Rajput EKTA

Rajput EKTA आपस के मतभेद भुलाकर समाज सुधार हेतु राजपूत एकता का परिचय करवाना अत्यंत आवश्यक है || They are divided into three major lineages.

A Rajput is a member of one of the major Hindu Kshatriya (warrior) groups of India and a ruling class of India. They enjoy a reputation as soldiers; many of them serve in the Indian Armed Forces. During the British Raj, the Government accepted them and recruited them heavily into their armies. Current-day Rajasthan is home to most of the Rajputs, although demographically the Rajput population and

the former Rajput states are found spread through much the subcontinent, particularly in North India and central India. Populations are found in Himachal Pradesh, Jammu, Punjab, Uttaranchal, Madhya Pradesh, Bihar,Gujarat, and Uttar Pradesh. Rajputs rose to prominence during the 6th to 12th centuries and Rajputs ruled until the 20th century in most of the princely states. The four Agnivanshi clans, namely the Pratiharas (Pariharas), Solankis (Chaulukyas), Paramaras (Parmars) and Chauhans (Chahamanas), rose to prominence first. Rajputs ruled more than 400 of the estimated 600 princely states and 81 of the 121 Salute states extant at the time of India's independence in 1947.

रक्तदान महादान……. सभी जरूर जरूर पधारे 🙏🏻🙏🏻
03/12/2025

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देशी कहावत है की 'बोदा की लुगाई न कोई भी भाभी कहदे'ये बात वर्तमान परिपेक्ष में राजस्थान को लेकर सही सिद्ध हो रही है। लचर...
06/12/2023

देशी कहावत है की 'बोदा की लुगाई न कोई भी भाभी कहदे'

ये बात वर्तमान परिपेक्ष में राजस्थान को लेकर सही सिद्ध हो रही है। लचर क़ानून व्यवस्था, डरपोक शासक होने का नतीजा है की कोई भी ऐरा गैरा नत्थू खैरा ज़ब मन करे तब राजस्थान की सुख शांति पर मूतकर चला जाता है। सरकार और सरकार के मुलाजिम सिर्फ 'यहाँ मूतना मना है' के स्लोगन लगाकर ही छिछोरों में भय पैदा कर रहे हैं। दरअसल विगत कुछ वर्षों में स्वघोषित माफियाओं ने राजस्थान में जो हालात पैदा किये हैं उसका बड़ा कारण कमजोर लीडरशिप ही है। मजबूत और ताकतवर लीडर जिस तरह यूपी जैसे आतंकित क्षेत्र को सुधार सकता है तो कुछ भी संभव है। आज जिस तरह ये बदमाश राजस्थान में कुकर्म कर रहे हैं क्या आपने सुना की उन्होंने यूपी में इस तरह की किसी वारदात को अंजाम दिया हो! शायद नहीं, क्योंकि ये सब डरपोक हैं इन्हे अच्छे से पता है की वहाँ जो व्यक्ति बैठा है वो राजनीति नहीं बल्कि जननीति करता है इसलिए जन के लिए किसी बदमाश का तन भी मिट्टी में मिलाना पड़े तो वो उसके लिए हमेशा तैयार रहता है।

भविष्य में किसी के बाल बच्चे अनाथ न हों इसके लिए राजस्थान में योगी मॉडल की अति आवश्यकता है।

23/03/2023

आप सादर आमंत्रित है

20/01/2021
मारवाड़ राजस्थान के युग पुरुष, भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व रक्षा मंत्री श्री जसवंत सिंह जसोल जी के दुःखद निधन पर हम स...
27/09/2020

मारवाड़ राजस्थान के युग पुरुष, भाजपा के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व रक्षा मंत्री श्री जसवंत सिंह जसोल जी के दुःखद निधन पर हम सब शोकाकुल है।

सैनिक और राजनेता दोनो रूप में वह एक सच्चे राष्ट्र भक्त थे। उन्हें अटल जी के हनुमान भी कहा जाता था। अटल सरकार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए समाज कल्याण के लिए उनके द्वारा किए गए कार्यों को राष्ट्र सदैव याद रख़ेगा।

ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को अपने श्री चरणों में स्थान दें और शोक संतप्त परिजनों को संबल दें।

विनम्र श्रद्धांजलि।

*खातीपुरा रोड व्यापार मण्डल समिति* द्वारा दुकानदारों को किराये मे राहत दिलाए जाने के संघर्ष मे आज पहली सफलता के रूप मे *...
02/06/2020

*खातीपुरा रोड व्यापार मण्डल समिति* द्वारा दुकानदारों को किराये मे राहत दिलाए जाने के संघर्ष मे आज पहली सफलता के रूप मे *श्री गोवर्धन सिंह जी मुंडरु (RTO साहब)* द्वारा लॉकडाउन के दो महीने का पूरा किराया सभी दस दुकानो का माफ़ किया व आगामी छः महीने का किराया कम किया है, जिससे व्यापारियों को लगभग Rs10,00,000/-(दस लाख रुपए) की राहत मिली है।

आप द्वारा किए गए इस नेक कार्य के लिए व्यापार मण्डल आपका तहें दिल से आभार व्यक्त करता है।

इसी संदर्भ मे आज व्यापार मण्डल द्वारा *श्री गोवर्धन सिंह जी मुंडरु (RTO साहब)* का साफ़ा व माल्यार्पण कर स्वागत किया गया।

ऐसा था वह "रणबांकुरा" - त्रिभुवन वह 65 साल का था, लेकिन आख़िरी के समय तक उसके चेहरे पर युवाओं जैसी ही आभा थी। वह भले पहले...
01/06/2020

