Aryavarta Tourism

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त्रिंगलवाड़ी किला 3238 फीट ऊंचाई पर स्थित है। यह किला गिरिदुर्ग प्रकार का है और कालसुबाई पर्वत श्रृंखला में स्थित है। कि...
27/03/2022

त्रिंगलवाड़ी किला 3238 फीट ऊंचाई पर स्थित है। यह किला गिरिदुर्ग प्रकार का है और कालसुबाई पर्वत श्रृंखला में स्थित है।
किले की तलहटी में जैन गुफाओं से अनुमान लगाया जाता है कि किले का निर्माण 10वीं शताब्दी के आसपास किया गया होगा।
इस किले का निर्माण प्राचीन व्यापार मार्ग को देखने के लिए किया गया था जो कोंकण से नासिक क्षेत्र को जोड़ता था।
त्रिगलवाडी किला, इगतपुरी, नासिक, महाराष्ट्र, भारत
1636 में शाहजी राजा को महुली फोर्ट में हार के बाद इसे मुगलों को सौंपना पड़ा था।
इस क्षेत्र पर मुगलों से लेकर मराठा तक शासन कर चुके हैं।
वर्तमान में यह का किला मात्र खंडहर रूप में ही यहां मौजूद है। चूंकि यह पहाड़ी पर स्थित है इसलिए यहां ट्रेकर्स का आगमन लगा रहता है।
त्रिंगलवाड़ी गांव से किले के रास्ते में पांडवलेनी नामक गुफा है। ये गुफाएं 3 भागों में हैं। ओसारी, विहार के अंदर और विहार में नक्काशीदार कोनों, प्रवेश द्वार पर सुंदर नक्काशी पाई जाती है।
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हरिश्चंद्रेश्वर मंदिर, हरिश्चंद्रगड किला, अकोले, अहमदनगर, महाराष्ट्र, भारतयह 10 वीं और 11वीं शताब्दी में राजा जंज द्वारा...
05/03/2022

हरिश्चंद्रेश्वर मंदिर, हरिश्चंद्रगड किला, अकोले, अहमदनगर, महाराष्ट्र, भारत
यह 10 वीं और 11वीं शताब्दी में राजा जंज द्वारा निर्मित 12 मंदिरों में से एक है। यह अपने आधार से लगभग 16 मीटर ऊँचा है।
दसवीं शताब्दी में, शिलाहार राजा ज़ांज़ ने गोदावरी और भीमा के बीच बारह नदियों के स्रोत पर कुल बारह शिवालयों का निर्माण किया। यह उन्हीं में से एक शिवालय है।
मंदिर परिसर में कई गुफाएं हैं। कुछ गुफाएं रहने के लिए उपयुक्त हैं जबकि कुछ गुफाओं में पानी है। इन गुफाओं का पानी शीतल और अमृत के समान है।
मंदिर के पीछे गुफा में एक चौक है। इस चतुर्भुज में जमीन के नीचे एक कमरा है। उस पर एक बड़ी चट्टान है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि 'चांगदेव ऋषि' ने इस कक्ष में चौदह सौ वर्षों तक तपस्या की थी।
मंदिर के प्रांगण में एक प्रकार की दीवार है। इस दीवार के सामने एक पत्थर का पुल है। इस पुल के नीचे तारामती चोटी से एक धारा बहती है, जिसे 'मंगल गंगा का स्रोत' भी कहा जाता है।
मंदिर के उत्तर में एक मैला धारा है। मन्दिर के दायीं और केदारेश्वर की गुफा है।
इस मंदिर के आसपास कुछ प्राचीन पानी की टंकियाँ है इन टंकियो में गर्मियों में पानी इतना ठंडा होता है कि आप वास्तव में ऐसा महसूस कर सकते हैं कि आप एक रेफ्रिजरेशन यूनिट में खड़े हैं।
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गुरुडोंगमार झील, लाचेन, उत्तर सिक्किम, सिक्किम, भारतयह झील 17,800 फीट की ऊंचाई पर कंचनजंगा पर्वतमाला के उत्तर पूर्व में ...
04/09/2021

