15/05/2022
सुखदेव और भगत सिंह में काफी घनिष्ठता थी और बम कांड में जानेवाले व्यक्ति को लेकर दोनों में कुछ गलतफहमी भी हुई। उसी गलतफहमी को दूर करने के लिए भगतसिंहने सुखदेव को एक पत्र लिखा। नीचे उद्धृत यह पत्र 11 अप्रैल, 1929 को सुखदेव की गिरफ्तारी के समय उनसे बरामद हुआ और मुकदमे की कार्रवाई का हिस्सा बन गया।
प्यार और बलिदान-जैसे सूक्ष्म विषयों पर भगत सिंह के विचार इस पत्र से प्रकट हुए हैं और क्रान्तिकारियों के दिलों में कितनी गहरी मानवीय भावनाएँ थीं, यह पत्र इसका भी प्रमाण है।
सुखदेव के नाम पत्र
प्रिय भाई,
जब तक तुम्हें यह खत मिलेगा, मैं दूर मंजिल की ओर जा चुका होऊँगा। मेरा यकीन कर, आजकल मैं बहुत प्रसन्नचित्त अपने आखिरी सफर के लिए तैयार हूँ। अपनी जिन्दगी की सारी खुशियों और मधुर यादों के बावजूद मेरे दिल में एक बात आज तक चुभती रही। वह यह कि मुझे अपने भाई ने गलत समझा और मुझ पर कमजोरी का बहुत ही गम्भीर आरोप लगाया। आज मैं पहले से कहीं ज्यादा पूरी तरह से सन्तुष्ट हूँ। मैं आज भी महसूस करता हूँ कि वह बात कुछ भी नहीं, बस गलतफहमी थी। गलत शक था। मेरे खुले व्यवहार के कारण मुझे बातूनी समझा गया और मेरे द्वारा सबकुछ स्वीकार कर लेने को कमजोरी माना गया। लेकिन आज मैं महसूस कर रहा हूँ कि कोई गलतफहमी नहीं, मैं कमजोर नहीं, अपनों में से किसी से भी कमजोर नहीं।
भाई मेरे, मैं साफ दिल से विदा लूँगा और तुम्हारी शंका भी दूर करूँगा। इसमें तुम्हारी बहुत कृपालुता होगी। ध्यान रहे, तुम्हें जल्दबाजी से कोई कदम नहीं उठाना चाहिए। सोच-समझकर और शान्ति से काम को आगे बढ़ाना। अवसर पा लेने की जल्दबाजी न करना। जनता के प्रति जो तुम्हारा फर्ज है उसे निभाते हुए काम को सावधानीपूर्वक करते रहना। सलाह के तौर पर मैं कहना चाहता हूँ कि शास्त्री मुझे पहले से अधिक अच्छा लग रहा है। मैं उसे सामने लाने की कोशिश करता, बशर्ते कि वह साफगोई से अपने आपको एक अँधेरे भविष्य के लिए अर्पित करने के लिए सहमत हो। उसे साथियों के नजदीक आने दो ताकि वह उनके आचार-विचार का अध्ययन कर सके। यदि वह अर्पित भाव से काम करेगा तो काफी लाभदायक और मूल्यवान सिद्ध होगा। लेकिन जल्दबाजी न करना। तुम स्वयं अच्छे पारखी हो। जिस तरह जँचे, देख लेना। आ मेरे भाई, अब हम खुशियाँ मना लें।
खैर, मैं कह सकता हूँ कि बहस के मामले में मुझसे अपने पक्ष पेश किए बिना नहीं रहा जाता। मैं पुरजोर कहता हूँ कि मैं आशाओं और आकांक्षाओं से भरपूर जीवन की समस्त रंगीनियों से ओतप्रोत हूँ, लेकिन वक्त आने पर मैं सबकुछ कुर्बान कर दूँगा। सही अर्थों में यही बलिदान है। यह वस्तुएँ मनुष्य की राह में कभी भी अवरोध नहीं बन सकतीं, बशर्ते कि वह इनसान हो। जल्द ही तुम्हें इसका प्रमाण मिल जाएगा। किसी के चरित्र के सन्दर्भ में विचार करते समय एक बात विचारणीय होनी चाहिए कि क्या प्यार किसी इनसान के लिए मददगार साबित हुआ है? इसका जवाब मैं आज देता हूँ- हाँ, वह मेजिनी था। तुमने अवश्य पढ़ा होगा कि अपने पहले नाकाम विद्रोह, मन को कुचल डालनेवाली हार का दुख और दिवंगत साथियों की याद- यह सब वह बर्दाश्त नहीं कर सकता था। वह पागल हो जाता या खुदकशी कर लेता। लेकिन प्रेमिका के एक पत्र से वह दूसरों जितना ही नहीं, बल्कि सबसे अधिक मजबूत हो गया।
जहाँ तक प्यार के नैतिक स्तर का सम्बन्ध है, मैं यह कह सकता हूँ कि यह अपने में एक भावना से अधिक कुछ भी नहीं और यह पशुवृत्ति नहीं बल्कि मधुर मानवीय भावना है। प्यार सदैव मानवचरित्र को ऊँचा करता है, कभी भी नीचा नहीं दिखाता, बशर्ते कि प्यार प्यार हो। इन लड़कियों (प्रेमिकाओं) को कभी भी पागल नहीं कहा जा सकता है जैसा कि हम फिल्मों में देखते हैं- वे सदैव पाशविक वृत्ति के हाथों में खेलती हैं। सच्चा प्यार कभी भी सृजित नहीं किया जा सकता। यह अपने ही आप आता है- कब, कोई कह नहीं सकता?
