Abhishek Jain Bittu

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 #वैश्विक_अभिभावक_दिवस (1 जून)“सुपर पेरेंट” बनने की दौड़ में खोता अभिभावकत्व, अधिकार भी छीने और सम्मान भी”✍🏻 Abhishek Ja...
31/05/2026

#वैश्विक_अभिभावक_दिवस (1 जून)

“सुपर पेरेंट” बनने की दौड़ में खोता अभिभावकत्व, अधिकार भी छीने और सम्मान भी”

✍🏻 Abhishek Jain Bittu
राजस्थान प्रदेश प्रवक्ता एवं मीडिया प्रभारी
Sanyukt Abhibhavak Sangh, Rajasthan- SAS, जयपुर

हर वर्ष 1 जून को विश्वभर में वैश्विक अभिभावक दिवस मनाया जाता है। इस दिन माता-पिता और अभिभावकों के योगदान को सम्मान देने की बातें होती हैं, उन्हें बच्चों का प्रथम गुरु, मार्गदर्शक और भविष्य निर्माता बताया जाता है। लेकिन इस अवसर पर एक ऐसा प्रश्न भी है, जिससे समाज, सरकार और शिक्षा व्यवस्था लगातार बचती रही है—क्या आज के अभिभावक वास्तव में सम्मानित हैं, या केवल जिम्मेदारियों का बोझ ढोने वाले एक मौन वर्ग बनकर रह गए हैं?

सच्चाई यह है कि आज का अभिभावक पहले से कहीं अधिक परेशान, असुरक्षित और दबावग्रस्त है। उसे बच्चों के भविष्य का निर्माता तो कहा जाता है, लेकिन उस भविष्य को तय करने वाली व्यवस्थाओं में उसकी कोई निर्णायक भागीदारी नहीं है। उसे जिम्मेदारियां दी गईं, लेकिन अधिकार नहीं;
1) अपेक्षाएं दी गईं, लेकिन सम्मान नहीं।
2) अभिभावक नहीं, व्यवस्था का सबसे बड़ा शिकार

आज का अभिभावक चारों ओर से घिरा हुआ है। सरकारी नीतियां उसे सुनने की बजाय उस पर निर्णय थोपती हैं। निजी स्कूल उसे अभिभावक नहीं, ग्राहक मानते हैं। कोचिंग संस्थान बच्चों के भविष्य का भय दिखाकर परिवारों की आर्थिक क्षमता का दोहन करते हैं। समाज उसे लगातार तुलना, प्रतिस्पर्धा और दिखावे की संस्कृति में धकेलता है।

बच्चे के जन्म से लेकर उच्च शिक्षा तक हर कदम पर अभिभावक को आर्थिक, मानसिक और सामाजिक दबावों का सामना करना पड़ता है। फीस, किताबें, यूनिफॉर्म, परिवहन, कोचिंग, प्रतियोगी परीक्षाएं, डिजिटल उपकरण और अतिरिक्त गतिविधियों का खर्च एक सामान्य परिवार की कमर तोड़ देता है। इसके बावजूद यदि बच्चा अपेक्षित परिणाम नहीं ला पाता, तो सबसे पहले सवाल अभिभावक पर ही उठते हैं।

विडंबना यह है कि जो व्यक्ति अपने परिवार के लिए सबसे अधिक संघर्ष कर रहा है, वही व्यवस्था में सबसे कम सुना जा रहा है।

-- “सुपर पेरेंट” का भ्रम और टूटते परिवार
-- पिछले कुछ वर्षों में समाज ने एक नई अवधारणा गढ़ी है—“सुपर पेरेंट”। ऐसा अभिभावक जो अपने बच्चे को हर क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ बनाने की क्षमता रखता हो। यह धारणा सुनने में आकर्षक लगती है, लेकिन इसके परिणाम बेहद खतरनाक हैं।

अभिभावकों को यह विश्वास दिलाया गया कि यदि वे हर कीमत पर अपने बच्चे को आगे नहीं बढ़ा पाए, तो वे असफल माता-पिता हैं। इसी सोच ने हजारों परिवारों को कर्ज, तनाव और मानसिक दबाव की स्थिति में पहुंचा दिया।