गुरुडोंगमार झील, लाचेन, उत्तर सिक्किम, सिक्किम, भारत
यह झील 17,800 फीट की ऊंचाई पर कंचनजंगा पर्वतमाला के उत्तर पूर्व में स्थित है।
गुरुडोंगमार झील दुनिया की और भारत की सबसे ऊंची झीलों में से एक है। यह झील चीनी सीमा से सिर्फ 5 किलोमीटर की दूर पर है।
इसे हिन्दू, बौद्धों, सिखों द्वारा पवित्र माना जाता है। झील का नाम गुरु पद्मसंभव के नाम पर रखा गया है जिन्हें गुरु रिनपोछे के नाम से भी जाना जाता है। इन्ही ने तिब्बती बौद्ध धर्म की स्थापना करी थी और 8वीं शताब्दी में इस झील की यात्रा करी थी।
माना जाता है कि झील में हमेशा बर्फ जमी रहती थी और यहां पीने के पानी का अभाव था। जब गुरू पद्मसंभव यहां से गुजर तो स्थानीय लोगों ने उनसे पानी की व्यवस्था करने को कहा।
लोगों की इस समस्या से निदान के लिए गुरू ने झील का एक हिस्सा स्पर्श किया और बर्फ पिघल गई। कहा जाता है कि कडाके की ठंड में भी झील का वह हिस्सा बर्फ में तब्दील नहीं होता। जबकि बाकी के हिस्से में बर्फ जमी होती है।
झील 118 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली हुई है। और इसकी परिधीय लंबाई 5.34 किलोमीटर है। हालांकि, झील का आकार उस स्थान पर छोटा दिखाई देता है जहां भक्त पूजा करते हैं।
भारतीय पर्यटकों को झील की यात्रा करने की अनुमति होती है, विदेशियों को दिल्ली में गृह मंत्रालय से एक विशेष परमिट प्राप्त करने की आवश्यकता होती है।
हिन्दुओं और बौद्धों के बीच लोकप्रिय यह झील सिक्किम की सबसे पवित्र झीलों में एक मानी जाती है।
इस झील से एक प्रवाह निकलती है जो त्शो लामो झील को इस झील से जोड़ती है और फिर यहाँ से तीस्ता नदी का उद्गम होता है।
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धनुष्कोटि, मेलकोट, मंड्या, कर्नाटक, भारतभगवान राम और माता सीता 14 साल के वनवास की अवधि के दौरान इस स्थान पर रुके थे। एक ...
01/09/2021

धनुष्कोटि, मेलकोट, मंड्या, कर्नाटक, भारत
भगवान राम और माता सीता 14 साल के वनवास की अवधि के दौरान इस स्थान पर रुके थे। एक दिन, जब माता सीता को प्यास लगी और आस-पास कोई जल स्रोत नहीं थे, तो माना जाता है कि भगवान राम ने चट्टान के किनारे एक तीर चलाया और वहा से जलधारा फुटी थी।
आज भी पहाड़ी की चोटी के तालाब को पवित्र माना जाता है। धनुषकोटि हिंदुओं के लिए ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व का स्थान है।
धनुष्कोटि तक पहुँचने के लिए लगभग आधे घण्टे की चढ़ाई करनी पढ़ती है। यहा से आप शहर और हरी-भरी पहाड़ियों के मनमोहक दृश्य भी देख सकते हैं।
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बयाना किला, बयाना, भरतपुर, राजस्थान, भारतइस किले का निर्माण 11वीं ईसवी में राजा विजयपाल द्वारा करवाया गया था। यह किला रा...
25/08/2021

बयाना किला, बयाना, भरतपुर, राजस्थान, भारत
इस किले का निर्माण 11वीं ईसवी में राजा विजयपाल द्वारा करवाया गया था। यह किला राजस्थान का पूर्वी प्रवेश द्वार था।
चित्तौड़गढ़ और मेहरानगढ़ किला बनने से पहले यह किला एशिया के सबसे बड़े किलों में से एक था।
बयाना किले में स्थित भीमलाट को राजस्थान का प्रथम विजयस्तम्भ माना जाता है।
बयाना का इतिहास हजारों साल पुराना है। इसे बाणासुर की नगरी भी कहा जाता है, क्योंकि बाणासुर की पुत्री उषा और भगवान कृष्ण के प्रपौत्र अनिरुद्ध की भविष्यवाणी श्रीमद्भागवत 10.62 और पुराणों में वर्णित है। यहां का बयाना उषा मंदिर इसका प्रमाण है।
महाराजा विजयपाल का 1045ई में अबूबकर शाह कंधारी से घमासान युद्ध हुआ था। इस युद्ध के उपरांत यहां की स्त्रियों ने जौहर का मार्ग अपनाया था। यह राजस्थान के इतिहास में पहला जौहर था।
भीमलाट जिसे विजय स्तंभ भी कहा जाता है। इस स्तंभ पर मालवा संवत 428 अर्थात सन 371-72 उत्कीर्ण है।
राजा विष्णु वर्धन द्वारा पुंडरीक यज्ञ के समापन पर इस प्रस्तर स्तंभ को बनवाया गया था। यह स्तंभ लाल बलुए पत्थर से निर्मित एकाश्मक स्तंभ है। जो 13.6 फुट लंबे तथा 9.2 फुट चौड़े चबूतरे पर है। स्तंभ की लंबाई 26.3 फुट है। जिसमें प्रथम 22.7 फुट का भाग अष्टकोणीय है।
तत्पश्चात तनुकार होता जाता है। स्तंभ के शिखर पर निकली धातुशलाका से स्पष्ट होता है कि इसके शीर्ष पर भी अवश्य कुछ रहा होगा। यहां लेख भी लगा है। यह बयाना के किले के परिसर में ही है जिससे यह भी सिद्ध होता है कि यह किला सर्वप्रथम गुप्तकाल में निर्मित हुआ और बाद के राजाओं ने इसे विकसित किया।
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रामप्पा मन्दिर (रामलिंगेश्वर मन्दिर) , पालमपेट, वारंगल, तेलंगाना, भारतमंदिर में आपको महिलाओ की कई मूर्तियां देखने को मिल...
18/08/2021

