Rahul Singh

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विश्वरंजन अंकल: एक अफ़सर, एक विद्वान, एक पारिवारिक मित्रछत्तीसगढ़ के पूर्व पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन जी के निधन की खबर न...
09/03/2026

विश्वरंजन अंकल: एक अफ़सर, एक विद्वान, एक पारिवारिक मित्र

छत्तीसगढ़ के पूर्व पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन जी के निधन की खबर ने भीतर तक झकझोर दिया। शनिवार रात उनके जाने की सूचना मिली तो मन में एक अजीब-सी रिक्तता भर गई। बचपन से उन्हें घर में आते-जाते, हँसते-बोलते, बहस करते, पढ़ते और पेंटिंग बनाते देखा था। इसलिए उनके न रहने की खबर सिर्फ एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के निधन की खबर नहीं थी, बल्कि जैसे परिवार का कोई अपना चला गया हो।

1973 बैच के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी विश्वरंजन जी मूलतः मध्यप्रदेश कैडर के थे। मध्यप्रदेश के विभाजन के बाद उन्हें छत्तीसगढ़ कैडर मिला और वे आगे चलकर वहां के पुलिस महानिदेशक बने। पुलिस सेवा में रहते हुए उनकी सबसे बड़ी पहचान उनकी इंटेलिजेंस पर अद्भुत पकड़ थी। मध्यप्रदेश में भी वे लंबे समय तक इंटेलिजेंस में रहे और बाद में डेपुटेशन पर दिल्ली में इंटेलिजेंस ब्यूरो में महत्वपूर्ण पदों पर रहे।

लेकिन उनके व्यक्तित्व को सिर्फ एक पुलिस अधिकारी की सीमाओं में बांधना मुश्किल है।

उनकी बौद्धिक दुनिया बहुत व्यापक थी। महान शायर फिराक गोरखपुरी उनके नाना थे, इसलिए साहित्य से उनका जुड़ाव जैसे विरासत में मिला था। मेरे पिताजी, एन.के. सिंह, जो पत्रकार रहे हैं, उनसे उनकी दोस्ती भी किसी अफ़सर और पत्रकार की औपचारिक दोस्ती नहीं थी। वह दोस्ती विचारों और रुचियों की समानता पर टिकी थी।

मुझे आज भी एक घटना याद आती है। एक बार मेरे माता-पिता कोलकाता से पटना ट्रेन से जा रहे थे। उस समय विश्वरंजन जी पटना में इंटेलिजेंस ब्यूरो के स्टेट हेड थे। उन्होंने फोन करके कहा कि सुबह स्टेशन पर गाड़ी भेज देंगे और कोई जूनियर अधिकारी उन्हें रिसीव करेगा। लेकिन जब ट्रेन सुबह करीब साढ़े छह बजे पटना पहुंची तो देखा कि वे खुद रिसीव करने के लिए गाड़ी लेकर स्टेशन पर खड़े हैं।

यह उनका स्वभाव था सरल, आत्मीय और औपचारिकताओं से दूर।

पढ़ने का उनका शौक अद्भुत था। जहां भी रहे, किताबें उनके जीवन का हिस्सा रहीं। उनके घर में विशाल और विविध विषयों की लाइब्रेरी थी। जब वे पटना में आईबी में थे तो उन्होंने अपने दफ्तर में भी एक लाइब्रेरी बनवाई। इतना ही नहीं, वहां एक जिम भी खुलवाया ताकि अधिकारी और कर्मचारी शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से फिट रहें।

उनके व्यक्तित्व में एक दिलचस्प सहजता भी थी। जब वे बस्तर में एसपी थे, तो एक दिन पैदल ही बाजार में सब्ज़ी खरीदने निकल पड़े। जब यह खबर पुलिस महकमे में फैली कि एसपी साहब पैदल बाजार में सब्जी खरीद रहे हैं, तो अफसरों में हलचल मच गई और लोग दौड़े-दौड़े वहां पहुंचे।

