Aqeel Ahmad Advocate

Aqeel Ahmad Advocate State Secreatary Rashtriya Lokdal
Uttar Pradesh

03/06/2026

مت پوچھ مسلمان کا حال
آج مسلمان امت کا حال ایسا ہے کہ دین سے محبت کے دعوے تو بہت ہیں، مگر عمل میں کمزوری نظر آتی ہے۔ ہم مسجدوں کی تعمیر کے لیے ہر ممکن کوشش کرتے ہیں، چندہ دیتے ہیں اور خوبصورت عمارتیں بناتے ہیں، لیکن انہی مسجدوں کو نمازیوں سے آباد کرنے کی طرف کم توجہ دیتے ہیں۔
اسی طرح نبی کریم ﷺ سے محبت ہر مسلمان کے ایمان کا حصہ ہے۔ آپ ﷺ کا نام آتے ہی دل عقیدت سے بھر جاتا ہے، مگر محبت کا اصل تقاضا آپ ﷺ کی سنتوں پر عمل کرنا ہے۔ اگر سنتیں ہماری زندگی میں نظر نہ آئیں تو محبت کا دعویٰ ادھورا رہ جاتا ہے۔
اسلام صرف جذبات کا نہیں بلکہ عمل کا دین ہے۔ نماز، اخلاق، دیانت داری، بھائی چارہ اور سنتِ نبوی ﷺ کی پیروی ہی ایک سچے مسلمان کی پہچان ہے۔ جب ہم اپنی زندگیوں میں دین کو نافذ کریں گے تو ہماری مساجد بھی آباد ہوں گی اور معاشرہ بھی بہتر ہوگا۔
اللہ تعالیٰ ہمیں نماز کی پابندی، سنتِ رسول ﷺ پر عمل اور دینِ اسلام کی صحیح سمجھ عطا فرمائے۔
عقیل احمد ایڈووکیٹ
ہائی کورٹ الٰہ آباد

03/06/2026

पुराने आवंटियों से दोबारा सिक्योरिटी डिपॉजिट और किराया वसूलना अन्यायपूर्ण
हाईकोर्ट इलाहाबाद के अधिवक्ताओं के लिए चेम्बर केवल एक कमरा नहीं बल्कि उनके पेशेवर जीवन का आधार है। वर्षों पहले जिन अधिवक्ताओं को विधिवत रूप से चेम्बर आवंटित किए जा चुके हैं और जिन्होंने उस समय की सभी शर्तों का पालन किया था, उनसे पुनः सिक्योरिटी डिपॉजिट जमा कराना या अतिरिक्त आर्थिक भार डालना न्यायसंगत प्रतीत नहीं होता।
दिनांक 01.06.2026 की सूचना के अनुसार मासिक किराये तथा सिक्योरिटी डिपॉजिट की दरों में संशोधन किया गया है। यद्यपि नई दरों में कुछ कमी की गई है, फिर भी यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि जो अधिवक्ता पहले से आवंटी हैं, उनसे पुनः सिक्योरिटी डिपॉजिट लेने का क्या औचित्य है?
सिक्योरिटी डिपॉजिट का उद्देश्य सामान्यतः नए आवंटन के समय सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है। जिन अधिवक्ताओं को वर्षों पूर्व चेम्बर आवंटित हो चुका है और जो लगातार उसका उपयोग कर रहे हैं, उनसे पुनः डिपॉजिट की मांग करना दोहरी आर्थिक वसूली जैसा प्रतीत होता है।
इसके अतिरिक्त, अधिवक्ता न्याय व्यवस्था के अभिन्न अंग हैं। सरकार अपने कर्मचारियों, विधायकों, सांसदों तथा अनेक अन्य संवैधानिक पदाधिकारियों को कार्यस्थल संबंधी सुविधाएं उपलब्ध कराती है। ऐसे में न्यायालयों में न्यायिक कार्य को सुचारु रूप से संचालित करने वाले अधिवक्ताओं पर अत्यधिक आर्थिक बोझ डालना उचित नहीं कहा जा सकता।
पुराने आवंटियों के संबंध में निम्न मांगें विचारणीय हैं—
पुराने आवंटियों से किसी भी प्रकार का नया सिक्योरिटी डिपॉजिट न लिया जाए।
यदि पूर्व में डिपॉजिट जमा कराया जा चुका है तो उसे पर्याप्त माना जाए।
पुराने आवंटियों को विशेष संरक्षण प्रदान किया जाए।
अधिवक्ताओं के हितों को ध्यान में रखते हुए किराये की व्यवस्था यथासंभव न्यूनतम रखी जाए।
चेम्बर को अधिवक्ताओं की पेशेगत आवश्यकता मानते हुए कल्याणकारी दृष्टिकोण अपनाया जाए।
अतः एडवोकेट्स एसोसिएशन एवं संबंधित प्राधिकरण से विनम्र अनुरोध है कि पुराने आवंटियों से पुनः सिक्योरिटी डिपॉजिट लेने तथा अतिरिक्त आर्थिक भार डालने के निर्णय पर पुनर्विचार किया जाए और अधिवक्ताओं के हित में न्यायोचित व्यवस्था लागू की जाए।
अक़ील अहमद
एडवोकेट, हाईकोर्ट इलाहाबाद

