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04/08/2026

Song: Coffee Date Chodo
Credit: ETS

जाति-व्यवस्था, दलित और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (अंतिम भाग)— सावित्री राभा मनुस्मृति के विश्लेषण की आवश्यकता है। मनुस्मृत...
04/08/2026

जाति-व्यवस्था, दलित और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
(अंतिम भाग)

— सावित्री राभा

मनुस्मृति के विश्लेषण की आवश्यकता है। मनुस्मृति में कहा गया है कि ब्रह्मा, अर्थात् वह सर्वशक्तिमान जिसने ब्रह्मांड की रचना की, उसके शरीर के विभिन्न अंगों से विभिन्न प्रकार के मनुष्यों की उत्पत्ति हुई। यहाँ विभिन्न प्रकार से आशय विभिन्न जातियों के लोगों से है। यद्यपि सर्वशक्तिमान ने समस्त ब्रह्मांड की रचना की, मनुस्मृति में केवल हिंदू धर्मावलंबियों का ही उल्लेख मिलता है। उसके मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघाओं (ऊरुओं) से वैश्य और चरणों से शूद्र उत्पन्न हुए। मनुस्मृति में कहा गया है कि चूँकि मनुष्य के शरीर में सिर से लेकर नाभि तक का भाग पवित्र माना जाता है, इसलिए सर्वशक्तिमान के सिर से नाभि तक के शरीर-भाग से उत्पन्न लोग पवित्र हैं। किंतु उनमें भी सर्वशक्तिमान ने स्वयं ब्राह्मण को सबसे अधिक पवित्र (Purest of them all) बताया है। और चूँकि ब्राह्मण सबसे अधिक पवित्र है, इसलिए वही सबसे अधिक सम्मान का अधिकारी है। संसार की समस्त वस्तुएँ उसी की हैं। अर्थात् मनुस्मृति के माध्यम से हिंदू धर्म की जाति-आधारित विभाजन व्यवस्था तथा ब्राह्मण के विशेषाधिकारों को वैधता प्रदान की गई। वेदों में वर्णित जाति-विभाजन के आधार पर मनुस्मृति ने दैवी आधार का सहारा लेकर इस जातिगत विभाजन को और अधिक मान्यता प्रदान की।

मनुस्मृति के विधानों का विश्लेषण करने से स्पष्ट होता है कि वे पूर्णतः महिलाओं और दलितों के सम्मानपूर्वक जीवन जीने के लिए आवश्यक अधिकारों के विरुद्ध हैं। जाति-विभाजन व्यवस्था में श्रम-विभाजन को मान्यता देते हुए कहा गया है कि शूद्रों का एकमात्र कार्य शेष तीन वर्णों की सेवा करना है। और चूँकि जातिगत पहचान जन्म पर आधारित तथा अपरिवर्तनीय मानी गई है, इसलिए शूद्रों को कभी भी कोई अन्य कार्य करने का अधिकार नहीं होगा। इस कठोर शोषणकारी व्यवस्था को वैध ठहराने के लिए पाप-प्रायश्चित्त का सिद्धांत भी प्रस्तुत किया गया है। इसमें एक शूद्र के जन्म को उसके पूर्वजन्म के पापों का परिणाम बताया गया है तथा कहा गया है कि उन पापों से मुक्ति पाने का एकमात्र उपाय शेष वर्णों, विशेषकर ब्राह्मणों, की सेवा करना है। इस कार्य के अतिरिक्त कोई भी अन्य कार्य उसके लिए फलदायक नहीं होगा (यद्यपि यहाँ यह उल्लेख नहीं किया गया है कि एक शूद्र को कितनी पीढ़ियों तक सेवा करते रहना होगा)। चूँकि यह कथन सर्वशक्तिमान सृष्टिकर्ता द्वारा मनु के माध्यम से कहा गया माना गया है, इसलिए इसका उल्लंघन करना या इस पर प्रश्न उठाना महापाप के रूप में निर्धारित किया गया है।

जाति-विभाजन व्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं में से एक जातिगत पहचान का निरंतर चिह्नीकरण है। ताकि किसी व्यक्ति के नाम से ही उसकी जाति का पता चल सके, मनुस्मृति में कहा गया है कि किसी ब्राह्मण के नाम का दूसरा भाग किसी शुभ वस्तु या शुभार्थ का संकेत करेगा। इसी प्रकार, क्षत्रियों के नाम के दूसरे भाग का अर्थ रक्षा से संबंधित होगा, वैश्यों के नाम के दूसरे भाग का अर्थ समृद्धि से संबंधित होगा, और शूद्रों के नाम के प्रथम भाग का अर्थ ऐसा होगा जो तिरस्कारसूचक हो तथा दूसरे भाग का अर्थ ऐसा होगा जो सेवा का बोध कराता हो। अर्थात्, किसी व्यक्ति के अस्तित्व को उसकी जातिगत पहचान पूरी तरह अपने अधीन कर लेगी और यह सुनिश्चित किया जाएगा कि वह अपने जीवन में कभी भी इस पहचान के बोझ से मुक्त न हो सके। मनुस्मृति ने जाति-विभाजन व्यवस्था के साथ सामाजिक प्रतिष्ठा की संरचना को इस प्रकार व्यवस्थित किया कि ब्राह्मण पहचान के साथ सम्मान और शूद्र पहचान के साथ अपमान स्थायी रूप से अभिन्न रूप से जुड़ जाए।

मनुस्मृति के लगभग प्रत्येक पृष्ठ पर शूद्रों के प्रति भेदभावपूर्ण व्यवहार को दैवी स्वीकृति प्रदान की गई है। इसमें कहा गया है कि सम्मान का निर्धारण किसी व्यक्ति के व्यवहार, चरित्र अथवा आयु के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी जातिगत पहचान के आधार पर किया जाएगा। इस प्रकार किसी भी आयु का ब्राह्मण केवल ब्राह्मण होने के कारण अन्य सभी जातियों के लोगों की अपेक्षा अधिक सम्मान का अधिकारी होगा। यद्यपि यह अपेक्षाकृत कम हानिकारक प्रतीत हो सकता है, किन्तु दैनिक जीवन में इस अवधारणा का अभ्यास शूद्रों के लिए अत्यंत अपमानजनक है, क्योंकि यहाँ भी उसे यह समझाया जाता है कि वह अन्य लोगों की तुलना में मनुष्य के रूप में निम्न है।