लेकिन वे ऐसे ही थे बिना दिखावे के, बेहद स्वाभाविक।

बाद में जब वे छत्तीसगढ़ के डीजीपी बने और किसी आधिकारिक बैठक के सिलसिले में भोपाल आए, तो अचानक बिना किसी पूर्व सूचना के हमारे घर पहुंच गए। बेहिचक बोले “कुछ खाने को है तो बनवा दीजिए।” और फिर आराम से बैठकर हमारे साथ भोजन किया।

वे अक्सर कहते थे “सिक्योरिटी अपनी जगह है, लेकिन किसी भी शासन की असली ताकत उसकी इंटेलिजेंस होती है और वह भी ह्यूमन इंटेलिजेंस।”

उनकी एक और पहचान थी : पेंटिंग।
वे बेहतरीन पेंटर थे और ऑयल पेंटिंग पर उनकी मजबूत पकड़ थी। एक्रेलिक में भी काम करते थे। जब भी मुलाकात होती, वे अपने पेंटिंग कलेक्शन दिखाते और रंगों, ब्रश और टेक्सचर पर लंबी चर्चा हो जाती।

मेरी उनसे पहचान बचपन से थी। जब मैं छोटा था, हाफ पैंट पहने ड्राइंग रूम के अंदर जब उनसे मुलाकात होती तो वह अपनी बाजू की मांसपेशियां दिखाकर कहते “इस पर लटक कर दिखाओ, इसे झुका कर दिखाओ।” मैं पूरी ताकत लगाकर उनकी बाजू नीचे झुकाने की कोशिश करता, लेकिन सफल नहीं हो पाता।

बाद में जब मैं पत्रकार बना और टाइम्स नाउ में मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ का ब्यूरो चीफ था, तब भी हमारे रिश्ते में वही अपनापन बना रहा। पेशेवर दूरी कभी नहीं आई।

एक बार मैं छत्तीसगढ़ नक्सल समस्या पर आधे घंटे का विशेष कार्यक्रम बनाने रायपुर गया था। उनके दफ्तर में पहुंचा तो कमरा अपने आप में एक अलग दुनिया था
चारों ओर किताबें, मेज पर होम्योपैथी की दवाइयां, कमरे में सिगरेट का धुआं, और उस धुएं के बीच से झांकता हुआ उनका चेहरा।

उन्होंने मुस्कुराकर पूछा “राहुल, आने में कोई दिक्कत तो नहीं हुई?”

फिर शुरू हुई लंबी चर्चा।
सिगरेट के अनगिनत कश, ब्लैक कॉफी के कप, और विषयों की कोई सीमा नहीं : साहित्य, राजनीति, होम्योपैथी, सुरक्षा, समाज… सब कुछ।

वे अक्सर मुझसे पूछते “आजकल क्या पढ़ रहे हो?”

लेकिन उनकी हंसी-मजाक के पीछे उनकी पैनी नजर और तेज बुद्धि हमेशा काम करती रहती थी।

एक बार मैं नक्सलियों के एक नेता से इंटरव्यू के लिए संपर्क कर रहा था। यह बात मैंने उन्हें नहीं बताई थी। अगली सुबह जैसे ही मैं उनके ऑफिस में दाखिल हुआ, उन्होंने धुएं के बीच से मुझे देखते हुए पूछा “राहुल, तुम नक्सलियों के उस लीडर से संपर्क क्यों कर रहे हो?”

