Anuj Joshi

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Uttarakhand, Delhi ||🇮🇳

🇮🇳 आज़ादी सिर्फ़ एक अधिकार नहीं, एक ज़िम्मेदारी भी है।आइए, अपने भारत को और बेहतर बनाने में अपना योगदान दें।स्वतंत्रता दि...
15/08/2026

🇮🇳 आज़ादी सिर्फ़ एक अधिकार नहीं, एक ज़िम्मेदारी भी है।
आइए, अपने भारत को और बेहतर बनाने में अपना योगदान दें।

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ! 🇮🇳
जय हिंद!

07/08/2026

क्या चकबंदी से बाखली संस्कृति खत्म हो जाएगी? | उत्तराखंड में चकबंदी

उत्तराखंड के पहाड़ों में बाखली संस्कृति हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। ऐसे में एक सवाल स्वाभाविक है—क्या चकबंदी से गांवों की बसावट और बाखली संस्कृति पर असर पड़ेगा?

इस वीडियो में हम इसी सवाल को सरल और तथ्यात्मक तरीके से समझने का प्रयास कर रहे हैं।

चकबंदी का उद्देश्य कृषि भूमि को व्यवस्थित करना है, गांवों की बसावट, बाखली, परंपराओं या हमारी सांस्कृतिक पहचान को बदलना नहीं।

पर्वतीय क्षेत्रों में चकबंदी, भूमि प्रबंधन, खेती और ग्रामीण विकास को स्थानीय परिस्थितियों, परंपराओं और लोगों की सहमति को ध्यान में रखकर ही आगे बढ़ाना महत्वपूर्ण है।

क्या विकास और पहाड़ की परंपराएँ साथ-साथ चल सकती हैं?
अपनी राय कमेंट में जरूर बताइए। 🙏

🎙️ जन भूमि संवाद | चकबंदी प्रश्नोत्तर

#चकबंदी #उत्तराखंड #बाखली #उत्तराखंडचकबंदी #जनभूमिसंवाद

उत्तराखण्ड की सबसे बड़ी चुनौती केवल पलायन नहीं, बल्कि अपनी पैतृक कृषि भूमि का धीरे-धीरे समाप्त होना है।जब किसान खेती छोड...
06/08/2026

उत्तराखण्ड की सबसे बड़ी चुनौती केवल पलायन नहीं, बल्कि अपनी पैतृक कृषि भूमि का धीरे-धीरे समाप्त होना है।

जब किसान खेती छोड़ने और भूमि बेचने को मजबूर हो जाए, तो हमें केवल चिंता नहीं, समाधान की दिशा में भी आगे बढ़ना होगा। चकबंदी उत्तराखण्ड की कृषि, गाँवों और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करने की एक महत्वपूर्ण पहल है।

आइए, इस जनजागरण अभियान का हिस्सा बनें। अधिक से अधिक लोगों तक यह संदेश पहुँचाएँ और उत्तराखण्ड की कृषि भूमि को बचाने में अपना योगदान दें।

🌱 भूमि बेचने की नहीं, भूमि बचाने की सोच अपनाएँ।
🌾 खेत-खेत में दूरी है, चकबंदी ज़रूरी है।

#चकबंदी #चकबंदी_उत्तराखण्ड #उत्तराखण्ड #कृषि #गांव_बचाओ #भूमि_बचाओ

#उत्तराखंड_पौड़ी में 112 नाली कृषिभूमि उनके मालिकों ने बेच दी, अब डीएम द्वारा निर्माण पर लगी रोक.🌴🌴🌳🌳🌳

मित्रों,
पौड़ी जनपद से आई यह खबर पूरे उत्तराखण्ड के लिए गंभीर चेतावनी है। समाचार के अनुसार लगभग 112 नाली उपजाऊ कृषिभूमि उनके वास्तविक भूमिधरों द्वारा बेच दी गई। जनाबिरोध को देखते हुए बाद में जिला प्रशासन द्वारा उस भूमि पर निर्माण कार्य रोकने की कार्रवाई की गई।

