25/08/2026
शहीद मेजर दुर्गा मल्ल — विस्तृत जीवनी
मेजर दुर्गा मल्ल भारतीय स्वतन्त्रता संग्रामका महान् गोर्खा योद्धा तथा आजाद हिन्द फौज (Indian National Army–INA) का वीर सेनानी थिए। नेताजी सुभाषचन्द्र बोसको नेतृत्वमा भारतलाई ब्रिटिस शासनबाट मुक्त गराउने अभियानमा उनले महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह गरे। अन्ततः मातृभूमिको स्वतन्त्रताका लागि 31 वर्षको उमेरमा 25 अगस्ट 1944 मा ब्रिटिस सरकारले उनलाई फाँसी दिएको थियो।
• जन्म तथा पारिवारिक परिचय
मेजर दुर्गा मल्लको जन्म 1 जुलाई 1913 मा तत्कालीन देहरादून जिल्लाको डोईवाला गाउँ, उत्तराखण्डमा भएको थियो। उहाँ गंगा राम मल्ल र पार्वती देवीका जेठा छोरा हुनुहुन्थ्यो।
उहाँका पिता गंगा राम मल्ल ब्रिटिस भारतीय सेनाको गोर्खा राइफल्समा जमदार (हालको नायब सुबेदार) पदमा कार्यरत हुनुहुन्थ्यो। उहाँकी आमा पार्वती देवी गृहिणी हुनुहुन्थ्यो। परिवारमा पछि तीन जना भाइ र तीन जना बहिनी पनि भए।
मल्ल परिवारका पुर्खाहरू लामो समयदेखि डोईवाला क्षेत्रमा बसोबास गर्दै आएका थिए। परिवारको मुख्य जीविकोपार्जन कृषि तथा सैनिक सेवासँग सम्बन्धित थियो। उनीहरूले उखु खेती गर्ने, गुड तथा चिनी बनाउने र बजारमा बिक्री गर्ने काम पनि गर्थे।
• बाल्यकाल तथा शिक्षा
दुर्गा मल्ल बाल्यकालदेखि नै मेहनती, अनुशासित, इमानदार र अध्ययनशील थिए। पढाइसँगै उनलाई खेलकुद, विशेषगरी फुटबल, साहित्य तथा सामाजिक गतिविधिमा पनि रुचि थियो।
डोईवालामा राम्रो शैक्षिक सुविधा नभएकाले उनले देहरादून नजिकको गोर्खा मिलिटरी मिडिल स्कुलमा अध्ययन गरे, जुन अहिले गोर्खा मिलिटरी इन्टर कलेजका रूपमा चिनिन्छ। विद्यालय घरबाट निकै टाढा भएकाले उनी आफ्ना काका केदार मल्लको नालापानीस्थित घरमा बसेर पढ्थे। उनी दैनिक करिब 8–9 माइल पैदल हिँडेर विद्यालय जाने गर्थे र पढाइमा सधैँ उत्कृष्ट विद्यार्थीमध्ये पर्थे।
• ब्रिटिस शासनविरुद्ध चेतना
सन् 1930 मा महात्मा गान्धीको दाण्डी मार्च तथा नुन सत्याग्रहको समयमा दुर्गा मल्ल कक्षा 9 मा अध्ययनरत थिए। किशोरावस्थामै उनी ब्रिटिस शासनविरुद्ध बोल्न र स्थानीय स्वतन्त्रता गतिविधिमा सहभागी हुन थालेका थिए।
उनको राष्ट्रवादी गतिविधिका कारण ब्रिटिस अधिकारीहरूले उनको परिवारमाथि समेत निगरानी र सोधपुछ गर्न थालेका थिए।
• गोर्खा राइफल्समा प्रवेश
1931 मा 18 वर्षको उमेरमा दुर्गा मल्ल 2/1 गोर्खा राइफल्समा भर्ती भए। सैन्य प्रशिक्षणमा उनको क्षमता र समर्पण देखेर उनी क्रमशः अगाडि बढे।