मैं चौंक गया। यही उनकी इंटेलिजेंस की असली ताकत थी।

बस्तर में रिपोर्टिंग के दौरान भी उन्होंने मुझे एक खास रास्ते से जाने की सलाह दी थी। जाते समय तो मैं उसी रास्ते से गया, लेकिन लौटते समय मैंने एक छोटा रास्ता चुन लिया। बस्तर में हमारी गाड़ी खराब हो गई थी तो वहां के एसपी ने हमें रायपुर जाने के लिए पुलिस की गाड़ी दे दी। एक तो पुलिस की गाड़ी ऊपर से बदला हुआ रूट। जब रायपुर पहुंचकर सीधे विश्वरंजन जी के ऑफिस गया पुलिस हेडक्वार्टर में तो उन्होंने पहला सवाल यही पूछा “तुम बच गए। उस रास्ते पर एंबुश लगा हुआ था। लेकिन नक्सलियों को पता चल गया कि गाड़ी में पत्रकार हैं, इसलिए उन्होंने हमला नहीं किया।”

यह सुनकर समझ आया कि उन्हें जमीन की हर छोटी जानकारी तक रहती थी।

रिटायरमेंट के बाद कुछ समय वे रायपुर में रहे और बाद में पटना चले गए। इस बीच वे कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से भी जूझे। एक बार हालत इतनी बिगड़ी कि वे आईसीयू में वेंटिलेटर पर पहुंच गए।

लेकिन अस्पताल से लौटने के बाद भी उनका उत्साह कम नहीं हुआ।

मेरे पिताजी दैनिक भास्कर स्कूल ऑफ जर्नलिज्म के हेड हैं। लगभग एक महीने पहले उन्होंने विश्वरंजन जी को फोन किया और कहा कि भास्कर के पत्रकारों के लिए उनका एक सेशन रखना चाहते हैं। उन्होंने तुरंत कहा “अरे, अभी इसी हफ्ते कर लेते हैं।”

चुकी विश्वरंजन अंकल को अस्पताल से छूट सिर्फ एक ही हफ्ता हुआ था पिताजी ने ही संकोच करते हुए कहा कि पहले आप पूरी तरह ठीक हो जाएं, फिर सेशन करेंगे।

लेकिन शायद समय को कुछ और ही मंजूर था। वे पूरी तरह स्वस्थ होकर वह सेशन देने के पहले ही इस दुनिया से विदा हो गए।

कभी-कभी सोचता हूं जिस व्यक्ति ने पूरी जिंदगी इंटेलिजेंस की दुनिया में बिताई, शायद से अपने जाने की "Intel" भी पहले से मिल गई होगी।

विश्वरंजन अंकल के नाना फिराक गोरखपुरी जी ने जिंदगी के फलसफे को शायरी में समेटते हुए एक शेर लिखा था।

क्या जानिए मौत पहले क्या थी
अब मेरी हयात हो गई है

विश्वरंजन अंकल अब नहीं हैं। लेकिन उनकी आवाज, उनका हंसना, उनका सिगरेट के धुएं के बीच से झांकता चेहरा, किताबों और रंगों से भरी उनकी दुनिया सब स्मृतियों में हमेशा जिंदा रहेंगे।

25/01/2026

सरकारी तंत्र में जैसे ही कोई फंड रिलीज होता है तो उसके हिस्सेदारी तय हो जाती है।
इसीलिए कहा जाता है : -

कद्दू कटेगा तो सब में बटेगा।
लेकिन यह वाला कद्दू मेरा निजी है😜😅😜😅

Overheard at a coffee house 🙈🙉🙊A group of four men in their mid-40s, seated nearby.Man 1: You know, there’s this IAS off...
16/01/2026

Overheard at a coffee house 🙈🙉🙊

A group of four men in their mid-40s, seated nearby.

Man 1: You know, there’s this IAS officer, used AI-generated images to bag a national award.

Man 2: Haan, I’ve heard of him. Same guy whose name earlier came up in bribery and land fraud cases, right?

Man 1: Exactly. So much hype, so many medals… and then this. It’s just embarrassing.

