Pahadi Sardar Badrish Chhabra

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Pahadi Sardar Badrish Chhabra जन्म पंजाबी परिवार में हुआ पर जन्म से ही गढ़वाल क्षेत्र में रहा तो गढ़वाल दिमाग और दिल में बस गया ।

फूलदेई पर्व की बधे 🙏🌺💐🌹🌼🌸
14/03/2026

फूलदेई पर्व की बधे 🙏🌺💐🌹🌼🌸

मंडुआ किंग Subhash Raturi ने राजभवन देहरादून में वसंतउत्सव में मडुवे से बने आधुनिक खान पान में धूम मचा रखी है । वैसे इनक...
28/02/2026

मंडुआ किंग Subhash Raturi ने राजभवन देहरादून में वसंतउत्सव में मडुवे से बने आधुनिक खान पान में धूम मचा रखी है । वैसे इनका रेस्टोरेंट मियांवाला देहरादून में स्थित है । Online food delivery apps पर Mandua king के नाम से भी है ।



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20/02/2026

धारी मां के मंदिर के समीप मोटर बोट की आवाजे परेशान तो करती ही थी अब हादसे भी कर कर रही है कही देवी देवता नाराज तो नहीं हो

गढ़वाली फिल्म ज़लमभूमि देखने मत जाना अगर तुम्हारी आँखें दिल से ज्यादा संवेदनशील  है और आंसू निकल पड़ते है ।क्या कमाल का त...
09/02/2026

गढ़वाली फिल्म ज़लमभूमि देखने मत जाना अगर तुम्हारी आँखें दिल से ज्यादा संवेदनशील है और आंसू निकल पड़ते है ।
क्या कमाल का ताना बाना ले कर उच्चतर की कहानी के माध्यम से पटकथा ,संवाद , किरदार , रिश्तों की गहराई ,समाजिक मुद्दे ,कैमरा और संगीत के बाद एडिटिंग द्वारा बनी perfect फिल्म । समस्त टीम को शुभकामनाएं और दर्शकों से निवेदन समय निकाल का जाए देखे । और मुझे एक बात समझ नहीं आई की डायरेक्टर कौन है ? कलाकार दिल जीत गए ,इस फिल्म में वही कलाकार चमत्कार कर गए और पिछली फिल्मों में अदाकारी !!!!!

गढ़वाल के वर्तमान में एक युग पुरुष है दाता राम जी यानी D.r. Purohit जी उन्होंने मुझे अपने विश्व विख्यात नाटक चक्रव्यूह (...
20/01/2026

गढ़वाल के वर्तमान में एक युग पुरुष है दाता राम जी यानी D.r. Purohit जी
उन्होंने मुझे अपने विश्व विख्यात नाटक चक्रव्यूह (गढ़वाली) में एक पूजारी का रोल करने को कहा जिसे मैंने अपना सौभाग्य समझ स्वीकार किया नाट्य मंचन देहरादून विरासत में हुआ था ।
इस किरदार ने मुझे बहुत ऑफर्स दे दिए है इस लिए आज सहर्ष लिंक शेयर कर रहा हूँ।

https://youtu.be/_Yp_LpB08AY?si=cR11VfyEKbzUMb1f

Day 8 Chakravyuh Full Performance - Virasat 2025 | 12th October 2025

आपको ये जरूर जानना चाहिए......🙏🔆🙏14 जनवरी को घुघुतिया पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया गया। उत्तराखंड में मकर संक्रांति को घुघुत...
14/01/2026