तर उनको मनमा ब्रिटिस शासनप्रति असन्तुष्टि र भारतको स्वतन्त्रताको भावना अझ बलियो हुँदै गयो।
• आजाद हिन्द फौजमा प्रवेश
दोस्रो विश्वयुद्धको समयमा सन् 1942 मा दुर्गा मल्ल आजाद हिन्द फौज (INA) मा सामेल भए। नेताजी सुभाषचन्द्र बोसको नेतृत्वमा रहेको आजाद हिन्द फौजले भारतलाई ब्रिटिस शासनबाट मुक्त गराउने उद्देश्य राखेको थियो।
भारत सरकारको संस्कृति मन्त्रालयको विवरणअनुसार, नेताजीले दुर्गा मल्ललाई विभिन्न गोर्खा बटालियनबाट सैनिक तथा स्वयंसेवकहरूलाई INA मा संगठित गर्ने महत्वपूर्ण जिम्मेवारी दिएका थिए। उनको समर्पण, साहस र सैन्य क्षमताबाट प्रभावित भएर उनलाई Major (मेजर) पदमा पदोन्नति गरिएको थियो।
• INA को Intelligence Branch मा महत्वपूर्ण जिम्मेवारी
मेजर दुर्गा मल्ललाई आजाद हिन्द फौजको Intelligence Branch मा जिम्मेवारी दिइयो। उनको काम ब्रिटिस सेनाको गतिविधि, सैनिक संख्या, आवागमन तथा रणनीतिसम्बन्धी महत्वपूर्ण सूचना संकलन गर्नु थियो।
उनी आफ्ना सहयोद्धाहरूसँग बर्मा हुँदै भारतको उत्तर–पूर्वी क्षेत्रमा प्रवेश गरेर गोप्य अभियानमा सक्रिय भए।
• ब्रिटिस सेनाद्वारा पक्राउ
27 मार्च 1944 मा मणिपुरको उखरुल (Ukhrul) क्षेत्रमा एउटा गुप्तचर अभियानका क्रममा मेजर दुर्गा मल्ल ब्रिटिस सेनाको हातमा पक्राउ परे। त्यसपछि उनलाई बन्दी बनाएर दिल्ली ल्याइयो र ब्रिटिस सैन्य अदालतमा मुद्दा चलाइयो।
ब्रिटिस सरकारले उनलाई आजाद हिन्द फौज त्याग्न र ब्रिटिस सरकारप्रति आत्मसमर्पण गर्न दबाब दिएको थियो। तर उनले आफ्नो देश र नेताजीप्रतिको निष्ठाबाट पछि हट्न अस्वीकार गरे।
• पत्नी शारदा देवीसँग अन्तिम भेट
मेजर दुर्गा मल्लकी पत्नी शारदा देवी थिइन्। उनीहरूको विवाह 1941 मा धर्मशालाको श्यामनगर निवासी शारदा देवीसँग भएको थियो। विवाह भएको केही दिनमै मल्ललाई सैन्य जिम्मेवारीका लागि बाहिर जानुपरेको थियो।
ब्रिटिसहरूले उनलाई आफ्नो निर्णय बदल्न दबाब दिन उनकी पत्नीलाई समेत जेलमा भेट्न ल्याएका थिए। तर पत्नीको अगाडि पनि मेजर दुर्गा मल्ल आफ्नो विचारबाट पछि हटेनन्। भारत सरकारको स्रोतमा उहाँले अन्तिम समयमा आफ्नो बलिदान व्यर्थ नजाने र भारत स्वतन्त्र हुने विश्वास व्यक्त गरेको उल्लेख छ।
• 25 अगस्ट 1944 — महान् बलिदान
25 अगस्ट 1944 मा दिल्लीमा ब्रिटिस सरकारले मेजर दुर्गा मल्ललाई फाँसी दियो। त्यतिबेला उहाँको उमेर केवल 31 वर्ष थियो।
त्यसैले 25 अगस्टलाई भारतीय गोर्खा समुदायले “बलिदान दिवस (Balidan Diwas)”का रूपमा स्मरण गर्दै आएको छ।
