LEGAL Remarks ?

LEGAL Remarks ? for legal awareness

05/12/2024

लोग यह कहते हुए बहुत खुश होते हैं कि वकील झूठे होते हैं, लेकिन वे पता नहीं क्यों यह भूल जाते हैं कि हम अदालत में जो भी दस्तावेज़ पेश करते हैं, उसके साथ मुवक्किल द्वारा दिया गया एक शपथ-पत्र भी होता है, जिसमें दावा किया जाता है कि यह सब सच है, जिसकी जिम्मेदारी वह खुद लेता है। इसलिए, अगर कोई झूठ बोल रहा है, तो वह हम नहीं हैं - मुवक्किल हैं। हम तो बस शानदार डिग्री वाले संदेशवाहक हैं!

Manish Kumar Sharma, Advocate
District Court, Bhiwani

क्या गूगल जैसे बड़े मगरमच्छ हमारे भारत के app developers को मारने का काम कर रहा है। निष्पक्ष होकर चिंतन करिए।  अमेरिका क...
17/03/2024

क्या गूगल जैसे बड़े मगरमच्छ हमारे भारत के app developers को मारने का काम कर रहा है। निष्पक्ष होकर चिंतन करिए। अमेरिका के app को विशेष सुविधाएं देता है और भारतीय app से भेदभाव करता है। ऐसा कोई सगा नही जिसे अमेरिका और उसकी कंपनियों ने ठगा नही। मुझे तो कम से कम यही लगता है।

मनीष कुमार शर्मा, एडवोकेट
भिवानी कोर्ट

MP में लगभग 1 सप्ताह के अंदर दो बड़ी घटनाएं हुईं. दोनों का वीडियो वायरल हुआ. एक में मुस्लिम लोग 2 दलित युवकों को जूते की...
05/07/2023

MP में लगभग 1 सप्ताह के अंदर दो बड़ी घटनाएं हुईं. दोनों का वीडियो वायरल हुआ. एक में मुस्लिम लोग 2 दलित युवकों को जूते की माला पहनाकर पूरे गांव में घुमाते हैं, मारते-पीटते हैं, मैला खिलाते हैं. कुछ मुसलमान पत्रकार मुस्लिमों के इस कृत्य का बचाव भी करते हैं. दूसरे में एक ब्राह्मण व्यक्ति गरीब लाचार आदिवासी युवक के ऊपर वाशरूम करता है. ब्राह्मण समेत सभी लोग प्रवेश शुक्ला नामक इस व्यक्ति पर कार्रवाई की मांग करते हैं. लेकिन कुछ नफरती जातिवादी लोग, प्रवेश शुक्ला वाले केस में जातिवाद का नंगा नाच करते हैं, ये वही हैं जो शिवपुरी वाले केस में जहां आरोपी मुस्लिम है वहाँ एकदम मौन रहते हैं. वास्तव में दलित समाज के सबसे बड़े दुश्मन ये नई नवेले अराजकतावादी, अवसरवादी, छूटभईया, घृणित मानसिकता वाले नेता ( self declared ) हैं. जो उन्हें जातिवाद के नफरत में उलझा कर रखना चाहते हैं. इन्हें किसी पीड़ित के साथ कोई संवेदना नहीं. ये बस जातिवाद का नंगा नाच कर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना चाहते हैं. ये समाज के लिए दीमक हैं.

आजकल बकरा चर्चा में बना हुआ है, कुछ लोग इसकी हत्या का विरोध कर रहे हैं तो कुछ बेशर्मी के साथ उसे डिफेंड कर रहे. भले आप म...
28/06/2023

आजकल बकरा चर्चा में बना हुआ है, कुछ लोग इसकी हत्या का विरोध कर रहे हैं तो कुछ बेशर्मी के साथ उसे डिफेंड कर रहे. भले आप मांसाहारी हों लेकिन आप भी इस बात पर यकीनकरेंगे ही कि जीव हत्या पाप है.

