15/10/2025
संघ नींव में ज्ञात - अज्ञात विसर्जित पुष्प श्रृंखला 65 =
श्री अनिल माधव दवे - बहुमुखी प्रतिभा के धनी अनिलजी दवे का जन्म 14 अक्टूबर 1956 ( आश्विन शुक्ल दशमी अर्थात् विजयादशमी ) को बडनगर जिला उज्जैन (मध्यप्रदेश) में हुआ था। अनिल जी पर उनके दादाजी श्री बद्रीलालजी दवे का विशेष प्रभाव था। उनके दादाजी कांग्रेस, जनसंघ और फिर संघ में सक्रिय रहे। बद्रीलालजी दवे मध्यप्रदेश जनसंघ के पहले अध्यक्ष रहे उसके बाद मध्यभारत प्रान्त संघचालक का दायित्व भी निभाया। संघ और जनसंघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता उनके घर आते रहते थे। अनिलजी के एक चाचाजी श्री केशवजी दवे भाजपा में संगठन मंत्री थे अतः बचपन से ही अनिलजी को ऐसे महान लोगों का प्रेम और आशीर्वाद मिला।
अनिलजी के पिताजी श्री माधवजी दवे रेल्वे विभाग में कार्यरत थे अतः अनिलजी की प्रारम्भिक शिक्षा पिताजी के साथ गुजरात के विभिन्न स्थानों पर हुई। विद्यार्थी जीवन में एन. सी. सी. में रूचि से भाग लेते थे। आप 8 वर्ष की उम्र में 1964 में स्वयंसेवक बन गये। आपने गुजराती कालेज इंदौर से ग्राम्य विकास एवं प्रबन्धन में एम काम की पढाई पूर्ण की तथा गुजराती कालेज में छात्रसंघ अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभाई। 1974 में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुए आन्दोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। कुछ समय नौकरी एवं उद्योग धंधों में हाथ आजमाने के पश्चात 1989 में वे संघ के प्रचारक बन गये। सर्वप्रथम उन्हें इंदौर में दायित्व दिया गया उसके पश्चात भोपाल विभाग प्रचारक की जिम्मेदारी दी गई। कुछ समय भोपाल विभाग प्रचारक के साथ प्रान्त स्तर का दायित्व भी निभाया। संकलन टोली के एक कार्यकर्ता जब 1985 में अनिल जी दवे के जन्म स्थान बड़नगर में विद्यार्थी विस्तारक थे तब से अनिल जी का उनको सानिध्य मिला करता था। अनिल जी हमेशा कहते थे कि जीवन में जो भी कार्य मिले तो उसे अपनी पूरी युक्ति, बुद्धि, शक्ति एवं क्षमताओं से पूर्ण करना चाहिए क्योंकि जीवन में उस कार्य को करने के लिए दूसरा मौका नही मिलता है।
अनिलजी काम के योजना पक्ष पर बहुत ध्यान देते थे। उनका यह गुण संघ के वरिष्ठ अधिकारियों के ध्यान में आया। उन दिनों मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। मुख्यमंत्री दिग्विजयसिंह संघ के घोर विरोधी थे, वहां भाजपा की सरकार बने इसके लिये एक योग्य एवं जुझारू नेता की आवश्यकता थी। सबका ध्यान साध्वी उमा भारती पर गया, उन्होंने जनसम्पर्क भी शुरू कर दिया परन्तु चुनाव में योजना का भी महत्व होता हैं अतः अनिलजी दवे को उनके साथ लगा दिया गया। परिणामस्वरूप 2003 में कांग्रेस का 10 साल का शासन धराशाही हो गया और उमा भारती को मुख्यमंत्री बना दिया गया। एक वर्ष बाद किन्हीं कारणों से उमा भारती को मुख्यमंत्री का पद छोडना पड़ा अतः अनिलजी केन्द्र की राजनीति में सक्रिय हो गये। उन्होंने गांव की चौपालों में सम्पर्क कर नर्मदा परिक्रमा, नर्मदा समग्र, नदी महोत्सव जैसे प्रकल्प शुरू किये। भोपाल में उनके निवास का नाम "नदी का घर" था। 2016 में केन्द्र में उन्हें पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की जिम्मेदारी दी गई। इससे पहले भी वे पर्यावरण संबंधी कई संसदीय समितियों के सदस्य रहे। वे विदेशी बीज, खाद, कीटनाशक आदि के बदले जैविक खेती तथा पर्यावरण संरक्षण में भारतीय परम्पराओं के समर्थक थे। वे बड़े दानवाकार बांधों का भी विरोध करते थे।
अनिलजी दवे शौकिया पायलट के साथ एक मौलिक लेखक एवं चिंतक भी थे। कुछ निबंध, कवितायें, सृजन से विसर्जन तक, नर्मदा समग्र, शताब्दी के पांच काले पन्ने, संभल के रहना अपने घर में छिपे हुए गद्दारों से, महानायक चन्द्रशेखर आजाद, रोटी और कमल की कहानी, समग्र ग्राम विकास, शिवाजी एवं सुराज, यस आई कैन : सो कैन वी उनकी लिखित किताबे हैं। कोपेनहेगन के विश्व पर्यावरण सम्मेलन से लौटकर उन्होंने बियांड कोपेनहेगन पुस्तक भी लिखी। नवरात्रि में वे प्रतिवर्ष उपवास एवं मौन रखते थे। भीषण हृदयरोग होने पर वे चुपचाप मुम्बई गये और फिर बड़े आपरेशन के बाद ही सबको बताया। यद्यपि इसके बाद वे काम में लग गए परन्तु रोग ने पीछा नहीं छोड़ा। वे मध्यप्रदेश से दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे पर राजनीति में होते हुए भी वे मन से प्रचारक ही थे। उन्होंने 2012 में ही अपनी वसीयत में लिख दिया था कि उनकी स्मृति में कोई स्मारक बनाने की बजाय वृक्ष, नदी और तालाबों का संरक्षण करें। 18 मई 2017 को दिल्ली में हृदयाघात से आपका स्वर्गवास हो गया। उनकी इच्छानुसार उनका अंतिम संस्कार नर्मदा के किनारे बांद्राभान नर्मदापुर में किया गया। इस प्रकार एक ओर पुष्प संघ नींव में विसर्जित हो गया।
।। भारत माता की जय।।
संदर्भ - हमारे प्रेरणा पूंज - लेखक महावीर सिंघल आगरा
संकलन - स्वयंसेवक एवं टीम