• आजको भारतमा सम्मान
मेजर दुर्गा मल्लको बलिदानलाई भारत सरकारले पनि सम्मान गरेको छ। 2004 मा संसद भवन परिसरमा उहाँको प्रतिमा स्थापना गरिएको थियो। यो प्रतिमा भारतीय स्वतन्त्रता संग्राममा गोर्खा समुदायले दिएको योगदानको प्रतीकका रूपमा लिइन्छ।
⸻
• संक्षिप्त परिचय
नाम: शहीद मेजर दुर्गा मल्ल
जन्म: 1 जुलाई 1913
जन्मस्थान: डोईवाला, देहरादून, उत्तराखण्ड
पिता: गंगा राम मल्ल — गोर्खा राइफल्सका जमदार
आमा: पार्वती देवी — गृहिणी
पत्नी: शारदा देवी
सैन्य संगठन: 2/1 गोर्खा राइफल्स → आजाद हिन्द फौज
INA मा पद: मेजर
नेतृत्व: नेताजी सुभाषचन्द्र बोस
जिम्मेवारी: Intelligence Branch
पक्राउ: 27 मार्च 1944, उखरुल, मणिपुर
शहादत: 25 अगस्ट 1944
उमेर: 31 वर्ष
स्मृति दिवस: 25 अगस्ट — बलिदान दिवस
“मेजर दुर्गा मल्ल केवल एक गोर्खा सैनिक थिएनन्; उनी भारतको स्वतन्त्रताका लागि आफ्नो जीवन अर्पण गर्ने साहसी राष्ट्रभक्त थिए। उनको बलिदान भारतीय गोर्खाहरूको देशभक्ति, वीरता र त्यागको अमर प्रतीक हो।”
___________________________________
শহীদ মেজর দুর্গা মল্ল — বিস্তারিত জীবনী
মেজর দুর্গা মল্ল ছিলেন ভারতের স্বাধীনতা সংগ্রামের একজন মহান গোরখা যোদ্ধা এবং আজাদ হিন্দ ফৌজ (Indian National Army–INA)-এর বীর সেনানী। নেতাজি সুভাষচন্দ্র বসুর নেতৃত্বে ভারতকে ব্রিটিশ শাসন থেকে মুক্ত করার অভিযানে তিনি গুরুত্বপূর্ণ ভূমিকা পালন করেছিলেন। শেষ পর্যন্ত মাতৃভূমির স্বাধীনতার জন্য ৩১ বছর বয়সে ২৫ আগস্ট ১৯৪৪ সালে ব্রিটিশ সরকার তাঁকে ফাঁসি দেয়।
• জন্ম ও পারিবারিক পরিচয়
মেজর দুর্গা মল্লের জন্ম ১ জুলাই ১৯১৩ সালে তৎকালীন দেরাদুন জেলার ডোইওয়ালা গ্রামে, উত্তরাখণ্ডে হয়েছিল। তিনি ছিলেন গঙ্গা রাম মল্ল ও পার্বতী দেবীর জ্যেষ্ঠ পুত্র।
তাঁর পিতা গঙ্গা রাম মল্ল ব্রিটিশ ভারতীয় সেনাবাহিনীর গোরখা রাইফেলসে জমাদার (বর্তমান নায়েব সুবেদার) পদে কর্মরত ছিলেন। তাঁর মা পার্বতী দেবী ছিলেন গৃহিণী। পরবর্তীকালে তাঁদের পরিবারে আরও তিন ভাই ও তিন বোন জন্মগ্রহণ করেন।
মল্ল পরিবারের পূর্বপুরুষেরা দীর্ঘদিন ধরে ডোইওয়ালা অঞ্চলে বসবাস করে আসছিলেন। পরিবারের প্রধান জীবিকা ছিল কৃষিকাজ ও সামরিক পরিষেবার সঙ্গে যুক্ত। তাঁরা আখ চাষ করার পাশাপাশি গুড় ও চিনি তৈরি করে বাজারে বিক্রি করতেন।
• শৈশব ও শিক্ষা
দুর্গা মল্ল ছোটবেলা থেকেই পরিশ্রমী, শৃঙ্খলাবদ্ধ, সৎ ও অধ্যয়নশীল ছিলেন। পড়াশোনার পাশাপাশি খেলাধুলা, বিশেষ করে ফুটবল, সাহিত্য এবং সামাজিক কর্মকাণ্ডের প্রতিও তাঁর আগ্রহ ছিল।
