07/02/2018
सल्तनल काल में संगीत
जब तुर्क भारत में आये तो वे अपने साथ ईरान एवं मध्य एशिया के समृद्ध अरबी संगीत परम्परा को भी लाए। उनके पास कई नये वाद्ययंत्र थे, जैसे 'रबाब', और 'सारंगी'। तुर्क अपने साथ 'सारंगी' जैसे वाद्य को लाए, परन्तु यहाँ आकर उन्होंने 'सितार' और 'तबला' जैसे वाद्यों को भी अपनाया। दिल्ली सल्तनत के कुछ शासक, जैसे- बलबन, जलालुद्दीन ख़िलजी, अलाउद्दीन ख़िलजी एवं मुहम्मद तुग़लक़ ने संगीत के प्रति रुचि होने के कारण राज दरबारों में संगीत सभाओं का आयोजन करवाया। ग़यासुद्दीन तुग़लक़ संगीत का विरोधी था। सिकन्दर लोदी शहनाई सुनने का शौक़ीन था। इस काल में सूफ़ी सन्तों ने भी संगीत के विकास में योगदान किया। शेख़ मुइनुद्दीन चिश्ती के अनुसार- “संगीत आत्मा के लिए पौष्टिक आहार है”। बलबन का पुत्र 'बुगरा ख़ाँ' महान् संगीत प्रेमी था। बलबन का पौत्र कैकुबाद सर्वाधिक संगीत प्रेमी सुल्तान था। बर्नी ने इसके बारे में लिखा है कि- ‘कैकूबाद ने संगीतकारों एवं गजल गायकों को इतनी अधिक संख्या में संरक्षण प्रदान किया कि, राजधानी की गलियाँ तथा सड़कें इनसें भरी हुई थीं।
संगीत को संरक्षण
बरनी ने इस समय के मशहूर संगीतकारों 'शाहचंगी', 'नुसरत ख़ातून' एवं 'मेहर अफ़रोज का उल्लेख किया है। अलाउद्दीन ख़िलजी के दरबार में तत्कालीन महान् कवि एवं संगीतज्ञ अमीर ख़ुसरो को संरक्षण प्राप्त था। अमीर ख़ुसरो ने भारतीय एवं इस्लामी संगीत शैली के समन्वय से अनेक यमन उसाक, मुआफिक, धनय, मुंजिर, फ़रगना जैसे राग-रागनियों को जन्म दिया। उसने दक्षिण के महान् गायक 'गोपाल नायक' को अपने दरबार में आमंत्रित किया था। इस काल में प्रचलित 'ख्याल गायकी' के अविष्कार का श्रेय जौनपुर के सुल्तान हुसैन शाह शर्की को दिया जाता है। संगीत के क्षेत्र में उपलब्धि के कारण इसे ‘नायक’ की उपाधि प्राप्त हुई थी। मालवा का शासक बाज बहादुर संगीत में रुचि रखता था। कव्वाली गायन शैली का प्रचलन भी सल्तनत काल में ही प्रारम्भ हुआ। सल्तनत काल में अनेक वाद्ययंत्र जैसे 'रबाब', 'सारंगी', 'सितार' तथा 'तबला' का प्रचलन था।
अमीर ख़ुसरो
मुख्य लेख : अमीर ख़ुसरो
अमीर ख़ुसरो को सितार और तबले के अविष्कार का श्रेय दिया जाता था। मध्यकालीन संगीत परम्परा के आदि संस्थापक अमीर ख़ुसरों थे। सर्वप्रथम उन्होंने भारतीय संगीत में कव्वाली गायन को प्रचलित किया। अमीर ख़ुसरों को ‘तूतिये