02/09/2026
हिंदुत्व और इतिहास पर अज्ञानता
आजकल सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर हर कोई हिंदुत्व, परंपराओं और भारतीय इतिहास पर बिना किसी अध्ययन या समझ के राय बाँटता फिर रहा है। विडंबना यह है कि जिनका सनातन संस्कृति और इसके मूल्यों से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं है, वे भी इस पर विशेषज्ञ बनने का ढोंग कर रहे हैं।
जौहर की ऐतिहासिक सच्चाई और वीरांगनाएँ
आज एक नर्तकी जौहर पर प्रवचन दे रही थी और दावा कर रही थी कि महिलाओं को कभी आगे बढ़ने नहीं दिया गया और उन्हें युद्ध का प्रशिक्षण नहीं दिया गया। अगर ऐसा था, तो झांसी की रानी कहाँ से आईं? बोलने से पहले थोड़ा सोच लो कि तुम क्या कह रही हो। तुम जौहर का मतलब जानती ही क्या हो? जिन लोगों के खिलाफ जौहर किया गया था, आज तुम उन्हीं के आगे उठाती हो।
और तो और आज एक मौलवी भी कह रहा था कि जब तक औरतें बाहर निकलेंगी, तब तक उनके साथ बलात्कार होता रहेगा। पहले उनसे पूछो: क्या तुम क़ैद में रहना चाहती हो, या उन दुष्टों को कड़ी सज़ा दिलाना चाहती हो, या इस्लामी क़ानून लागू करना चाहती हो? तुम जैसे तथाकथित बुद्धिजीवियों को सुनकर मेरा सिर चकरा गया है। तुम लोग आपस में ही तय कर लो कि तुम असल में चाहते क्या हो। एक तरफ तुम्हारा धार्मिक क़ानून कहता है कि औरतों को घर के अंदर रहना चाहिए, और दूसरी तरफ तुम कहती हो कि औरतों को उन लोगों से लड़ने की आज़ादी नहीं दी गई जिन्होंने उन्हें जौहर करने पर मजबूर किया।
कला और मनोरंजन से जुड़े कुछ लोग इतिहास की जटिल और संवेदनशील घटनाओं—जैसे जौहर—पर बेबुनियाद बयानबाज़ी कर रहे हैं। यह दावा करना पूरी तरह ऐतिहासिक अज्ञानता है कि भारतीय समाज में महिलाओं को कभी आगे बढ़ने नहीं दिया गया या उन्हें युद्ध कौशल नहीं सिखाया गया। यदि ऐसा था, तो रानी लक्ष्मीबाई, रानी दुर्गावती, कित्तूर चेन्नम्मा और वेलु नाचियार जैसी अनगिनत वीरांगनाएँ कहाँ से आईं?
जौहर कोई उत्पीड़न या लाचारी नहीं थी, बल्कि विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा किए जाने वाले अमानवीय अत्याचारों, लूट और शील हरण से अपने स्वाभिमान और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए उठाया गया एक असाधारण और सर्वोच्च बलिदान था।
इतिहास के इस गहरे दर्द और बलिदान को समझे बिना सतही टिप्पणी करना न केवल उन वीरांगनाओं का अपमान है, बल्कि अपनी ही विरासत को भूलने जैसा है।
रूढ़िवादिता और महिलाओं की सुरक्षा पर दोहरा मापदंड
दूसरी तरफ, कुछ कट्टरपंथी सोच वाले लोग आज भी यह दलील देते हैं कि यदि महिलाएँ घर से बाहर निकलेंगी तो उनके साथ अपराध और बलात्कार होंगे। यह मानसिकता अपराध को रोकने के बजाय पीड़िता को ही दोषी ठहराने की कोशिश करती है।
क्या समाधान महिलाओं को घरों में क़ैद कर देना है, या फिर अपराधियों और दरिंदों को ऐसा कड़ा दंड देना है जो एक मिसाल बन सके?
एक तरफ कुछ धार्मिक व्यवस्थाएँ महिलाओं को चारदीवारी में बंद रखने की वकालत करती हैं, और दूसरी तरफ वही लोग यह सवाल उठाते हैं कि इतिहास में महिलाओं को स्वतंत्रता क्यों नहीं मिली।
यह दोहरा चरित्र पूरी तरह हास्यास्पद है। जो लोग इतिहास और आधुनिक समाज दोनों पर उपदेश देते हैं, उन्हें पहले अपनी सोच का विरोधाभास सुलझाना चाहिए। जब तक समाज अपराधियों के खिलाफ सख्त और निष्पक्ष रुख नहीं अपनाएगा, तब तक महिलाओं की वास्तविक सुरक्षा और सम्मान संभव नहीं है।
जय हिन्द जय भारत
वंदे मातरम्