जाति-विभाजन व्यवस्था केवल हीनता और घृणा को जन्म देती है—यह बात मनुस्मृति के विभिन्न भागों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। इसमें कहा गया है कि यदि कोई शूद्र किसी उच्च जाति के व्यक्ति का अपमान करे, तो उसकी जीभ काट दी जाएगी। यदि कोई शूद्र किसी उच्च जाति के व्यक्ति को उसके कर्तव्यों के बारे में बताने का प्रयास करे अथवा उसके साथ अभद्र व्यवहार करे, तो उसके मुँह और कानों में गरम तेल डाल दिया जाएगा। यदि कोई शूद्र स्वयं को उच्च जाति के समान समझे और उसी प्रकार व्यवहार करने का प्रयास करे, तो उसे गंभीर रूप से दंडित किया जाएगा तथा राज्य से निष्कासित कर दिया जाएगा। जिस समय मनुस्मृति की रचना हुई, उस समय भारत में राजतंत्र प्रचलित था। उस काल में विभिन्न प्रकार के अमानवीय और क्रूर दंड (जिन्हें आज हम 'मध्ययुगीन' अत्याचार कहते हैं, यद्यपि 'आधुनिक' भारत में भी दलितों को इस प्रकार तथा इससे भी अधिक भीषण अत्याचारों का सामना करना पड़ता है) प्रचलन में थे। किंतु ध्यान देने योग्य बात यह है कि दंड व्यवस्था में भी जातिगत भेदभाव कितना स्पष्ट था। चूँकि ब्राह्मण का अस्तित्व ही पवित्र माना गया, इसलिए वह चाहे जो भी करे, उसे अपराध नहीं माना जाएगा। इसके विपरीत, जिस समाज में शूद्रों के अस्तित्व को ही अपमानजनक समझा जाता था और जहाँ उनके पास कोई आर्थिक अथवा सामाजिक शक्ति नहीं थी, वहाँ उनके किसी भी व्यवहार को अपराध माना जाएगा। ऐतिहासिक रूप से समाज में शूद्रों की जो स्थिति थी, उसके आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अपमान अथवा अभद्र व्यवहार की परिभाषा उच्च जातियों के लोग ही निर्धारित करते थे। और चूँकि उस समय कोई निष्पक्ष न्याय-व्यवस्था नहीं थी, इसलिए राजा अनिवार्य रूप से उच्च जाति के तथाकथित 'सम्मानित' लोगों के पक्ष में ही निर्णय देता था। इस प्रकार के दंड (अत्याचार) का विधान वास्तव में भय और नियंत्रण का एक साधन था। किसी भी दमनकारी व्यवस्था में शासक वर्ग अपने अधीनस्थ लोगों को भयभीत करके उन पर नियंत्रण बनाए रखता है। इस संदर्भ में उस समय के राजनीतिक और सामाजिक शासक, अर्थात् उच्च जातियों, के लिए शूद्रों को भयभीत करके नियंत्रित करना आवश्यक था, ताकि उनका प्रभुत्व बना रहे और सभी प्रकार के संसाधनों पर उनका नियंत्रण कायम रहे।

शूद्रों की कोई स्वतंत्र पहचान विकसित न हो तथा वे सदैव उच्च जातियों पर निर्भर बने रहें, इसलिए मनुस्मृति में कहा गया है कि कोई भी शूद्र कभी किसी प्रकार की संपत्ति अर्जित नहीं कर सकता। क्योंकि ऐसा करना ब्राह्मण के लिए कष्ट का कारण बन जाएगा। इसके स्थान पर ब्राह्मण शूद्र को अपना बचा हुआ भोजन, अपने पुराने वस्त्र आदि 'दान' करेगा। अर्थात्, दयालुता के आवरण में जाति-विभाजन व्यवस्था के स्तरीकरण को बनाए रखा गया है। साथ ही शूद्रों की स्थिति भी स्पष्ट कर दी गई है कि उन्हें सदैव ब्राह्मणों की कृपा पर निर्भर रहकर ही जीवन व्यतीत करना होगा। शूद्रों की न्यूनतम आवश्यकताओं की पूर्ति के माध्यम से मनुस्मृति ने रणनीतिक रूप से इस विभाजनकारी व्यवस्था को प्रश्नों के घेरे में आने से बचाने का प्रयास किया। इतने प्रकार के नियमों के बाद भी यदि किसी प्रकार शूद्र शक्तिशाली हो जाएँ, तो उसके लिए भी मनुस्मृति ने निर्देश दिए हैं। इसमें कहा गया है कि जिस समाज या देश में शूद्र शक्तिशाली हों, वहाँ ब्राह्मण को नहीं रहना चाहिए। इसका कारण यह बताया गया है कि जहाँ शूद्र जैसे 'नीच' और 'अन्यायी' लोग सत्ता में हों, वहाँ रहने से हिंदू धर्म के पवित्र कानून का अपमान होगा और ऐसी स्थिति में ब्राह्मण भी शूद्रों के साथ अधोगति अथवा नरक को प्राप्त होंगे। यद्यपि यहाँ 'पवित्र कानून' से क्या अभिप्राय है, यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है, फिर भी यह समझने में कठिनाई नहीं होती कि इसका आशय ब्राह्मण की श्रेष्ठता, उसके प्रभुत्व तथा उसके साथ जाति-व्यवस्था की वैधता से है।

आरएसएस ने भारत के लिखित संविधान, जो समानता, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के आदर्शों से प्रेरित है, के स्थान पर मनुस्मृति, जिसकी मूल विशेषता घृणा बताई गई है, को लागू करने की बात कही थी (नूरानी, 2019)। आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गेनाइज़र में लिखा गया था कि इस संविधान में भारतीयता जैसी कोई बात नहीं है। भारत की प्राचीन सनातन परंपराएँ और नियम, जो मनुस्मृति में वर्णित हैं, यदि नए भारत में उन्हें कोई वैधता नहीं दी जाती, तो इसका अर्थ भारतीयता का ही निषेध है। अर्थात्, मनुस्मृति में जो कुछ लिखा है, वही भारतीयता का प्रमाण है। इस तर्क के अनुसार, जाति-व्यवस्था भारतीयता की प्रमुख तथा वैध विशेषताओं में से एक है। नए और स्वतंत्र भारत में दलितों को जो कानूनी संरक्षण प्रदान किया गया था।