मैं शाकाहारी हूं, मुझे जीव हत्या पाप लगती है। मैं भगवान से डरता हूं। इसलिए कभी भी मांसाहार नहीं कर सकता। जो लोग बकरा नहीं काटने की अपील कर रहे उम्मीद है वो मांसाहार नहीं करते होंगे या जो करते रहें होंगे वो छोड़ देंगे. तब यह एक अच्छी पहल हो सकती है। खैर किसे क्या खाना है क्या नहीं इसके लिए लिए वो स्वतंत्र है, मांसाहार करना या न करना किसी नैतिकता का पैमाना नहीं है। लेकिन मांसाहार छोड़ने को लेकर जितने लोगों को जागरुक किया जा सके वो भी कोई कम नहीं। बकरा/मुर्गा या अन्य जीव की हत्या कर खाने को किसी आधार पर समर्थन नहीं किया जा सकता। मेरे जान पहचान में भी जो लोग करते हैं मैं उन्हें भी मना करता हूं, उनसे भी कहता हूं ये गलत है मत करो। लेकिन अंतिम इच्छा उन्हीं की है। उन्हें जैसा सही लगता है वो करें।

27/06/2023

सरकार ने समान नागरिक संहिता पर सुझाव मांगे है।

मेरा एक सुझाव यह है कि

"अगर कोई भी व्यक्ति किसी भी जाति धर्म लिंग का हो अगर वह दो बच्चों से ज्यादा बच्चे पैदा करता है तो यह अपने आप में महिला के प्रति क्रूरता मानी जाएगी। यह conclusive proof होगा, यानी कि इस कथन को ना साबित करने के लिए कोई भी साक्ष्य न्यायालय में नहीं दिया जा सकता।
और यह एक सक्षम आधार होगा पत्नी अपने पति से किसी भी समय तलाक ले सकती है या फिर seperation की डिग्री ले सकती है या फिर reconstruction of conjugal right में अपनी तरफ से इस आधार को डिफेंस में लाती है तो यह एक सक्षम आधार होगा और इसे सभी आधारों पर वरीयता दी जाएगी तथा न्यायालय इस आधार पर विश्वास करेंगे।

और अगर पत्नी इस आधार पर अलग रहती है तो वह गुजारे भत्ते की भी हकदार होगी। और अगर उस पति पत्नी के बच्चे भी अपने पिता से अलग रहते हैं तो वह भी इस आधार पर गुजारे भत्ते की हकदार होंगे।"

मनीष कुमार शर्मा, अधिवक्ता
जिला न्यायलय, भिवानी

21/04/2023

जनसंख्या नियंत्रण के लिए पी वी नरसिंह राव सरकार 79 संविधान संशोधन विधेयक लेकर आई थी। इसके जरिए" विधायकों और सांसदों को 2 बच्चों के नीति के दायरे में लाना था" लेकिन दुर्भाग्य है की अपनी राजनीति चमकाने के लिए सांसदों ने अपनी जिम्मेदारी नहीं समझी और यह विधेयक कानून का रूप नहीं दे पाया।

अधिवक्ता मनीष शर्मा
न्याय परिषर भिवानी

SC/ST (Prevention of Atrocities) Act, 1989 कितना प्रासंगिक   ?????????????अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निव...
07/04/2023

SC/ST (Prevention of Atrocities) Act, 1989 कितना प्रासंगिक ?????????????

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, जिसे अनुसूचित जाति / अनुसूचित जनजाति अधिनियम के रूप में भी जाना जाता है, 1989 में भारतीय संसद द्वारा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के खिलाफ अत्याचार को रोकने के उद्देश्य से अधिनियमित किया गया था, जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से इसका सामना किया है। भारत में भेदभाव और हिंसा

हालांकि, ऐसे उदाहरण हैं जहां अधिनियम का दुरुपयोग किया गया है, मुख्य रूप से अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदायों के लोगों द्वारा, जिन्होंने अन्य समुदायों के सदस्यों पर उनके खिलाफ अत्याचार करने का झूठा आरोप लगाया है। इस तरह के झूठे मामले निर्दोष लोगों के उत्पीड़न और गिरफ्तारी का कारण बन सकते हैं और सामाजिक सद्भाव को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं और समुदायों के बीच तनाव पैदा कर सकते हैं।

अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के दुरुपयोग का मुद्दा भारत में बहस और चर्चा का विषय रहा है। कुछ लोगों ने तर्क दिया है कि इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए अधिनियम में संशोधन की आवश्यकता है, जबकि अन्य का कहना है कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदायों के सदस्यों के अधिकारों की रक्षा के लिए अधिनियम आवश्यक है।

2018 में, भारत सरकार ने अधिनियम में एक संशोधन पारित किया जिसमें इसके दुरुपयोग के आसपास की कुछ चिंताओं को दूर करने की मांग की गई थी। संशोधन ने अधिनियम के तहत झूठे मामले दर्ज करना और कठिन बना दिया, और कुछ मामलों में जमानत देने का भी प्रावधान किया। हालांकि, संशोधन को कुछ हलकों से विरोध का सामना करना पड़ा, जिन्होंने महसूस किया कि यह अधिनियम द्वारा प्रदान की गई सुरक्षा को कम कर देता है।