Man 3 chukels: “Ye log itna padhte kyun hain, jab chori hi karni hoti hai?” 😜

Waise bande ne question toh sahi puchha hai 🙂

भारतीय न्याय प्रणाली: जहाँ इंतज़ार में ज़िंदगी हार जाती है1️⃣ 198831st May 1988वी॰ एम॰ सौदागर, रेलवे के TTE, Dadar Nagpu...
15/01/2026

भारतीय न्याय प्रणाली: जहाँ इंतज़ार में ज़िंदगी हार जाती है

1️⃣ 1988
31st May 1988
वी॰ एम॰ सौदागर, रेलवे के TTE, Dadar Nagpur Express, पर आरोप लगे कि उन्होंने यात्रियों से ₹50 रिश्वत ली। विभागीय जांच शुरू हुई। Vigilance team ने कहा कि 3 पैसेंजर से 50 रुपये लिए और उनमें से एक पैसेंजर को ₹18 वापस नहीं लौटाया। हालांकि बाद में inquiry के दौरान दो पैसेंजर ने कहा कि TTE ने अगले डब्बे से सबका टिकट बनाने के बाद रसीद काटने की बात कही थी।

2️⃣ 1996
8 साल बाद विभागीय जांच के आधार पर सौदागर को सेवा से निलंबित/निष्कासित कर दिया गया।

3️⃣ 2002
14 साल बाद Central Administrative Tribunal (CAT) ने फैसला दिया — निष्कासन अनुचित है; पुनर्स्थापना और पेंशन सहित सभी फायदे देने को कहा।

4️⃣ 2002 – 2017
सरकार ने CAT के आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी — और मामला 15 साल तक हाईकोर्ट में अटका रहा।

5️⃣ 2017
हाईकोर्ट ने CAT का आदेश पलट दिया —
अब अदालत ने सौदागर के निष्कासन को सही माना।

6️⃣ इस बीच…
सौदागर की मृत्यु हो गई —
यह लंबी कानूनी लड़ाई जारी रहने के बीच हुई; वे उस फैसले को स्वयं नहीं देख पाए। परिवार वाले न्याय की लड़ाई को सुप्रिम कोर्ट ले गए।

7️⃣ 2025 (27 October 2025)
सुप्रीम कोर्ट ने 37 वर्षों बाद फैसला सुनाया:
✔ CAT का आदेश फिर लागू किया गया।
✔ रेलवे को सौदागर के कानूनन वारिसों को सभी पेंशन/सेवा लाभ और बकाया दिए जाने का निर्देश दिया गया।
✔ कोर्ट ने कहा कि पुराने निष्कासन का कोई ध्रुव प्रमाण नहीं है। आरोप साबित नहीं हुए।

बहरहाल सुप्रिम कोर्ट को लख-लख बधाई ₹50 की रिश्वत का मसला आख़िरकार 37 साल में हल कर दिया गया। 🙏🏼🫡

भारतीय न्याय प्रणाली: जहाँ समय हार जाता है(क्रोनोलॉजी समझिए)196855 साल के सोपान गायकवाड़ ने रजिस्टर्ड  सेल डीड से ज़मीन ...
14/01/2026

भारतीय न्याय प्रणाली: जहाँ समय हार जाता है

(क्रोनोलॉजी समझिए)

1968
55 साल के सोपान गायकवाड़ ने रजिस्टर्ड सेल डीड से ज़मीन पुणे में खरीदी।
कुछ समय बाद पता चला — ज़मीन पहले से बैंक के पास गिरवी है।

1969
बैंक ने लोन डिफॉल्ट का नोटिस भेजा।
सोपान कोर्ट पहुँचे।

1982
14 साल बाद ट्रायल कोर्ट ने फैसला सोपान के पक्ष में दिया।
उम्र: 69 वर्ष
लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकी…

1987
हाईकोर्ट ने निचली अदालत का फैसला रद्द कर दिया।
उम्र: 74 वर्ष

1988
सोपान ने फिर अपील दायर की।
उम्र: 75 वर्ष

2015
27 साल बाद हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी।
उम्र: 102 वर्ष
न्याय अब भी दूर…

2019
दूसरी अपील वकील की गैर-हाज़िरी के कारण खारिज।
सोपान को पता ही नहीं चला।
उम्र: 106 वर्ष