ডোইওয়ালায় ভালো শিক্ষার সুযোগ না থাকায় তিনি দেরাদুনের কাছে অবস্থিত গোরখা মিলিটারি মিডল স্কুলে পড়াশোনা করেন, যা বর্তমানে গোরখা মিলিটারি ইন্টার কলেজ নামে পরিচিত।
বিদ্যালয়টি বাড়ি থেকে অনেক দূরে হওয়ায় তিনি তাঁর কাকা কেদার মল্লের নালাপানি এলাকার বাড়িতে থেকে পড়াশোনা করতেন। প্রতিদিন প্রায় ৮–৯ মাইল হেঁটে তিনি বিদ্যালয়ে যেতেন এবং পড়াশোনায় সর্বদা কৃতী ছাত্রদের মধ্যে ছিলেন।
• ব্রিটিশ শাসনের বিরুদ্ধে চেতনা
সন ১৯৩০ সালে মহাত্মা গান্ধীর ডান্ডি অভিযান ও লবণ সত্যাগ্রহের সময় দুর্গা মল্ল নবম শ্রেণিতে পড়তেন। কৈশোর থেকেই তাঁর মধ্যে ব্রিটিশ শাসনের বিরুদ্ধে জাতীয়তাবাদী চেতনা গড়ে উঠতে শুরু করে এবং তিনি স্থানীয় স্বাধীনতা আন্দোলনের বিভিন্ন কর্মকাণ্ডে অংশ নিতে থাকেন।
তাঁর জাতীয়তাবাদী কর্মকাণ্ডের কারণে ব্রিটিশ কর্মকর্তারা তাঁর পরিবারের উপরও নজরদারি শুরু করেন এবং পরিবারের সদস্যদের জিজ্ঞাসাবাদ করা হতো।
• গোরখা রাইফেলসে যোগদান
১৯৩১ সালে মাত্র ১৮ বছর বয়সে দুর্গা মল্ল ২/১ গোরখা রাইফেলসে যোগ দেন। সামরিক প্রশিক্ষণের সময় তাঁর দক্ষতা, শৃঙ্খলা ও নিষ্ঠার কারণে তিনি ধীরে ধীরে উন্নতি করতে থাকেন।
তবে তাঁর মনে ব্রিটিশ শাসনের প্রতি অসন্তোষ এবং ভারতের স্বাধীনতার আকাঙ্ক্ষা ক্রমশ আরও শক্তিশালী হয়ে ওঠে।
• আজাদ হিন্দ ফৌজে যোগদান
দ্বিতীয় বিশ্বযুদ্ধের সময় ১৯৪২ সালে দুর্গা মল্ল আজাদ হিন্দ ফৌজে (INA) যোগ দেন। নেতাজি সুভাষচন্দ্র বসুর নেতৃত্বে আজাদ হিন্দ ফৌজের প্রধান লক্ষ্য ছিল ভারতকে ব্রিটিশ শাসন থেকে মুক্ত করা।
ভারত সরকারের সংস্কৃতি মন্ত্রকের তথ্য অনুযায়ী, নেতাজি বিভিন্ন গোরখা ব্যাটালিয়ন থেকে সৈনিক ও স্বেচ্ছাসেবকদের আজাদ হিন্দ ফৌজে সংগঠিত করার গুরুত্বপূর্ণ দায়িত্ব দুর্গা মল্লকে দিয়েছিলেন। তাঁর নিষ্ঠা, সাহস ও সামরিক দক্ষতায় সন্তুষ্ট হয়ে তাঁকে মেজর পদে উন্নীত করা হয়।
• INA-এর Intelligence Branch-এ গুরুত্বপূর্ণ দায়িত্ব
মেজর দুর্গা মল্লকে আজাদ হিন্দ ফৌজের Intelligence Branch-এ গুরুত্বপূর্ণ দায়িত্ব দেওয়া হয়। তাঁর কাজ ছিল ব্রিটিশ সেনাবাহিনীর গতিবিধি, সৈন্য সংখ্যা, যাতায়াত এবং সামরিক কৌশল সম্পর্কিত গুরুত্বপূর্ণ তথ্য সংগ্রহ করা।
তিনি সহযোদ্ধাদের সঙ্গে বার্মার পথে ভারতের উত্তর-পূর্বাঞ্চলে প্রবেশ করে বিভিন্ন গোপন অভিযানে সক্রিয়ভাবে অংশগ্রহণ করেন।
• ব্রিটিশ সেনার হাতে গ্রেফতার