आपको ये जरूर जानना चाहिए......🙏🔆🙏

14 जनवरी को घुघुतिया पर्व बड़ी धूमधाम से मनाया गया। उत्तराखंड में मकर संक्रांति को घुघुतिया संक्रांति या पुस्योड़िया संक्रांति भी कहते हैं। हालांकि इसके अन्य नाम मकरैण, उत्तरैण, घोल्डा, घ्वौला, चुन्यात्यार, खिचड़ी संक्रांति, खिचड़ी संगरादि भी हैं।
मकर संक्रांति के त्यौहार के दिन अनेक पकवान कव्वों को खिलाये जाते हैं। घुघता इन पकवानों में मुख्य है। घुघुत एक पक्षी का नाम भी है। त्यौहार के दिन बनने वाला घुघुत पकवान हिन्दी के अंक ४ के आकार का होता है।
आटे को गुड़ में गूंदने के बाद उससे घुघते बनाए जाते हैं। इस बात का कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं है कि यह त्यौहार कब से और क्यों मनाया जाता है। साथ ही इस बात का भी कोई प्रमाण नहीं है कि इस पकवान को घुघता क्यों कहते हैं।
एक लोककथा के अनुसार कहा जाता है कि बहुत समय पहले घुघुत नाम का एक राजा हुआ करता था। एक ज्योतिषी ने उसे बताया कि मकर संक्रांति की सुबह कव्वों द्वारा उसकी हत्या कर दी जायेगी।
राजा ने इसे टालने का एक उपाय सोचा। उसने राज्य भर में घोषणा कर दी कि सभी लोग गुड़ मिले आटे के विशेष प्रकार के पकवान बनाकर अपने बच्चों से कव्वों को अपने अपने घर बुलायेंगे। इन पकवानों का आकर सांप के आकार के रखने के आदेश दिए गये ताकि कव्वा इन पर और जल्दी झपटे।
राजा का अनुमान था कि पकवान खाने में उलझ कर कव्वे उस पर आक्रमण की घड़ी को भूल जायेंगे। लोगों ने राजा के नाम से बनाये जाने वाले इस पकवान का नाम ही घुघुत रख दिया। तभी से यह परम्परा चली आ रही है।
इसी तरह की एक अन्य जनश्रुति के अनुसार सालों पहले उत्तराखंड क्षेत्र में एक राजा हुआ करता था। उसे एक ज्योतिषी ने बताया कि उस पर मारक ग्रहदशा आयी हुई है। यदि वह घुघुतों (फ़ाख्तों) का भोजन कव्वों को करा दे तो उसके इस ग्रहयोग का प्रभाव टल सकता है।
राजा अहिंसावादी था। उसे संक्रांति के दिन निर्दोष पक्षियों को मारना ठीक नहीं लगा। उसने उपाय के तौर पर गुड़ मिले आटे के प्रतीकात्मक घुघते बनवाये। राज्य के बच्चों से कव्वों को इसे खिलवाया तभी से यह परम्परा चल पड़ी।
कव्वे को पकवान खिलाने के संबंध में एक अन्य मान्यता यह है कि ठण्ड और हिमपात के कारण अधिकांश पक्षी मैदानों की ओर प्रवास कर जाते हैं। कव्वा पहाड़ों से प्रवास नहीं करता है। कव्वे के अपने प्रवास से इस प्रेम के कारण स्थानीय लोग मकर संक्रांति के दिन उसे पकवान खिलाकर उसका आदर करते हैं।
गढ़वाल में इसे ‘चुन्या त्यार’ भी कहा जाता है। इस दिन वहां दाल, चावल, झंगोरा आदि सात अनाजों को पीसकर उससे चुन्या नाम का विशेष व्यंजन तैयार किया जाता है। इस दिन गढ़वाल में आटे के मीठे घोल्डा/ घ्वौलो के बनाये जाने के कारण इसे घोल्डा या घ्वौल भी कहा जाता है।
ंक्रांति

पर मेरे ज्ञान के अनुसार 8 के आकर के घुगुतिया कीड़े के आकार की अनुभूति देता है जिसे कौआ तुरन्त खा लेता है इस दिनों कौओ ने पीपल , गूलर के पेड़ से दाने या फल खाये होते है । जिस मिश्रण से घुगुतिया बनाया जाता है वो उसके पेट मे एक रसायन बनाता है तो बीज के अंकुरित होने में बहुत सहायता करता है । जब कौआ बीट करता है तो बीज जहाँ भी गिरता है पौधे का रूप ले लेता है । हमारे पुरखो ने कितने अच्छे तरीके से हमारे द्वारा त्योहार के रूप में बीजारोपण करवा दिया ।

🙏 नव वर्ष की बधे
02/01/2026

🙏 नव वर्ष की बधे

#उत्तराखंड #गढ़वाली #2025 #2026

भारतीय वायु सेना के परम आदरणीय  AIR CHIEF MARSHAL Amar Preet  SINGH जी के गेटअप में मैं ...  Indian Air Force           ...
18/11/2025

भारतीय वायु सेना के परम आदरणीय AIR CHIEF MARSHAL Amar Preet SINGH जी के गेटअप में मैं ...

Indian Air Force #उत्तराखंड

02/11/2025

इगास बगवाल पर सम्पूर्ण लेख पढ़े ,अच्छा लगे तो शेयर भी कर सकते है ।

उत्तराखंड के गढ़वाल छेत्र में मनायी जाने वाली दीपावली का एक त्यौहार है " बग्वाल" जिसमें पर्यावरण को नुकसान पहुँचाये बिना, प्राकृतिक रूप से मनाया जाता है ।
ईगास बग्वाल के अवसर पर बर्त खींचा जाता है( बर्त का अर्थ है मोटी रस्सी ) मुख्यतः यह बर्त बाबला, बबेड़ू या उलेंडू घास से बनाया जाता है (जो एक तरह से खरपतवार है )