02/06/2026

अधिवक्ताओं पर किराया थोपना कहाँ तक उचित?
— अक़ील अहमद एडवोकेट, प्रदेश सचिव, राष्ट्रीय लोक दल, उत्तर प्रदेश
इलाहाबाद उच्च न्यायालय बार एसोसिएशन द्वारा चैंबरों और सीटों पर मासिक किराया तथा सिक्योरिटी डिपॉजिट बढ़ाने का प्रस्ताव अधिवक्ताओं के बीच गंभीर चिंता का विषय बन गया है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस भवन का निर्माण जनता के टैक्स के पैसे से हुआ है, उसी भवन में न्यायिक व्यवस्था के अभिन्न अंग अधिवक्ताओं से किराया वसूलने का औचित्य क्या है?
अधिवक्ता कोई व्यापारी या कारोबारी वर्ग नहीं हैं। वे न्यायपालिका के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं और न्याय दिलाने की प्रक्रिया में न्यायालय की सहायता करते हैं। संविधान और कानून के शासन को मजबूत बनाने में अधिवक्ताओं की केंद्रीय भूमिका है। ऐसे में उनके बैठने और कार्य करने की व्यवस्था उपलब्ध कराना सरकार और न्यायालय प्रशासन की जिम्मेदारी है।
यदि सरकार अपनी ही इमारत के रखरखाव के लिए अधिवक्ताओं से किराया वसूलना चाहती है, तो फिर यह प्रश्न भी उठेगा कि क्या विधानसभा और लोकसभा के सदस्यों से उनके कार्यालयों का किराया लिया जाता है? क्या सरकारी कर्मचारियों से उनके कार्यालयों की सीट का किराया वसूला जाता है? क्या रोडवेज के कर्मचारियों से बस अड्डों पर बैठने का किराया लिया जाता है? क्या सरकारी अस्पतालों के डॉक्टरों से उनके केबिन का किराया लिया जाता है? जब इन वर्गों से ऐसा नहीं किया जाता, तो केवल अधिवक्ताओं पर यह आर्थिक बोझ डालना न्यायसंगत प्रतीत नहीं होता।
वास्तविकता यह है कि हजारों युवा अधिवक्ता पहले से ही आर्थिक कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। मुकदमों की संख्या, बढ़ती महंगाई और पेशे की प्रारंभिक चुनौतियों के बीच अतिरिक्त किराया और भारी सिक्योरिटी डिपॉजिट उन पर अनावश्यक बोझ डालेंगे। इससे न्यायिक पेशे में आने वाले नए और साधनहीन अधिवक्ताओं को सबसे अधिक नुकसान होगा।
यदि भवन के रखरखाव के लिए धन की आवश्यकता है, तो सरकार और प्रशासन अन्य विकल्पों पर विचार कर सकते हैं। सिक्योरिटी डिपॉजिट की राशि को बैंक में जमा कर उसके ब्याज का उपयोग रखरखाव कार्यों में किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त राज्य सरकार को न्यायिक आधारभूत संरचना के लिए पर्याप्त बजट उपलब्ध कराना चाहिए।
अधिवक्ता समाज यह मानता है कि न्यायालय परिसर में बैठने की व्यवस्था कोई सुविधा नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया के सुचारु संचालन की अनिवार्य आवश्यकता है। इसलिए अधिवक्ताओं पर मासिक किराया थोपने के बजाय उनकी समस्याओं का समाधान किया जाना चाहिए। न्यायपालिका की मजबूती अधिवक्ताओं की मजबूती से जुड़ी हुई है, और उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालना न्याय के हित में नहीं होगा।