समाचार के एक अन्य वीडियो में रिपोर्टर जब भूमिधरों से पूछता है कि "इतनी सुंदर और उपजाऊ कृषि भूमि बेचने की आखिर क्या मजबूरी थी?" तो उनका उत्तर अत्यंत पीड़ादायक था। उनका कहना था कि खेत छोटे-छोटे टुकड़ों में दूर-दूर बिखरे हुए हैं, जंगली जानवर लगातार फसलें नष्ट कर देते हैं, खेती में लागत अधिक और आय नगण्य है। ऐसी स्थिति में हम सभी परिवारों ने विचार-विमर्श कर यह निर्णय लिया कि खेती से कुछ प्राप्त नहीं हो रहा, इसलिए भूमि बेचकर कोई अन्य रोजगार या कार्य किया जाए।

यह केवल एक गाँव की कहानी नहीं है, बल्कि उत्तराखण्ड के हजारों गाँवों की वास्तविकता है। जिसे हमें समझना होगा।

चकबंदी मंच उत्तराखण्ड का स्पष्ट मत है कि समस्या का स्थायी समाधान केवल भूमि बिक्री पर रोक लगाने से नहीं होगा, बल्कि प्रत्येक परिवार की बिखरी हुई कृषि भूमि को एक-दो स्थानों पर एकत्रित (चकबंदी) करने से होगा।

यदि किसी किसान की भूमि एक स्थान पर समेकित हो जाए तो—
• खेती करना सरल और लाभकारी बनेगा।
• जंगली जानवरों से सुरक्षा के सामूहिक उपाय संभव होंगे।
• आधुनिक कृषि तकनीक एवं मशीनों का उपयोग आसान होगा।
• बागवानी, औषधीय पौधों, जैविक खेती तथा कृषिजन्य लघु उद्योगों की स्थापना का मार्ग खुलेगा।
• कृषि-बागवानी के क्षेत्र में करोणों रुपयों की योजनायें जो चल रही हैं, वे सफल होंगी।
• युवाओं को अपने गाँव में ही रोजगार एवं स्वरोजगार के अवसर मिलेंगे।
• गाँवों में आवादी बढने से स्कूल/अस्पताल/व्यावसायिक संस्थान आदि भी सुधरेंगे.
• सबसे महत्वपूर्ण, पैतृक कृषिभूमि गैरों को बिकने से बचेगी।

इसी उद्देश्य से चकबंदी मंच उत्तराखण्ड लंबे समय से आग्रह कर रहा है कि सरकार चकबंदी अधिनियम 2016 एवं नियमावली 2020 के प्रावधानों के अंतर्गत प्रत्येक जिले में कम से कम एक-एक "चकबंदी मॉडल गाँव" अनिवार्य रूप से विकसित करे। यदि शासन स्वयं पहल नहीं करता, तो चकबंदी मंच उत्तराखण्ड अपने स्तर पर तैयार गाँवों को "स्वैच्छिक चकबंदी मॉडल गाँव" के रूप में विकसित करने का प्रयास करेगा।

संतोष का विषय है कि आज उत्तराखण्ड के हजारों जागरूक भूमिधरों द्वारा अपनी-अपनी तहसीलों में ऑनलाइन एवं ऑफलाइन आवेदन भेजे जा चुके हैं। अनेक गाँवों में 60–70 प्रतिशत से अधिक परिवार आवेदन भेज चुके हैं तथा ग्रामसभाओं द्वारा चकबंदी के समर्थन में प्रस्ताव भी पारित किए जा चुके हैं।

मंच का तहसील प्रशासन से विनम्र आग्रह है कि यदि किसी कारणवश तत्काल सरकारी चकबंदी प्रक्रिया प्रारम्भ नहीं हो पा रही है, तो कम से कम प्रत्येक आवेदक को उसकी खातावार कुल भूमि का स्पष्ट विवरण उपलब्ध कराया जाए, ताकि इच्छुक भूमिधर आपसी सहमति से अपने खेतों का अदल-बदल कर स्वयं अपनी भूमि को एकत्रित (स्वैच्छिक चकबंदी) कर सकें। बाद में राजस्व अभिलेखों में आवश्यक संशोधन भी नियमानुसार किया जा सकता है।