आज लाखों अभिभावक अपनी आय से अधिक खर्च कर रहे हैं। बच्चों के लिए महंगी शिक्षा और कोचिंग की व्यवस्था करने हेतु ऋण ले रहे हैं। अपनी जरूरतों को त्यागकर बच्चों के भविष्य के नाम पर आर्थिक संकट झेल रहे हैं। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में परिवारों का भावनात्मक संतुलन कमजोर होता जा रहा है।

बच्चों से संवाद कम हो रहा है और अपेक्षाओं का दबाव बढ़ रहा है। अंक, रैंक और पैकेज की चर्चा ने संस्कार, संवेदनशीलता और मानसिक स्वास्थ्य को पीछे धकेल दिया है।

#शिक्षा_व्यवस्था में अभिभावकों की भूमिका केवल भुगतान तक सीमित

यदि अभिभावक शिक्षा व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण भागीदार है, तो फिर उसे निर्णय प्रक्रिया से बाहर क्यों रखा जाता है?

आज भी अधिकांश राज्यों में फीस निर्धारण, शिक्षा नीति, पाठ्यक्रम संबंधी निर्णय, परीक्षा प्रणाली और स्कूल प्रशासन के महत्वपूर्ण मामलों में अभिभावकों की प्रभावी भागीदारी नहीं है। निजी स्कूलों की मनमानी फीस वृद्धि, अनिवार्य खरीदारी और विभिन्न प्रकार के आर्थिक दबावों के खिलाफ अभिभावकों की आवाज को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

देश में प्रतियोगी परीक्षाओं की अव्यवस्था, पेपर लीक, परीक्षा स्थगन, परिणाम विवाद और मूल्यांकन संबंधी त्रुटियों का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव भी परिवारों पर पड़ता है। नीट, जेईई, भर्ती परीक्षाओं और बोर्ड परीक्षाओं से जुड़े विवादों ने बार-बार यह साबित किया है कि शिक्षा व्यवस्था की कमियों की कीमत विद्यार्थी और अभिभावक दोनों चुकाते हैं।

फिर भी जब नीतियां बनती हैं, तो अभिभावकों को केवल दर्शक बनाकर रखा जाता है। बाजारवाद ने शिक्षा को सेवा से व्यापार बना दिया, शिक्षा का मूल उद्देश्य व्यक्ति निर्माण और समाज निर्माण था। लेकिन आज शिक्षा का बड़ा हिस्सा बाजार के प्रभाव में आ चुका है। स्कूल ब्रांड बन गए हैं, कोचिंग उद्योग अरबों रुपये का कारोबार बन चुका है और सोशल मीडिया ने सफलता की एक कृत्रिम परिभाषा स्थापित कर दी है।

अभिभावकों को यह विश्वास दिलाया जा रहा है कि महंगी शिक्षा ही बेहतर भविष्य की गारंटी है। इसी सोच ने शिक्षा को अधिकार से अधिक उत्पाद बना दिया है।

परिणामस्वरूप परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हो रहे हैं, जबकि बच्चों पर प्रदर्शन का दबाव बढ़ रहा है। मानसिक तनाव, अवसाद और आत्महत्या जैसी घटनाएं लगातार चिंता का विषय बन रही हैं। दुखद यह है कि इन परिस्थितियों में अभिभावकों की मानसिक स्थिति पर शायद ही कभी गंभीर चर्चा होती है।

#अभिभावक_अधिकार_आंदोलन की आवश्यकता

वैश्विक अभिभावक दिवस केवल शुभकामनाओं और औपचारिक आयोजनों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यदि वास्तव में अभिभावकों का सम्मान करना है, तो उन्हें शिक्षा व्यवस्था में वैधानिक और प्रभावी भागीदारी देनी होगी।

समय की मांग है कि—शिक्षा नीति निर्माण में अभिभावकों की सहभागिता सुनिश्चित की जाए।

फीस निर्धारण प्रक्रिया को पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाए।

निजी स्कूलों की मनमानी पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित हो।

विद्यार्थियों के साथ-साथ अभिभावकों के मानसिक स्वास्थ्य को भी नीति का हिस्सा बनाया जाए।