ऐसा था वह "रणबांकुरा" - त्रिभुवन

वह 65 साल का था, लेकिन आख़िरी के समय तक उसके चेहरे पर युवाओं जैसी ही आभा थी। वह भले पहले जैसा बलिष्ठ नहीं था, लेकिन किसी को कुछ ग़लत करते देखता तो अभी भी दृढ़ता से फ़टकार लगाने में कहां चूकता था। उसका रौबीला व्यक्तित्व कुछ अलग ही अंदाज़ का था। अफ़सर उससे थर-थर कांपते थे। वह आते तो मंत्री चैंबर छोड़कर निकलना ज़्यादा पसंद करते थे। और अगर सत्तारूढ़ दल से होने के बावजूद कुछ मंत्रियों या विधायकों को पता लग जाता कि "वह" भी इसी ट्रेन से जा रहा है तो वे यात्रा रद्द करना ज़्यादा उपयुक्त मानते थे।

उसके एक कार्यकर्ता को किसी ने पीट दिया। वह भरे बाज़ार गया पीटने वाले नेता की दुकान पर और उसे फ़िल्मी अंदाज़ में जमकर पीटा। फिर कार में बिठाकर कोतवाली ले गया और सीआई से कहा : हम दोनों ने एक जैसा अपराध किया है। हम दोनों को गिरफ़्तार कर लो।

वह एक छोटी पार्टी का बहुत बड़ा नेता था। एक चुनाव में उसके किसी कार्यकर्ता को बड़ी पार्टी के नेताओं ने पंचायत समिति के कमरे में बंद कर दिया। वह अकेला था और सामने करीब ढाई हजार कार्यकर्ताओं के साथ उसके प्रतिद्वंद्वी ताल ठोक रहे थे। वह निडर होकर अकेला उनके बीच जाता है और सब ऐसे तितर-बितर हो जाते हैं जैसे आबादी में कोई युवा बघेरा आ गया हो। वह जाता है और अपने कार्यकर्ता को छुड़ाकर ये जा और वो जा। सब हत्प्रभ।

उसकी निर्भीकता सम्मोहित करती थी। जैसे आप किसी फिल्म के दृश्य देख रहे हों।

सिखों से उनका मा-जाए भाई का-सा रिश्ता हुआ करता था। दलित और मुस्लिम तो उन पर जान छिड़कते थे।

प्रदेश की जेलों में गंगानगर के लोग काफ़ी हुआ करते थे। सरदार लोग भोलेपन में कुछ अपराध कर बैठते और फिर पुलिस और जेल के अफ़सरों की बन आती। बीकानेर के एक नामी जेलर साहब ने किसी सरदार को तंग करने में अति कर दी तो उसकी बहन इससे बोली : देख भाई तू कर कुछ भाई का। भाई अगले दिन ही बीकानेर पहुंचा और ऐसा किया कि ये जेलर की कुर्सी पर और जेलर मेज के नीचे।

जिन दिनों वह सक्रिय था, उसमें ग़ज़ब की फुर्ती थी। वह सौम्य, शालीन और बनावटी किस्म का नेता नहीं था। जो भीतर था, वैसा ही बाहर था। छुपकर कभी कुछ नहीं किया। सब साहस के साथ। चौड़े-धाड़े। जो हूं, वह हूं।

उसका रंग, उसकी चाल और उसके बोलने का अंदाज़ सबको दूर से ही मोहित कर लेता था। दोस्त सम्मोहित हाेते थे और दुश्मन चुपचाप किनारे करके दूसरी गली में चले जाते थे। वह हर समय किसी लोडेड एके फोर्टीसेवन जैसा रहता था। न डर, न चिंता और न कोई सावधानी।

उसकी एक अलग ही छवि थी। अंदाज़ भी बहुत अलग था। बहुत बार खु़द अपने साधारण से घर के एक छोटे से कमरे में बैठा रहता और बाहर कई-कई दिन तक दो-ढाई सौ लोग इंतज़ार करते रहते। अचानक बाहर आता और दहाड़ता : क्यों भीड़ लगा रखी है! क्या हो गया!!! सामने करीब पौने सात फुट के एक पार्षद ने कहा : प्रधान जी, आपके दर्शन करने थे! वह बोला : कर लिये दर्शन!!! अब चलो घर अपने-अपने!!! और वह हुजूम निकलता तो दूसरा आ धमकता। फिर वही खेल और वही अंदाज़।

हमारा औपचारिक परिचय कुछ महीने पहले हो चुका था और लेकिन जो पहली मुलाकात थी, वह बहुत यादगार थी।

हाड़ कंपा देने वाली शीत की वह आधी रात थी। भारी बारिश हो रही थी। तेज झंझा चल रही थी। उस समय दरवाज़े पर थपकियां ज़ोर-ज़ोर से लगीं और त्रिभुवन-त्रिभुवन की आवाज़ गूंजने लगी। मैंने दरवाज़ा खोला तो सामने आते ही वह बोला : "कुकुरमुत्ता" दो।

मैं हैरान। आप और 'कुकुरमुत्ता’! और वह भी इस समय। जिस व्यक्ति की छवि को मैं उन दिनों एक खालिस गुंडे के रूप में प्रचारित पा रहा था, वह मुझसे कह रहा था : देखो "कुकुरमुत्ता’ निराला की रचना है और मैं भी प्रकृति की निराली रचना हूं। मैं भी निराला हूं।

मैं पुरानी आबादी थर्ड ब्लॉक के अपने छोटे से कमरे की अलमारी से किताब ढूंढ़ रहा हूं और उस व्यक्ति के कद के लिहाज से मेरा कमरा बहुत छोटा था, क्योंकि उस व्यक्ति का किसी भी जगह खड़े होने का ही अर्थ था कि सौ-पचास लोग प्रधानजी-प्रधानजी कहकर उमड़ आएंगे।

मैं अभी किताब ढूंढ़ ही रहा था कि उन्होंने याददाश्त के हिसाब से ही पढ़ना शुरू कर दिया :
आया मौसिम, खिला फ़ारस का गुलाब,
बाग पर उसका पड़ा था रोब-ओ-दाब;
वहीं गन्दे में उगा देता हुआ बुत्ता
पहाड़ी से उठे-सर ऐंठकर बोला कुकुरमुत्ता-
“अबे, सुन बे, गुलाब,
भूल मत जो पायी खुशबू, रंग-ओ-आब,
खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,
डाल पर इतरा रहा है केपीटलिस्ट!