2021
सोपान सुप्रीम कोर्ट पहुँचे।
उम्र: 108 वर्ष

12 जुलाई 2021
सुप्रीम कोर्ट ने केस सुनने पर सहमति दी।
उसी दिन वकील ने बताया —
सोपान गायकवाड़ अब इस दुनिया में नहीं हैं।

निष्कर्ष:
55 की उम्र में ज़मीन खरीदी,
53 साल तक न्याय के लिए लड़े,
108 की उम्र में बिना फ़ैसले के विदा हो गए।

क्रोनोलॉजी समझिए —
न्यायालय अमर हैं, इंसान नहीं

03/12/2025

आप कितने भी कानून बना ले। सुप्रीम कोर्ट के कितने भी ऑर्डर आ आए। पर जमीनी व्यवस्था वही ढाक के तीन पात !

सुप्रीम कोर्ट ने सभी थानों में CCTV लगाना अनिवार्य किया है। पर थाने वाले CCTV फुटेज RTI में देने से मना कर देते है। मैंने खुद सूचना आयुक्त रहते हुए RTI दायर होने के 30 दिन के भीतर MP के सभी थानों के CCTV फुटेज देने का निर्णय दिया था। PHQ से वह ऑर्डर सभी थानों में प्रेषित भी किया गया। पर अब उसके बावजूद पुलिस वाले "व्यक्तिगत जानकारी" के आधार पर CCTV फुटेज देने से मना कर देते है।

ये व्यक्तिगत जानकारी क्या है नीचे वीडियो में देखे।

29/11/2025

वृंदावन में आज सुबह की शुरुआत यमुना मैया के दर्शन से हुई। दिशा भक्ति चैनल की टीम के साथ दर्शन का लाभ लिया।

🌞🌙🔱 त्रिशूल, चंद्र और सूर्य : महादेव का संकेतमैं हाल ही में मप्र के सीहोर स्थित कुबरेश्वर धाम मे पंडित प्रदीप मिश्रा जी ...
26/11/2025

🌞🌙🔱 त्रिशूल, चंद्र और सूर्य : महादेव का संकेत

मैं हाल ही में मप्र के सीहोर स्थित कुबरेश्वर धाम मे पंडित प्रदीप मिश्रा जी से चर्चा करने पहुंचा।

बाहर विशाल त्रिशूल के शीर्ष पर चंद्रमा दमक रहा था,
और ठीक उसके सामने से सूर्य देव दिखाई दिए।

एक ही फ्रेम में: -
त्रिशूल, चंद्र और सूर्य!
मैंने तत्काल उस क्षण को कैमरे पर कैद कर लिया।

लेकिन सच कहूँ तो
जो अनुभूति आँखों ने देखी, उसे कोई कैमरा कैसे पकड़ पाए!

🔱 शिव -शक्ति

शिव का त्रिशूल तीन शक्ति तत्वों का प्रतीक है।

भूत, भविष्य और वर्तमान

सृजन, पालन और संहार

सत्व, रजस और तमस

ये तीनों जब संतुलित हों, तभी ब्रह्मांड चलता है।

🌙 चंद्र -शीतलता

चंद्रमा शिव के मस्तक पर इसलिए सुशोभित है,
क्योंकि वह मन का अधिपति है।

शिव कहते हैं
शक्ति तभी पवित्र है, जब मन शांत हो।

🌞 सूर्य - प्रकाश और चेतना

सूर्य जहाँ है, वहाँ अंधकार टिक नहीं पाता।
यह सत्य, ऊर्जा और जीवन का मूर्त स्वरूप है।

और जब
शक्ति (त्रिशूल)
शांति (चंद्र)
और प्रकाश (सूर्य)
एक साथ प्रकट हों
तो समझना चाहिए भोलेनाथ पास ही हैं। ❤️🙏🏼