वर्तमान भारत में आरएसएस और दलित

वर्तमान भारत में हिंदुत्ववादी राजनीतिक दल सत्ता में है। उसके संरक्षण में आरएसएस सरकारी समर्थन प्राप्त करके और अधिक प्रभावशाली बनने में सक्षम हुआ है। साथ ही भारत में दलितों पर होने वाले हमले पहले की अपेक्षा और बढ़ गए हैं। किंतु इसी के साथ भारत में दलितों सहित हिंदुओं के बीच हिंदुत्व का प्रभाव भी अधिक बढ़ा है। अनेक मामलों में हिंदुत्व के आक्रामक स्वरूप के रूप में दलितों को ही अग्रिम पंक्ति में देखा गया है। 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस तथा 2002 के गुजरात दंगे—जो भारत में सांप्रदायिक हिंसा की दो सबसे भयावह घटनाओं में से हैं—पर किए गए अध्ययनों से यह निष्कर्ष सामने आया है कि हिंसा में प्रत्यक्ष रूप से शामिल लोगों में अधिकांश दलित थे। केवल इन दो घटनाओं में ही नहीं, बल्कि अधिकांश सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में देखा जाता है कि हिंसा के अग्रिम चेहरे के रूप में दलित ही सामने रहते हैं। इसका सैद्धांतिक विश्लेषण करते हुए अनेक विद्वानों ने कहा है कि वास्तव में ब्राह्मणवादी हिंदुत्व दलितों का उपयोग 'फुट सोल्जर्स' (Foot Soldiers) के रूप में करता है। इस प्रकार की सांप्रदायिक हिंसा के माध्यम से समाज में हिंदुत्व के विमर्श को और अधिक सुदृढ़ रूप से स्थापित करने के पीछे 'मस्तिष्क' के रूप में ब्राह्मण कार्य करते हैं और दलित उस 'शरीर' के रूप में कार्य करते हैं जो हिंसा को क्रियान्वित करता है (पांडे, 1991)। अर्थात् यहाँ भी जाति-व्यवस्था का स्तरीकरण कार्य करता है। एक बात स्पष्ट है कि आरएसएस के प्रचारक हिंदू धर्म के प्रश्न पर अत्यंत आक्रामक थे और साथ ही हिंदू धर्म की रक्षा को लेकर एक मिथ्या असुरक्षा-बोध से भी ग्रस्त थे। उनके लिए हिंदू धर्म की रक्षा की मूल कुंजी धार्मिक एकता थी। और इस एकता का एकमात्र स्रोत जाति-व्यवस्था थी। क्योंकि यदि यह व्यवस्था न रहे अथवा शूद्र इससे अलग हो जाएँ, तो हिंदू धर्म की स्थिरता समाप्त हो जाएगी। ब्राह्मणों को हिंदू धर्म को जीवित बनाए रखने के लिए दलितों सहित समस्त गैर-ब्राह्मण आबादी की आवश्यकता है। यहाँ प्रश्न समस्त हिंदू हितों का नहीं, बल्कि ब्राह्मणवादी हितों का है। किन्तु इस विश्लेषण को करते समय हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कहीं नए दृष्टिकोण से विचार करते हुए हम पुनः उसी ब्राह्मणवादी विमर्श को तो आगे नहीं ला रहे, जो सदैव ब्राह्मण को उच्च स्थान पर स्थापित करता है। यह सही है कि हिंदुत्व को शूद्रों की आवश्यकता है और यह भी सही है कि उसे उनकी जनशक्ति की आवश्यकता है। किंतु यह भी विचार करना आवश्यक है कि शूद्र अथवा दलित स्वयं हिंदुत्व के इस सिद्धांत से कैसी प्रेरणा प्राप्त कर रहे हैं। हिंदुत्व की राजनीति में दलितों की इस स्वायत्त सक्रियता के पीछे उनकी अपनी धार्मिक पहचान भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारत में दलितों और मुसलमानों की आर्थिक स्थिति में समानताएँ होने के बावजूद सामाजिक और सांस्कृतिक समानताएँ अधिकांश मामलों में नहीं हैं। सामाजिक संबंधों के अभाव में इन दोनों समुदायों के बीच धार्मिक भिन्नताओं को विभाजन में परिवर्तित करना आरएसएस के लिए अपेक्षाकृत सरल रहा है। लेकिन यह भी सत्य है कि शूद्र जाति-व्यवस्था के समस्त विभाजनों के बावजूद स्वयं को हिंदू ही मानते हैं। आरएसएस ने हिंदू अस्मिता का निर्माण नहीं किया, बल्कि उसे जागृत किया और अपनी सामाजिक अभियांत्रिकी (Social Engineering) के माध्यम से उसे और अधिक हिंसक, भयावह तथा आक्रामक बना दिया। इसमें कोई संदेह नहीं कि आरएसएस ने मुसलमानों को एक काल्पनिक शत्रु के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है और वह काफी हद तक इसमें सफल भी हुआ है। 'हिंदू खतरे में है' जैसी निराधार अवधारणा—जिसका वास्तविक तथ्यों और आँकड़ों से मेल नहीं बैठता—(यह शब्द-प्रयोग एर्नेस्टो लैकलाउ की पुस्तक On Populist Reason से लिया गया है) ने 'हिंदू कल्पना' को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। हिंदू कौन हैं? वे क्यों खतरे में हैं? किस प्रकार का खतरा है? यह खतरा कैसे उत्पन्न हो रहा है? इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तरों के अभाव में भी अनेक हिंदू यह विश्वास करने लगे हैं कि इस खतरे के मूल में मुसलमान हैं। भारत की अधिकांश संपत्ति उच्च वर्ग के ब्राह्मणों अथवा अन्य 'ऊँची जातियों' के हाथों में केंद्रित है। फिर भी हिंदुत्व के हित में मुसलमानों को सभी समस्याओं की जड़ के रूप में प्रस्तुत करके ऐसा विमर्श निर्मित करने में भारत का राजनीतिक शासक वर्ग पूर्णतः सफल रहा है। दलितों की आर्थिक स्थिति ने भी उन्हें इस धारणा में और अधिक डूबने में सहायता की है। आरएसएस मुसलमानों को बाहरी (विदेशी) के रूप में प्रस्तुत करता है। अतः यह विश्वास करना कठिन नहीं रह जाता कि बाहरी लोग भारत के सभी प्रकार के संसाधनों का अन्यायपूर्ण उपयोग कर रहे हैं और इसी कारण हिंदू आर्थिक रूप से पिछड़ रहे हैं। दुनिया के अनेक देशों में प्रवासियों को इसी प्रकार शत्रु के रूप में प्रस्तुत करना शासक वर्ग की एक अत्यंत प्रचलित रणनीति रही है। विश्वभर में दक्षिणपंथी सरकारें काल्पनिक शत्रुओं का निर्माण करती हैं ताकि उनका शोषण बना रहे और लोगों के मन में घृणा भी बनी रहे। भारत के संदर्भ में यह काल्पनिक शत्रु मुसलमान हैं। और इस काल्पनिक शत्रु के प्रति विद्वेष केवल दलितों में ही नहीं, बल्कि सभी जातियों के हिंदुओं, विशेषकर ऊँची जातियों के हिंदुओं में भी विद्यमान है। वे प्रत्यक्ष रूप से हिंसा में भाग नहीं लेते, इसलिए यह हमारे सामने कम दिखाई देता है। चिंता का विषय यह है कि विद्वेष के आवेग में अंधे होकर जिन दलितों ने आरएसएस और हिंदुत्व को अपना उद्धारकर्ता मान लिया है, यदि वही आरएसएस इस देश में पूर्ण रूप से सत्ता पर आ गया, तो सबसे पहले वह अपनी ब्राह्मणवादी विचारधारा के प्रति निष्ठा बनाए रखते हुए संविधान को बदलकर मनुस्मृति को लागू कर देगा और तब हम वास्तव में हजार वर्ष पीछे ऐसे समाज में पहुँच जाएँगे, जहाँ शासन जाति-व्यवस्था के अमानवीय, अपमानजनक और अत्यंत भेदभावपूर्ण नियमों के आधार पर संचालित होगा।

यहाँ हमें एक बार फिर डॉ. बी. आर. आंबेडकर की टिप्पणी को अपने मन और मस्तिष्क में स्मरण रखना होगा —

"यदि भारत में हिंदू राज वास्तव में स्थापित हो गया, तो यह निस्संदेह इस देश के लिए सबसे बड़ी आपदा सिद्ध होगा। किसी भी प्रकार से हिंदू राज का प्रतिरोध करना होगा।"
(Pakistan or the Partition of India, 1946)