২৭ মার্চ ১৯৪৪ সালে মণিপুরের উখরুল (Ukhrul) এলাকায় একটি গোয়েন্দা অভিযানের সময় মেজর দুর্গা মল্ল ব্রিটিশ সেনার হাতে গ্রেফতার হন। এরপর তাঁকে বন্দি করে দিল্লিতে নিয়ে আসা হয় এবং ব্রিটিশ সামরিক আদালতে তাঁর বিরুদ্ধে মামলা চালানো হয়।
ব্রিটিশ সরকার তাঁকে আজাদ হিন্দ ফৌজ ত্যাগ করে ব্রিটিশ সরকারের কাছে আত্মসমর্পণ করার জন্য চাপ দেয়। কিন্তু তিনি নিজের দেশ এবং নেতাজির প্রতি আনুগত্য থেকে একচুলও পিছিয়ে আসেননি।
• স্ত্রী শারদা দেবীর সঙ্গে শেষ সাক্ষাৎ
মেজর দুর্গা মল্লের স্ত্রী ছিলেন শারদা দেবী। তাঁদের বিবাহ হয়েছিল ১৯৪১ সালে ধর্মশালার শ্যামনগর নিবাসী শারদা দেবীর সঙ্গে। বিবাহের কয়েক দিনের মধ্যেই দুর্গা মল্লকে সামরিক দায়িত্ব পালনের জন্য বাইরে যেতে হয়েছিল।
ব্রিটিশ কর্তৃপক্ষ তাঁর সিদ্ধান্ত পরিবর্তন করানোর জন্য তাঁর স্ত্রীকেও কারাগারে তাঁর সঙ্গে দেখা করতে নিয়ে আসে। কিন্তু স্ত্রীর সামনেও মেজর দুর্গা মল্ল তাঁর আদর্শ ও সংকল্প থেকে পিছিয়ে যাননি।
ভারত সরকারের সূত্র অনুযায়ী, জীবনের শেষ মুহূর্তেও তিনি বিশ্বাস প্রকাশ করেছিলেন যে তাঁর আত্মত্যাগ বৃথা যাবে না এবং একদিন ভারত অবশ্যই স্বাধীন হবে।
• ২৫ আগস্ট ১৯৪৪ — মহান আত্মবলিদান
২৫ আগস্ট ১৯৪৪ সালে দিল্লিতে ব্রিটিশ সরকার মেজর দুর্গা মল্লকে ফাঁসি দেয়। সেই সময় তাঁর বয়স ছিল মাত্র ৩১ বছর।
তাঁর এই সর্বোচ্চ আত্মত্যাগের স্মরণে ২৫ আগস্ট ভারতীয় গোরখা সম্প্রদায়ের কাছে “বলিদান দিবস (Balidan Diwas)” হিসেবে স্মরণীয়।
• আজকের ভারতে সম্মান
মেজর দুর্গা মল্লের মহান আত্মত্যাগকে ভারত সরকারও সম্মান জানিয়েছে। ২০০৪ সালে সংসদ ভবন চত্বরে তাঁর মূর্তি স্থাপন করা হয়। এই মূর্তি ভারতের স্বাধীনতা সংগ্রামে গোরখা সম্প্রদায়ের অবদান, বীরত্ব ও আত্মত্যাগের একটি গুরুত্বপূর্ণ প্রতীক।
⸻
• সংক্ষিপ্ত পরিচয়
নাম: শহীদ মেজর দুর্গা মল্ল
জন্ম: ১ জুলাই ১৯১৩
জন্মস্থান: ডোইওয়ালা, দেরাদুন, উত্তরাখণ্ড
পিতা: গঙ্গা রাম মল্ল — গোরখা রাইফেলসের জমাদার
মাতা: পার্বতী দেবী — গৃহিণী
স্ত্রী: শারদা দেবী
সামরিক সংগঠন: ২/১ গোরখা রাইফেলস → আজাদ হিন্দ ফৌজ
INA-তে পদ: মেজর
নেতৃত্ব: নেতাজি সুভাষচন্দ্র বসু
দায়িত্ব: Intelligence Branch
গ্রেফতার: ২৭ মার্চ ১৯৪৪, উখরুল, মণিপুর
শহীদ: ২৫ আগস্ট ১৯৪৪
বয়স: ৩১ বছর
স্মরণ দিবস: ২৫ আগস্ট — বলিদান দিবস
“মেজর দুর্গা মল্ল শুধু একজন গোরখা সৈনিক ছিলেন না; তিনি ছিলেন ভারতের স্বাধীনতার জন্য নিজের জীবন উৎসর্গকারী একজন মহান দেশপ্রেমিক। তাঁর আত্মত্যাগ ভারতীয় গোরখাদের দেশপ্রেম, বীরত্ব ও ত্যাগের এক অমর প্রতীক।”