परिवारों को प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ से निकालकर संवाद, संस्कार और संतुलन की दिशा में प्रेरित किया जाए।

शिक्षा को व्यापार नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व के रूप में स्थापित किया जाए।

परिवार बचेंगे तो समाज बचेगा
आज सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि अभिभावकों को केवल भुगतान करने वाला माध्यम या बच्चों की सफलता का जिम्मेदार व्यक्ति मानने की सोच बदली जाए। उन्हें समाज और शिक्षा व्यवस्था का वास्तविक साझेदार स्वीकार किया जाए।

क्योंकि जब अभिभावक स्वयं तनाव, असुरक्षा और अधिकारहीनता में जी रहा होगा, तब वह बच्चों को सुरक्षित और संतुलित वातावरण कैसे दे पाएगा?

वैश्विक अभिभावक दिवस हमें यह याद दिलाता है कि मजबूत राष्ट्र की नींव मजबूत परिवारों पर टिकी होती है, और मजबूत परिवारों की आधारशिला सशक्त अभिभावक होते हैं।

यदि हम सचमुच बच्चों का भविष्य सुरक्षित करना चाहते हैं, तो सबसे पहले अभिभावकों को उनका सम्मान, अधिकार और निर्णय प्रक्रिया में उचित स्थान देना होगा।

क्योंकि अभिभावक केवल बच्चों का पालन-पोषण नहीं करते, वे समाज का भविष्य गढ़ते हैं। और जिस समाज में अभिभावक कमजोर होंगे, वहां भविष्य भी कमजोर होगा।

Government of Rajasthan

  - क्या शिक्षा व्यवस्था विद्यार्थियों को शिक्षित कर रही है या उनके भविष्य के साथ प्रयोग कर रही है?✍🏻 अभिषेक जैन बिट्टूर...
30/05/2026

- क्या शिक्षा व्यवस्था विद्यार्थियों को शिक्षित कर रही है या उनके भविष्य के साथ प्रयोग कर रही है?

✍🏻 अभिषेक जैन बिट्टू
राजस्थान प्रदेश प्रवक्ता, संयुक्त अभिभावक संघ, जयपुर
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👇🏻भारत को विश्वगुरु बनाने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, नई शिक्षा नीति की सफलता के गीत गाए जाते हैं, डिजिटल इंडिया और तकनीकी क्रांति की बातें होती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि आज देश का विद्यार्थी और अभिभावक दोनों शिक्षा व्यवस्था पर विश्वास खोते जा रहे हैं। *कारण स्पष्ट है—लगातार सामने आ रही अनियमितताएं, पेपर लीक, परीक्षा घोटाले, मूल्यांकन में त्रुटियां, बढ़ता व्यावसायीकरण और जवाबदेही का अभाव।

हाल ही में सीबीएसई की ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली को लेकर सामने आए विवाद ने एक बार फिर शिक्षा व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर कर दिया है। उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैनिंग में त्रुटियां, पन्ने गायब होना, अंक अपलोडिंग में गड़बड़ियां और पुनर्मूल्यांकन के बाद अंकों में बड़े बदलाव यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि व्यवस्था उतनी मजबूत नहीं है जितना सरकार और बोर्ड दावा करते हैं।

लेकिन यह समस्या केवल सीबीएसई तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में देश ने देखा है कि कैसे राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित परीक्षाएं भी विवादों केघेरे में रही हैं। मेडिकल क्षेत्र में प्रवेश का आधार मानी जाने वाली NEET परीक्षा हो या इंजीनियरिंग क्षेत्र की प्रतिष्ठित JEE परीक्षा, बार-बार पारदर्शिता, निष्पक्षता और परीक्षा संचालन को लेकर सवाल उठते रहे हैं। कई राज्यों में भर्ती परीक्षाओं से लेकर प्रतियोगी परीक्षाओं तक पेपर लीक के मामले सामने आए। लाखों विद्यार्थियों की वर्षों की मेहनत कुछ भ्रष्ट लोगों की लालच और प्रशासनिक विफलताओं की भेंट चढ़ गई।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि हर घोटाले और हर विवाद के बाद जांच समितियां तो बनती हैं, बयान भी जारी होते हैं, लेकिन शिक्षा व्यवस्था में मूलभूत सुधार शायद ही कभी दिखाई देते हैं। सरकारें बदलती हैं, अधिकारी बदलते हैं, नीतियां बदलती हैं, लेकिन विद्यार्थियों की परेशानियां जस की तस बनी रहती हैं।