जाति व्यवस्था, दलित और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (भाग 1)सावित्री राभा  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के राजनीतिक और साम...
03/08/2026

जाति व्यवस्था, दलित और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
(भाग 1)

सावित्री राभा

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के राजनीतिक और सामाजिक उद्देश्यों पर सैद्धांतिक रूप से बहुत चर्चा हुई है। आरएसएस वैचारिक रूप से हिंदुत्व की अवधारणा के प्रति प्रतिबद्ध है, इस विषय से भी सभी अवगत हैं। वी. डी. सावरकर के हिंदुत्व के विचार के मूल में सैद्धांतिक रूप से 'स्व' (Self) और 'अन्य' (Other) की अवधारणा निहित है। हिंदुत्व एक भौगोलिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में हिंदू 'स्व' के निर्माण की बात करता है। इस हिंदू 'स्व' का निर्माण मुस्लिम 'अन्य' के निर्माण पर निर्भर करता है। सावरकर के अनुसार, प्रथम, एक हिंदू वह है जो भारत को अपनी पितृभूमि और पुण्यभूमि मानता है। अर्थात, इस परिभाषा के अनुसार जो भारत में जन्मा है, वह हिंदू है। द्वितीय, एक हिंदू वह है जो भारत को अपनी पुण्यभूमि मानता है (सावरकर, 1945, पृ. 2)। पुण्यभूमि की यह अवधारणा काफी हद तक धार्मिक है। सावरकर ने लिखा है कि जिन धर्मों का जन्म भारत के इस भौगोलिक क्षेत्र में हुआ है, उनके अनुयायियों की इस क्षेत्र के प्रति स्वाभाविक निष्ठा होगी। अर्थात, वे अपने धर्म के कारण इस देश के प्रति मानसिक रूप से प्रतिबद्ध रहेंगे और उनके भीतर इस देश के प्रति एकात्मता की भावना कार्य करेगी। इस तर्क के अनुसार हिंदुओं के साथ-साथ अनेक अन्य धर्मों, जैसे सिख, बौद्ध और जैन धर्म के अनुयायी भी 'हिंदू' हैं, क्योंकि उनके धर्म का जन्म इसी देश में हुआ है, फलतः वे इस देश को अपनी पुण्यभूमि मानते हैं (सावरकर, 1945)। इसी तर्क के अनुसार, इस देश में जन्म लेने के बावजूद मुसलमान इस देश को अपनी पुण्यभूमि नहीं मानते, क्योंकि उनके धर्म का जन्म इस देश में नहीं हुआ। चूँकि वे इस देश को अपनी पुण्यभूमि नहीं मानते, इसलिए सावरकर ने दावा किया कि वे इस देश के प्रति किसी प्रकार की एकात्मता का अनुभव नहीं कर सकते। हिंदुत्व की इस बहिष्कारी अवधारणा का उपयोग लंबे समय से इस देश में मुसलमानों के विरुद्ध घृणा फैलाने के लिए किया जाता रहा है। वर्तमान भारत में आक्रामक हिंदू राष्ट्रवादी सरकार इस अवधारणा का उपयोग करके राजनीतिक हिंसाकरण कर रही है और इस सरकार के समर्थन से आरएसएस सामाजिक हिंसाकरण चला रहा है।

अब प्रश्न यह है कि यदि आरएसएस एक हिंदुत्ववादी संगठन है और उसका मूल उद्देश्य इस देश में 'हिंदू' हितों की रक्षा करना है, तो आरएसएस और दलितों के संबंध पर चर्चा करने की आवश्यकता कहाँ है? और हिंदू हितों की रक्षा के संदर्भ में दलितों की आवश्यकता कहाँ है? सामान्यतः हम जानते हैं कि दलित हिंदू समाज का ही एक हिस्सा हैं; वे हिंदू हैं। तो क्या आरएसएस समस्त 'हिंदू समाज' के हितों की रक्षा नहीं कर रहा है? इस विषय पर विस्तृत चर्चा करने से पहले डॉ. बी. आर. आंबेडकर की एक टिप्पणी को हमें स्मरण रखना आवश्यक है—

“हिंदू चेतना जैसी कोई चीज़ नहीं है। प्रत्येक हिंदू के भीतर जो चेतना विद्यमान है, वह उसकी जातिगत पहचान की चेतना है। इसी कारण हिंदू कभी भी एक समग्र राष्ट्र या समाज नहीं थे और न ही कभी होंगे।” (Annihilation of Caste, 1936; इसका प्रत्यक्ष हिंदी अनुवाद उद्धृत किया गया है।) अर्थात, उन्होंने जातिगत पहचान को हिंदू धर्म का मूल अंग के रूप में प्रस्तुत किया है। यदि जातिगत पहचान की चेतना इतनी प्रबल है, तो प्रत्येक हिंदू के मन और मानस में जाति-व्यवस्था की चेतना भी विद्यमान है। वस्तुतः जाति-व्यवस्था तथा उससे जुड़ा सामाजिक स्तरीकरण भी विद्यमान है। इस स्तरीकरण की मूल विशेषता ही ब्राह्मणवादी प्रभुत्व है, जिसकी छाप हिंदू समाज के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक तथा आर्थिक—सभी क्षेत्रों में सदैव विद्यमान रहती है। ऐसी स्थिति में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि 'हिंदू हित' से वास्तव में आरएसएस का क्या आशय है। आरएसएस के इतिहास तथा उसके विचारधारा-निर्माताओं के वक्तव्यों का विश्लेषण करने पर ब्राह्मणवाद के प्रति उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता स्पष्ट हो जाती है।

आरएसएस का इतिहास और दलित

भारत के राजनीतिक इतिहास में राष्ट्रवाद की विभिन्न धाराओं का उल्लेख मिलता है। हिंदू राष्ट्रवाद उनमें से एक प्रमुख धारा है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की हिंदू ऐतिहासिक विचारधारा तथा दयानंद सरस्वती के हिंदू सुधारवादी आंदोलन ने भारत में हिंदू राष्ट्रवाद की आधारशिला रखी। इसके बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रमुख प्रवक्ताओं में से एक लाला लाजपत राय ने हिंदुओं को एक पृथक राष्ट्र के रूप में अभिहित किया तथा भारत के खोए हुए गौरव की पुनर्स्थापना के लिए हिंदू नवजागरण का आह्वान किया (नूरानी, 2019)। मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में 1915 में हिंदू महासभा का गठन हुआ, जिसने हिंदू राष्ट्रवाद की राजनीतिक भूमि तैयार करने में सहायता की। धर्मांतरण को रोकना इन हिंदू सुधारवादी आंदोलनों के प्रमुख उद्देश्यों में से एक बन गया। 1920 के दशक से हिंदू महासभा ने शुद्धि आंदोलन पर विशेष ध्यान केंद्रित किया। किन्तु इस विचारधारा के कण-कण में ब्राह्मणवाद अंतर्निहित था। हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रवर्तक यह भली-भाँति समझते थे कि हिंदू धर्म की अत्यंत कठोर जाति-व्यवस्था धर्मांतरण के प्रमुख कारणों में से एक थी। फलतः उन्होंने हिंदू समाज की विभिन्न जातियों से अपने आंतरिक मतभेदों को भुलाकर हिंदू धर्म की महानता को स्वीकार करने तथा सभी हिंदुओं को एकजुट होने का आह्वान किया। स्वामी श्रद्धानंद (हिंदू संगठन आंदोलन के प्रवर्तक) ने भी सभी जातियों के हिंदुओं से एक साथ बैठकर भोजन करने का आह्वान किया। किंतु एक ही बर्तन से नहीं; शूद्र अलग बर्तनों में भोजन परोसेंगे और अन्य लोग उसे ग्रहण करेंगे। अर्थात्, जाति-व्यवस्था से जुड़ी अस्पृश्यता यथावत बनी रहेगी।