रामप्पा मन्दिर (रामलिंगेश्वर मन्दिर) , पालमपेट, वारंगल, तेलंगाना, भारत
मंदिर में आपको महिलाओ की कई मूर्तियां देखने को मिलेंगी। इन स्त्री मूर्तियों को मदनिका के नाम से जाना जाता है।
हम जिस फैशन को पश्चिमी देशों से सीखते हैं, उस फैशन को पश्चिमी देशों ने हमारे पूर्वजों से ही सीखा था।
यहा स्थित प्रतिमा के पैरों में देखने पर ऊंची एड़ी की आधुनिक सैंडिल की तरह ही नक्काशी दिखती। और वह प्रतिमा 800 वर्ष पुरानी प्रतिमा है।
यानि कि भारतीयों को Modern Fashion का जनक कहा जाए तो गलत नहीं होगा। इस मंदिर में अद्धभुत नक्काशी व शिल्पकला देखने को मिलती है।
800 साल पूराने इस मन्दिर को बनने में 40 साल लगे थे। यह मंदिर 6 फ़ीट ऊँचे प्लेट फ़ार्म पर बना हुआ है।
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ब्रोमो पर्वत (ब्रह्मा पर्वत), ईस्ट जावा, इंडोनेशियाजावा की जैवनीज भाषा में ब्रह्मा को ब्रोमो कहते हैं। और पर्वत के मुहान...
16/08/2021

ब्रोमो पर्वत (ब्रह्मा पर्वत), ईस्ट जावा, इंडोनेशिया
जावा की जैवनीज भाषा में ब्रह्मा को ब्रोमो कहते हैं। और पर्वत के मुहाने पर 700 साल पहले गणेशजी की स्थापना की गई थी।
ब्रोमो पर्वत पर 7641 फ़ीट की की ऊंचाई पर लावा पत्थरों से गणेशजी बने हैं। आसपास के 48 गांवों के तीन लाख हिंदुओं का विश्वास है कि गणेश जी उनके रक्षक हैं।
माउंट ब्रोमो पर सालभर गणपति जी की पूजा होती है, पर मुख्य आयोजन जुलाई में 15 दिन तक चलता है। पांच सौ साल से ज्यादा पुरानी यह परंपरा 'याद्नया कासडा' कहलाती है, जो कभी रुकी नहीं।
700 वर्षों पहले जब इस जगह पर ज्वालामुखी का प्रकोप बहुत बढ़ गया था तब इन्ही लोगो ने इस पहाड़ की चोटी पर भगवान गणेश की लावा से मूर्ति बनाकर स्थापित की थी। तब से आज तक वे सभी लोग वहां पर सुरक्षित हैं व आराम से रहते हैं। यहाँ के लोगों का कहना हैं कि भगवान गणेश उनकी इन भीषण ज्वालामुखियों से रक्षा करते है।
लोगों का कहना हैं कि जब यहाँ गणेश जी की मूर्ति नही थी तब उन्हें ज्वालामुखी का बहुत प्रकोप सहना पड़ता था किन्तु जब से उनके पूर्वजो ने यहाँ गणेश जी की मूर्ति स्थापित की है तब से उन्हें यहाँ किसी भी प्रकार की कोई समस्या नही हुई है। उनकी मान्यता है कि विघ्नहर्ता भगवान गणेश उनकी इन ज्वालामुखियों से रक्षा करते हैं।
वर्ष 2016 में यहाँ आखिरी ज्वालामुखी विस्फोट हुआ था।
उस समय इंडोनेशिया की सरकार ने 15 पुजारियों को यहाँ भगवान गणेश की पूजा करने की अनुमति दी थी। तब भी हजारों की संख्या में लोग यहाँ पहुँच गए थे व वर्षों से चली आ रही परंपरा को निभाया था।
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नागकुंड, नागकुआ (कर्कोटक नागेश्वर मन्दिर) वाराणसी, उत्तरप्रदेश, भारत।इस कुंड के अन्दर एक कुआँ है और उस कुएँ के अन्दर प्र...
15/08/2021

