17/08/2025
अमेरिकी दूध की बदहाली: कनाडा ने ठुकराया, तो भारत को क्यों ठेलना चाहते हैं ये जहर?
अमेरिका, वो महाशक्ति जो खुद को दुनिया का मालिक समझता है, आज अपनी ही दूध की हालत पर रो रहा है। कनाडा ने चुपचाप अमेरिकी डेयरी प्रोडक्ट्स पर बैन लगा दिया—पिछले 48 घंटों में 3 अरब डॉलर से ज्यादा के 200 से अधिक कंटेनरों को बॉर्डर पर ठुकरा दिया गया, बिना किसी चेतावनी या स्पष्टीकरण के। ये वो दूध है जो अमेरिका अपने यहां के किसानों को सब्सिडी देकर सस्ता बनाता है, लेकिन इसमें इतने केमिकल्स, हॉर्मोन्स और जेनेटिकली मॉडिफाइड फीड्स मिले होते हैं कि कोई सभ्य देश इसे अपने नागरिकों को खिलाना नहीं चाहता। यूरोपीय संघ पहले से ही इसे इंपोर्ट नहीं करता, और अब कनाडा ने भी दरवाजा बंद कर दिया। लेकिन ये अमेरिकी हिपोक्रेट्स अब भारत जैसे विकासशील देशों पर दबाव डाल रहे हैं कि अपना बाजार खोलो, हमारा ये जहर खरीदो! क्यों? क्योंकि अपना कचरा खुद नहीं निगल पा रहे, तो गरीब देशों पर डंप करना चाहते हैं?
सोचिए, अमेरिका में दूध की क्या हालत है? वहां के दूध में rBGH जैसे हॉर्मोन्स इंजेक्ट किए जाते हैं, जो गायों को ज्यादा दूध देने पर मजबूर करते हैं, लेकिन इंसानों में कैंसर और हेल्थ प्रॉब्लम्स का खतरा बढ़ाते हैं। अमेरिकी खुद अपने सस्ते दूध से पेट की बीमारियां झेलते हैं—एक भारतीय मूल के व्यक्ति ने तो ट्विटर पर लिखा कि अमेरिका में ज्यादातर मिल्क ब्रांड्स पीने से पेट फूल जाता है, जबकि भारत का दूध कभी ऐसी समस्या नहीं देता। वहां के लोग ऑर्गेनिक मिल्क खरीदते हैं, जो दोगुना-तिगुना महंगा होता है। लेकिन ये वही अमेरिका है जो भारत को FTA (फ्री ट्रेड एग्रीमेंट) के नाम पर दबाव डाल रहा है कि अपना डेयरी सेक्टर खोलो, हमारे प्रोडक्ट्स इंपोर्ट करो। क्यों? क्योंकि उनके यहां सरप्लस प्रोडक्शन है, और कनाडा जैसे पड़ोसी ने इसे रिजेक्ट कर दिया तो अब भारत को टारगेट कर रहे हैं। ये नेोकोलोनियलिज्म नहीं तो क्या है—अपना घटिया माल डंप करो, लोकल किसानों को बर्बाद करो, और फिर फार्मा कंपनियों को बीमारियां बेचो!
भारत की मोदी सरकार ने सही किया जो इनकी मांगों को ठुकरा रही है। अगर हमने अपना बाजार खोल दिया होता, तो आज अमेरिका के बजाय हम झेल रहे होते ये रिजेक्टेड मिल्क। हमारे लाखों डेयरी किसान, जो अमूल जैसे कोऑपरेटिव्स से जुड़े हैं, बर्बाद हो जाते। अमेरिका का डेयरी इंडस्ट्री तो पहले से ही सब्सिडी पर टिका है—वो किसानों को सस्ता दूध बनाने के लिए पैसा देते हैं, लेकिन क्वालिटी घटिया। कनाडा ने इसे ठुकराया क्योंकि उनके यहां सप्लाई मैनेजमेंट सिस्टम है, जो लोकल प्रोडक्शन को प्रोटेक्ट करता है। लेकिन अमेरिका? वो तो दुनिया भर में अपना कचरा एक्सपोर्ट करने को उतावला है। ट्रंप जैसे नेता तो कनाडा पर टैरिफ्स लगाने की धमकी दे रहे हैं, लेकिन सच ये है कि उनका अपना डेयरी सिस्टम इतना खराब है कि 7 अमेरिकी स्टेट्स अरबों डॉलर का नुकसान झेल रहे हैं।
ये डबल स्टैंडर्ड क्यों? अमेरिका खुद अपने यहां फूड सेफ्टी स्टैंडर्ड्स को ढीला रखता है—EU और कनाडा के मुकाबले ज्यादा ऐडिटिव्स और प्रिजर्वेटिव्स की इजाजत देता है। फिर भारत को क्यों ललचा रहे हैं? क्योंकि हमारा बाजार बड़ा है, हमारे किसान कमजोर हैं, और अगर हमने इंपोर्ट शुरू किया तो लोकल मिल्क प्राइस गिर जाएगी, किसान कर्ज में डूबेंगे। ये वही अमेरिका है जो WTO में भारत के खिलाफ केस करता है, लेकिन खुद ट्रेड रूल्स तोड़ता है। का हैशटैग ट्विटर पर ट्रेंड कर रहा है, और सही भी है। भारत को इनकी मांगों पर थूकना चाहिए—हमारा दूध शुद्ध है, हमारी गायें खुश हैं, हम क्यों इनका जहर पिएं?
अमेरिका, पहले अपना घर संभालो। अपना रिजेक्टेड मिल्क खुद पियो, या फेंक दो। भारत कोई डंपिंग ग्राउंड नहीं है। अगर तुम्हें इतना ही उतावलापन है एक्सपोर्ट का, तो पहले अपनी क्वालिटी सुधारो। वरना, दुनिया तुम्हें और ठुकराएगी, जैसे कनाडा ने किया।