1923 में वी. डी. सावरकर की पुस्तक Hindutva: Who is a Hindu? प्रकाशित हुई। हिंदुत्व की अवधारणा को अधिकांश समय एक मुस्लिम-विरोधी सिद्धांत के रूप में देखा जाता है, जो काफी हद तक सही भी है। किंतु धार्मिक विमर्श पर अधिक ध्यान केंद्रित करने के कारण हम अनेक बार इसके साथ घनिष्ठ रूप से जुड़े जाति-व्यवस्था के प्रश्न को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। सावरकर ने इस पुस्तक में अत्यंत आक्रामक ढंग से चातुर्वर्ण्य व्यवस्था के संरक्षण की वकालत की है। उन्होंने लिखा कि जाति-व्यवस्था हिंदू राष्ट्र की प्रमुख विशेषताओं में से एक है। उन्होंने यह भी कहा कि जिस देश में चार वर्णों का अस्तित्व नहीं है, वह वास्तव में 'म्लेच्छों का देश' है। उन्होंने हिंदू धर्म की पवित्रता को बनाए रखने के पीछे चातुर्वर्ण्य व्यवस्था को प्रमुख आधार माना। दूसरी ओर, यही सावरकर अस्पृश्यता के विरुद्ध कार्यक्रमों का भी आयोजन करते थे। किंतु इसके पीछे समानता की कोई अवधारणा कार्यरत नहीं थी। उनका मानना था कि शूद्रों को अस्पृश्य मानने के कारण उनका एक बड़ा भाग इस्लाम या ईसाई धर्म स्वीकार कर लेता है, जिससे हिंदू धर्म संख्यात्मक दृष्टि से कमजोर हो जाता है। फलतः वे शूद्र जनसंख्या को हिंदू धर्म की एकता और गौरव की रक्षा के लिए आवश्यक मानते थे। ऐतिहासिक रूप से इन सभी घटनाओं ने प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से आरएसएस की स्थापना को प्रभावित किया। 1925 में विजयादशमी के दिन केशव हेडगेवार के नेतृत्व में बी. एस. मुंजे, बाबाराव सावरकर, एल. वी. परांजपे तथा बी. बी. ठक्कर (ये सभी उस समय हिंदू महासभा के कार्यकर्ता थे) की उपस्थिति में हेडगेवार के घर पर आरएसएस की स्थापना हुई। आरएसएस ने हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा को और अधिक आक्रामक तथा सैन्य स्वरूप प्रदान किया। हेडगेवार ने हिंदू राष्ट्र की स्थापना की शपथ ली और साथ ही जाति-समूहों से रहित हिंदू राष्ट्रवाद के निर्माण की घोषणा भी की। किन्तु ब्राह्मणवाद आरएसएस के रग-रग में विद्यमान है, यह अनेक उदाहरणों से स्पष्ट होता है। आरएसएस के दस्तावेज़ों में उसके संस्थापक हेडगेवार के सक्षम नेतृत्व का उल्लेख करते समय उनकी ब्राह्मण पहचान का भी विशेष उल्लेख किया गया है। उनकी नेतृत्व क्षमता के साथ उनकी जातिगत पहचान को पूरक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। हेडगेवार का ब्राह्मणवादी दृष्टिकोण संगठन में नियुक्तियों के संदर्भ में भी स्पष्ट था। हेडगेवार हमेशा 'ऊँची' जातियों के तथा स्नातक पुरुषों की ही नियुक्ति करते थे (नूरानी, 2019)।

आरएसएस के अगले सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर ने हिंदुत्व की अवधारणा को और अधिक आक्रामक स्वरूप प्रदान किया। उन्होंने जाति-व्यवस्था का उपयोग इस्लाम को भयावह रूप में प्रस्तुत करने के लिए किया। उनके अनुसार, भारत के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में, जहाँ बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ था और उसके परिणामस्वरूप जाति-व्यवस्था का लोप हो गया था, वहाँ मुस्लिम शासक अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी ढंग से अपना प्रभुत्व स्थापित कर सके। दूसरी ओर, भारत के जिन क्षेत्रों में जाति-व्यवस्था अत्यंत सुदृढ़ थी, वहाँ मुस्लिम शासक अपना प्रभाव स्थापित नहीं कर सके। अतः उनके अनुसार हिंदू धर्म की रक्षा के लिए जाति-व्यवस्था आवश्यक है।

इसके बाद दीनदयाल उपाध्याय ने भी अपने पूर्ववर्तियों के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए जाति-व्यवस्था को स्वाभाविक बताया। यद्यपि उन्होंने 'इंटीग्रल ह्यूमनिज़्म' (Integral Humanism) का सिद्धांत प्रस्तुत किया, जिसका मूल सार यह था कि हिंदू धर्म के सभी अंग मानवता के बंधन में जुड़े हुए हैं, किंतु उनके सिद्धांत के अनुसार यह एकीकरण जाति-व्यवस्था के सभी नियमों का पालन करते हुए ही होना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऊँच-नीच की अवधारणा पूरी तरह गलत है, क्योंकि हिंदू धर्म में प्रत्येक व्यक्ति को उसकी क्षमता के अनुसार कार्य सौंपा गया है। जिसे जो दायित्व दिया गया है, वह हिंदू धर्म में दैवी विधान के अनुसार निर्धारित हुआ है; अतः उस पर प्रश्न उठाना सृष्टिकर्ता पर प्रश्न उठाने के समान है। उनके अनुसार सृष्टिकर्ता का यह विधान वैज्ञानिक है, क्योंकि यह विभाजन वास्तव में हिंदू समाज को स्थिरता प्रदान करता है, जिसके परिणामस्वरूप हिंदू धर्म अधिक संगठित बना रहता है (उपाध्याय, 1965)।

आरएसएस के दस्तावेज़ों का विश्लेषण करने से स्पष्ट होता है कि यह संगठन प्रारंभ से ही मनुस्मृति के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करता रहा है। उसी मनुस्मृति को डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने शूद्रों और महिलाओं के प्रति अत्यंत अपमानजनक नियमों और प्रावधानों के विरोध में सार्वजनिक रूप से जलाया था।

1949 में, जब भारत का संविधान अपनाया जा रहा था, उसके कुछ ही समय बाद आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गेनाइज़र में एक लेख प्रकाशित हुआ, जिसमें भारत के संविधान के स्थान पर मनुस्मृति को वास्तविक संविधान के रूप में प्रस्तुत किया गया। भारत में हिंदुत्व की अवधारणा के प्रमुख प्रवर्तक वी. डी. सावरकर ने भी मनुस्मृति की अत्यंत प्रशंसा करते हुए कहा था—

