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यह पेज समर्पित है हमारे जवानों के शौर्य, त्याग और देश सेवा।
यहां मिलेंगी आपको सेना की गौरव गाथाएं, युद्ध की कहानियां और मदद के किस्से
!भारत माता की जय!
नोट:- यह केवल शैक्षिक और जानकारी साझा करने वाला पेज है।

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01/09/2026

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31/08/2026

30/08/2026
24/08/2026

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एक महीने के मासूम बेटे को छोड़कर देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर योद्धा को शत-शत नमन! 🇮🇳🙏एक तरफ था मौत का साया…...
24/08/2026

एक महीने के मासूम बेटे को छोड़कर देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर योद्धा को शत-शत नमन! 🇮🇳🙏

एक तरफ था मौत का साया…
एक तरफ था फर्ज निभाना…
गोद में था एक माह का लाल,
पर दिल में था सिर्फ़ भारत का तराना। 🇮🇳

✈️ स्क्वाड्रन लीडर लोकेंद्र सिंह सिंधु — भारतीय वायुसेना के वह जांबाज़ योद्धा, जिन्होंने अपनी जान से ज्यादा देश के नागरिकों की जिंदगी को महत्व दिया।

📅 9 जुलाई 2025 को राजस्थान के चूरू जिले में भारतीय वायुसेना का एक जगुआर लड़ाकू विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। विमान में स्क्वाड्रन लीडर लोकेंद्र सिंह सिंधु और उनके साथी फ्लाइट लेफ्टिनेंट ऋषि राज सिंह नियमित उड़ान पर थे।

हादसे के दौरान विमान में तकनीकी समस्या उत्पन्न हुई। उस समय लोकेंद्र सिंह के सामने खुद को बचाने का विकल्प था। वे इजेक्ट कर सकते थे…

लेकिन नीचे आबादी थी। 🏘️

विमान अगर आबादी वाले क्षेत्र में गिरता, तो बड़ी संख्या में निर्दोष नागरिकों की जान खतरे में पड़ सकती थी।

और फिर उस वीर ने वह फैसला लिया, जो केवल असाधारण साहस वाले लोग ही ले सकते हैं…

उन्होंने विमान का रुख आबादी से दूर मोड़ दिया। 🇮🇳

वक्त निकलता गया…
लेकिन उन्होंने नागरिकों को बचाने की कोशिश नहीं छोड़ी।

आखिरकार वे समय पर इजेक्ट नहीं कर सके और देशवासियों की सुरक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। 💔

💔 सबसे दर्दनाक बात…

लोकेंद्र सिंह सिंधु मूल रूप से हरियाणा के रोहतक जिले के खेड़ी साध गांव के रहने वाले थे। उनकी पत्नी डॉ. सुरभि के साथ उनका परिवार हादसे से कुछ ही समय पहले एक बड़ी खुशी से गुजरा था।

📅 10 जून 2025 को उनके घर बेटे का जन्म हुआ था।

जिस नन्हे बेटे को पिता का हाथ पकड़कर बड़ा होना था…
जिसने अभी अपने पिता को ठीक से जाना भी नहीं था…
उसने जन्म के महज एक महीने बाद ही अपने पिता को खो दिया। 😢

लोकेंद्र सिंह 30 जून को ही ड्यूटी पर लौटे थे। हादसे से कुछ घंटे पहले उन्होंने वीडियो कॉल पर अपने नवजात बेटे का चेहरा भी देखा था।

किसे पता था…
वह अपने बेटे को आखिरी बार देख रहे हैं। 💔

🇮🇳 अंतिम विदाई का वो भावुक दृश्य…

जब रोहतक में उन्हें पूरे सैन्य सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई, तो हर आंख नम थी।

गोद में एक महीने का मासूम बेटा…
आंखों में आंसू…
दिल में पति और पिता को खोने का दर्द…

फिर भी वीरांगना पत्नी डॉ. सुरभि ने अपने शहीद पति को “जय हिंद” कहकर अंतिम सलाम किया। 🇮🇳🙏

यही है भारत की मिट्टी की शक्ति…
यही है एक सैनिक परिवार का साहस…
और यही है उस वर्दी की कीमत, जिसे पहनकर हमारे जवान अपने परिवार से दूर देश की रक्षा करते हैं। 🫡

लोकेंद्र सिंह सिंधु ने सिर्फ़ अपना कर्तव्य नहीं निभाया…
उन्होंने यह साबित कर दिया कि एक सैनिक की जिंदगी में देश और उसके नागरिकों की सुरक्षा सर्वोपरि होती है।

एक पिता अपने एक महीने के बेटे को पीछे छोड़ गया…
लेकिन हजारों परिवारों के बेटे-बेटियों को सुरक्षित रखने की कोशिश करते हुए अमर हो गया। 🇮🇳