______________________________________
🇮🇳 शहीद मेजर दुर्गा मल्ल — विस्तृत जीवनी
मेजर दुर्गा मल्ल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान गोर्खा योद्धा तथा आजाद हिंद फौज (Indian National Army–INA) के वीर सेनानी थे। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्व में भारत को ब्रिटिश शासन से मुक्त कराने के अभियान में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अंततः मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए 31 वर्ष की आयु में 25 अगस्त 1944 को ब्रिटिश सरकार ने उन्हें फाँसी दे दी।
• जन्म एवं पारिवारिक परिचय
मेजर दुर्गा मल्ल का जन्म 1 जुलाई 1913 को तत्कालीन देहरादून जिले के डोईवाला गाँव, उत्तराखंड में हुआ था। वे गंगा राम मल्ल और पार्वती देवी के ज्येष्ठ पुत्र थे।
उनके पिता गंगा राम मल्ल ब्रिटिश भारतीय सेना की गोर्खा राइफल्स में जमदार (वर्तमान नायब सूबेदार) के पद पर कार्यरत थे। उनकी माता पार्वती देवी गृहिणी थीं। परिवार में बाद में उनके तीन भाई और तीन बहनें भी हुईं।
मल्ल परिवार के पूर्वज लंबे समय से डोईवाला क्षेत्र में निवास करते थे। परिवार की मुख्य आजीविका कृषि और सैनिक सेवा से जुड़ी थी। परिवार में गन्ने की खेती, गुड़ एवं चीनी बनाने तथा उसे बाजार में बेचने का कार्य भी किया जाता था।
• बाल्यकाल एवं शिक्षा
दुर्गा मल्ल बचपन से ही मेहनती, अनुशासित, ईमानदार और अध्ययनशील थे। पढ़ाई के साथ-साथ उन्हें खेलकूद, विशेषकर फुटबॉल, साहित्य और सामाजिक गतिविधियों में भी रुचि थी।
डोईवाला में उस समय पर्याप्त शैक्षणिक सुविधाएँ उपलब्ध नहीं थीं। इसलिए उन्होंने देहरादून के निकट स्थित गोर्खा मिलिटरी मिडिल स्कूल में शिक्षा प्राप्त की, जिसे आज गोर्खा मिलिटरी इंटर कॉलेज के नाम से जाना जाता है।
विद्यालय घर से काफी दूर होने के कारण वे अपने चाचा केदार मल्ल के नालापानी स्थित घर में रहकर पढ़ाई करते थे। वे प्रतिदिन लगभग 8–9 मील पैदल चलकर विद्यालय जाते थे। पढ़ाई में भी वे सदैव उत्कृष्ट विद्यार्थियों में गिने जाते थे।
• ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रवादी चेतना
सन् 1930 में महात्मा गांधी के दांडी मार्च एवं नमक सत्याग्रह के समय दुर्गा मल्ल कक्षा 9 में अध्ययनरत थे। किशोरावस्था में ही उनके भीतर ब्रिटिश शासन के विरुद्ध राष्ट्रवादी भावना विकसित होने लगी थी।
