25/07/2020
यदि मैं कभी बॉलीवुड में फ़िल्म बनाऊँ तो उसमें नाग पंचमी के दिन मनाया जाने वाला गुड़िया का त्योहार ज़रूर दिखाऊँ.
एक ज़माने में साल भर इंतज़ार होता था गुड़िया त्योहार का. सबेरे से ही गाँव के बाहर कोने में प्रधान जी टाइप के लोग दंगल के लिए ज़मीन खुदवाने लगते थे. इधर गली मुहल्ले के लड़कों में साल भर प्रतिस्पर्धा रहती थी दंगल जीतने की. अमीर ग़रीब, बच्चा बूढ़ा, ब्राह्मण ठाकुर तेली मोची सब बिना भेद भाव के दस बजे के आस पास से दंगल में एकत्रित हो जाते थे. और फिर चालू होता दंगल. सब कुश्ती लड़ते थे अपनी अपनी आयु और सेहत के अनुसार. कई बार तो एक ही अखाड़े में चार पाँच कुश्ती चलने लगती. बढ़िया लड़ने वालों को हाथ के हाथ नगद पुरुष्कार.
उधर दूसरी ओर लड़कियाँ घर में गुड़िया बनाती. रंग बिरंगी किलकारी मारती गुड़िया. फिर सारी लड़कियाँ एक ही जगह एकत्रित होती और यह गुड़िया रास्ते में डाल दी जातीं. लड़के दंगल लड़ने के पश्चात दोपहर जब वापसी कर रहे होते तो डंडे/ नीम के डँठल आदि से इन गुड़िया की ख़ूब पिटाई करते. नेपथ्य से लड़कियाँ मधुर स्वर में लोक गीत वाली गालियाँ सुनाती.
तीसरी ओर घर में ग्रहणियाँ खाने की तैयारी कर रही होती. साल के सबसे बड़े त्योहार में यह त्योहार होता था. ग़रीबी बहुत थी. दंगल लड़ने के पश्चात लड़के थक गए होंगे, उन्हें बढ़िया खाने की ज़रूरत है तो शानदार भोजन बनता. पूरी, सब्ज़ी, पनीर वाला. अधिसंख्य घरों में ऐसा शानदार भोजन केवल गुड़िया में ही बनता था.
खाने के पश्चात सब घर से बाहर निकलते. सावन का महीना है, हर घर के बाहर पेंड़ होते थे, हरियाली छाई होती थी और रस्से में लकड़ी का बड़ा पटरा बाँध झूला टंगा होता था. झूले पर तीन चार लोग बैठते और दो लोग पैंगे मारते. बैठे हुवे लोग गाना गाकर पैंग मारने वालों का उत्साह वर्धन करते. हँसी, किलकारी से पूरा माहौल गुंजाय मान हो उठता.
अब गाँव गाँव में पैसे आ गए, प्रगति हो गई, दारू के ठेके आ गए, लेकिन वह किलकारी, वह संगीत, वह सभ्यता विलुप्त हो गई. समाज जातियों में बँट गया. फ़ेमिनिस्ट आ गए जिन्हें गुड़िया का पीटा जाना नारीवादी अधिकारों का हनन लगने लगा. सावन के झूले अब बस वही पार्क में एक बच्चे के झूला झूले जाने जैसे हो गए. गाँवों के घर छोटे होने लगे, हरियाली ग़ायब होने लगी. घर के बाहर खुली जगह, पेंड़ बचे नहीं. सामान्य जीवन में झूम कर गाया जाने वाला लोक संगीत विलुप्त हो गया. बच्चे मिट्टी में खेलने से डरने लगे. निहसंदेह मनुष्य ने बीते दसकों में बहुत पाया है तो गँवाया भी बहुत है.