स्क्वाड्रन लीडर लोकेंद्र सिंह सिंधु और फ्लाइट लेफ्टिनेंट ऋषि राज सिंह को भावभीनी श्रद्धांजलि। 💐🙏

आपका साहस, आपका कर्तव्य और आपका बलिदान देश हमेशा याद रखेगा। 🫡🇮🇳

जब तक ये अंबर और ये भारत की धरती रहेगी,
आप जैसे वीरों की कहानी हमेशा जिंदा रहेगी। ❤️🇮🇳

जय हिंद! 🇮🇳
जय हिंद की सेना! 🫡

ये हैं देहरादून में रहने वाला कुकरेती परिवार इस परिवार में एक नहीं बल्कि पाँच-पांच भाइयों ने एक साथ 1971 के भारत पाकिस्त...
13/08/2026

ये हैं देहरादून में रहने वाला कुकरेती परिवार इस परिवार में एक नहीं बल्कि पाँच-पांच भाइयों ने एक साथ 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध में मोर्चा संभाला था. जो शायद भारतीय सैन्य इतिहास के सबसे दुर्लभ उदाहरणों में से एक है।

पाँच भाइयों में से तीन राजपूत रेजिमेंट और दो ईएमई कोर में थे। अलग-अलग मोर्चों पर वीरता दिखाते हुए, उन्होंने भारत की विजय में योगदान दिया। लेफ्टिनेंट कर्नल राकेश कुकरेती, शौर्य चक्र विजेता, उन साहसी सैनिकों में से थे।

ये परिवार देहरादून के डिफेंस कॉलोनी इलाके में रहता है. इन पांच भाईयों में से तीन भाई राजपूत रेजिमेंट में और दो भाई ईएमई कोर में तैनात थे. इन सभी को अलग-अलग मोर्चों पर तैनात किया गया था, उनकी यूनिट अलग थीं लेकिन, सबका संकल्प केवल एक ही था- भारत माता की विजय।

एक परिवार के पांच भाइयों ने संभाला था मोर्चा:

इन पांच वीरों में सबसे प्रमुख नाम है शौर्य चक्र विजेता रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल राकेश कुकरेती. वे बताते हैं कि नवंबर 1971 के अंतिम सप्ताह में ही युद्ध की आहट साफ सुनाई देने लगी थी. सीमाओं पर तनाव बढ़ रहा था, पाकिस्तानी सेना भारतीय फौज की सप्लाई लाइनों को तोड़ने की साजिश रच रही थी. लेकिन, भारतीय जवान हर चुनौती के लिए तैयार थे.

युद्ध के दौरान धर्मनगर से गाजीपुर तक दुश्मन के इलाके में घुसकर की गई रेकी ने रणनीति की दिशा बदल दी. लेफ्टिनेंट कर्नल कुकरेती याद करते हैं जब उन्होंने तीन दिन तक बिना खाने और पानी के करीब 93 किलोमीटर तक पैदल चलते रहे. चारों तरफ गोलों की बारिश लेकिन, हौसला जरा भी डगमगाया नहीं. उनकी आंखों में आज भी वह दृश्य जिंदा है, जब मौत बेहद करीब थी लेकिन, देश से बड़ा कुछ भी नहीं था।

कुकरेती परिवार की यह वीरगाथा केवल स्मृतियों तक सीमित नहीं रही. इसे ‘कहानी 1971 युद्ध की’ नामक पुस्तक में सहेजा गया है ताकि आने वाली पीढ़ियां जान सकें कि आज़ादी और विजय के पीछे कितनी कुर्बानियां छिपी होती हैं।🇮🇳💐

क्या एक छोटी बच्ची अपने नन्हे भाई के लिए इतनी जिम्मेदारी उठा सकती है? मोंटेनेग्रो, क्विंडियो के एक जंगली इलाके से सामने ...
13/08/2026

क्या एक छोटी बच्ची अपने नन्हे भाई के लिए इतनी जिम्मेदारी उठा सकती है? मोंटेनेग्रो, क्विंडियो के एक जंगली इलाके से सामने आई घटना ने भाई-बहन के रिश्ते की गहराई को दिखाया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, गश्त कर रही पुलिस को जंगल में बच्चे के रोने की आवाज सुनाई दी। वहां दो भाई-बहन अकेले मिले। छोटी बच्ची अपने कुछ महीने के भाई को गोद में लेकर बैठी थी और उसे ठंड से बचाने की कोशिश कर रही थी।

अधिकारियों ने बच्चों के वहां पहुंचने की परिस्थितियों को समझने के लिए जांच शुरू की है। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि वे वहां कितनी देर से थे और उन्हें वहां कौन छोड़कर गया। इस घटना ने बच्चों की सुरक्षा और देखभाल की जिम्मेदारी को लेकर गंभीर सवाल सामने रखे हैं।

10/08/2026

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