वह कहने लगा, मैं यह कविता कुछ जगहों से भूल गया था। मैं कुछ महीनों पहलेे आखिरी बार उससे मिला तो महान कवि केशव दास को उद्धृत करते हुए कहने लगा : केशव केसनि असि करी, बैरिहु जस न कराहिं। चंद्रवदन मृगलोचनी बाबा कहि कहि जाहिं! और जोर से हंस पड़े। उन्हें केशवदास की रसिकप्रिया और रामचंद्रिका के बहुतेरे हिस्से कंठस्थ थे।

उसे तरह-तरह की कारों, शराबों और हथियारों का भी बहुत शौक था। वे एक बार फ़ीरोज़पुर के पास किसी गांव में मुझे ले गए और बोले : चलो, तुम्हें अपनी लाइब्रेरी दिखाता हूं। वहां एक आलीशान अलमारी में तीन चार सौ किताबें। एक से सुंदर एक और एक से बढ़कर एक। बोले : देखो। पढ़कर देखो। मैंने एक बहुत सुंदर पुस्तक निकाली, जिस पर मीन कैंफ और अडोल्फ़ हिटलर लिखा था। वह पुस्तक मेरे हाथ से फिसलते-फिसलते बची। दरअसल वह पुस्तक नहीं, पुस्तक की तरह दिखने वाली स्कॉच की एक बोतल थी।

चुनावों में विरोधियों ने जैसे हमले उस पर किये, वैसा आम तौर पर नहीं होता। उसके विरोधी नेताओं ने उसे गुंडा और शराबी कहा तो उसने चुनाव की पूरी धारा ही मोड़ दी। सभाओं में कहना लगा : हां, मैं गुंडा हूं। और हर उस आदमी के लिए गुंडा हूं, जो इस शहर में गरीब लोगों के साथ बेइन्साफ़ी करेगा। जो मज़दूर का खून चूसेगा। जो बेईमानी करेगा। वह सभाओं में गरजता : माताओ-बहनो, मैं शराब पीता हूं, लेकिन मैं अपने विरोधी की तरह कभी किसी का खून नहीं पीता। मैंने ग़रीब और किसी मज़लूम की अस्मत नहीं लूटी। मैंने किभी किसी का शोषण नहीं किया। लेकिन हां, मैं गुंडा हूं और वह गांधीवादी है, जो खून पीता है…आप सबका। क्या तेवर थे उसके!

साहित्य और इतिहास का वह बहुत अच्छ जानकार था। लेकिन उस जैसी निर्भीकता और साहसिकता मैंने कभी किसी में इस तरह लपलपाती नहीं देखी।

पिछले दो-तीन दिन से उस पर आ रही प्रतिक्रियाएं देख रहा था कि ज़माना उसे किस तरह देखता है। बहुतेरे लोग उसकी प्रतिभा को ज़ाया होना मानते हैं और बहुतेरे लोग नाकाम।

लेकिन उसने अपनी हर सांस को अपनी शर्त पर जीकर दिखाया। वह कभी न तो सत्ता के बल के आगे झुका और न किसी के बाहुबल के आगे। वह न न्यायबल के आगे समर्पित हुआ और न बुद्धिबल के आगे। यह सब उसने उस दौर में करके दिखाया, जब बड़े-बड़े राजनीतिक लोग छोटी-छोटी बातों के लिए शीर्षासन करने लगते हैं।

करीब पांच साल उसने मुझे बुलाकर बताया था कि ब्लड कैंसर के बाद अब पता नहीं कब क्या हो जाए। पूरा शरीर भीतर से जर्जर हो गया है, लेकिन मैं किसी को क्या बताऊं। तुम भी मत बताना।

उसके कारण निराश नागरिकों में उम्मीदें जगती थीं। टूटे हुए युवाओं में एक बलभाव तैरने लगता था। उसका अपना ही धर्म और अपनी अलग ही जाति थी। इतिहास में जिसे वीरता कहा जाता है, वह उसको जीता था। उसने गुंडापन भी किया और बहुत धमक के साथ किया, लेकिन सिंह-वृत्ति से। उसने प्रतिद्वंद्वियों पर हमले भी किए और खुले आम किए, लेकिन कभी किसी सताए हुए को नहीं सताया। कई लोगों को उनसे प्राण भिक्षा मांगते भी देखा। ताकतवरों को चुनौतियों देने का आनंद अगर किसी ने लिया तो उसी ने लिया। मैंने पूरे प्रदेश में ऐसा तो कोई नहीं देखा।

उसके एक बहुत नज़दीकी प्रतिद्वंद्वी पर एक प्राणघातक हमला हुआ। आरोप उसी पर लगा। लेकिन वह हमला उसने नहीं, किसी और ने किया था। वह कहने लगा : ये मेरी मॉडस ऑपरेंडी है क्या? क्या मैं ऐसे घटिया हमले करता हूं।

वह जिस तरह हथेली पर प्राण लिए फिरता था, उसकी क्या वज़ह थी? वह बोला : मैं नहीं बना। जैसे तुम्हें तुम्हारे पिता ने ऐसा बना दिया, वैसे ही मेरी मां ने मुझे ऐसा बना दिया। बचपन में जाड़ दर्द करती और मां शराब का फाहा दबा देती। मैं तो तभी से यह रस चूस रहा था। एक बार बड़े भाई को कक्षा में बिना कारण ही शिक्षिका ने पीट दिया। वह बिना कारण ही बार-बार ऐसा करती थी। मां तो पता चला तो भाई कहीं बाहर खेल रहा था और मैं हाथ लग गया। मां ने मेरी बाजू पकड़ी और बोली : देख भाई को मैडम ने बिना कारण मारा और तू देखता रहा! शर्म नहीं आती। कैसा राजपूत है रे। राजपूत क्या कभी अन्याय देखता है। और अगले दिन जाते ही मैंने मैडम के बाल खींच लिए, धूल डाल दी और बुरा हाल किया। अब जहां कहीं अन्याय होता है तो मुझे लगता है : मां कह रही है, कैसा राजपूत है रे तू। अन्याय देखता है?