“हमारे हिंदू राष्ट्र के लिए वेदों के बाद मनुस्मृति ही वह पूजनीय शास्त्र है, जो प्राचीन काल से हमारी संस्कृति का धारक और वाहक रहा है। कई शताब्दियों से यह ग्रंथ हमारे राष्ट्र की आध्यात्मिक और दैवी चेतना का प्रमुख स्रोत रहा है। आज भी हिंदू जिन नियमों का पालन करते हैं, उनका आधार मनुस्मृति है। वर्तमान समय में मनुस्मृति ही हिंदू कानून है, और वह मौलिक है।” (सावरकर समग्र—सावरकर के हिंदी लेखन-संग्रह से प्रत्यक्ष अनूदित।) आरएसएस के प्रचारक हेडगेवार तथा गोलवलकर ने भी विभिन्न अवसरों पर मनुस्मृति को आदर्श विधि के रूप में प्रस्तुत किया है (नूरानी, 2019)।

परवर्ती भाग कल....

📱 31 जुलाई 1995 — भारत के दूरसंचार इतिहास का एक ऐतिहासिक अध्याय 🇮🇳31 जुलाई 1995 को भारत ने आधुनिक दूरसंचार के क्षेत्र मे...
02/08/2026

📱 31 जुलाई 1995 — भारत के दूरसंचार इतिहास का एक ऐतिहासिक अध्याय 🇮🇳

31 जुलाई 1995 को भारत ने आधुनिक दूरसंचार के क्षेत्र में एक नए युग में प्रवेश किया। इसी दिन भारत की पहली वाणिज्यिक मोबाइल फ़ोन सेवा का औपचारिक शुभारंभ हुआ। इस ऐतिहासिक अवसर पर CPI(M) नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार के मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) के राइटर्स बिल्डिंग से तत्कालीन केंद्रीय दूरसंचार मंत्री सुख राम को नई दिल्ली स्थित संचार भवन में देश की पहली मोबाइल फ़ोन कॉल की।

यह केवल दो नेताओं के बीच हुई एक बातचीत नहीं थी, बल्कि भारत में मोबाइल संचार क्रांति की औपचारिक शुरुआत थी। उस दौर में जब मोबाइल तकनीक देश के लिए बिल्कुल नई थी, तब पश्चिम बंगाल की CPI(M) नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार ने इस ऐतिहासिक पहल का नेतृत्व करते हुए यह संदेश दिया कि वैज्ञानिक सोच, आधुनिक तकनीक और जनहितकारी विकास एक-दूसरे के पूरक हैं।

यह उपलब्धि इस बात का भी प्रतीक थी कि वाम मोर्चा सरकार केवल भूमि सुधार, पंचायत व्यवस्था और सामाजिक न्याय तक सीमित नहीं थी, बल्कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी, औद्योगिक विकास और आधुनिक अवसंरचना को भी जनता के विकास का महत्वपूर्ण आधार मानती थी। 31 जुलाई 1995 का यह क्षण भारत के दूरसंचार इतिहास में एक ऐसे मील के पत्थर के रूप में दर्ज है जिसने आने वाले वर्षों में मोबाइल संचार के अभूतपूर्व विस्तार का मार्ग प्रशस्त किया।

आज जब मोबाइल फ़ोन करोड़ों भारतीयों के दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है, तब उस ऐतिहासिक शुरुआत और उसमें CPI(M) नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार की भूमिका को याद करना इतिहास के प्रति सम्मान और तकनीकी प्रगति के उस निर्णायक क्षण को स्वीकार करना है।

🚩 इतिहास गवाह है—दूरदर्शी सोच, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और जनहितकारी नीतियाँ ही समाज को आगे बढ़ाती हैं और वामपंथ ही यह रास्ता दिखा सकता है।

कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत की 18वीं पुण्यतिथि पर लाल सलाम! 🚩आज भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के पूर्व महासचिव ए...
01/08/2026

कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत की 18वीं पुण्यतिथि पर लाल सलाम! 🚩

आज भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के पूर्व महासचिव एवं पार्टी के नवरत्न पोलित ब्यूरो के सदस्य कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत की 18वीं पुण्यतिथि पर हम उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।

कॉमरेड सुरजीत का जीवन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन, किसान संघर्षों, सांप्रदायिकता-विरोध और लोकतंत्र की रक्षा के लिए आजीवन समर्पित रहा। किशोरावस्था में ही उन्होंने भगत सिंह और ग़दर आंदोलन से प्रेरणा लेकर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष का रास्ता चुना और जीवनभर मेहनतकश जनता के अधिकारों की लड़ाई लड़ते रहे।

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेतृत्व में उन्होंने किसानों, खेत मज़दूरों, सिखों, हिंदुओं और सभी मेहनतकश तबकों को सांप्रदायिक विभाजन के विरुद्ध संगठित करने का कार्य किया। उन्होंने पंजाब में भाईचारे, धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रीय एकता की रक्षा के लिए लगातार संघर्ष किया तथा आतंकवाद और सांप्रदायिक शक्तियों के विरुद्ध जनआंदोलनों को मजबूत किया।

राष्ट्रीय राजनीति में भी कॉमरेड सुरजीत एक दूरदर्शी रणनीतिकार और सिद्धांतनिष्ठ मार्क्सवादी नेता के रूप में जाने जाते हैं। लोकतांत्रिक एवं धर्मनिरपेक्ष शक्तियों को एक मंच पर लाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे सिद्धांतों से समझौता किए बिना जनता के व्यापक हितों के लिए राजनीतिक एकता बनाने में विश्वास रखते थे।

आज उनकी पुण्यतिथि पर हम संकल्प लेते हैं कि सांप्रदायिकता, अलगाववाद, फासीवादी प्रवृत्तियों और जनविरोधी नीतियों के विरुद्ध संघर्ष को और मजबूत करेंगे तथा उनके दिखाए मार्ग पर चलते हुए लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और समाजवाद के लिए अपनी लड़ाई जारी रखेंगे।

कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत अमर रहें!
लाल सलाम! 🚩

01/08/2026

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन जिंदाबाद

शहीद-ए-आज़म कॉमरेड ऊधम सिंह की 87वीं शहादत दिवस पर लाल सलाम! 🚩कॉमरेड उधम सिंह (राम मोहम्मद सिंह आजाद) को उनके 87वें बलिद...
31/07/2026

शहीद-ए-आज़म कॉमरेड ऊधम सिंह की 87वीं शहादत दिवस पर लाल सलाम! 🚩

कॉमरेड उधम सिंह (राम मोहम्मद सिंह आजाद) को उनके 87वें बलिदान दिवस पर शत-शत नमन। वे एक सच्चे देशभक्त कम्युनिस्ट थे। वे गदर पार्टी और भगत सिंह की हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन के सदस्य थे। उन्होंने जलियाँवाला बाग हत्याकांड के दोषी माइकल ओ'डायर को उसकी ही धरती पर मारकर शहीदों का बदला लिया।

