02/11/2024
जिस ओर जवानी चलती है, बुढापा वहीं पहुंचता है।
घ्वस्त देश और इकॉनमी। 1950 मे जापान की नई पीढी को ये सौगात मिली थी।
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देश राख से खड़ा़ करना था। शुरूआती कनफ्यूजन के बाद, जापान सरकार और केन्द्रीय बैंक ने अर्थव्यवस्था खड़ा करना शुरू किया।
एक क्रेडिट सिस्टम शुरू किया -
विण्डो गाइडेंस
यह युद्ध के दौर की फंडिंग का ही प्रतिरूप था। तब टैंक के लिए, प्लेन के लिए, बंदूको, हथियार इंडस्ट्री के लिए लक्ष्य तय होता था। बैंक सिर्फ ऋण ही नही देता था, बल्कि उत्पादन मे कोई बाधा न आए, ये भी देखता।
यह व्यवस्था युद्ध के बाद सिविल सेक्टर में लागू हुई। स्टील मे, बिजली, हाउसिंग, आटो मोबाइल.. हर सेक्टर मेे इन्वेस्टमेंट तय किया।
छोटे व्यवसाइयों को खोजे, उन्हे काम के लिए लोन दिये।
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जॉब क्रिएशन हुआ, तो स्किल्ड लोग चाहिए।
सरकार ने सस्ते मे अच्छी शिक्षा दी। कालेज यूनिवर्सिटी से छात्र निकल, सीधे इन फैक्ट्रियों मे पहुंचे।
छोटी छोटी कंपनियां - सान्यो, माजदा, होंडा, टोयोटा, कैनन, सोनी, पैनासोनिक, लैक्सस बनकर दुनिया पर छा गई।
दुनिया मे जापानी सामान बिकता और दुनिया का पैसा जापान आ जाता। याने और इन्वेस्टमेण्ट..
और समृद्धि!!
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यही काम 18 वी सदी से ब्रिटेन, दुनिया की फैक्ट्री बनकर कर रहा था। जापान ने महज 15 साल में उसे उसे पीछे छोड़ दिया। USA क्व बाद दूसरी बड़ी इकॉनमी।
अगली पीढी को भी यही कर्मठता, इनोवेशन, एजुकेशन घुट्टी मे मिली। महज 2 पीढी मे जापानियो का जीवन स्तर दुनिया मे सबसे उंचा हो गया।
आज जापान विगत 20 साल से मंदी और स्थिरता मे फंसा है। घटती आबादी, घटता कन्ज्मप्शन, इसका कारण है।
शानदार हेल्थकेयर के कारण इंसान 100 साल जीता है। आबादी मे बूढे ज्यादा है, जवान कम, वर्कफोर्स कम।
पर इससे जीवन स्तर मे कोई गिरावट नही आई।
इन बूढों के पास सेविंग है। घर है, पेंशन है ..
जिंदगी के मजे है।
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यही माडल चीन ने अपनाया। अपनी अथाह आबादी को काम पर लगा दिया। पिछले 20 साल से दुनिया का कारखाना, चीन है।
इस रास्ते 1990 के बाद से उसने 80 करोड लोगों को गरीबी से बाहर निकाला। अब वो दुनिया का ट्रेड किंग है।
उस पैसे से सुपरपावर बन गया है।उसकी भी आबादी बढना रूक चुकी है। जन्म दर कम है, मृत्यु दर और भी कम।
तो चीन 20 साल बाद बूढों का देश होगा।
लेकिन समृद्ध, आत्मनिर्भर बूढों का।
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यही माडल हमने भी अपनाया।
सन 2000 से 2015 के बीच आप 15+ साल के थे, तो भारत मे पैदा होने का सुनहरा वक्त था।ये विश्व का सबसे जवान देश था, जिसकी 65% आबादी युवा थी।
ये ईश्वरीय अवसर था।
और सफलता कदम चूम भी रही थी।
भारत इमर्जिंग इकानमी था। नए बिजनेस खुल रहे थे। नए बाजार, नए मॉल, नए पॉवर प्लांट, स्टील फैक्ट्री, रिफाइनरी..नई खदाने, नये कॉल सेंटर, बीपीओ।
IIT और IIM के ग्रेजुएट तो एक्सपोर्ट हो रहे थे। घरेलू जरूरतों के लिए आसपास धड़ाधड़ इंजीनियरिंग और MBA कालेज खुले।
उनसे लाखो लड़के निकले।
एग्जीक्यूटिव, मैंनेजर, सीईओ बने।
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और तब हमारा धर्म खतरे मे आ गया।
डर हुआ कि देश मे इस्लाम बढ़ रहा है। सबको राजनीति और इतिहास में रुचि हुई। शिक्षा महंगी हुई, इन्टरनेट सस्ता। इससे रैलियों मे भीड़ बढ़ी, पार्टी के कार्यकर्ता भी।
हमारा युवा, टीवी और व्हाट्सप पर नेहरू को गरियाने, चीन को कटियाने, पाकिस्तान को लतियाने का मौका खोजने लगा। भूखों से जय श्रीराम बोलवाया गया।
नंगे तलवार लेकर नाचने लगे।
मंदिर बना, सेन्ट्रल विस्टा बना, 370 हट गई और तीन तलाक बैन हो गया। पप्पू मूत्र पीवक, वामी, और जेएनयू धूल चाटने लगे।
मुल्ले खूब टाइट हुए।
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व्यापार, इन्वेस्टमेंट, रोजगार भी टाइट हुआ। ग्रोथ थमी,कर्ज बढा। मॉल बंद हो रहे है, नए बिजनेस के अवसर सीमित हैं।
कालेजो को छात्र नही मिल रहे, और ग्रेजुएट्स को जॉब्स नही मिल रहे। इस वर्ष IIT बॉम्बे में 35% को प्लेसमेंट नही मिला।
पर जवानी मुल्ले टाइट करके खुश है। बाप के खून पसीने से सना बेटा, फिलिस्तीन को ट्रोल कर रहा है, इजराइल के साथ खड़ा है।
कभी कभी पेपर आउट होने के खिलाफ हैशटैग भी चलाता है।
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दुनिया में जन्म दर गिर रही है। देश के देश बुढापे की जकड़ में बढ़ रहे हैं। हम भी उस राह पर हैं।
डेमोग्राफिक डिवीडेंट का जो मौका, चार हजार साल के इतिहास मे पहली बार आया था, बस यूं ही फिसल गया।
अधिकांश युवा के पास न स्किल्स है, न जॉब है, न सेविंग। 30 साल बाद कोई पेंशन भी नही होगी।
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नेहरू की पेंशन खाने वाले 10 साल मे साफ हो जाएंगे। अटल की नाममात्र की पेंशन वाले भी अपने बच्चों पर निर्भर होंगे।
और वो बच्चे?
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वो खुद मिडिल एज, थकी, चीट करी गई, हताश, बेकार आबादी होगी। यह भविष्य, इन्होंने अपनी हाथ से लकीरों मे जबरन खोदा है।
जिस ओर जवानी चलती है,
बुढापा वहीं पहुंचता है।
इस लेख को पढ़े और स्वयं से संवाद करें कि हम कहाँ भटक रहे हैं या भटकाएँ जा रहे हैं।