उसकी मां अनपढ़ थी, लेकिन हीरे गढ़ती थी। घर में जिस समय बेटी की शादी हुई तो वह आमंत्रित करने वालों के नाम और पते िसर्फ़ बोले जा रही थीं और लिखने वाला थके जा रहा था। पांच हजार से ज्यादा पते उन्हें कंठस्थ थे। इसलिए यह बेटा भी कभी किसी को चीज़ को किसी डायरी में नहीं लिखता था और जब मौका आता था तो सब अचानक याद आ जाता था।

वह बहुत ही अलग अंदाज का बिंदास बंदा था और उसका जीवन किसी उपन्यास से कम में नहीं आ सकता।

एक बार वह टाइटैनिक फिल्म दिखाने अपने कई दोस्तों और बच्चों को ले गया । रात को घर आने के बाद वाल्मीकि बस्ती में वाल्मीकि समाज के लोगों के बीच खूब ठुमके लगाए और गीत गाए।

अंबेडकर जयंती पर लोग उसे सम्मान से बुलाते तो एससी ऑफिसर बहुत परेशान हाेते थे, क्योंकि वह उन्हें मंच से बहुत खरीखोटी सुनाता था। दलितों की बदहाली के लिए वह दलित अफसरों को बहुत खींचता था। लेकिन उनका साथ भी देता था।

उसका गोरा रंग बहुत आभा बिखेरता था। एकदम चिकना और बिंदास। कॉलेजों के नए नए चुनाव हुए थे और वह गर्ल्स कॉलेज का चुनाव जीतने के बाद आई और पांव छूकर बोली : अंकल, आई लव यू! वह बोला : हट मरज्याणिए, तेरा बाप तो मेरा छोटा भाई है!

दोस्तों और परिजनों की बेटियों के प्रति उसके मन में जितना सम्मान और गर्वभाव था, वह बहुत कम देखने में आता है। एक बार उसका एक कार्यकर्ता उसके पास पिटाई किए जाने की शिकायत लेकर आया तो उसने सामने वालों को बुलाया, जैसा कि उनके यहां दरबार लगा करता था। सामने वाले बुजुर्ग ने बताया कि यह मेरे बेटे का दोस्त है और इस नाते मेरी बेटी इसकी बहन हुई। तो इसने उसे गलत निगाह से क्यों देखा? उन्होंने कार्यकर्ता की तरफ देखा, तो वह बोला : अंकल, हम दोनों लव करते हैं! इतने में ही लड़का दूर फर्श पर जाकर गिरा। उसे उसने इतना झन्नाटेदार थप्पड़ लगाया और कहा : हरामजादे, दोस्त की बहन अपनी बहन होती है।

वह बहुत छोटी उम्र में प्रधान बन गया था। एक बीडीओ ग्रामीण इलाके में महिलाओं के सेंटर चेक करने गया तो उसने किसी महिला से छेड़छाड़ कर ली। प्रधानजी के पास गांव वाले आए तो उन्होंने बीडीओ से पूछा : बीडीओ बोला, सर गलती हो गई। माफ कर दो। और पंचायत समिति पहुंचकर उन्होंने बीडीओ को कमरे में बंद किया और उसी की कुर्सी के हत्थे से जमकर सुंताई की और उसे पुलिस में लेकर गए कि इसकी एफआईआर दर्ज करो। इसे इसके प्रधान ने इसके दफ्तर में मारा!

आजकल विधायकों के लिए मुख्यमंत्री के सेक्रेटरी या प्रिंसीपल सेक्रेटरी बहुत बड़ी बात हैं, लेकिन उसने अपने समय में जो किया, वह सेक्रेटेरिएट कवर करने वाले पत्रकार जानते हैं। उन्होंने कहा : मैं विधायक नहीं हूं, सुरेंद्र सिंह हूं। वे अपने बयानों से कभी मुकरते नहीं थे। एक बार उन्होंने गंगानगर में प्रेसकॉन्फ्रेंस में अपनी ही सरकार को लेकर बहुत कुछ कह दिया तो यहां से भाजपा नेताओं का एक दल सुबूत जुटाने गया। वे कुछ अख़बार वालों से मिले। शायद सबने कहा : सुबूत की क्या ज़रूरत है। उन्हें अभी बुला देते हैं। प्रधान जी फिर बोल देंगे!

एक नज़ारा मेरी रिपोर्टिंग के दाैरान ऐसा भी आया, जब भाजपा नेताओं के साथ उसका जबरदस्त टकराव हुआ। हेतराम बेनीवाल भी उनके साथ थे। उनकी गिरफ्तारी की मांग हुई। सत्ता पक्ष आंदोलित था। वह विपक्ष में था। वह कोतवाली पहुंचा और एसपी लक्ष्मण मीणा से कहा कि चलो मुझे गिरफ्तार कर लो। वह हालात देखकर कांप गए। बाहर भाजपा के लेाग मांग करें कि गुंडे को गिरफ्तार करो। भीतर से यह गुंडा ज़ोर-ज़ोर से नारा लगाए कि भाजपा नेताओं की मांग पूरी करो!!! बेचारे एसपी!