26 दिसंबर 1899 को पंजाब के सुनाम में जन्मे ऊधम सिंह का बचपन अत्यंत कठिन परिस्थितियों में बीता। कम आयु में ही माता-पिता का निधन हो जाने के बाद वे अमृतसर के खालसा अनाथालय में पले-बढ़े। 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग़ नरसंहार ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। निहत्थे भारतीयों पर ब्रिटिश शासन द्वारा बरसाई गई गोलियों और सैकड़ों निर्दोष लोगों की हत्या ने उनके मन में साम्राज्यवाद के विरुद्ध गहरा आक्रोश पैदा किया। उन्होंने संकल्प लिया कि इस जघन्य अपराध के दोषियों को उनके अपराध का उत्तर अवश्य मिलेगा।

लगभग दो दशकों तक उन्होंने अनेक देशों की यात्राएँ कीं, क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े और भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत साथियों के साथ काम किया। वे गदर आंदोलन और अंतरराष्ट्रीय उपनिवेश-विरोधी विचारों से भी प्रभावित थे। अंततः 13 मार्च 1940 को लंदन के कैक्सटन हॉल में पंजाब के पूर्व लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ'डायर को गोली मारकर उन्होंने जलियांवाला बाग़ के शहीदों के प्रति अपनी ऐतिहासिक प्रतिज्ञा पूरी की। न्यायालय में उन्होंने निर्भीकता से कहा कि उन्होंने यह कार्य भारत की जनता पर हुए अत्याचारों के प्रतिरोध में किया है और उन्हें अपने कृत्य पर कोई पछतावा नहीं है।

ऊधम सिंह केवल एक प्रतिशोधी क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि वे सांप्रदायिक एकता और राष्ट्रीय एकजुटता के भी प्रबल प्रतीक थे। उन्होंने स्वयं को "राम मोहम्मद सिंह आज़ाद" नाम दिया, जो हिंदू, मुस्लिम और सिख समुदायों की साझा विरासत तथा भारत की धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भावना का प्रतीक था। उनका यह संदेश आज भी सांप्रदायिक विभाजन की राजनीति के विरुद्ध एक सशक्त प्रेरणा है।

31 जुलाई 1940 को फाँसी के फंदे को चूमते हुए उन्होंने हँसते-हँसते अपने प्राण मातृभूमि के नाम न्यौछावर कर दिए।

उन्होंने चार अलग-अलग महाद्वीपों (एशिया, यूरोप, अफ्रीका, अमेरिका) और कई देशों में काम किया और विभिन्न साम्राज्यवाद-विरोधी क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया। वे मजदूर वर्ग के अंतर्राष्ट्रीयवाद में विश्वास करते थे।

शहीद ऊधम सिंह अमर रहें!
इंक़लाब ज़िंदाबाद!
साम्राज्यवाद मुर्दाबाद! 🚩

समाजवाद : काल्पनिक (यूटोपियाई) और वैज्ञानिकइतिहास पर द्वंद्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) की पद्धति लागू करने...
31/07/2026

समाजवाद : काल्पनिक (यूटोपियाई) और वैज्ञानिक

इतिहास पर द्वंद्वात्मक भौतिकवाद (Dialectical Materialism) की पद्धति लागू करने पर यह तुरंत स्पष्ट हो जाता है कि मानव इतिहास के अपने नियम (laws) हैं, और इसलिए इसे एक प्रक्रिया (process) के रूप में समझा जा सकता है। विभिन्न सामाजिक-आर्थिक संरचनाओं (socio-economic formations) का उदय और पतन वैज्ञानिक रूप से इस आधार पर समझाया जा सकता है कि वे उत्पादन के साधनों (means of production) का विकास करने में कितनी सक्षम या असमर्थ थीं, और इस प्रकार वे मानव संस्कृति की सीमाओं का कितना विस्तार कर सकीं तथा प्रकृति पर मानव के नियंत्रण (domination) को कितना बढ़ा सकीं।

लेकिन वे कौन-से नियम हैं जो ऐतिहासिक परिवर्तन (historical change) को संचालित करते हैं? जिस प्रकार जीवन के विकास (evolution of life) के अपने अंतर्निहित (inherent) नियम हैं, जिन्हें पहले डार्विन (Darwin) ने और बाद के समय में आनुवंशिकी (Genetics) के अध्ययन में हुई तीव्र प्रगति ने और अधिक स्पष्ट किया, उसी प्रकार मानव समाज के विकास (evolution of human society) के भी अपने अंतर्निहित नियम हैं, जिनकी व्याख्या मार्क्स (Marx) और एंगेल्स (Engels) ने की।

The German Ideology, जो The Communist Manifesto से पहले लिखी गई थी, में मार्क्स लिखते हैं:

> "समस्त मानव इतिहास की पहली पूर्वधारणा (premise), निश्चित रूप से, जीवित मानव व्यक्तियों का अस्तित्व है। इसलिए सबसे पहला तथ्य जिसे स्थापित किया जाना चाहिए, वह इन व्यक्तियों का भौतिक संगठन (physical organisation) और उसके परिणामस्वरूप प्रकृति के शेष भाग के साथ उनका संबंध है। (...) मनुष्यों को पशुओं से चेतना, धर्म या किसी भी अन्य आधार पर अलग माना जा सकता है। लेकिन वे स्वयं को पशुओं से अलग करना तभी शुरू करते हैं जब वे अपने जीवन-निर्वाह (means of subsistence) के साधनों का उत्पादन करना शुरू करते हैं। यह एक ऐसा कदम है जो उनके भौतिक संगठन द्वारा निर्धारित होता है। अपने जीवन-निर्वाह के साधनों का उत्पादन करके मनुष्य अप्रत्यक्ष रूप से अपने वास्तविक भौतिक जीवन (actual material life) का उत्पादन करते हैं।"

बहुत बाद में लिखी गई पुस्तक Anti-Dühring में एंगेल्स ने इन विचारों को और अधिक विकसित रूप में प्रस्तुत किया। यहाँ हमें ऐतिहासिक भौतिकवाद (Historical Materialism) के मूल सिद्धांतों का अत्यंत उत्कृष्ट और संक्षिप्त विवेचन मिलता है:

> "इतिहास की भौतिकवादी अवधारणा (The materialist conception of history) इस सिद्धांत से आरंभ होती है कि मानव जीवन को बनाए रखने के साधनों (means) का उत्पादन, और उत्पादन के बाद उत्पादित वस्तुओं का विनिमय (exchange), समस्त सामाजिक संरचना (social structure) का आधार है। इतिहास में अस्तित्व में आए प्रत्येक समाज में संपत्ति (wealth) का वितरण तथा समाज का वर्गों (classes) या श्रेणियों (orders) में विभाजन इस बात पर निर्भर करता है कि क्या उत्पादन किया जाता है, उसका उत्पादन कैसे किया जाता है, और उत्पादित वस्तुओं का विनिमय किस प्रकार किया जाता है। इस दृष्टिकोण से, सभी सामाजिक परिवर्तनों (social changes) और राजनीतिक क्रांतियों (political revolutions) के अंतिम कारण मनुष्यों के मस्तिष्क में, या शाश्वत सत्य (eternal truth) और न्याय (justice) के बारे में उनकी बेहतर समझ में नहीं, बल्कि उत्पादन और विनिमय की पद्धतियों (modes of production and exchange) में होने वाले परिवर्तनों में खोजे जाने चाहिए।