साथ ही हमारा यह भी सुझाव है कि शासन-प्रशासन स्वयं ग्राम पंचायतों, क्षेत्र पंचायतों (ब्लॉक) तथा जिला पंचायतों के माध्यम से व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाए, ताकि प्रत्येक भूमिधर को यह जानकारी मिल सके कि वह चकबंदी हेतु ऑनलाइन या ऑफलाइन आवेदन कैसे कर सकता है। जब जनता जागरूक होगी और प्रशासन सहयोग करेगा, तभी उत्तराखण्ड की कृषि भूमि सुरक्षित रह सकेगी।ताकि इच्छुक दो या दो से अधिक भूमिधर भी आपसी सहमति से अपने खेत आदलाबदली कर सकें।

आवेदन फ़ार्म/एप्लीकेशन इस लिंक से भरकर भेजें... https://www.facebook.com/chakbandi1985/posts/1459567492856696

आज आवश्यकता भूमि बेचने की नहीं, बल्कि भूमि बचाने की है।
और भूमि बचाने हेतु— "चकबंदी शक्त भूकानून सहित"।
ताकि चकबंदी होने के बाद कोई भी परिवार इसे कम से कम 5 वर्षों तक नहीं बेच पाए।
खेत-खेत में दूरी है,
चकबंदी ज़रूरी है।

केवला नन्द तेवाडी
चकबंदी मंच उत्तराखंड
Kewala Nand Tewari चकबंदी मंच उत्तराखंडKewala Nand Tewari

क्या हम केवल हरेला मना रहे हैं... या हरियाली भी बचा रहे हैं?उत्तराखंड में हरेला केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के प...
15/07/2026

क्या हम केवल हरेला मना रहे हैं... या हरियाली भी बचा रहे हैं?

उत्तराखंड में हरेला केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी संस्कृति, संवेदना और जिम्मेदारी का प्रतीक है।

लेकिन आज, जब विकास के नाम पर ऋषिकेश और देहरादून में हजारों पेड़ काटे जा रहे हैं, तब एक सवाल हम सभी से है—

क्या विकास और पर्यावरण साथ-साथ नहीं चल सकते?

हरेला हमें सिर्फ पौधे लगाने की नहीं, बल्कि ऐसी सोच अपनाने की प्रेरणा देता है जहाँ विकास भी हो और प्रकृति भी सुरक्षित रहे।

इस हरेला पर केवल एक पौधा ही नहीं, एक संकल्प भी लगाइए—हरियाली बचाने का, उत्तराखंड बचाने का।

आप सभी को हरेला पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ।

#हरेला #उत्तराखंड #जनभूमिसंवाद #चकबंदी

10/07/2026

क्या चकबंदी केवल उन्हीं लोगों के लिए उपयोगी है जिनकी जमीन कई टुकड़ों में बंटी हुई है?

यह चकबंदी से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।

यदि किसी व्यक्ति के पास पहले से ही एक या दो खेत एक ही स्थान पर हैं, तो क्या उसे भी चकबंदी से कोई लाभ होगा?

इस एपिसोड में हमने इसी प्रश्न का सरल और व्यवहारिक उत्तर देने का प्रयास किया है।

💬 आपका क्या विचार है? अपनी राय कमेंट में अवश्य साझा करें।

🙏 यदि यह जानकारी उपयोगी लगे, तो इसे अपने गांव, परिवार और मित्रों तक अवश्य पहुंचाएं।

जन भूमि संवाद
— जागरूक नागरिक • समृद्ध गांव • सशक्त उत्तराखंड

#चकबंदी #उत्तराखंड #जनभूमिसंवाद #गांव

07/07/2026

क्या पहाड़ में चकबंदी संभव है?

पहाड़ में हर खेत अलग है—तो फिर चकबंदी कैसे होगी?

इस वीडियो में जानिए:
✅ क्या चकबंदी का मतलब सभी को एक जैसी जमीन देना है?
✅ क्या पहाड़ के लिए अलग चकबंदी मॉडल हो सकता है?
✅ क्या इससे खेती, ग्रामीण विकास जैसी समस्याओं का समाधान संभव है?