विरोधी उसकी जिन प्रवृत्तियों और गतिविधियों काे उसकी गुंडागर्दी करार देते थे, पुलिस और लोकसमाज तक उसे उन्मुक्त भाव से देखता था। लोकसभा चुनाव का मौका था। एक पार्टी के ताक़तवर कैबिनेट मंत्री की सभाओं में भादरा से हनुमानगढ़ के बहुत कम लोग जुटे और वह देखता हुआ आ रहा था। हनुमानगढ़ में अचानक उन्होंने बहुत ही आपत्तिजनक ढंग से उस मंत्री से इशारा करके कहा कि यहां तुम्हारी पार्टी को कुछ नहीं मिलने वाला। अचानक पुलिस के कई अधिकारियों और गार्डों ने पीछा किया। हनुमानगढ़ में वह जसपालसिंह के घर के आगे कार रोकता है तो पुलिस चारों तरफ से घेर लेती है। बंदा जैसे ही उतरा, सब पुलिस वाले एक साथ : अरे, प्रधान जी, आप??? सब एक साथ : चलो-चलो। भाजपा के बड़े बड़े नेता हैरान। क्या हुआ प्रधानजी हैं तो। क्या प्रधानमंत्री हैं! नेता कुढ़ते रहे। पुलिस वाले अधिकारी हंसते रहे।

गंगानगर में उसने दलित-निर्धन समर्थक के रूप में एक जातिविहीन नेता की छवि स्थापित की। राजपूतों से गहरे जुड़े होने के बावजूद वह सती का कट्‌टर विरोधी था। आडवाणी की रथयात्रा के समय के उसके धर्मांधता विरोधी भाषणों में इनसानियत की वह बहुत वकालत करता था। मंडल रिपोर्ट और सामाजिक न्याय के आंदोलनों का वह अगुआ था।

उसकी बातों में ज़बरदस्त हंसोड़पन भी था। एक प्रेसकॉन्फ्रेंस में एक बड़े मूंछधारी को देखकर वह बोला : मूंछ रखने से कोई बहादुर बनता है तो फिर ये जो सामने पत्रकार महोदय बैठे हैं, वह सबसे बहादुर होते!

वे प्रदेश के ऐसे मंत्रियाें काे लपका गिरोह के सदस्य की संज्ञा देते थे, जो सीएम कोटरी के लोग माने जाते थे।

प्रो केदार के देहावसान के बाद चुनाव आए तो भाजपा के कुछ नेता भेरोसिंह शेखावत को चुनाव लड़ने के लिए ले आए। तब तक वह अपने चुनाव की पूरी तैयारियां कर चुका था। शेखावत के जलसे में 500 लोग थे और उसके यहां दस हजार से ज़्यादा। दोनों के रिश्ते पिता-पुत्र जैसे थे। शेखावत को भरोसा था कि उनके जाते ही मैदान खाली होगा। लेकिन एक रात वह जब शेखावत से एकांत में मिला तो उसने एक सूसाइड नोट और अपना पिस्टल उस पर रख दिया। बोला : चुनाव से पीछे हटना है तो गोली मार दो। आपको कोई कुछ नहीं कहेगा। सूसाइड नोट लिख दिया है। शेखावत बहुत गंभीर नेता थे और उन्होंने उसे चिंतित मन से वापस भेज दिया। उस चुनाव में शेखावत तीसरे स्थान पर रहे और वह खु़द दूसरे। यहां भी वोट की एक राजनीति हुई थी, जिसने कालांतर में बहुत कड़वाहट भरा रूप लिया।

चुनाव के दिनों में वह अगर विरोधी का मंच भी खाली देखता था तो निडर होकर भाषण देने चढ़ जाया करता था। विरोधी देखते रहते थे। उसकी इस निडरता में एक गहरी अपणायत भी हुआ करती थी। भैरोसिंह शेखावत के जाने कितनी ही चुनाव सभाअों में उसने भाषण दिए थे।

एक बार किसी ने बताया कि उसके चाहने वालों में विचित्र तरह के लोग थे। ऐसे कि सुनने वाला हैरान रह जाए। उसकी एक चुनाव सभा में कोई 10-15 विचित्र तरह के लोग आए। उसके बड़े भाई जेलर थे और वे इनकी असलियत जानते थे। उन्होंने डपटा कि भागो यहां से। वे पांव छूते हुए बोले : हम प्रधान जी के समर्थन में आए हैं। हम कांग्रेस और बीजेपी वालों की सभाओं में ही सक्रिय हैं। जेलर साहब ने राहत की सांस ली : तो ठीक है! किसी ने पूछा कि ये भी कोई राहत की बात है। ये समर्थन अपना करना आए हैं और काम बीजेपी कांग्रेस में कर रहे हैं। जेलर साहब बोले : ये सारे के सारे छंटैल जेबकतरे हैं! वे निकले ही थे कि एक बाबा जी आ गए। बोले : मैं तो चंदा लेकर रायपुर से आया था। इसने हमारे गुरुजी जयपुर आए थे तो एक मृगछाला भेंट की थी।

वह स्वयं ही एक दिन मुझसे कह रहा था : छोटे भाई, कुदरत आपको कस्तूरी मृग बनाकर भेजती है। यह आप पर है कि आप कस्तूरी मृग बनकर भी कस्तूरी की तलाश में भटकते रहते हैं या अपने अंदाज से अपना जीवन जीते हैं।

इस शख्स की आलोचना के लिए इतना कुछ है कि आप सुनते-सुनते थक जाएंगे। दोस्तों से भी और दुश्मनों से भी। लेकिन निंदा और आलोचनाओं के इस ढेर में आप उसके कुछ अनचीन्हे पहलुओं को देखेंगे तो आपको गर्व होगा कि वह सामान्य नहीं, एक बहुत असाधारण पात्र था, जिसने जीवन एक अलग अंदाज से जिया। उसने कर्मक्षेत्र से मुंह मोड़ा तो मोड़ ही लिया। नेताओं की तरह लिप्सा नहीं टपकाई।

