03/08/2025
#हमारा_सनातन_धरोहर_42
🚩जिन लोगों को गलतफहमी है कि दुनियाँ में केवल 7 आश्चर्य हैं.. तो वो अपनी गलतफहमी दूर कर लें क्योंकि अनगिनत आश्चर्य तो अकेले हमारे भारत में ही हैं। कला, संस्कृति, इतिहास एवं वास्तुकला क्षेत्रों की बात की जाये, तो भारत भूमि का मुकाबला तो दूर, कोई आस-पास भी खडा हुआ नजर नहीं आता। और इन्हीं में से है हमारा प्राचीन Rain Water Harvesting Technology...!
जी हां, आज आपको दर्शन करवाने ले जा रहे हैं राजस्थान की प्राचीन चांद बावड़ी की! 1200+ वर्ष प्राचीन चांद बावड़ी विश्व में सबसे बड़ी और और सबसे सुंदर बावड़ी मानी जाती है। यानि यह विश्व का सबसे बड़ा जल संचयन प्रणाली है। जब आप यहां जाएंगे और इस को देखेंगे तो इसकी विशालता और भव्यता देखकर आपके आंखों की पुतलियां आश्चर्य से फैल जाएगी।
♦️चांद बावड़ी का निर्माण गुर्जर प्रतिहार वंश के राजा मिहिर भोज महान् ने 9वीं सदी में करवाया था। आपको बता दें कि गुर्जर प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज महान को चांद नाम से भी जाना जाता था। इसलिए इस बावड़ी को नाम चांद बावड़ी के नाम से जाना जाता है।
दुनिया की सबसे गहरी यह वर्गाकार बावडी चारों ओर से लगभग 35 मीटर चौडी है तथा इस बावडी में ऊपर से नीचे तक पक्की सीढियाँ बनी हुई हैं, जिससे पानी का स्तर चाहे कितना ही हो, आसानी से भरा जा सकता है।यह बावड़ी 13 मंजिला ऊंची, 100 फिट से ज्यादा गहरी और कुल 3500 सीढ़ियों वाली बावड़ी है। इन सीढ़ियों की बनाबट सिमेट्रिक है। यह सीढ़ियों का जाल किसी भुलभुलैया की तरह अहसास कराता है। क्योंकि अगर आप इन सीढ़ियों पर चिन्ह बनाते हुए भी नीचे उतरेंगे न तब भी आप उन्ही सीढ़ियों से वापस ऊपर नहीं चढ़ पाएंगे। है न आश्चर्यजनक!
इस बावड़ी के गहरे होने के कारण इसके निचे के तल का तापमान ऊपर के तल की तापमान तुलना में 5-6 डिग्री ठंडी रहती है। पुराने समय में इस बावड़ी का उपयोग गाँव के लोग पानी लेने के साथ साथ गर्मियों में कल्चरल एक्टिविटी के लिए भी किया करते थे। इस बावड़ी के ठीक सामने प्रसिद्ध हर्षद माता का मंदिर है।
चाँदनी रात में एकदम दूधिया सफ़ेद रंग की तरह दिखाई देने वाली यह बावडी अँधेरे-उजाले की बावडी नाम से भी प्रसिद्ध है। तीन मंजिला इस बावडी में नृत्य कक्ष व गुप्त सुरंग बनी हुई है, साथ ही इसकी तह तक जाने के लिए 13 सोपान तथा लगभग 1300 सीढियाँ बनाई गई हैं, जो कि कला का अप्रतिम उदाहरण पेश करती हैं। स्तम्भयुक्त बरामदों से घिरी हुई यह बावडी चारों ओर से वर्गाकार है। इसकी सबसे निचली मंजिल पर बने दो ताखों पर महिसासुर मर्दिनी एवं गणेश जी की सुंदर मूर्तियाँ भी इसे खास बनाती हैं। बावडी की सुरंग के बारे में भी ऐसा सुनने में आता है कि इसका उपयोग युद्ध या अन्य आपातकालीन परिस्थितियों के समय राजा या सैनिकों द्वारा किया जाता था। बावडी की सीढियों को आकर्षक एवं कलात्मक तरीके से बनाया गया है। बावड़ी के भीतर, जल सतह तक पहुँचती सीढ़ियों की सममितीय त्रिकोणीय संरचना देख आप दांतों तले उंगली दबा लेंगे।
◾ यह चांद बावड़ी 1200+ वर्षों के बाद अभी भी सुंदर और अद्वितीय वास्तुकला, अद्भुत गणितीय सटीकता और बीते युगों की प्राचीन भारतीय मूर्तिकला शैली को प्रदर्शित करती है। बेहद कुशलता पूर्वक की गई अद्भुत स्थापत्य कला का उदाहरण संभवतः विश्व में ऐसा कहीं नहीं होगा। प्राचीन भारत में आक्रांताओं द्वारा इन्हें क्षति पहुंचाई गई,अन्यान्य विदेशी शासकों ने इतिहास अपने मन माफिक लिखाया,अपनी तारीफ में कसीदे पढ़वाए और इस राष्ट्र की धरोहरों को विश्व पटल पर नही आने दिया! आज जरूरत है ऐसे प्रयासों की जिससे हमारी इन धरोहरों को विश्व देखें और हम इन्हें वो स्थान दिलाने में कामयाब हों जिसके ये हकदार हैं।
(चाँद बावड़ी,आभानेरी, दोसा, राजस्थान, 9वीं शताब्दी)