30/12/2023
बरसों पहले मैं यूपीएससी का इंटरव्यू देने दिल्ली के धौलपुर हाऊस गई तो वहां इंटरव्यू देने आए जेएनयू के एक छात्र ने कहा कि हम हॉस्टल में हर रोज कम से कम बीस इंटरव्यू पिछले कई दिनों से दे रहे हैं ।अलीराजपुर के हमारे पूर्व कलेक्टर और वर्तमान आगरमालवा कलेक्टर श्री राघवेन्द्र सिहं के पहले उपन्यास 615 पूर्वांचल हॉस्टल को पढ़ा तो इस बात की गहराई को समझा ।उपन्यास में शेखर जब रूट नंबर 615 की बस से पहली बार जेएनयू आया तो सच में मैंने इंतजार किया कि इसकी रैगिंग कब होगी पर यहाँ तो उलट उसका सीनियर राजेश उसे अपने कमरे में रुकाए है ।जेएनयू की फीस बढ़ने की खबर पर जो जेएनयू में बवाल की खबरें कुछ साल पहले देखीं थी तो औरों की तरह मुझे भी लगा था कि इन लोगों को टैक्स पेयर के पैसे पर बस साल दर साल हॉस्टल में रहकर किसी कोर्स में एडमिशन लेकर बस पढ़ते जाना है ।पर अब लगता है-- नहीं ,देश के युवा की कुछ बनना है तो जेएनयू जैसी संस्थाएँ होनी ही चाहिए ।
सर ने जेएनयू के हॉस्टलों का नाम सहित खूब वर्णन किया है ।वहाँ का मेनु ,हरियाली ,अमलतास, ढाबे ,चाय ,चाट सम्मेलन, चुनाव,दोपहर की नींद ,दिन और रातों का वर्णन पढ़कर लगता है- " हम जेएनयू में काहे नहीं पढ़े बे ?"
पुस्तक में हमारा पसंदीदा कैरेक्टर है ईवा ।अपने कॉलेज की टॉपर,आत्मविश्वास से लबरेज,उसे मालूम है उसे क्या करना है ,प्रेम है पर उसे दायरों में बाँधना नहीं चाहती ,उसकी पहचान उसका नाम है ।हासिल करने की प्रक्रिया से दूर रहना चाहती है ऊबने से डरती है।नारी मन की इतनी थाह कब पा लिऐ बताईये सर।
शेखर हिंदी बेल्ट का सामान्य लङका है जो जिंदगी में कुछ पाने ,बनने की कोशिश करता है भी तो दूसरे के योग्य होने या बराबर होने के लिऐ ।स्वीकार्यता के लिऐ हमारा संघर्ष ही हम में से ज्यादातर की जिंदगी का दंश है ।किसी ने हमसे कहा कि सर ही शेखर हैं !!ऐसा क्या ?नहीं , हमें ऐसा नहीं लगा ।
स्निग्धा,निधि ,प्रदीप ,सपना ,राजशेखर ,योगेश सब के अपने जीवन के उद्देश्य हैं।इन सब के बीच हम कन्हैया कुमार को ढूंढते रहे- चच्चा? राजीव रंजन ?पर चच्चा का अंत में बदल जाना और नौकरी ढूंढना सुखद लगा ।
पुस्तक में कामरेड,तर्क वितर्क,अच्छे प्रोफेसर और गाईड सब हैं । पर हमने महसूस किया कि जेएनयू में जवाहरलाल नेहरू नहीं हैं ।पूरी पुस्तक में एक बार भी जिक्र तक नहीं ,जैसे एकदम इतने गैरजरूरी हो।
पूरी पुस्तक पढ़कर मंथन करने योग्य है ।बहुत से ब्रहमवाक्य गढ़े गए हैं जो जेएनयू और उसके छात्रों के दिऐ सटीक हैं ।पुस्तक पढ़कर जेएनयू में नहीं पढ़ने का ग़म सालता है ।
सर को शानदार पुस्तक के लिऐ बहुत बहुत बधाई ।अगली पुस्तक का इंतजार रहेगा ।