पांच साल पहले वह बहुत बीमार थे। मैं मिलने गया तो मुझे मेरे मित्र गजराजसिंह जी ने एक दिलचस्प वाकया सुनाया। बोले : मैं 23 साल पहले की बात है। मैं यूथ हॉस्टल में बैठा था इनके पास। हम ठहाके लगा रहे थे। अचानक मुझे संदेश देने कोई और आया। मैंने सुना और मैं वापस आकर बैठा था तो मेरा चेहरा रुंआसा हो गया। साहब ने मुझे पूछा : अरे कौन क्या कह गया। अभी ठीक करता हूं। ऐसी राेनी सूरत क्यों बना ली? गजराज बोले : हुकुम बेटी हुई है मेरे। यह सुनकर वह बोले : अरे, खुश हो। लक्ष्मी आई है। और हां, भूल जा कि ये तेरी बेटी है। ये मेरी बेटी है। इसे मैं अपने घर ले जाऊंगा। बात आई-गई हो गई। 23 साल चले गए। एक दिन हुकुम अचानक घर पधारे और बोले : मेरी बेटी कहां है? घर ले जाना है। वह तब जयपुर के महारानी कॉलेज में फाइनल में ही थी। और हुकुम ने याद दिलाया कि देख तेरे साथ 23 साल पहले यूथ हॉस्टल में उस दिन वादा किया था कि यह मेरी बेटी है और इसे मैं अपने घर ले जाऊंगा। आैर आज समय गया है। आैर आज वह लक्ष्मी उस उसी के आंगन में है। बेटी का पिता तो भूल गया वह बात, लेकिन इस मरजीवड़े को यह सब याद रहा।

ऐसा था वह इस युग का रणबांकुरा।

शेखावत सूर्यवंशी कछवाह क्षत्रिय वंश की एक शाखा है देशी राज्यों के भारतीय संघ में विलय से पूर्व मनोहरपुर,शाहपुरा, खंडेला,...
31/05/2020

शेखावत सूर्यवंशी कछवाह क्षत्रिय वंश की एक शाखा है देशी राज्यों के भारतीय संघ में विलय से पूर्व मनोहरपुर,शाहपुरा, खंडेला,सीकर, खेतडी,बिसाऊ,सुरजगढ़,नवलगढ़, मंडावा,मुकन्दगढ़, दांता,खुड,खाचरियाबास,दूंद्लोद,अलसीसर,मलसिसर,रानोली आदि प्रभाव शाली ठिकाने शेखावतों के अधिकार में थे जो शेखावाटी नाम से प्रशिध है वर्तमान में शेखावाटी की भौगोलिक सीमाएं सीकर और झुंझुनू दो जिलों तक ही सीमित है भगवान राम के पुत्र कुश के वंशज कछवाह कहलाये महाराजा कुश के वंशजों की एक शाखा अयोध्या से चल कर साकेत आयी, साकेत से रोहतास गढ़ और रोहताश से मध्य प्रदेश के उतरी भाग में निषद देश की राजधानी पदमावती आये रोहतास गढ़ का एक राजकुमार तोरनमार मध्य प्रदेश आकर वाहन के राजा गौपाल का सेनापति बना और उसने नागवंशी राजा देवनाग को पराजित कर राज्य पर अधिकार कर लिया और सिहोनियाँ को अपनी राजधानी बनाया कछवाहों के इसी वंश में सुरजपाल नाम का एक राजा हुवा जिसने ग्वालपाल नामक एक महात्मा के आदेश पर उन्ही नाम पर गोपाचल पर्वत पर ग्वालियर दुर्ग की नीवं डाली महात्मा ने राजा को वरदान दिया था कि जब तक तेरे वंशज अपने नाम के आगे पाल शब्द लगाते रहेंगे यहाँ से उनका राज्य नष्ट नहीं होगा सुरजपाल से 84 पीढ़ी बाद राजा नल हुवा जिसने नलपुर नामक नगर बसाया और नरवर के प्रशिध दुर्ग का निर्माण कराया नरवर में नल का पुत्र ढोला (सल्ह्कुमार) हुवा

जो राजस्थान में प्रचलित ढोला मारू के प्रेमाख्यान का प्रशिध नायक है उसका विवाह पुन्गल कि राजकुमारी मार्वणी के साथ हुवा था, ढोला के पुत्र लक्ष्मण हुवा, लक्ष्मण का पुत्र भानु और भानु के परमप्रतापी महाराजाधिराज बज्र्दामा हुवा जिसने खोई हुई कछवाह राज्यलक्ष्मी का पुनः उद्धारकर ग्वालियर दुर्ग प्रतिहारों से पुनः जित लिया बज्र्दामा के पुत्र मंगल राज हुवा जिसने पंजाब के मैदान में महमूद गजनवी के विरुद्ध उतरी भारत के राजाओं के संघ के साथ युद्ध कर अपनी वीरता प्रदर्शित की थी मंगल राज दो पुत्र किर्तिराज व सुमित्र हुए,किर्तिराज को ग्वालियर व सुमित्र को नरवर का राज्य मिला सुमित्र से कुछ पीढ़ी बाद सोढ्देव का पुत्र दुल्हेराय हुवा जिनका विवाह dhundhad के मौरां के चौहान राजा की पुत्री से हुवा था
दौसा पर अधिकार करने के बाद दुल्हेराय ने मांची,bhandarej खोह और झोट्वाडा पर विजय पाकर सर्वप्रथम इस प्रदेश में कछवाह राज्य की नीवं डाली मांची में इन्होने अपनी कुलदेवी जमवाय माता का मंदिर बनवाया वि.सं. 1093 में दुल्हेराय का देहांत हुवा दुल्हेराय के पुत्र काकिलदेव पिता के उतराधिकारी हुए जिन्होंने आमेर के सुसावत जाति के मीणों का पराभव कर आमेर जीत लिया और अपनी राजधानी मांची से आमेर ले आये