कुल मिलाकर, अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदायों के सदस्यों के अधिकारों की रक्षा और अधिनियम के दुरुपयोग को रोकने के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण है। यह उपायों के संयोजन के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है, जिसमें अधिनियम का बेहतर कार्यान्वयन, इसका दुरुपयोग करने वालों के लिए कड़ी सजा, और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदायों के सदस्यों द्वारा सामना किए जाने वाले मुद्दों के बारे में अधिक जागरूकता और शिक्षा शामिल है।

मनीष शर्मा ( एडवोकेट )
न्याय परिसर भिवानी

05/04/2023

पशु क्रूरता एक प्रमुख मुद्दा है जो हर साल लाखों जानवरों को प्रभावित करता है। यह उपेक्षा और परित्याग से लेकर शारीरिक शोषण और यातना तक कई रूप ले सकता है। क्रूरता के प्रकार के बावजूद, यह एक क्रूर और अमानवीय प्रथा है जिसे रोकने की जरूरत है।

पशु क्रूरता के सबसे आम रूपों में से एक उपेक्षा है। यह तब होता है जब किसी जानवर को भोजन, पानी, आश्रय और चिकित्सा जैसी उचित देखभाल नहीं दी जाती है। उपेक्षित जानवर कुपोषण, निर्जलीकरण, संक्रमण और परजीवी सहित कई स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित हो सकते हैं। कुछ इन स्थितियों से मर भी सकते हैं।

शारीरिक शोषण पशु क्रूरता का दूसरा रूप है। इसमें मारना, लात मारना, फेंकना या किसी जानवर को मारना भी शामिल हो सकता है। कुछ मामलों में, दुर्व्यवहार करने वाले जानवरों को नुकसान पहुँचाने के लिए हथियारों या अन्य वस्तुओं का उपयोग कर सकते हैं। जिन जानवरों का शारीरिक शोषण किया जाता है वे टूटी हुई हड्डियों, आंतरिक चोटों और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित हो सकते हैं। वे दुर्व्यवहार के परिणामस्वरूप भय, चिंता और अवसाद का अनुभव भी कर सकते हैं।

अत्याचार पशु क्रूरता का सबसे चरम रूप है। इसमें जानबूझ कर किसी जानवर को दर्द देना या आनंद प्राप्त करने के लिए पीड़ित करना शामिल है। यातना के उदाहरणों में जलना, डूबना और जानवरों का अंग-भंग करना शामिल है। यातना जानवरों को गंभीर शारीरिक और मनोवैज्ञानिक नुकसान पहुंचा सकती है, और कुछ मामलों में इसका परिणाम मृत्यु भी हो सकता है।

पशु क्रूरता एक गंभीर समस्या है जो घरेलू और जंगली दोनों जानवरों को प्रभावित करती है। यह अक्सर उन लोगों द्वारा किया जाता है जो या तो जानवरों की ज़रूरतों से अनभिज्ञ होते हैं या जो जानबूझकर उन्हें अपने सुख या लाभ के लिए नुकसान पहुँचाते हैं। कारण चाहे जो भी हो, पशु क्रूरता कभी भी उचित नहीं है।

पशु क्रूरता को रोकने के लिए कई संगठन और व्यक्ति काम कर रहे हैं। इनमें पशु आश्रय, पशु कल्याण संगठन और कानून प्रवर्तन एजेंसियां ​​शामिल हैं। इसके अलावा, कई देशों में जानवरों को क्रूरता से बचाने के लिए कानून हैं, और जो लोग इन कानूनों का उल्लंघन करते हैं, उन्हें जुर्माना, कारावास या दोनों का सामना करना पड़ सकता है।

व्यक्तियों के रूप में, हम पशु क्रूरता को रोकने के लिए भी अपनी भूमिका निभा सकते हैं। इसमें जानवरों को पालतू जानवरों की दुकानों या प्रजनकों से खरीदने के बजाय आश्रयों से गोद लेना, जानवरों के साथ दुर्व्यवहार या उपेक्षा के मामलों की रिपोर्ट करना और जानवरों की रक्षा के लिए काम करने वाले संगठनों का समर्थन करना शामिल है।

अंत में, पशु क्रूरता एक गंभीर समस्या है जो हर साल लाखों जानवरों को प्रभावित करती है। यह एक क्रूर और अमानवीय प्रथा है जिसे बंद करने की जरूरत है। एक साथ काम करके, हम यह सुनिश्चित करने में मदद कर सकते हैं कि जानवरों के साथ वह देखभाल और सम्मान किया जाए जिसके वे हकदार हैं।