वे ब्रिटिश शासन के विरोध में होने वाली स्थानीय स्वतंत्रता गतिविधियों में भी सक्रिय रूप से भाग लेने लगे। उनकी राष्ट्रवादी गतिविधियों के कारण ब्रिटिश अधिकारियों ने उनके परिवार पर भी निगरानी रखनी शुरू कर दी थी।
• गोर्खा राइफल्स में प्रवेश
सन् 1931 में 18 वर्ष की आयु में दुर्गा मल्ल 2/1 गोर्खा राइफल्स में भर्ती हुए। सैन्य प्रशिक्षण के दौरान उन्होंने अपनी क्षमता, अनुशासन और समर्पण का परिचय दिया तथा सैन्य जीवन में आगे बढ़ते गए।
हालाँकि, उनके मन में ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष और भारत की स्वतंत्रता की भावना लगातार मजबूत होती गई।
• आजाद हिंद फौज में प्रवेश
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान सन् 1942 में दुर्गा मल्ल आजाद हिंद फौज (INA) में शामिल हुए। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज का मुख्य उद्देश्य भारत को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्र कराना था।
भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय से उपलब्ध विवरण के अनुसार, नेताजी ने दुर्गा मल्ल को विभिन्न गोर्खा बटालियनों से सैनिकों एवं स्वयंसेवकों को आजाद हिंद फौज में संगठित करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी थी।
उनकी वीरता, सैन्य क्षमता, अनुशासन और समर्पण से प्रभावित होकर उन्हें मेजर के पद पर पदोन्नत किया गया।
• INA की Intelligence Branch में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी
मेजर दुर्गा मल्ल को आजाद हिंद फौज की Intelligence Branch (गुप्तचर शाखा) में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई।
उनका कार्य ब्रिटिश सेना की गतिविधियों, सैनिकों की संख्या, आवागमन तथा सैन्य रणनीति से संबंधित महत्वपूर्ण सूचनाएँ एकत्र करना था।
वे अपने साथी सैनिकों के साथ बर्मा होते हुए भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में प्रवेश कर गुप्त अभियानों में सक्रिय रहे।
• ब्रिटिश सेना द्वारा गिरफ्तारी
27 मार्च 1944 को मणिपुर के उखरुल (Ukhrul) क्षेत्र में एक गुप्तचर अभियान के दौरान मेजर दुर्गा मल्ल ब्रिटिश सेना के हाथों गिरफ्तार हो गए।
इसके बाद उन्हें बंदी बनाकर दिल्ली लाया गया और ब्रिटिश सैन्य अदालत में उनके विरुद्ध मुकदमा चलाया गया।
ब्रिटिश सरकार ने उन्हें आजाद हिंद फौज छोड़कर ब्रिटिश सरकार के सामने आत्मसमर्पण करने के लिए दबाव डाला। लेकिन मेजर दुर्गा मल्ल अपने देश, अपने सिद्धांतों और नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के प्रति अपनी निष्ठा से कभी पीछे नहीं हटे।