काकिलदेव के बाद हणुदेव व जान्हड़देव आमेर के राजा बने जान्हड़देव के पुत्र पजवनराय हुए जो महँ योधा व सम्राट प्रथ्वीराज के सम्बन्धी व सेनापति थे संयोगिता हरण के समय प्रथ्विराज का पीछा करती कन्नोज की विशाल सेना को रोकते हुए पज्वन राय जी ने वीर गति प्राप्त की थी आमेर नरेश पज्वन राय जी के बाद लगभग दो सो वर्षों बाद उनके वंशजों में वि.सं. 1423 में राजा उदयकरण आमेर के राजा बने,राजा उदयकरण के पुत्रो से कछवाहों की शेखावत, नरुका व राजावत नामक शाखाओं का निकास हुवा उदयकरण जी के तीसरे पुत्र बालाजी जिन्हें बरवाडा की 12 गावों की जागीर मिली शेखावतों के आदि पुरुष थे बालाजी के पुत्र मोकलजी हुए और मोकलजी के पुत्र महान योधा शेखावाटी व शेखावत वंश के प्रवर्तक महाराव शेखाजी का जनम वि.सं. 1490 में हुवा वि. सं. 1502 में मोकलजी के निधन के बाद राव शेखाजी बरवाडा व नान के 24 गावों के स्वामी बने राव शेखाजी ने अपने साहस वीरता व सेनिक संगठन से अपने आस पास के गावों पर धावे मारकर अपने छोटे से राज्य को 360 गावों के राज्य में बदल दिया राव शेखाजी ने नान के पास अमरसर बसा कर उसे अपनी राजधानी बनाया और शिखर गढ़ का निर्माण किया राव शेखाजी के वंशज उनके नाम पर शेखावत कहलाये

जिनमे अनेकानेक वीर योधा,कला प्रेमी व स्वतंत्रता सेनानी हुए शेखावत वंश जहाँ राजा रायसल जी,राव शिव सिंह जी, शार्दुल सिंह जी, भोजराज जी,सुजान सिंह आदि वीरों ने स्वतंत्र शेखावत राज्यों की स्थापना की वहीं बठोथ, पटोदा के ठाकुर डूंगर सिंह, जवाहर सिंह शेखावत ने भारतीय स्वतंत्रता के लिए अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष चालू कर शेखावाटी में आजादी की लड़ाई का बिगुल बजा दिया था शेखावत वंश के ही श्री भैरों सिंह जी भारत के उप राष्ट्रपति बने |

शेखावत वंश की शाखाएँ

* टकनॆत शॆखावत‍‍‍‍- शेखा जी के ज्येष्ठ पुत्र दुर्गा जी के वंशज टकनॆत शॆखावत‍‍‍‍ कहलाये !खोह,पिपराली,गुंगारा आदि इनके ठिकाने थे जिनके लिए यह दोहा प्रशिध है
खोह खंडेला सास्सी गुन्गारो ग्वालेर !
अलखा जी के राज में पिपराली आमेर !!
टकनॆत शॆखावत‍‍‍‍ शेखावटी में त्यावली,तिहाया,ठेडी,मकरवासी,बारवा ,खंदेलसर,बाजोर व चुरू जिले में जसरासर,पोटी,इन्द्रपुरा,खारिया,बड्वासी,बिपर आदि गावों में निवास करते है !

* रतनावत शेखावत -महाराव शेखाजी के दुसरे पुत्र रतना जी के वंशज रतनावत शेखावत कहलाये इनका स्वामित्व बैराठ के पास प्रागपुर व पावठा पर था !हरियाणा के सतनाली के पास का इलाका रतनावातों का चालीसा कहा जाता है
*मिलकपुरिया शेखावत -शेखा जी के पुत्र आभाजी,पुरन्जी,अचलजी के वंशज ग्राम मिलकपुर में रहने के कारण मिलकपुरिया शेखावत कहलाये इनके गावं बाढा की ढाणी, पलथाना ,सिश्याँ,देव गावं,दोरादास,कोलिडा,नारी,व श्री गंगानगर के पास मेघसर है !

* खेज्डोलिया शेखावत -शेखा जी के पुत्र रिदमल जी वंशज खेजडोली गावं में बसने के कारण खेज्डोलिया शेखावत कहलाये !आलसर,भोजासर छोटा,भूमा छोटा,बेरी,पबाना,किरडोली,बिरमी,रोलसाहब्सर,गोविन्दपुरा,रोरू बड़ी,जोख,धोद,रोयल आदि इनके गावं है !
*बाघावत शेखावत - शेखाजी के पुत्र भारमल जी के बड़े पुत्र बाघा जी वंशज बाघावत शेखावत कहलाते है ! इनके गावं जेई पहाड़ी,ढाकास,सेनसर,गरडवा,बिजोली,राजपर,प्रिथिसर,खंडवा,रोल आदि है !

*सातलपोता शेखावत -शेखाजी के पुत्र कुम्भाजी के वंशज सातलपोता शेखावत कहलाते है !

*रायमलोत शेखावत -शेखाजी के सबसे छोटे पुत्र रायमल जी के वंशज रायमलोत शेखावत कहलाते है
इनकी भी कई शाखाएं व प्रशाखाएँ है जो इस प्रकार है !
-तेजसी के शेखावत -रायमल जी पुत्र तेज सिंह के वंशज तेजसी के शेखावत कहलाते है ये अलवर
जिले के नारायणपुर,गाड़ी मामुर और बान्सुर के परगने में के और गावौं में आबाद है !

-सहसमल्जी का शेखावत -- रायमल जी के पुत्र सहसमल जी के वंशज सहसमल जी का
शेखावत कहलाते है !इनकी जागीर में सांईवाड़ थी !
-जगमाल जी का शेखावत -जगमाल जी रायमलोत के वंशज जगमालजी का शेखावत कहलाते
है !इनकी १२ गावों की जागीर हमीरपुर थी जहाँ ये आबाद है

-सुजावत शेखावत -सूजा रायमलोत के पुत्र सुजावत शेखावत कहलाये !सुजाजी रायमल जी के
ज्यैष्ठ पुत्र थे जो अमरसर के राजा बने !
-लुनावत शेखावत :-लुन्करण जी सुजावत के वंशज लुन्करण जी का शेखावत कहलाते है इन्हें लुनावत शेखावत भी कहते है,इनकी भी कई शाखाएं है !
उग्रसेन जी का शेखावत ,अचल्दास का शेखावत,सावलदास जी का शेखावत,मनोहर दासोत शेखावत आदि !