आज शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा संकट विश्वास का संकट है। विद्यार्थी को भरोसा नहीं कि परीक्षा निष्पक्ष होगी। अभिभावक को भरोसा नहीं कि मूल्यांकन सही होगा। शिक्षक को भरोसा नहीं कि उसकी मेहनत को उचित महत्व मिलेगा। और समाज को भरोसा नहीं कि शिक्षा वास्तव में प्रतिभा को आगे बढ़ाने का माध्यम बन रही है।

स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि अब शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान प्राप्ति से अधिक अंक प्राप्ति और सीट हासिल करने तक सीमित होता जा रहा है। कोचिंग उद्योग अरबों रुपये का कारोबार बन चुका है। सरकारी विद्यालय संसाधनों के अभाव से जूझ रहे हैं। निजी विद्यालयों की फीस लगातार बढ़ रही है। प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल रहा है। इसके बावजूद सरकारें शिक्षा के मूल प्रश्नों पर गंभीर बहस से बचती दिखाई देती हैं।

सीबीएसई मूल्यांकन विवाद भी इसी व्यापक संकट का हिस्सा है। जब किसी विद्यार्थी को उसकी वास्तविक मेहनत के अनुरूप अंक नहीं मिलते, तो उसका केवल परिणाम प्रभावित नहीं होता बल्कि उसका आत्मविश्वास, उसका करियर और उसके भविष्य की संभावनाएं भी प्रभावित होती हैं। एक गलत मूल्यांकन किसी विद्यार्थी को मनचाहे कॉलेज, विश्वविद्यालय या छात्रवृत्ति से वंचित कर सकता है।

इसका सबसे बड़ा दंश अभिभावकों को झेलना पड़ता है। वर्षों तक फीस, कोचिंग, किताबों और अन्य शैक्षणिक खर्चों का बोझ उठाने के बाद जब परिणामों पर सवाल खड़े होते हैं तो अभिभावकों को पुनर्मूल्यांकन, शिकायत, दस्तावेजी प्रक्रिया और कभी-कभी न्यायालयों तक का सहारा लेना पड़ता है। आर्थिक नुकसान अलग होता है और मानसिक तनाव अलग।

विडंबना यह है कि शिक्षा व्यवस्था में हर पक्ष से जवाबदेही मांगी जाती है। विद्यार्थी से उत्कृष्ट प्रदर्शन की अपेक्षा की जाती है। अभिभावकों से फीस समय पर जमा करने की अपेक्षा की जाती है। शिक्षकों से परिणाम सुधारने की अपेक्षा की जाती है। लेकिन जब सरकार, शिक्षा बोर्ड, परीक्षा एजेंसियां और प्रशासन अपनी जिम्मेदारियों में विफल होते हैं, तब जवाबदेही तय करने का साहस शायद ही कभी दिखाई देता है।

यदि किसी सड़क के निर्माण में खामी आ जाए तो जांच होती है। यदि किसी भवन में तकनीकी त्रुटि हो जाए तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होती है। लेकिन यदि लाखों विद्यार्थियों का भविष्य प्रभावित हो जाए तो अक्सर इसे केवल "तकनीकी समस्या" कहकर टाल दिया जाता है। यह दृष्टिकोण अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और अस्वीकार्य है।

अब समय आ गया है कि अभिभावक और विद्यार्थी केवल दर्शक बनकर न रहें। उन्हें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होना होगा। परीक्षा प्रक्रिया, मूल्यांकन प्रणाली, पुनर्मूल्यांकन के अधिकार, शिकायत निवारण तंत्र और शिक्षा संबंधी नीतियों की जानकारी रखनी होगी। संगठित और जागरूक अभिभावक ही शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही सुनिश्चित कर सकते हैं।