नागकुंड, नागकुआ (कर्कोटक नागेश्वर मन्दिर) वाराणसी, उत्तरप्रदेश, भारत।
इस कुंड के अन्दर एक कुआँ है और उस कुएँ के अन्दर प्राचीन शिवलिंग है जो साल भर पानी में डूबा रहता है। नागपंचमी के पहले कुंड का पानी निकाल कर शिवलिंग का श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद नागकुंड फिर से पानी से भर जाता है।
साल में बस नागपंचमी के दिन ही यहा पर शिवलिंग के दर्शन होते है। महर्षि पतंजलि ने अपने तप से इस कुंड का निर्माण कराया था।
कहा जाता है कि नागकुंड में स्थित नागकुँए से नागलोक जाने का रास्ता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शिव की नगरी काशी से ही नागलोक जाने का रास्ता है।
नागपंचमी पर यहां दर्शन करने से कालसर्प योग से मुक्ति मिलती है। नागकुंड स्थित कुएं का वर्णन धर्म शास्त्र में भी किया गया है।
पूरी दुनिया में तीन ही ऐसे कुंड हैं जहां पर दर्शन करने से कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है। तीनो कुंड में से मुख्य नागकुंड है।
यहां भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर है। बताया जाता है कि भगवान शिव की पूजा यहां नागेश के रूप में होती है। भगवान शिव के इस स्वरूप की पूजा के कारण इस मंदिर को करकोटक नागेश्वर के नाम से जाते हैं।
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चांदपुर दुर्ग (गढ़ी) , चांदपुर, आदिबद्री, चमोली, उत्तराखंड, भारतयह दुर्ग राजा कनकपाल द्वारा 14 वी शताब्दी में बनाया गया थ...
08/08/2021

चांदपुर दुर्ग (गढ़ी) , चांदपुर, आदिबद्री, चमोली, उत्तराखंड, भारत
यह दुर्ग राजा कनकपाल द्वारा 14 वी शताब्दी में बनाया गया था। यह सड़क से 200 मीटर की ऊंचाई पर एक टीले की चोटी पर स्थित है।
कनकपाल न केवल पवार वंश का संस्थापक माने जाते है बल्कि चांदपुर को राजधानी बनाने का श्रेय भी कनकपाल को ही जाता है।
चांदपुर गढ़ी में स्थित वर्तमान अवशेषों में कुछ भवन आकृति के अवशेष, कुछ पत्थर, एक कुआं जिसमे चुने का लेप किया हो आदि है। दीवारों के पत्थरों पर कहीं कहीं देवी-देवताओं की आकृति भी उकेरी गयी है।
ये सारी सरंचनाए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा 2004-07 में करवाए गए उत्खनन में प्राप्त हुई थी।
इस दुर्ग की सीढ़ियाँ दो टन वजनी पत्थर की शीलाओं से निर्मित थी। जिसके बारे में लोक कथा है कि यह शिला खण्ड दुधातोली के खानों से सौंरु और भौरु नामक भेड़ों (वीरों) द्धारा लाए गए थे।
राजा कनकपाल जो की गढ़वाल के शक्तिशाली राजा थे मालवा से सवंत 755 (699ई०) को गढ़वाल पहुचे थे उन्होंने स्वयं को राजा सोनपाल का उत्तराधिकारी सिद्ध किया और चांदपुर गढ़ी में राजधानी स्थापित कर राजा बने थे।
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देवगिरि किला (दौलताबाद किला), देवगिरि, औरंगाबाद, महाराष्ट्र, भारत 626 फ़ीट ऊँचा यह किला शंकु के आकार का है। इस किले कि तट...
05/08/2021

