18/07/2026
ये पृथ्वीराज की दिल्ली नहीं है जहाँ मुहम्मद गौरी को बिठा दोगे ये अमित शाह की दिल्ली है, हमले का सोचा भी तो अफगानिस्तान भी खो दोगे।
कॉकरोच दिल्ली का तख़्त हिलाने निकले थे लेकिन इस दिल्ली साम्राज्य का महाराजा वो है जिसने 12 साल गुजरात मे सिर्फ षड़यंत्र झेला है।
पांडव कुरुक्षेत्र जीते क्योंकि उसके पीछे एक कारण इतने वर्षो का वनवास भी था, दुर्योधन ने समस्या पैदा कर करके उन्हें मजबूत बना दिया था और इसका परीक्षण विराट युद्ध मे हुआ जब अकेले अर्जुन ने पूरी हस्तिनापुर की सेना को पस्त कर दिया।
सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मे अमित शाह के साथ जो सब हुआ उसने उन्हें कई सालो तक परेशान रखा, गुजरात छोड़ना पड़ गया मगर उस संघर्ष से जो अमित शाह आज बन गए है वो ही अब विपक्ष के लिए घातक है। भारत के गृहमंत्री के लिए सबसे जरुरी तीन ही प्रोजेक्ट थे एक आतंकवादी हमले रोकना, दूसरे घुसपैठियों को रोकना और तीसरा जो सबसे जरूरी और सबसे कठिन था नक्सलवाद।
अमित शाह को 7 साल हो गए है और तीनो ही समस्या हल हो गयी है। आतंकी हमले हुए होंगे मगर 2008-09 वाला डर नहीं है, जितनी सरलता से ISI जो मर्जी किसी भी शहर मे धमाके कर रही थी वो अब बंद हो गए है। घुसपैठ रोकने के लिए अंतिम दीवार बंगाल बची थी जो भी अब मजबूत हो गयी।
गजवा ए हिन्द का प्रोजेक्ट अब कम से कम 50 साल पीछे जा चुका है और वो भी इस पर निर्भर है कि कांग्रेस को कम से कम 15 साल तो मिले तब ही भारत इस्लामिक राष्ट्र बन सकता है अन्यथा अब सारे दरवाजे बंद है।
लेकिन तीसरा और सबसे जरूरी है नक्सलवाद, ये रूस की क्रांति पर आधारित है। कम्युनिस्ट नहीं चाहते थे कि कांग्रेस को सत्ता मिले इसलिए उन्होंने हथियारों का सहारा लिया, ये कम्युनिस्ट तीन श्रेणी मे बंटे थे।
एक जो जंगलो मे नक्सलवाद फैला रहे थे, दूसरे जो कॉलेज और यूनिवर्सिटीज मे बच्चों के माध्यम से सरकार विरोधी मुहीम छेड़ रहे थे और तीसरे जो राजनीति मे उतरकर हल्ला मचा रहे थे, तीनो ही विदेशो से मिलने वाले समर्थन पर टिके थे। विदेशो से जो फंडिंग हो रही थी वही इनकी ऑक्सीजन थी।
लेकिन फिर होती है नोटबंदी, इसके बाद से ही असल मे सबकी कमर टूटी है। आतंकी घटनाये हथेली पर गिनने योग्य रह गयी है, नक्सली बर्बाद हो गए और पड़ोस मे पाकिस्तान भी पतन के रास्ते आगे बढ़ गया।
2019 मे अमित शाह गृहमंत्री बने और यही से असली क्रेकडाउन भी शुरू हुआ, सबसे पहले कॉलेज यूनिवर्सिटीज मे चुन चुन कर वे प्रोफेसर शांत कराये गए जो साम्यवाद का सपना देख रहे थे। अधिकारियो और जजों की नियुक्ति भी उसी हिसाब से बदली गयी, सोहराबुद्दीन को देसी ढंग से मारा था उसका भी सबक ले लिया।
नक्सलीयों के एक एक सरगना को बड़ी ही कसाईंनुमा मौत दी और वो भी क्लासिक ढंग से, मीडिया मैंनेजमेंट भी शानदार रहा कौन सी खबर किस तरह से दिखाई जायेगी यह भी सुनिश्चित हो गया। कम्युनिस्टो को हर राज्य मे साम नाम दंड भेद से मात दी और आज नतीजा ये है कि इस कैंसर का इलाज हो गया।
2029 तक भारत के गृहमंत्री के लिए इन 3 प्रोजेक्टस से जरूरी और कुछ नहीं होगा। अमित शाह सरदार पटेल के बाद सबसे योग्य गृहमंत्री है, मोहन यादव और भजनलाल शर्मा जैसी शिकायते जरूर है मगर वो शिकायते हमें इतना दिवालिया भी नहीं बनाती कि हम अमित शाह की योग्यता पर शक करें।
2016 मे जेएनयू के आंदोलन हुए थे तब एक अलग ही माहौल था, मीडिया की रिपोर्टिंग, बॉलीवुड का सपोर्ट और विपक्ष का हंगामा देखकर हम सभी ये सोचने को मजबूर थे कि 2014 मे सिर्फ सत्ता मिली है काम करने के लिए अभी एक अलग ही लड़ाई लड़नी है।
लेकिन आज सोनम वांगचुक का जो हाल हुआ है वो बता रहा है कि व्यवस्था कितनी बदल गयी है। आज बॉलीवुड कही नहीं है अब यदि आपको स्वरा भास्कर बॉलीवुड की पहचान लगने लगे तो गेट वेल सून ही कहूंगा। सोनम वांगचुक यदि खुद अपना आंदोलन करते तो शिकायत ना होती मगर इन्होने ऐसा प्लेटफॉर्म पकड़ा जहाँ सच मे कॉकरोच ही है।
यदि अरुनधति रॉय जैसी महिला आपके बगल मे बैठती है तो इससे जलील कुछ हो ही नहीं सकता। अभिजीत दीपके चाहता था कि एयरपोर्ट पर उसे गिरफ्तार कर ले ताकि केजरीवाल वाली नौटंकी वो भी खेले लेकिन हुआ उल्टा ही, पुलिस ने खुद जंतर मंतर की इज़ाज़त दे दी। इस आंदोलन ने वैसे भी इथेनॉल वाला संकट लोगो को भुला दिया।
अब सिर्फ नौटंकी हो रही है, 19 दिन बहुत ज्यादा होते है। मुझे निजी रूप से लगता है कि ये बंदा कुछ ना कुछ तो खा रहा है, अब समस्या यही है कि दिन निकलते जाएंगे और इसके पास विकल्प नहीं बचेगा। 20 को ये संसद भवन का घेराव करेंगे, जाहिर है पुलिस ही लाठी मारेगी, इनमे आधे से ज्यादा तो ABVP से हारे लेफ्ट छात्र संगठन है।
मोटा भाई आप तो दंड बजाओ हम आपके साथ है, जंगलो मे ज़ब सेना ने नक्सलियो को मारा वो हम नहीं देख पाए लेकिन दिल्ली की बीच सड़को पर ज़ब पुलिस नक्सलियो को पीटेगी वो 22 जनवरी और 5 अगस्त जितना ही ऐतिहासिक क्षण होगा।