02/04/2026
बहनजी की आगामी 14 अप्रैल को लखनऊ मे बाबा साहेब के जन्मदिवस के अवसर पर एक रैली होनी है। इस समय गाँवों मे गेहुँ की कटाई का सीजन रहता है और दलित समाज मे जो मजदूर वर्ग है, वो गेहूँ की कटाई करके साल भर के लिए अपने घर में अनाज के जुगाड़ मे लगा रहता है लेकिन फिर भी इन्ही लोगो की बदौलत बहनजी की ये रैली भी बहुत बड़ी रैली होने जा रही है। बहनजी सिर्फ नेता नही रही, उनको महापुरुषों वाला सम्मान मिलना शुरू हो चुका हैं जो सदियों तक मिलता रहेंगा।
निसंदेह बसपा यूपी मे 2022 और 2024 के चुनावों मे बुरी तरह हारी थी क्योंकि दलित वर्ग मे मनुवादी मीडिया, उनके सर्वे एवम् ओपिनियन पोल्स, चुनाव का दो गुटो मे बट जाना, यू ट्यूब चैनल चलाने वाले पत्रकार आदि सभी ने 2022 के विधानसभा चुनावों से एक साल पहले से ही बसपा को ब्लैक ऑऊट कर रखा था और सभी के मुँह पर एक ही लाईन चिपकी हुई थी कि बसपा तो कहीं दिखती ही नहीं जबकि सच्चाई ये थी कि 2020 और 2021 वाले साल मे लॉकडाऊन लगा हुआ था, भीड़ इक्कठी करने पर पाबंदियाँ लगी हुई थी फिर भी सभी दल नियमों के अनुसार अपनी मीटिंग्स लेते थे, बसपा भी अपनी मीटिंग्स लेती थी। 2022 के फरवरी में चुनाव भी लॉकडाऊन नियमों में ही करवाएं गए थे, बसपा की रैली में ज्यादा भीड़ आने के कारण लॉकडाऊन नियम तोड़ने का आरोप लगाकर बसपा पदाधिकारियों पर FIR भी की गई थी लेकिन कांग्रेस गुट व भाजपा गुट समर्पित दोनो ही तरह के मीडिया मे यही अफवाहे फैलाई गई थी कि बसपा तो कहीं दिखती ही नहीं है।
कांग्रेसी गुट समर्पित यू ट्यूबर्स मीडिया वालो के साथ साथ बहुजन मीडिया कहलाने वाले ज्यादातर यूट्यूबर्स पत्रकारों का बहुजन की जगह "भोजन मीडिया " बनकर दलित समाज को संविधान बचाने के नाम पर भावुक बनाना आधी बसपा को निगल गया। लेकिन पीतल को सोना बताकर कब तक सपा कांग्रेस की दुकानदारी आरोपो और अफवाहों के भरोसे चलनी हैं, बाबा साहेब, मान्यवर साहेब और बहनजी ने जो कमाया हैं, वो ऐसे ही व्यर्थ जाता तो आज विरोधी दल बाबा साहेब और मान्यवर कांशीराम साहेब का गुणगान करते नजर नही आते।
आज भी बहनजी का सम्मान बरकरार हैं, 9 अक्टूबर की लखनऊ रैली मे अपने खर्चे पर आई 20 लाख के आसपास की भीड़ इसका सबूत है कि दलित समाज आज भी बहनजी पर ही भरोसा करता है। यूपी चुनावों के अभी लगभग 9 -10 महीने बाकी हैं, साम दाम दण्ड भेद सभी को देखते देखते और झेलते हुए बसपा ने बिना धन्नासेठों के पैसे से इस मूवमेंट को चलाया हैं, ये सफर ना मान्यवर के लिए आसान था और न बहनजी के लिए ये सफर आसान हैं और अगर आसान होता तो अब तक दलित आदिवासी एवम् अतिपिछड़े वर्गों से पिछले 50 सालो मे अनेकों कांशीराम पैदा हो जाते, अनेकों मायावती पैदा हो जाती, बहुत से लोग कांशीराम और मायावती बनने की राह पर चले भी लेकिन पद और विधायक सांसद बनने की लालसा ने उनको अपनी और अपने परिवार की 1-2 टिकटों के लिए लालची, मौकापरस्त और दलाल टाईप नेता ही बना डाला, इनमें से ना कोई मान्यवर बन पाया और न कोई बहनजी बन पाया।
चारो तरफ नजर घुमाकर देख लो कोई सत्ता की लड़ाई लड़ रहा हो तो, सभी बहनजी की बुराई करके अपनी टिकट पक्की करने भाजपा, कांग्रेस, सपा, एएपी, राजद, टीएमसी आदि के दफ्तरों मे चाकरी कर रहे होते है। किसी को अगर भ्रम है कि स्वामीप्रसाद मौर्य, नसीमुद्दीन सिद्दिकी, रामअचल राजभर, दद्दू प्रसाद, चन्द्रशेखर, ओमप्रकाश राजभर, अनुप्रिया पटेल, उदित राज, संजय निषाद, चिराग पासवान, मुकेश साहनी, उपेन्द्र कुशवाहा आदि अपने समाज की सम्मान की लड़ाई लड़ रहे हैं तो वो भ्रम पाले रहे, हमे तो यही लगता हैं कि वो अपनी 1-2 सीटें जीतने की ही लड़ाई लड़ रहे है, जिधर फायदा दिखे, उधर लुढ़क जाने का चलन किसी समाज का भला नही कर सकता, सिर्फ निजी फायदे तक सीमित रहता है। बिना विचारधारा वाले दल सिर्फ निजी महत्वाकांक्षाओं को पूरी करने के मकसद से ही राजनीति को एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते आए है। ゚ #दिलबाग_सिंह