शिक्षा किसी सरकार की उपलब्धि बताने का माध्यम नहीं है। शिक्षा राष्ट्र के भविष्य की नींव है। यदि इस नींव में ही भ्रष्टाचार, लापरवाही, तकनीकी खामियां और जवाबदेही का अभाव होगा तो उसका दुष्परिणाम केवल विद्यार्थियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश को भुगतना पड़ेगा।

आज आवश्यकता केवल सीबीएसई की मूल्यांकन प्रणाली की जांच की नहीं है, बल्कि संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा की है। प्रश्न यह नहीं है कि एक परीक्षा में क्या गलती हुई, प्रश्न यह है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था वास्तव में विद्यार्थियों के हित में काम कर रही है या फिर उन्हें आंकड़ों, प्रयोगों और व्यवस्थागत विफलताओं के बीच संघर्ष करने के लिए छोड़ दिया गया है?

जब तक शिक्षा व्यवस्था में पूर्ण पारदर्शिता, कठोर जवाबदेही, स्वतंत्र निगरानी और अभिभावकों की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक ऐसे विवाद बार-बार सामने आते रहेंगे और हर बार कीमत विद्यार्थियों के भविष्य को चुकानी पड़ेगी।

किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी संपत्ति उसके विद्यार्थी होते हैं। यदि हम उनके भविष्य की रक्षा नहीं कर सकते, तो शिक्षा सुधार के सारे दावे केवल भाषणों और विज्ञापनों तक सीमित रह जाएंगे।

  - सोमवार, 25 मई 2026 को अखिल भारतीय दिगंबर जैन युवा एकता संघ और विश्व जैन संगठन के तत्वाधान में मध्य प्रदेश के रीवा मे...
25/05/2026

- सोमवार, 25 मई 2026 को अखिल भारतीय दिगंबर जैन युवा एकता संघ और विश्व जैन संगठन के तत्वाधान में मध्य प्रदेश के रीवा में हुए दुखद सड़क हादसे में दो आर्यिका माताजी की सुनियोजित तरीके से की गई हत्या के विरोध में जयपुर जिलाधीश संदेश नायक की अनुपस्थिति में एसडीएम प्रथम विनीता सिंह को प्रधानमंत्री Narendra Modi, केंद्रीय गृहमंत्री Amit Shah और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री Dr Mohan Yadav के नाम ज्ञापन दिया और मामले की निष्पक्ष जांच के लिए SIT गठित करने और आरोपियों को गिरफ्तार करने की मांग करते हुए सकल जैन समाज का आक्रोश प्रस्तुत किया। इस दौरान अभिषेक जैन बिट्टू, बाबूलाल जैन इटुंदा, अशोक जैन गुड़ाचंद्रजी, कमलेश जैन, निर्मल जैन सहित अन्य समाज बंधु सम्मिलित हुए।

Government of Rajasthan Arvind Gangwal Siddharth Jain Jeetendra Patodi Rakesh Jain Sarvesh Jain Heena Adish Jain Shruti Jain Priyanka Jain Aminesh Jain Himani Jain Veeru Jain Ruchi Jain Deepak Jain Jaikumartholia Jaitholia Khush Jain Manish Jain Manish Jain Satish Jain Rajeev Jain Rahul Jain Nitesh Jain Uma Jain Ankit Jain Rakesh Jain Ashok Jain

15/05/2026

प्रवेश प्रक्रिया में देरी से लाखों लीटर फ्यूल हो रहा बर्बाद, प्रधानमंत्री Narendra Modi को पत्र भेजकर संयुक्त अभिभावक संघ ने की हस्तक्षेप की मांग

👉🏻 #जयपुर। संयुक्त अभिभावक संघ ने राजस्थान में लंबित चल रही #आरटीई प्रवेश प्रक्रिया को लेकर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भेजकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। संघ ने कहा कि एक ओर केंद्र सरकार देशभर में फ्यूल बचत एवं ऊर्जा संरक्षण का संदेश दे रही है, वहीं दूसरी ओर राजस्थान में शिक्षा विभाग और निजी स्कूलों की लापरवाही के कारण लाखों अभिभावकों को बार-बार कार्यालयों और स्कूलों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, जिससे प्रतिदिन बड़ी मात्रा में पेट्रोल-डीजल व्यर्थ हो रहा है।