वीडियो देखें और अपनी राय कमेंट में जरूर साझा करें।

🙏 जय उत्तराखंड।

#जनभूमिसंवाद #चकबंदी #उत्तराखंड #ग्रामीणविकास #खेती #पलायन

21/06/2026

1.79 लाख+ लोगों तक पहुँची यह आवाज़ 🙏

अगर आप उत्तराखंड से हैं, या आपकी जड़ें उत्तराखंड से जुड़ी हैं, तो यह विषय आपसे भी जुड़ा है।

चकबंदी सिर्फ़ ज़मीन का विषय नहीं है, यह आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का विषय है।

अपना गाँव, अपनी ज़मीन, अपना भविष्य।

अगर यह बात आपको महत्वपूर्ण लगती है, तो इसे आगे बढ़ाइए🙏

18/06/2026

#क्या_आपने भी चकबंदी आवेदन पत्र 🌿 तहसील में भेजें हैं यदि नही भेजे हैं तो तुरंत भिजवाएं ताकि भूमि अधिकार सुरक्षित होकर भविष्य के विवाद समाप्त हों।🌿🌿🌳🌳🌳🌳

मित्रों,
1. बिखरे खेत गोलखातों से निकलकर व्यक्तिगत नाम पर तथा एकत्रित (चकबंदी) हों-
अपने गाँव के अधिकतम परिवारों से आवेदन पत्र तहसील में जमा करवाएँ ताकि आवेदन पत्र दे चुके इच्छुक भूमिधरों के बीच आपसी सहमति से खेतों का समायोजन एवं अदला-बदली कर बिखरी कृषि भूमि को एक स्थान पर एकत्रित किया जा सके। इससे प्रत्येक परिवार के खेत स्पष्ट रूप से चिन्हित होंगे, खेती करना आसान होगा तथा आने वाली पीढ़ियों को भी अपने खेतों की सही स्थिति और सीमाओं की जानकारी रहेगी।

2. पहले से अदल-बदल कर एकत्रित किए गए खेत भी व्यक्तिगत नाम पर दर्ज हों-
पर्वतीय क्षेत्रों में अनेक परिवारों ने वर्षों पूर्व आपसी सहमति से खेतों का अदला-बदली कर अपने खेत एक स्थान पर एकत्रित कर लिए थे तथा उन पर घर, गौशाला, बाड़े-ख्वाड़े, फलदार बगीचे एवं अन्य स्थायी निर्माण भी कर लिए थे। किंतु दुर्भाग्यवश राजस्व अभिलेखों में ये भूमि आज भी पुराने मालिकों के नाम पर ही दर्ज है।

इसी राजस्व विसंगति का लाभ उठाकर कुछ लोग और भूमाफिया वर्तमान कब्जेदारों के वैध अधिकारों को चुनौती देने का प्रयास कर रहे हैं। कई स्थानों पर भूमाफियाओं द्वारा मासूम लोगों से उनके व्यक्तिगत खेत जबरदस्ती बिकवाने के लिए उनके पूर्वजों के पुस्तैनी घर-आंगन तथा बाड़े-ख्वाड़े तक बिबादित करार दिए जा रहे हैं जिससे सम्बंधित परिवारों को मानसिक, आर्थिक एवं सामाजिक रूप से भी तोड़ा जा रहा है.

इसलिए आवश्यक है कि प्रत्येक भूमिधर शीघ्रातिशीघ्र तहसील में आवेदन प्रस्तुत करे, ताकि वास्तविक कब्जे एवं पारस्परिक सहमति के आधार पर भूमि का विधिवत अभिलेखीकरण हो सके तथा वर्तमान एवं भविष्य के सभी प्रकार के भूमि विवादों से स्थायी मुक्ति मिल सके।

पिछले कुछ समय से सरकार भी चकबंदी पर सक्रिय है तो हमैं भी आगे आकर इस मिशन को मंजिल तक लेकर जाना है।

