16/06/2026
धार्मिक राजनीति के बजाय सकारात्मक राजनीति की आवश्यकता
देश की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों से धार्मिक ध्रुवीकरण की प्रवृत्ति बढ़ती दिखाई दे रही है। हिंदू-मुस्लिम मुद्दों को राजनीतिक बहस का केंद्र बनाकर वोट हासिल करने की कोशिशें की जाती हैं। ऐसे माहौल में मुस्लिम राजनीतिक दलों और नेतृत्व की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि वे उसी रास्ते पर चलने के बजाय सकारात्मक, रचनात्मक और दूरदर्शी राजनीति को अपनाएं।
लोकतंत्र में सफलता का आधार धार्मिक नारे, भावनात्मक भाषण या भीड़ की राजनीति नहीं, बल्कि जनता की समस्याओं का समाधान होता है। शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, किसानों की समस्याएं, महंगाई, महिलाओं की सुरक्षा और युवाओं का भविष्य ऐसे मुद्दे हैं जो हर नागरिक से जुड़े हुए हैं। यदि मुस्लिम राजनीतिक दल भी केवल धार्मिक पहचान की राजनीति तक सीमित रहेंगे, तो इससे समाज में दूरी बढ़ेगी और वास्तविक समस्याएं पीछे छूट जाएंगी।
मुस्लिम नेतृत्व को चाहिए कि वह संविधान के मूल्यों, सामाजिक सद्भाव, शिक्षा, आर्थिक सशक्तिकरण और युवाओं के विकास को अपनी राजनीति का केंद्र बनाए। मुसलमानों की वास्तविक तरक्की भावनात्मक नारों से नहीं, बल्कि आधुनिक शिक्षा, राजनीतिक जागरूकता, आर्थिक आत्मनिर्भरता और राष्ट्रीय मुख्यधारा में प्रभावी भागीदारी से संभव है।
यह भी सच है कि जब राजनीति धर्म के आधार पर बंटने लगती है, तो समाज में अविश्वास और तनाव बढ़ता है। इसलिए समझदारी इसी में है कि मुस्लिम राजनीतिक दल प्रतिक्रिया की राजनीति से बचें और सेवा, विकास तथा जनहित की राजनीति को प्राथमिकता दें। नफरत का जवाब नफरत से नहीं, बल्कि बेहतर सोच, बेहतर नेतृत्व और बेहतर कार्यों से दिया जाना चाहिए।
एक मजबूत लोकतंत्र तभी बन सकता है जब सभी राजनीतिक दल धर्म और जाति से ऊपर उठकर जनता के वास्तविक मुद्दों पर काम करें। राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सौहार्द और देश की प्रगति का रास्ता भी इसी सोच से होकर गुजरता है। आज समय की मांग है कि राजनीति को टकराव का नहीं, बल्कि विकास और भाईचारे का माध्यम बनाया जाए।
✍️ अकील अहमद
एडवोकेट, हाई कोर्ट, इलाहाबाद
प्रदेश सचिव, राष्ट्रीय लोक दल (RLD), उत्तर प्रदेश