• पत्नी शारदा देवी से अंतिम मुलाकात
मेजर दुर्गा मल्ल की पत्नी का नाम शारदा देवी था। उनका विवाह 1941 में धर्मशाला के श्यामनगर निवासी शारदा देवी के साथ हुआ था। विवाह के कुछ ही समय बाद दुर्गा मल्ल को सैन्य जिम्मेदारी के कारण घर से दूर जाना पड़ा।
ब्रिटिश अधिकारियों ने उनकी पत्नी को जेल में उनसे मिलवाकर उनका निर्णय बदलने का प्रयास किया। लेकिन अपनी पत्नी के सामने भी मेजर दुर्गा मल्ल अपने विचारों और स्वतंत्रता के संकल्प से पीछे नहीं हटे।
भारत सरकार के उपलब्ध विवरण के अनुसार, अंतिम समय में भी उन्हें विश्वास था कि उनका बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा और भारत एक दिन अवश्य स्वतंत्र होगा।
• 25 अगस्त 1944 — महान बलिदान
25 अगस्त 1944 को दिल्ली में ब्रिटिश सरकार ने मेजर दुर्गा मल्ल को फाँसी दे दी। उस समय उनकी आयु मात्र 31 वर्ष थी।
भारत की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने वाले मेजर दुर्गा मल्ल की शहादत को भारतीय गोर्खा समुदाय आज भी अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ स्मरण करता है।
25 अगस्त को उनके बलिदान दिवस के रूप में स्मरण किया जाता है।
• आज के भारत में सम्मान
मेजर दुर्गा मल्ल के बलिदान को भारत सरकार द्वारा भी सम्मान दिया गया है। सन् 2004 में संसद भवन परिसर में उनकी प्रतिमा स्थापित की गई।
यह प्रतिमा भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गोर्खा समुदाय के योगदान, वीरता और बलिदान का महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है।
⸻
🇮🇳 संक्षिप्त परिचय
नाम: शहीद मेजर दुर्गा मल्ल
जन्म: 1 जुलाई 1913
जन्मस्थान: डोईवाला, देहरादून, उत्तराखंड
पिता: गंगा राम मल्ल — गोर्खा राइफल्स के जमदार
माता: पार्वती देवी — गृहिणी
पत्नी: शारदा देवी
सैन्य संगठन: 2/1 गोर्खा राइफल्स → आजाद हिंद फौज
INA में पद: मेजर
नेतृत्व: नेताजी सुभाष चन्द्र बोस
जिम्मेदारी: Intelligence Branch
गिरफ्तारी: 27 मार्च 1944, उखरुल, मणिपुर
शहादत: 25 अगस्त 1944
आयु: 31 वर्ष
स्मृति दिवस: 25 अगस्त — बलिदान दिवस
“मेजर दुर्गा मल्ल केवल एक गोर्खा सैनिक नहीं थे; वे भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना जीवन अर्पित करने वाले महान राष्ट्रभक्त थे। उनका बलिदान भारतीय गोर्खाओं की देशभक्ति, वीरता और त्याग का अमर प्रतीक है।”