देवगिरि किला (दौलताबाद किला), देवगिरि, औरंगाबाद, महाराष्ट्र, भारत
626 फ़ीट ऊँचा यह किला शंकु के आकार का है। इस किले कि तटबंदी लगभग 8 किलोमीटर लंबी है।
भीलम नामक राजा ने इसे 11वीं सदी में इसे बनवाया था और उसी काल से दो सौ वर्षों तक हिंदू शासकों ने देवगिरि पर शासन किया। 14वीं सदी से यह नगर मुसलमानों के अधिकार में चला गया था।
इस किले से पूरे भारत पर शासन किया जा सकता था।
देवगिरि मध्यकालीन भारत का सबसे ताकतवर किला था। दुश्मन सेना का किले तक पहुंच पाना मुश्किल होता था।
यह किला जिस पहाड़ी पर बना है उसके चारों ओर कई गहरी खाईयां है। जिनमे मगरमच्छ छोड़े जाते थे। इस किले को ताकत से जीत पाना नामुमकिन था इसे हर बार छलकपट या धोखे से ही जीता गया था।
क़िले की बाहरी दीवार और क़िले के आधार के बीच दीवारों की तीन मोटी पंक्तियां हैं। जिसपर कई बुर्ज बने हुए हैं।
इस किले में भूमिगत गलियारे और कई सारी खाईयां हैं, ये सभी चट्टानों को काटकर बनाए गए हैं। इस दुर्ग में एक अंधेरा भूमिगत मार्ग भी है, जिसे ‘अंधेरी’ कहते हैं। इस मार्ग में कहीं-कहीं पर गहरे गड्ढे भी हैं, जो शत्रु को धोखे से गहरी खाई में गिराने के लिए बनाये गये थे।
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शेरगढ़ किला (कौशवर्धन किला) , धौलपुर, राजस्थान, भारतपहले इसका नाम कोशवर्द्धन था जो इसकी पर्वत चोटी के कोशवर्द्धन नाम के क...
31/07/2021

शेरगढ़ किला (कौशवर्धन किला) , धौलपुर, राजस्थान, भारत
पहले इसका नाम कोशवर्द्धन था जो इसकी पर्वत चोटी के कोशवर्द्धन नाम के कारण रखा गया था। इस किले को धौलपुर किले के रूप में भी जाना जाता है।
शेरगढ़ किला एक जल किला है जो कि चारों तरफ से पानी से सुरक्षित है, क्योंकि परवन नदी किलेबंदी के चारों ओर एक नहर की संरचना है।
इस किले को 1532 में राजा मालदेव ने बनवाया था। बाद में शेरशाह ने इस किले पर आक्रमण कर कब्जा कर लिया था।
शेरगढ़ किले में चार द्वार हैं लेकिन अक्सर इस्तेमाल किया जाने वाला गेट पूर्वी तरफ था। ओस किले में एक हनुमान मंदिर, कई महल, और खंडहर संरचनाएं हैं।
धौलपुर के पास रामसागर अभ्यारण भी प्रमुख पर्यटन स्थल है।
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जटाशंकर (गुफा) मन्दिर, पंचमढ़ी, नर्मदापुरम, मध्यप्रदेश, भारतभोलेनाथ का पहला घर कैलाश पर्वत है तो दूसरा घर जटाशंकरधाम है। ...
30/07/2021

जटाशंकर (गुफा) मन्दिर, पंचमढ़ी, नर्मदापुरम, मध्यप्रदेश, भारत
भोलेनाथ का पहला घर कैलाश पर्वत है तो दूसरा घर जटाशंकरधाम है। यह स्थान पचमढ़ी की वादियों में सैकड़ों चट्टानों के बीच बसा हुआ है।
इसे शिव जी का दूसरा घर क्यों कहा जाता है पौराणिक कथाओं की माने तो भस्मासुर नाम का एक असुर था जिसने भगवान शिव की घोर तपस्या करके उनसे वरदान प्राप्त किया की वो जिसके भी सर पर हाथ रखेगा वो भस्म हो जायेगा।
इसके बाद भस्मासुर ने अपने वरदान को आज़माने के लिए भगवान शिव पर ही आक्रमण कर दिया, और भस्मासुर को आते देख भगवान शिव ने पचमढ़ी की गुफा में शरण ली।
पौराणिक कथा के अनुसार कहा जाता है की भगवान शिव ने अपनी विशालकाय जटायें यहाँ फैला रखी हो जिससे गुफा के अंदर जटाओं जैसी आकृतियां बन गयी हैं। इसी वजह से इस जगह का नाम जटाशंकर पड़ गया।
गुफा के अंदर एक बड़ा शिवलिंग प्राकृतिक रूप से बना हुआ है। इसके अलावा यहाँ पर एक पवित्र स्नान कुंड है।
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