मैं यह कह सकता हूँ कि नौजवान युवक-युवती आपस में प्यार कर सकते हैं और वे अपने प्यार के सहारे अपने आवेगों से ऊपर उठ सकते हैं। अपनी पवित्रता कायम रखे रह सकते हैं। मैं यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि जब मैंने प्यार को मानवीय कमजोरी कहा था तो यह किसी सामान्य व्यक्ति को लेकर नहीं कहा था, जहाँ तक कि बौद्धिक स्तर पर सामान्य व्यक्ति होते हैं पर वह सबसे उच्च आदर्श स्थिति होगी जब मनुष्य प्यार, घृणा और अन्य सभी भावनाओं पर नियन्त्रण पा लेगा। जब मनुष्य कर्म के आधार पर अपना पक्ष अपनाएगा। एक व्यक्ति की दूसरे व्यक्ति से प्यार की मैंने निन्दा की है, वह भी एक आदर्श स्थिति होने पर। मनुष्य के पास प्यार की एक गहरी भावना होनी चाहिए जिसे वह एक व्यक्ति विशेष तक सीमित न करके सर्वव्यापी बना दे।
मेरे विचार से मैंने अपने पक्ष को काफी स्पष्ट कर दिया है। हाँ, एक बात मैं तुम्हें खासतौर पर बताना चाहता हूँ कि बावजूद क्रान्तिकारी विचारों के हम नैतिकता सम्बन्धी सभी सामाजिक धारणाओं को नहीं अपना सके। क्रान्तिकारी बातें करके इस कमजोरी को बहुत सरलता से छिपाया जा सकता है, लेकिन वास्तविक जीवन में हम तुरन्त ही थर-थर काँपना शुरू कर देते हैं।
मैं तुमसे अर्ज करूँगा कि यह कमजोरी त्याग दो। अपने मन में बिना कोई गलत भावना लाए अत्यन्त नम्रतापूर्वक क्या मैं तुमसे आग्रह कर सकता हूँ कि तुममें जो अति आदर्शवाद है उसे थोड़ा-सा कम कर दो। जो पीछे रहेंगे और मेरी-जैसी बीमारी का शिकार होंगे, उनसे बेरुखी का व्यवहार न करना, झिड़ककर उनके दुख-दर्दों को न बढ़ाना, क्योंकि उनको तुम्हारी हमदर्दी की जरूरत है। क्या मैं यह आशा रखूँ कि तुम किसी विशेष व्यक्ति के प्रति खुन्दक रखने के बजाय उनसे हमदर्दी रखोगे, उनको इसकी बहुत जरूरत है। तुम तब तक इन बातों को नहीं समझ सकते जब तक कि स्वयं इस चीज़ का शिकार न बनो। लेकिन मैं यह सबकुछ क्यों लिख रहा हूँ? दरअसल मैं अपनी बातें स्पष्ट तौर पर कहना चाहता हूँ। मैंने अपना दिल खोल दिया है।
तुम्हारी सफलताओं और जीवन के लिए शुभकामनाओं के साथ।
तुम्हारा,
भगत सिंह