हर हर महादेव! 🔱🌙☀️🔥 🙏

भोपाल से लांच होने वाला देश का पहला धार्मिक आध्यात्मिक सेटेलाइट चैनल Disha Bhakti की टीम को पूज्य पंडित प्रदीप मिश्रा जी...
23/11/2025

भोपाल से लांच होने वाला देश का पहला धार्मिक आध्यात्मिक सेटेलाइट चैनल Disha Bhakti की टीम को पूज्य पंडित प्रदीप मिश्रा जी से आशीर्वादपूर्ण मुलाकात का अवसर प्राप्त हुआ।

मैं जल्द ही Pandit pradeep mishra जी का शिव की शक्ति और भक्ति विषय पर सीहोर में ही एक सार्थक चर्चा करने जा रहा हूँ। अगर आप के कोई सवाल हो जो आप पंडित प्रदीप मिश्रा जी से पूछना चाह रहे हो तो यहां कमेंट बॉक्स में बता दें मैं उनसे जरूर वह सवाल करूंगा। जय शिव शम्भू ❤️🙏🏼

अर्णव… 19 साल का एक मासूम बच्चा।केलकर कॉलेज, मलाड में पहला साल… सपनों, उम्मीदों और नई दुनिया की शुरुआत का वक़्त।  अगर आप...
20/11/2025

अर्णव… 19 साल का एक मासूम बच्चा।

केलकर कॉलेज, मलाड में पहला साल… सपनों, उम्मीदों और नई दुनिया की शुरुआत का वक़्त। अगर आपके घर 19 साल का बच्चा है तो आप बेहतर समझ सकते है कि ये उम्र सिर्फ सपनों की होती है, संघर्षों की नहीं।

उस दिन लोकल ट्रेन में भी कुछ ऐसा ही हुआ जो किसी भी शहर, किसी भी देश में सामान्य माना जाता है।

एक हिंदी बोलने वाले यात्री का बैग उसे लग रहा था, तो अर्णव ने बहुत ही विनम्रता से कहा : “थोड़ा उधर खड़े रहिए, आपका धक्का लग रहा है।”

बस इतना सुनते…
बगल में खड़े कुछ स्वघोषित भाषा योद्धा जाग गए। उन्होंने मराठी में ताना मारा :
“मराठी बोलायला लाज वाटते का?”
(मराठी बोलने में शर्म आती है क्या?)

और फिर शुरू हुआ अपमान, गालियाँ, मारपीट… मानो भाषा नहीं, किसी युद्ध का मोर्चा हो।

अर्णव मराठी था पर इस भाषाई गुंडों की भीड़ के लिए वह सिर्फ एक ‘निशाना’ था, जिसे उनके झूठे भाषाई अहंकार के आगे झुकना था।


घर पहुँचा तो काँप रहा था, सदमे में था।

उसके चेहरे पर डर, अपमान और असहायता की गहरी छाप थी।

एक बच्चा जिसने कभी किसी को चोट नहीं पहुँचाई, वह खुद इस समाज की नफरत का शिकार बन चुका था।

वह सदमा सह नहीं पाया… और कुछ ही घंटों में उसने अपनी ज़िंदगी खत्म कर ली।

आज अर्णव नहीं है…
पर हम सबके सामने एक बड़ा सवाल है!

हम कहाँ जा रहे हैं?
क्या भारत ऐसे ही विकसित होगा जहाँ भाषा, जाति, धर्म… हर चीज़ के नाम पर हिंसा और नफ़रत फैलेगी?

क्या यही विकास है?
जहाँ शब्द जोड़ते नहीं, मार डालते हैं?

क्या एक बच्चे की ज़िंदगी इतनी सस्ती हो गई कि कुछ अनपढ़, हिंसक लोग अपनी कुंठा उतारकर घर चले जाएँ… और एक परिवार हमेशा के लिए बिखर जाए?

खैर अब …
अर्णव कभी हिंदी नहीं बोलेगा।
भाषाई गुंडों की अनपढ़ टोली को शायद यही चाहिए था।

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