आज ही आवेदन करें, अपने खेतों की सुरक्षित के लिए अपने अधिकारों को मजबूत करें और अपने गाँव के भविष्य को सशक्त बनाएं।

आवेदन पत्र भेजने के तरीके इस लिंक पर देखें...
https://www.facebook.com/chakbandi1985/posts/1275099577970156

इस आवेदन पत्र को आप इस लिंक मैं क्लिक☝️☝️☝️☝️☝️ करके ऑनलाइन भेज सकते हैं कैसे भेजना होगा वो आपको कमेंट बॉक्स में एक फोटो रूट के माध्यम से बताया जा रहा है ध्यान रखें और धैर्य रखकर इस प्रक्रिया को पूरा करें।ज्यादा जानकारी के लिए आप कमेंट्स कर सकते हैं या मंच के व्हाट्सऐप ग्रुप से जुड़ सकते हैं।ये लिंक है।

https://chat.whatsapp.com/Frmdcrp0M7s5sntIoxBvuf

जय पहाड़🌿🌿🌳🌳🌳🌳🌳

केवला नन्द तेवाड़ी
चकबंदी मंच उत्तराखंड 🙏🙏🙏

06/06/2026

📢 उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के सभी भूमिधरों से एक महत्वपूर्ण अपील

अगर आप चाहते हैं कि आपकी जमीन का सही रिकॉर्ड बने, बिखरे खेत व्यवस्थित हों, खेती को नई दिशा मिले और आने वाली पीढ़ियों को भी अपनी पैतृक भूमि की जानकारी रहे, तो चकबंदी आवेदन अवश्य करें।

आज उत्तराखंड के गांवों, खेती और भूमि प्रबंधन से जुड़े मुद्दों पर गंभीरता से विचार करने का समय है। इसी संदर्भ में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जी भी कई सार्वजनिक मंचों पर पर्वतीय क्षेत्रों में चकबंदी और व्यवस्थित भूमि प्रबंधन की आवश्यकता पर बल दे चुके हैं।

साथ ही, सन् 1985 से चकबंदी मंच उत्तराखंड एवं इसके संस्थापक श्री केवलानंद तिवारी जी लगातार जनजागरण, संवाद और जागरूकता के माध्यम से इस विषय को लोगों तक पहुंचा रहे हैं।

अब समय है कि हम भी सिर्फ चर्चा न करें, बल्कि पहल करें।

✅ ऑनलाइन आवेदन:
https://chakbandiuk1985.in/application-form-chakbandi/

✅ आवेदन फॉर्म डाउनलोड करें:
https://drive.google.com/file/d/15UO8hIhTZgGbHLcHgEKga4Yn9juCEgIl/view?usp=drive_link

आवेदन स्वयं करें और अपने गांव के अन्य भूमिधरों को भी इसके लिए प्रेरित करें।

यह सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि उत्तराखंड के गांवों, खेती और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का प्रश्न है। 🙏

— अनुज कुमार जोशी

22/05/2026

उत्तराखंड में खेती क्यों खत्म हो रही है? | चकबंदी ही आखिरी उम्मीद? | Uttarakhand Podcast

क्या चकबंदी उत्तराखंड के गांवों और खेती को बचा सकती है? 🌱🏔️

आज पहाड़ की सबसे बड़ी समस्या सिर्फ पलायन नहीं…
बल्कि बिखरी हुई जमीन, खत्म होती खेती और खाली होते गांव हैं।

इस पॉडकास्ट में बात होगी:
🔹 चकबंदी क्या है?
🔹 पहाड़ की खेती क्यों खत्म हो रही है?
🔹 किसान खेती क्यों छोड़ रहे हैं?
🔹 जंगली जानवर और बंजर खेत
🔹 उत्तराखंड में भूमि सुधार की जरूरत

क्या चकबंदी पहाड़ की खेती बचाने की आखिरी उम्मीद है?

पूरा पॉडकास्ट देखें और अपनी राय जरूर दें। 🙏

— अनुज कुमार जोशी
जन भूमि संवाद

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Saket Colony, Charayal Nayabad
Haldwani
263139

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