30/05/2026

वकीलों पर तंज करने वालों के नाम
अक्सर कुछ लोग मज़ाक में कहते हैं, "जब वकील पैदा हुआ तो शैतान बोला कि अब हम भी साहिब-ए-औलाद हो गए।" यह एक पुराना तंज है, लेकिन हक़ीक़त इससे बिल्कुल अलग है।
आज समाज में अगर किसी गरीब, मज़लूम, कमज़ोर और बेबस इंसान को न्याय दिलाने वाला कोई सबसे मज़बूत स्तंभ है तो वह अधिवक्ता (वकील) है। वकील अदालत में केवल अपने मुवक्किल की पैरवी नहीं करता, बल्कि संविधान, कानून और इंसाफ़ की हिफाज़त भी करता है।
हर पेशे में अच्छे और बुरे लोग हो सकते हैं। डॉक्टर, व्यापारी, नेता, मौलवी, पंडित या वकील—किसी एक व्यक्ति की गलती के आधार पर पूरे पेशे को बदनाम करना उचित नहीं है। समाज में यह भी देखा जाता है कि कुछ डॉक्टर अनावश्यक जांच लिखकर पैथोलॉजी से कमीशन लेते हैं या इलाज के नाम पर भारी शुल्क वसूलते हैं। कुछ धार्मिक और सामाजिक पदों पर बैठे लोग भी आलीशान जीवन जीते हैं। लेकिन इससे पूरे पेशे को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
वकील की कमाई उसकी मेहनत, अध्ययन, अनुभव और अदालत में घंटों की बहस का परिणाम होती है। वह वर्षों तक कानून की पढ़ाई करता है और न्याय की लड़ाई लड़ता है। जब किसी निर्दोष को जेल से रिहाई मिलती है, किसी गरीब को उसका हक़ मिलता है या किसी पीड़ित को न्याय मिलता है, तो उसके पीछे अक्सर किसी अधिवक्ता की अथक मेहनत होती है।
इसलिए किसी भी पेशे का सम्मान होना चाहिए। विशेष रूप से वकालत जैसे पेशे का, जो लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था की रीढ़ माना जाता है।
— अकील अहमद एडवोकेट
हाई कोर्ट इलाहाबाद
प्रदेश सचिव, राष्ट्रीय लोक दल (उत्तर प्रदेश)

27/05/2026
23/05/2026

अधिवक्ता समाज को बदनाम करने वाले भ्रामक प्रचार की कड़ी निंदा करता हूँ। कोई व्यक्ति अपराधी हो सकता है, लेकिन “फ़र्ज़ी वकील” जैसा शब्द पूरे अधिवक्ता वर्ग का अपमान है। कुछ लोगों की गलती के आधार पर लाखों ईमानदार अधिवक्ताओं की प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगाना उचित नहीं है। मीडिया और संबंधित संस्थाओं को तथ्यों के साथ जिम्मेदारीपूर्ण भाषा का प्रयोग करना चाहिए।
— अकील अहमद एडवोकेट
प्रदेश सचिव, राष्ट्रीय लोकदल (RLD)
हाई कोर्ट, इलाहाबाद

21/05/2026

मई–जून के महीने में किसान अपनी भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए धैंचा की बुवाई करते हैं। धैंचा एक उत्कृष्ट हरी खाद है, जो मिट्टी में जैविक तत्व और नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाकर भूमि को अधिक उपजाऊ बनाती है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि बुवाई का समय शुरू हो चुका है, लेकिन सरकारी बीज गोदामों पर धैंचा का बीज उपलब्ध नहीं है।
सरकार और कृषि विभाग को तत्काल संज्ञान लेकर पर्याप्त मात्रा में धैंचा बीज उपलब्ध कराना चाहिए, ताकि किसानों को समय पर बीज मिल सके और वे अपनी खेती की लागत कम करते हुए भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ा सकें। किसानों को कृषि संबंधी योजनाओं का लाभ तभी मिलेगा जब आवश्यक बीज और संसाधन समय पर उपलब्ध कराए जाएं।
— अकील अहमद एडवोकेट
प्रदेश सचिव, राष्ट्रीय लोक दल (RLD)

21/05/2026

اِنَّا لِلّٰهِ وَاِنَّا اِلَيْهِ رَاجِعُوْنَ
نہایت افسوس کے ساتھ اطلاع دی جاتی ہے کہ ہمارے بڑے ساڑھو جناب شُفیان احمد ساکن گاؤں کوہنڈا، ضلع اعظم گڑھ کا 21 مئی 2026ء کو رات 2:30 بجے انتقال ہو گیا۔ آج نمازِ عصر کے بعد ان کی تدفین عمل میں آئی۔
اللہ تعالیٰ مرحوم کی مغفرت فرمائے، ان کی تمام خطاؤں کو معاف فرمائے، انہیں جنت الفردوس میں اعلیٰ مقام عطا فرمائے اور تمام اہلِ خانہ کو صبرِ جمیل نصیب فرمائے۔
اِنَّا لِلّٰهِ وَاِنَّا اِلَيْهِ رَاجِعُوْنَ
🤲 آمین یا رب العالمین۔

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Allahabad
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