मनीष शर्मा एडवोकेट
न्याय परिसर भिवानी

ऐसी घटनाएं साफ तौर पर दिखाती है कि महिलाओं को शोषण से बचाने के लिए उनके समर्थन में एकतरफा बने कानूनों का किस प्रकार से ग...
30/03/2023

ऐसी घटनाएं साफ तौर पर दिखाती है कि महिलाओं को शोषण से बचाने के लिए उनके समर्थन में एकतरफा बने कानूनों का किस प्रकार से गलत इस्तेमाल किया जा रहा है। यह तो एक बिल्कुल बच्चा भी बता सकता है कि कोई भी बलात्कार पीड़िता बलात्कार करने वाले से शादी तो दूर उसके पास एक सेकेंड के लिए रह भी नहीं सकती। जब कोई बलात्कार पीड़िता बलात्कारी के साथ शादी करती है तो क्या यह प्रश्न नहीं उठता की उसने उस व्यक्ति को बदनाम करने , या रुपए ऐठने के लिए, या शादी का दबाव डालने के लिए उसके तथा उसके पूरे परिवार की इज्जत को ध्वस्त कर दिया। इस प्रकार के मामलों में न्यायाधीशों को ऐसी महिलाओं पर सख्त से सख्त कार्रवाई करनी चाहिए यह मेरी व्यक्तिगत राय है। आप लोग इससे कितना सहमत हैं ???

ऐसी घटनाएं चीख चीख कर समाज को बताती है कि पुरुष की भी इज्जत होती है वह भी प्रताड़ित होता है, उसका भी अपमान होता है, और वह भी यातनाएं सहता है, उसके पास भी एक कोमल मन होता है,इसलिए कानून न्याय संगत होने चाहिए। मन में खोट किसी के भी हो सकता है । किसी को सिर्फ इसलिए अपराधी नहीं मान लेना चाहिए कि वह एक पुरुष है। अपराध का निर्धारण तर्कसंगत होना चाहिए।

मनीष शर्मा एडवोकेट।
न्याय परिसर भिवानी।।

14/02/2023

5 करोड़ मुकदमों के कारण 5 करोड़ परिवार अर्थात 30 करोड़ भारतीय अत्यधिक तनाव में हैं लेकिन संसद में तू-तू-मैं-मैं, आरोप-प्रत्यारोप और तू चोर मैं सिपाही का खेल चल रहा है!

1947 से पहले बने घटिया कानूनों को खत्म करने और पुलिस चार्टर, ज्यूडिशियल चार्टर, सिटिजन चार्टर पर चर्चा कब होगी?

अधिवकता मनीष शर्मा
न्याय परिसर भिवानी

जवानी में मुकदमा शुरू होता है और बुढ़ापे में जाकर खत्म होता हैवैज्ञानिकों ने 5000 किमी तक मार करने वाली अग्नि मिसाईल बना...
28/11/2022

जवानी में मुकदमा शुरू होता है और बुढ़ापे में जाकर खत्म होता है

वैज्ञानिकों ने 5000 किमी तक मार करने वाली अग्नि मिसाईल बना लिया लेकिन हमारे माननीय घटिया कानून नहीं बदल पाए

दृढ़ इच्छा शक्ति हो तो पुलिस रिफार्म, ज्यूडिशियल रिफार्म, इलेक्शन रिफार्म मात्र एक वर्ष में किया जा सकता है।

ऐसी घटनाएं हमें चीख चीख कर बताती हैं कि आजादी के तथा संविधान बनने के कितने सालों बाद तक हम कितने आजाद हो पाए हैं?????? क...
19/09/2022

ऐसी घटनाएं हमें चीख चीख कर बताती हैं कि आजादी के तथा संविधान बनने के कितने सालों बाद तक हम कितने आजाद हो पाए हैं?????? कुछ भी नहीं बदला वही औपनिवेशिक काल की पुलिस की मानसिकता तथा वही मानवीय जीवन की कीमत कीड़े मकोड़ों जितनी।।

पुलिस हिरासत में मौत अपने आप में कितना गंभीर अपराध है यह सोचने वाला विषय है। लेकिन हम इसके ऊपर कितने सजग हैं यह हम सभी जानते हैं। इस प्रकार के अपराधों से हद से ज्यादा सख्ती से निपटा जाना चाहिए तथा किसी पर भी कोई रहे नहीं दिखाना चाहिए।

अधिवक्ता मनीष शर्मा
न्याय परिसर भिवानी

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