रॉबर्ट ओवेन (Robert Owen), सेंट-साइमन (Saint-Simon) और फूरिये (Fourier) के काल्पनिक (यूटोपियाई) समाजवादी (Utopian Socialist) विचारों के विपरीत, मार्क्सवाद (Marxism) समाजवाद की एक वैज्ञानिक (scientific) अवधारणा पर आधारित है। मार्क्सवाद यह स्पष्ट करता है कि प्रत्येक समाज के विकास की कुंजी उत्पादक शक्तियों (productive forces) का विकास है, जिनमें श्रम (labour), उद्योग (industry), कृषि (agriculture), तकनीक (technique) और विज्ञान (science) शामिल हैं। प्रत्येक नई सामाजिक व्यवस्था (social system)—चाहे वह दास-प्रथा (slavery) हो, सामंतवाद (feudalism) हो या पूँजीवाद (capitalism)—ने उत्पादक शक्तियों के विकास के माध्यम से मानव समाज को आगे बढ़ाने का कार्य किया है।

ऐतिहासिक भौतिकवाद (Historical Materialism) का मूल सिद्धांत यह है कि मानव विकास का अंतिम स्रोत उत्पादक शक्तियों (productive forces) का विकास है। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण निष्कर्ष है, क्योंकि केवल इसी के आधार पर हम इतिहास की वैज्ञानिक अवधारणा (scientific conception of history) तक पहुँच सकते हैं। मार्क्सवाद का मानना है कि लाखों वर्षों में मानव समाज का विकास प्रगति (progress) का प्रतिनिधित्व करता है, इस अर्थ में कि इससे प्रकृति पर मानव का नियंत्रण बढ़ा है और इस प्रकार पुरुषों तथा महिलाओं के लिए वास्तविक स्वतंत्रता (genuine freedom) प्राप्त करने की भौतिक परिस्थितियाँ (material conditions) निर्मित हुई हैं। किंतु यह विकास कभी भी एक सीधी रेखा (straight line) में नहीं हुआ, जैसा कि विक्टोरियन युग (Victorians) के लोग—जो विकास (evolution) के बारे में एक सतही (vulgar) और अद्वंद्वात्मक (undialectical) दृष्टिकोण रखते थे—गलत रूप से मानते थे। इतिहास में केवल उन्नति (ascending line) ही नहीं होती, बल्कि अवनति (descending line) भी होती है।

यदि कोई भौतिकवादी दृष्टिकोण (materialist point of view) को अस्वीकार कर देता है, तो उसके पास ऐतिहासिक घटनाओं की प्रेरक शक्ति (motor force) के रूप में केवल व्यक्तियों—अर्थात् ‘महान पुरुषों’ (great men) (या महिलाओं)—की भूमिका ही बचती है। दूसरे शब्दों में, तब हमारे पास इतिहास की प्रक्रिया का केवल एक आदर्शवादी (idealist) और व्यक्तिपरक (subjectivist) दृष्टिकोण रह जाता है।

यही यूटोपियाई समाजवादियों (Utopian Socialists) का दृष्टिकोण था। यद्यपि उनके पास अत्यंत उत्कृष्ट अंतर्दृष्टियाँ (brilliant insights) थीं और उन्होंने तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था की गहन एवं तीखी आलोचना (penetrating criticism) की, फिर भी वे ऐतिहासिक विकास (historical development) के मूलभूत नियमों (fundamental laws) को समझने में असफल रहे। उनके लिए समाजवाद केवल एक ‘अच्छा विचार’ (good idea) था, अर्थात ऐसी चीज़ जिसे एक हजार वर्ष पहले भी सोचा जा सकता था या कल सुबह भी सोचा जा सकता है। यदि इसका आविष्कार एक हजार वर्ष पहले ही हो गया होता, तो मानवजाति को बहुत-सी कठिनाइयों (troubles) से बचाया जा सकता था!

इतिहास को उसके प्रमुख पात्रों (protagonists) की व्यक्तिपरक व्याख्याओं (subjective interpretations) के आधार पर समझना असंभव है। आइए, इसका एक उदाहरण लेते हैं।

प्रारंभिक ईसाई (Christians), जो हर क्षण संसार के अंत (End of the World) और मसीह (Christ) के दूसरे आगमन (Second Coming) की प्रतीक्षा करते थे, निजी संपत्ति (private property) में विश्वास नहीं रखते थे। अपने समुदायों में वे एक प्रकार के साम्यवाद (communism) का पालन करते थे (यद्यपि उनका साम्यवाद यूटोपियाई (utopian) प्रकार का था, जो उत्पादन (production) पर नहीं बल्कि उपभोग (consumption) पर आधारित था)। साम्यवाद के उनके प्रारंभिक प्रयोग किसी परिणाम तक नहीं पहुँचे और न ही पहुँच सकते थे, क्योंकि उस समय उत्पादक शक्तियों (productive forces) का विकास वास्तविक साम्यवाद (real communism) के विकास की अनुमति नहीं देता था।

अंग्रेज़ी क्रांति (English Revolution) के समय, ओलिवर क्रॉमवेल (Oliver Cromwell) पूरे विश्वास के साथ यह मानते थे कि वे प्रत्येक व्यक्ति के उस अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे हैं जिसके अनुसार वह अपनी अंतरात्मा (conscience) के अनुसार ईश्वर की प्रार्थना कर सके। लेकिन इतिहास की आगे की यात्रा ने सिद्ध कर दिया कि क्रॉमवेलीय क्रांति (Cromwellian Revolution) वास्तव में अंग्रेज़ी बुर्जुआ वर्ग (English bourgeoisie) के सत्ता तक पहुँचने की अजेय (irresistible) उन्नति का निर्णायक चरण (decisive stage) थी। सत्रहवीं शताब्दी (17th Century) के इंग्लैंड में उत्पादक शक्तियों के विकास की वास्तविक अवस्था किसी अन्य परिणाम की अनुमति ही नहीं देती थी।

1789–1793 की महान फ़्रांसीसी क्रांति (Great French Revolution) के नेताओं ने "स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व" (Liberty, Equality, Fraternity) के ध्वज के नीचे संघर्ष किया। उनका विश्वास था कि वे न्याय (Justice) और विवेक (Reason) के शाश्वत नियमों (eternal laws) पर आधारित एक व्यवस्था के लिए लड़ रहे हैं। किंतु उनकी इच्छाओं (intentions) और विचारों (ideas) की परवाह किए बिना, जैकोबिन (Jacobins) वास्तव में फ्रांस में बुर्जुआ वर्ग (bourgeoisie) के शासन का मार्ग प्रशस्त कर रहे थे। एक बार फिर, वैज्ञानिक दृष्टिकोण (scientific standpoint) से देखा जाए तो सामाजिक विकास (social development) के उस चरण में कोई दूसरा परिणाम संभव ही नहीं था।

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