ईगास बग्वाल के दिन भैला खेलने का विशिष्ठ रिवाज है। यह चीड़ की लीसायुक्त लकड़ी से बनाया जाता है। यह लकड़ी ज्वलनशील होती है। इसे दली या छिल्ला कहा जाता है। जहां चीड़ के जंगल न हों वहां लोग देवदार, भीमल या हींसर की लकड़ी आदि से भी भैलो बनाते हैं। इन लकड़ियों के छोटे-छोटे टुकड़ों को एक साथ रस्सी अथवा जंगली बेलों से बांधा जाता है। फिर इसे जला कर घुमाते हैं। इसे ही भैला खेलना कहा जाता है।
परंपरानुसार बग्वाल से कई दिन पहले गांव के लोग लकड़ी की दली, छिला, लेने ढोल-बाजों के साथ जंगल जाते हैं। जंगल से दली, छिल्ला, सुरमाड़ी, मालू अथवा दूसरी बेलें, जो कि भैलो को बांधने के काम आती है, इन सभी चीजों को गांव के किसी बड़े चौक में एकत्र करते हैं।
सुरमाड़ी, मालू की बेलां अथवा बाबला, स्येलू से बनी रस्सियों से दली और छिलो को बांध कर भैला बनाया जाता है। सार्वजनिक स्थान या पास के समतल खेतां में आस पास के गांव के लोग एकत्रित होकर ढोल-दमाऊं के साथ नाचते और भैला खेलते हैं। भैलो खेलते हुए अनेक मुद्राएं और नृत्य किया जाता है । भैलो खेलते हुए कुछ गीत गाने, व्यंग्य-मजाक करने की परम्परा भी है। यह सिर्फ हास्य विनोद के लिए किया जाता है। जैसे अगल-बगल या सामने के गांव वालों को रावण की सेना और खुद को राम की सेना मानते हुए मजाक की जाती हैं, कई तुक बंदियां की जाती हैं जो मनोरंजन के लिए होती है । जैसे- फलां गौं वाला रावण कि सेना, हम छना राम की सेना। निकटवर्ती गांवों के लोगों को गीतों के माध्यम से छेड़ा जाता है। नए-नए त्वरित गीत तैयार होते हैं।

इसमें चीड़ की लकड़ी जिसे बारीक फाड़कर एक छोटी गठ्ठी बनाकर, एक लम्बी मोटी बेल जो रस्सी नुमा होती है । (मेरे ज्ञान के अनुसार ये बेले उस समय मिट्टी के बने घरो को नुकसान पहुंचाती थी तो हमारे पुरखो ने इसे खत्म करने का एक सही तरीका निकला जिन से ये बेले और खरपातवतर को वो एक माह तक त्योहार में भेळो बना कर आम जनमानस से जलवाते यानी खत्म करते रहे और चीड़ की लकड़ी की छाल जो पेड़ से नीचे गिर कर जंगल मे आग का कारण बन सकती थी उसे हमारे पुरखो ने लोक त्यौहार से जोड़ कितना अच्छा किया ।वर्तमान समय मे यदि बेल नहीं मिलती फिर आगे धातु की तार से बाँधकर पिछे लम्बे रस्सी का ही प्रयोग करते हैं,)
इससे बाँधकर लकड़ी की गठ्ठी के दोनों सिरों पर अग्नि जलाकर इस प्रकार घुमाया जाता है जिससे अग्नि जलती रहे ओर स्वयं को बचाते हुए किसी दूसरे को भी नुकसान न पहुंचे,मानो दो योद्धा तलवार से युद्ध कर रहे हो सभी एक उचित दूरी पर रहकर इसे घुमाते है इसे भेला नाम से जाना जाता है
( मेरे ज्ञान के अनुसार लकड़ी की गठ्ठी का वजन तलवार के वजन के बराबर होता था क्योंकी राज्य का राजा इतना अमीर नही था इस तरह से हर नागरिको को तलवार उठाने का और तलवार बाजी का अनुभव हो जाता रहा होगा )
। जब सम्पूर्ण गांव वाले मिल कर रात्री में इसे जला कर नृत्य कर एक त्यौहार के रूप में मनाते रहे तो बग्वाल का जन्म हुआ ।
(मेरे ज्ञान के अनुसार पहाड़ के अलग अलग गावो में जब ये त्योहार एक माह तक मनाया जाने लगा तो गढ़वाल के राजा और तिब्बत की राजशाही को भी पता लग गया की पहाड़ो में दुर्गम स्थानों में भी जनता रहती है इससे गढ़वाल राज्य पर तिब्बत से आक्रमण बहुत कम हुऐ । और रात्री को इतने बडे आग के गोले इधर उधर घूमते देख आक्रमणकारियो को दहशत भी देता होगा । ) ।
दीपावली , इगास बग्वाल की बहुत बहुत शुभकामनाये और बधाई ।

संकलन और विचार
बद्रीश छाबड़ा
पहाड़ी सरदार
#बग्वाल #इगास_बग्वाल #उत्तराखंड #उत्तराखंड

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