28/05/2026
23 और 24 मई की अमर उजाला में प्रकाशित ये खबरें किसी अफवाह का नहीं, बल्कि एक बेहद गंभीर और भयावह सच्चाई का संकेत हैं।
इन खबरों के पत्रकार गौरव सागवाल और प्रदीप पिलानिया जी हैं जिन्होंने सबसे पहले इस संस्थान का काला चिटठा सबके सामने रखाl
कल दीपक कालीरमन जी ने वहाँ पुलिस व मीडिया बुलाकर कुछ बच्चों को आज़ाद करवाया l
दोनों ही द्वारा वहाँ का जो दृश्य बताया, वह बेहद चिंताजनक और झकझोर देने वाला है।
खबरों के अनुसार —
▪️ छात्राओं के परिसर से भागने की घटनाएँ हुईं
▪️ बच्चों द्वारा मानसिक दबाव और भय का ज़िक्र किया गया
▪️ अभिभावकों ने सामान न लौटाने, बच्चों से मिलने न देने और दबाव बनाने जैसे गंभीर आरोप लगाए
▪️ जिला शिक्षा अधिकारी को स्वयं मौके पर पहुँचकर जांच करनी पड़ी
बच्चों को “मौत ” जैसे पत्र लिखने की नौबत क्यों आई?
छात्राएँ दीवार फांदकर भाग रही हैं।
16-17 घंटे तक उनके अभिभावकों को कोई सूचना नहीं दी जाती।
डरी हुई बच्चियाँ डेरों में जाकर छुपती हैं और वहाँ से अपने माता-पिता को फोन कर कहती हैं —
“प्लीज़ हमें यहाँ से ले जाओ…”
आख़िर ऐसा कौन सा माहौल था जहाँ बच्चियों को अपनी जान और मानसिक स्थिति बचाने के लिए भागना पड़ा?
क्यों अभिभावकों को उनकी बेटियों की जानकारी तक नहीं दी गई?
किस अधिकार से बच्चों को उनके परिवारों से काटकर रखा गया?
यह शिक्षा नहीं, अमानवीयता है।
यह अनुशासन नहीं, मानसिक दबाव और भय का वातावरण है।
शिक्षा के नाम पर यदि बच्चों का मानसिक संतुलन, स्वतंत्रता और सम्मान छीना जा रहा है, तो यह किसी भी सभ्य समाज के लिए स्वीकार्य नहीं हो सकता।
बच्चे मशीन नहीं होते।
प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के नाम पर उनका बचपन, मानसिक स्वास्थ्य और भावनाएँ कुचली नहीं जा सकतीं।
और सबसे शर्मनाक बात —
यह सब सरकार की नाक के नीचे, सरकारी संरक्षण में चल रहा था।
अगर मीडिया में खबरें न छपतीं, अगर बच्चियाँ भागकर बाहर न आतीं, तो क्या सरकार और प्रशासन चुप ही बैठे रहते?
इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय न्यायिक जांच होनी चाहिए और दोषियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए — चाहे वे संस्था संचालक हों या उन्हें संरक्षण देने वाले सरकारी लोग।
#श्वेता_ढुल