06/07/2026
सोमवार; दिनांक ६ जुलाई २०२६
विचारपूर्वक अपने जीवन को राष्ट्र के प्रति समर्पित करने वाली लक्ष्मीबाई केळकर का आज जन्मदिन है।
हिंदू संस्कृति से अगाध प्रेम करने वाली महिलाओं में राष्ट्र-जागृति की ज्योत जलाने वाली आदरणीय लक्ष्मीबाई केळकर का जन्म ६ जुलाई १९०५ को नागपुर शहर में हुआ था।
लक्ष्मीबाई का जन्म एक मध्यमवर्गीय और राष्ट्रीय संस्कारों से युक्त परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी स्कूली उम्र में लोकमान्य तिलक के ओजस्वी और राष्ट्रप्रेरक भाषण सुने, जिससे उनके मन में स्वराज्य और स्वदेशी के बीज अंकुरित हुए। जब वह स्कूली शिक्षा प्राप्त कर रही थीं, तभी प्लेग की भयानक महामारी फैल गई और उनकी पढ़ाई रुक गई। महज १४ वर्ष की आयु में उनका विवाह वर्धा के केळकर परिवार में हो गया।
विवाह के बाद वर्धा आने पर, वे संसार को केवल 'चूल्हा और चौका' (घर-गृहस्थी) तक सीमित न रखकर, गांधीजी के आश्रम में उनके साथ सूत कातने का काम करने लगीं। विवाह के केवल १२ वर्ष बाद ही उनके पति का निधन हो गया। संसार की जिम्मेदारी संभालते हुए भी लक्ष्मीबाई प्रभात फेरियों में भाग लेती थीं और गांधी आश्रम जाती थीं।
जब हिंदू-मुस्लिम दंगे भड़के, तब उन्होंने देखा कि दंगाइयों ने हिंदू महिलाओं का अपहरण किया। इस घटना से उनके मन में गहरा आक्रोश पैदा हुआ। उन्होंने पहचान लिया कि महिलाओं का आत्मरक्षा के लिए शारीरिक रूप से सक्षम होना समय की मांग है। महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक महिला संगठन का होना आवश्यक है, यह विचार उनके मन में आया। उन्होंने अपने इस विचार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार के सामने व्यक्त किया। लक्ष्मीबाई केळकर की इस संकल्पना और उनकी आत्मीयता को पहचानकर डॉ. हेडगेवार ने उन्हें संगठन स्थापित करने की अनुमति दे दी। २५ अक्टूबर १९३६ को दशहरे के दिन वर्धा में उन्होंने "राष्ट्रसेविका समिति" की स्थापना की।
कार्य का विस्तार और विचार
राष्ट्रसेविका समिति की स्थापना के बाद उनके सामने यह सवाल खड़ा हुआ कि:
महिलाओं को संगठन में कैसे लाया जाए?
उन्हें क्या सिखाया जाना चाहिए?
उनके सामने कौन सा विचार रखा जाए जिससे वे समझ सकें कि राष्ट्रधर्म क्या है?
लक्ष्मीबाई ने बेहद सुनियोजित तरीके से राष्ट्रसेविका समिति के कार्य की शुरुआत की। उन्होंने प्रतिदिन महिलाओं को इकट्ठा करना शुरू किया। उनके सामने हिंदुत्व के विचार रखकर उन्हें उनके मन पर अंकित किया। स्वामी विवेकानंद के दर्शन (तत्वज्ञान) के बारे में बताया। स्वातंत्र्यवीर सावरकर के साहित्य के माध्यम से हिंदू धर्म से परिचित कराया। पंडित सातवलेकर के हिंदू संस्कृति के साहित्य का अध्ययन किया। उन्होंने हिंदी सीखी और उस दौर में, उस उम्र में वे साइकिल चलाना भी सीखीं। भारतीय परंपरा और संस्कृति का गहरा अध्ययन कर उन्होंने उस पर स्वतंत्र चिंतन किया और महिलाओं के सामने इसे प्रभावी ढंग से कैसे प्रस्तुत किया जाए, इसका अभ्यास किया। अपनी अत्यंत सात्विक और ओजस्वी वाणी से वे श्रोताओं को रामायण सुनाने लगीं। वे एक प्रभावी वक्ता और विचारक के रूप में जानी जाने लगीं।
संस्थागत विकास और वैश्विक विस्तार
लक्ष्मीबाई केळकर का कार्य गति पकड़ने लगा और कई महिलाएं उनके कार्य में स्वतः स्फूर्त होकर शामिल होने लगीं। १९५३ में उन्होंने "स्त्री जीवन विकास परिषद" की स्थापना की। शहर के प्रमुख डॉक्टरों को एकत्र कर महिलाओं को नर्सिंग (सुश्रूषा) का प्रशिक्षण दिलाया। वे योगासन के महत्व को जानती थीं, इसलिए दैनिक कार्यक्रमों में योगासन को शामिल किया गया।
एक आदर्श सेविका कैसी होनी चाहिए? इसकी रूपरेखा तैयार कर उन्होंने अपने कुशल सांगठनिक कौशल से सेविकाओं को गढ़ने का काम शुरू किया।
उन्होंने अपने पाठ्यक्रम में व्यायाम, योग, दंड (लाठी), छुरिका (खंजर) और नियुद्ध (मार्शल आर्ट) जैसी विधाओं को शामिल किया। महिलाओं में आध्यात्मिकता, शौर्य, साहस, धैर्य और राष्ट्रभक्ति का निर्माण किया। 'स्वस्थ शरीर में ही ओजस्वी मन का वास होता है', इसलिए उन्होंने 'बौद्धिक' (वैचारिक सत्रों) के माध्यम से महिलाओं का मानसिक विकास किया। उन्होंने कई शैक्षणिक संस्थान, सिलाई केंद्र, योग केंद्र, औषधालय, वनवासी महिलाओं के लिए छात्रावास और कई भजन मंडलियां चलाईं। उन्होंने राष्ट्रसेविका समिति को भारतीय महिलाओं के एक सुदृढ़ संगठन के रूप में सक्रिय किया। आज यह समिति न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी सक्रिय है और दुनिया के १६ देशों में इसका कार्य चल रहा है।
विनम्र श्रद्धांजलि
महिलाओं के लिए इतना बड़ा कार्य करने वाली लक्ष्मीबाई केळकर का २६ नवंबर को स्वर्गवास (देवाज्ञा) हो गया। "कृण्वन्तो विश्वमार्यम्" (हम पूरे विश्व को श्रेष्ठ बनाएंगे) का सपना देखने वाली साहसी, कुशल संगठनकर्ता, प्रखर राष्ट्रप्रेमी, हिंदू संस्कृति पर गर्व करने वाली और आत्मविश्वास की प्रतिमूर्ति आदरणीय लक्ष्मीबाई केळकर के चरणों में कोटि-कोटि नमन।