🙏 सभी अभिभावक जिन्होंने RTE प्रक्रिया के तहत आवेदन किए है उन सभी अभिभावकों से आग्रह है कि इस पोस्ट को अधिक से अधिक शेयर करे, लाइक करे और कमेंट अवश्य करें

जिससे आप सभी को आवाज को और मजबूती प्रदान की जा सके।

👉🏻 अगर आप सोच रहे हो कि घर बैठे, बिना आवाज उठाए आपके बच्चों को निजी स्कूलों में दाखिला मिल जाएगा तो बेशक आप लोग घर में बैठकर आराम करें, किंतु जो लोग चाहते है कि प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार को सभी बच्चों को उनका मौलिक शिक्षा का अधिकार प्राप्त हो तो आप सभी को एकजुटता के साथ बोलना होगा।

अभिषेक जैन बिट्टू
राजस्थान प्रदेश प्रवक्ता, संयुक्त अभिभावक संघ

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यह संघर्ष ना मेरा है ना आपका यह संघर्ष हम सभी का है। बच्चों के बेहतर भविष्य का है।*आओ साथ मिलकर संघर्ष को आवाज दे बच्चों...
04/05/2026

यह संघर्ष ना मेरा है ना आपका यह संघर्ष हम सभी का है। बच्चों के बेहतर भविष्य का है।

*आओ साथ मिलकर संघर्ष को आवाज दे बच्चों का शैक्षणिक भविष्य का सपना साकार करे।*

राइट टू एजुकेशन मौलिक शिक्षा अधिकार अधिनियम कानून की पालना सुनिश्चित करवाने के लिए * #गुरुवार, 07 मई 2026 को प्रातः 11 बजे* शिक्षा संकुल, जेएलएन मार्ग में ज्यादा से ज्यादा संख्या में पधारे।

*यह लड़ाई नहीं अधिकार यात्रा है केवल बच्चों की पढ़ाई के लिए।*



https://www.facebook.com/share/p/1JFJn3EQ9n/

बुधवार, 29 अप्रैल 2026 को   के अभिभावकों द्वारा लगातार बुलाने पर एक दिवसीय प्रोग्राम बनाया और उनके बीच बैठक और संवाद कर ...
30/04/2026

बुधवार, 29 अप्रैल 2026 को के अभिभावकों द्वारा लगातार बुलाने पर एक दिवसीय प्रोग्राम बनाया और उनके बीच बैठक और संवाद कर अभिभावकों की पीड़ाओं का निराकरण करने के लिए यथासंभव प्रयास किया। इस दौरान विभिन्न स्कूलों में पढ़ रहे अभिभावकों से मुलाकात की साथ उन सभी अभिभावकों के साथ मिलकर अजमेर जिले की Department of Education, Rajasthan जिला शिक्षा अधिकारी दर्शना शर्मा जी से मुलाकात कर अभिभावकों की पीड़ाओं को साझा कर त्वरित कार्यवाही करने का मांग पत्र देकर अभिभावकों और विद्यार्थियों के संरक्षण की मांग उठाई। इस दौरान #अजमेर के बड़ी संख्या में अभिभावकों का सानिध्य एवं मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। संयुक्त अभिभावक संघ के तत्वाधान में पिछले 6 वर्षों में #अजमेर_जिले के अभिभावकों से 10 वीं बार मुलाकात करने का अवसर प्राप्त हुआ।

हर मुलाकात में यह विशेषता रही कि हर बार नए अभिभावक मिलते है और पुराने गायब हो जाए है यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी कमी है।

क्योंकि जिन लोगों को जरूरत होती है वह आ जाते है और जिन लोगों का काम हो जाता है वह घर बैठ जाते है।

सभी #अभिभावकों से आग्रह करता हूं काम किसी का भी हो हमें एक दूसरे का सदैव साथ निभाना चाहिए, जरूरतों की कभी पूर्ति नहीं होती किंतु साथ और सहयोग हो तो हर जरूरतों की पूर्ति आसान हो जाती है।