-लुनावत शेखावत :-लुन्करण जी सुजावत के वंशज लुन्करण जी का शेखावत कहलाते है इन्हें लुनावत शेखावत भी कहते है,इनकी भी कई शाखाएं है !
उग्रसेन जी का शेखावत ,अचल्दास का शेखावत,सावलदास जी का शेखावत,मनोहर दासोत शेखावत आदि !

रायसलोत शेखावत :- लाम्याँ की छोटीसी जागीर जागीर से खंडेला व रेवासा का स्वतंत्र राज्य
स्थापित करने वाले राजा रायसल दरबारी के वंशज रायसलोत शेखावत कहलाये !राजा रायसल के १२
पुत्रों में से सात प्रशाखाओं का विकास हुवा जो इस प्रकार है !
A- लाड्खानी :- राजा रायसल जी के जेस्ठ पुत्र लाल सिंह जी के वंशज लाड्खानी कहलाते है
दान्तारामगढ़ के पास ये कई गावों में आबाद है यह क्षेत्र माधो मंडल के नाम से भी प्रशिध है
पूर्व उप राष्ट्रपति श्री भैरों सिंह जी इसी वंश से है !
B- रावजी का शेखावत :- राजा रायसल जी के पुत्र तिर्मल जी के वंशज रावजी का शेखावत कहलाते है !
इनका राज्य सीकर,फतेहपुर,लछमनगढ़ आदि पर था !
C- ताजखानी शेखावत :- राजा रायसल जी के पुत्र तेजसिंह के वंशज कहलाते है इनके गावं चावंङिया,
भोदेसर ,छाजुसर आदि है
D. परसरामजी का शेखावत :- राजा रायसल जी के पुत्र परसरामजी के वंशज परसरामजी का शेखावत कहलाते है !
E. हरिरामजी का शेखावत :- हरिरामजी रायसलोत के वंशज हरिरामजी का शेखावत कहलाये !

F. गिरधर जी का शेखावत :- राजा गिरधर दास राजा रायसलजी के बाद खंडेला के राजा बने
इनके वंशज गिरधर जी का शेखावत कहलाये ,जागीर समाप्ति से पहले खंडेला,रानोली,खूड,दांता आदि ठिकाने इनके आधीन थे !
G. भोजराज जी का शेखावत :- राजा रायसल के पुत्र और उदयपुरवाटी के स्वामी भोजराज के वंशज भोजराज जी का शेखावत कहलाते है ये भी दो उपशाखाओं के नाम से जाने जाते है,
१-शार्दुल सिंह का शेखावत ,२-सलेदी सिंह का शेखावत
*गोपाल जी का शेखावत - गोपालजी सुजावत के वंशज गोपालजी का शेखावत कहलाते है
* भेरू जी का शेखावत - भेरू जी सुजावत के वंशज भेरू जी का शेखावत कहलाते है
* चांदापोता शेखावत - चांदाजी सुजावत के वंशज के वंशज चांदापोता शेखावत कहलाये

27/05/2020

गुण बिन ठाकर ठीकरो ,गुण बिन मीत गंवार।
गुण बिन चंदन लाकड़ी ,गुण बिन नार कुनार।।
हर वस्तु की पहचान उसके गुण से होती है नमक तभी ही नमक है जब तक की उसमें खार है शक्कर तब तक ही शक्कर है जब तक उसमें मिठास है।
इसी प्रकार राजपूत में जब तक शूरवीरता,ब्रह्मचर्य और तपस्या,धीरज,निपुणता,कठिनाई का सामना,दान और ईश्वरीय भाव जेसे गुण नही है वह तब तक वह राजपूत नही है राजपूत केवल एक जाति ही नहीं है बल्कि यह धैर्य, साहस, शौर्य, त्याग, सच्चरित्रता, स्वामिभक्ति एवं सुशासन का पर्याय भी है।

कवियों ने इसे समाज व दीन-दुखियों के हितैषी के रूप में इंगित किया है -
रण खेती रजपूत री, कबहू न पीठ धरै ।
देस रुखाळै आपणो, दुखियां पीड़ हरै।।

राजपूत भारतीय समाज का वह अंग है जो देश और समाज के हित में अपने प्राणों तक का उत्सर्ग करने में तनिक भी संकोच नहीं करता है -
मरणों पण हटणों नहीं आ रण खेतां रीत ।
भली निभाई हेम रा, रजवट हंदी रीत ।।
ये छंद एक राजपूत की शूरवीरता का प्रतिक है।

 #बधाईसोशियल डिस्टेंसिंग के साथ सादगीपूर्ण विवाह संपन्न ।कद्दावर नेता देवीसिंह भाटी के पोते अंशुमानसिंह का विवाह सादगी क...
24/05/2020

#बधाई

सोशियल डिस्टेंसिंग के साथ सादगीपूर्ण विवाह संपन्न ।

कद्दावर नेता देवीसिंह भाटी के पोते अंशुमानसिंह का विवाह सादगी के साथ संपन्न हुआ ।

कस्तूरी निवास में आयोजित इस समारोह में लॉकडाउन के चलते सोशियल डिस्टेंसिंग सहित तमाम तरह की कोरोना एडवायजरी का पालन किया गया ।

शादी में शामिल होने वाले लोगों की संख्या ही 20 रखी गई। बता दें, भाटी ने अंशुमान का सगाई समारोह भी सादगी से ही किया था।

उस वक्त भी शगुन के तौर पर एक रुपया व नारियल लिया था।

महाराणा प्रताप की वीरता, पराक्रम, त्याग और देशभक्ति सभी के लिए प्रेरणादायी है और सिर्फ एक दिन ही नहीं बल्कि पूरे वर्ष हम...
08/05/2020

महाराणा प्रताप की वीरता, पराक्रम, त्याग और देशभक्ति सभी के लिए प्रेरणादायी है और सिर्फ एक दिन ही नहीं बल्कि पूरे वर्ष हमें उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लेना चाहिए।

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