पिछले 6 वर्षों से अभिभावकों और विद्यार्थियों के हितों की इस लड़ाई की सबसे कमजोर कड़ी यही है कि हम #अभिभावक एकजुट नहीं है।

यही #निजी_स्कूलों #शिक्षा_विभाग और #राज्य_सरकार की सबसे बड़ी ताकत है जिसके चलते हर स्तर पर, हर योजना पर अभिभावकों को बेहिचक और खुलेआम लुटा जाता है।

इसलिए आप सभी से पुनः आग्रह करता हूं एकजुटता बनाओ ना केवल अपने लिए बल्कि अपनों के लिए।

क्योंकि #शिक्षा इस दुनिया का सबसे बड़ा #दान है
आपका सहयोग और सानिध्य सबसे बड़ा समर्पण है।

अपने लिए तो हर कोई प्रयास कर लेता है किंतु अपनों के लिए प्रयास करने वाला सदैव महान कहलाया गया है।।

संयुक्त अभिभावक संघ एक डोर है अब आपको खुद तय करना है इस डोर को तोड़ना है या मजबूर गांठ बांधनी है।

आप जिस राह को चुनोगे, आपकी राह उस मंजिल पर अवश्य पहुंचाएगी।

लेकिन #निजी_स्कूल की मनमानियों को खत्म करना है तो अभिभावकों को एकजुटता का प्रदर्शन करना होगा, #निजी_स्वार्थ #अहंकार #अपना_काम_बनता
#भाड़_में_जनता का त्याग करना ही होगा।



Amit Chhangani Chhavi Aavasthi Amit Dadhich Ashutosh Ranka Anjana Sharma Abdul Bari Arvind Palawat Arunraj Ruthala Ajay Kumar Sharma Arvind Sharma Arvind Gangwal Amardeep Sharma Archana Gupta Ayushi Gupta Arif Khan Ashu Mehra Mayank Agrawal Amit Kumar Jain Shikha Bagga Sandeep Sharma Shivesh Dutt Pandey Sarvesh Mishra Surendra Sharma Umesh Sharma Sapan Jain Vinesh Sogani Sunil Sogani Subhash Verma Bairwa Department of Education, Rajasthan Government of Rajasthan

इंग्लिश कैलेंडर के अनुसार रविवार, 13 अप्रैल आज ही के दिन पूज्य गुरुमां गणिनी प्रमुख आर्यिका रत्न 105 श्री सुपार्श्वमती म...
12/04/2026

इंग्लिश कैलेंडर के अनुसार रविवार, 13 अप्रैल आज ही के दिन पूज्य गुरुमां गणिनी प्रमुख आर्यिका रत्न 105 श्री सुपार्श्वमती माताजी यमसंलेखना धारण कर हम सभी के बीच से चली गई थी। किंतु आज भी पूज्य माताजी का वात्सल्य और आशीर्वाद हम सभी को निरंतर प्राप्त होता रहे यही कामना करते है।

पूज्य माताजी के श्रीचरणों में शत-शत नमन

  - पाठयपुस्तकों के नाम पर स्कूलों में अभिभावकों संग खुली लुट, स्कूल - वेंडर कमीशन सिस्टम पर नहीं लग रही रोक - https://x...
07/04/2026

- पाठयपुस्तकों के नाम पर स्कूलों में अभिभावकों संग खुली लुट, स्कूल - वेंडर कमीशन सिस्टम पर नहीं लग रही रोक -

https://x.com/i/status/2041345272140452244

🤔 अभिभावकों के नाम जागरूकता संदेश👉🏻 निजी स्कूल फीस वसूली पर सख्त कार्रवाई के बड़े-बड़े दावे हर साल नए सत्र की शुरुआत में...
03/04/2026

🤔 अभिभावकों के नाम जागरूकता संदेश

👉🏻 निजी स्कूल फीस वसूली पर सख्त कार्रवाई के बड़े-बड़े दावे हर साल नए सत्र की शुरुआत में सुनने को मिलते हैं। बयान दिए जाते हैं, चेतावनी दी जाती है, मीडिया में सुर्खियां बनती हैं—लेकिन हकीकत क्या है? वही पुरानी कहानी… नतीजा शून्य।

🙏 सच्चाई यह है कि जब निजी स्कूल संचालक अभिभावकों से मनमानी फीस, महंगी ड्रेस, किताबों और अन्य मदों के नाम पर खुली लूट करते हैं, तब शिक्षा मंत्री और शिक्षा विभाग के अधिकारी केवल कागजी कार्यवाही में उलझे रहते हैं। शिकायत करने वाला अभिभावक दर-दर भटकता है, लेकिन न्याय नहीं मिलता।

👉🏻 #याद_रखिए:
* फीस एक्ट 2016 में बना और 2017 में लागू हुआ

* राजस्थान हाईकोर्ट (19 दिसंबर 2020) और सुप्रीम कोर्ट (03 मई 2021, पुनः 01 अक्टूबर 2021) ने अभिभावकों के पक्ष में स्पष्ट निर्णय दिए

* इसके बावजूद आज तक यह कानून जमीनी स्तर पर लागू क्यों नहीं हुआ?

क्योंकि— न तो सरकारों में इच्छाशक्ति है और न ही अभिभावकों में एकजुटता।

📺 हर साल यही खेल दोहराया जाता है—

* बयानबाजी, आश्वासन, और फिर चुप्पी।
* और इस चुप्पी की कीमत केवल और केवल अभिभावक ही चुका रहा है।

*अब समय है खुद से सवाल करने का:*
* क्या केवल घर बैठकर महंगाई का रोना रोने से समस्या हल होगी?
* क्या अकेले-अकेले लड़कर कोई न्याय पा सकता है?
* जब दूसरे अभिभावक संघर्ष कर रहे होते हैं, तब आपकी खामोशी क्या सही है?

✍🏻 #कटु_सत्य:
जब आप एकजुट नहीं होते—
तब सिस्टम आपको नजरअंदाज करता है।
जब आप दूसरों के संघर्ष में साथ नहीं देते— तब आपके संघर्ष में भी कोई साथ नहीं देता।

👉🏻 #एकजुटता ही समाधान है अगर आप चाहते हैं कि—
1. फीस एक्ट सही मायनों में लागू हो
2. निजी स्कूलों की मनमानी बंद हो
3. बच्चों का भविष्य सुरक्षित हो
4. तो अब चुप्पी तोड़नी होगी, एकजुट होना होगा।

🙏 #अंतिम_संदेश:
आज अगर आप केवल अपने बच्चे तक सीमित रहेंगे, तो कल सिस्टम आपको भी अकेला छोड़ देगा।
जब आपने अपने स्वार्थ को प्राथमिकता दी, तो अब दूसरों ने भी वही रास्ता अपना लिया है।
*इसलिए जागिए… संगठित होइए…*
क्योंकि अधिकार मांगने से नहीं,
एकजुट होकर लड़ने से मिलते हैं।

✍🏻
राजस्थान प्रदेश प्रवक्ता & मीडिया प्रभारी
संयुक्त अभिभावक संघ, जयपुर

👉🏻 चैनल लिंक - https://whatsapp.com/channel/0029Vb5w1VC17Emt1XgQmR3r

स्कूलों में शिक्षा तो मिल नहीं रही है। #राज्य_सरकार और  #शिक्षा_विभाग ड्रेस को एक सामान बनाने के चलते लुट रहे हैऔर #निजी...
03/04/2026

स्कूलों में शिक्षा तो मिल नहीं रही है।
#राज्य_सरकार और #शिक्षा_विभाग ड्रेस को एक सामान बनाने के चलते लुट रहे है
और
#निजी_स्कूल संचालक खुलेआम ड्रेस, किताब, कॉपी, फ्रीस, स्टेशनरी आइटम, बेकरी, ड्रग्स, गाजा, चरस इत्यादियों के नाम पर लुट रहे है।

बेचारा #अभिभावक खुद को लुटवा भी रहा है और घटना होने पर जिम्मेदार भी कहलवा रहा है।

यही वह अभिभावक है जिसे खुद बच्चे की प्रवाह तो है लेकिन दूसरे के बच्चे की मौत पर एक आंसू नहीं।

हम भी गजब के पगले है मूर्खों के चलते, मूर्खों से लड़ते फिरते है।

फिर सुनेगा कौन ?

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Delhi

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