शैलेन्द्र

शैलेन्द्र Political conversation

12/08/2026

#वचन की मर्यादा और राजनीति!
“रघुकुल रीति सदा चली आई।
प्राण जाए पर वचन न जाई॥”
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वचन देना बहुत आसान है, लेकिन वचन की मर्यादा निभाना ही व्यक्ति के चरित्र की असली पहचान है। राजनीति में आज सत्य, सनातन और मर्यादा की बातें करने वालों की कमी नहीं है, लेकिन जब व्यक्तिगत स्वार्थ सामने आता है तो सिद्धांत और आदर्श अक्सर सुविधानुसार बदलते दिखाई देते हैं।

भेष-भूषा और धार्मिक प्रतीकों से कोई राम का अनुयायी नहीं बन जाता। भगवान राम का जीवन हमें सिखाता है कि वचन परिस्थिति देखकर नहीं, धर्म और सत्य को सामने रखकर निभाया जाता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम राम का नाम केवल राजनीतिक लाभ के लिए न लें, बल्कि उनके आदर्शों को अपने आचरण में भी उतारें। असहमति हो सकती है, राजनीतिक विचार अलग हो सकते हैं, लेकिन सत्य को स्वार्थ के तराजू पर तौलना और गलत को अनर्गल तर्कों से सही साबित करना मर्यादा का मार्ग नहीं है।

राम को मानने का अर्थ केवल जय श्रीराम कहना नहीं, बल्कि राम के आचरण से सीखना भी है।

राजनीति में पद और सत्ता स्थायी नहीं हैं, लेकिन वचन, चरित्र और मर्यादा की पहचान लंबे समय तक रहती है।

राम नाम की राजनीति करने से पहले, राम की मर्यादा को जीना सीखना होगा।

10/08/2026

मनुष्य जन्म—पुण्य का फल या चेतना की सजा?
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कहते हैं, मनुष्य जन्म बड़े पुण्यों के बाद मिलता है। लेकिन कभी जीवन की भीड़ से अलग खड़े होकर सोचिए—क्या यह सचमुच पुरस्कार है?

जिस प्राणी को कल की कोई खबर नहीं, वह आज में पूरा जीवन जी लेता है। और जिसे कल का ज्ञान नहीं, वह आज भी कल की चिंता में खोया रहता है। यही मनुष्य की विडंबना है।

पशु के पास न बैंक बैलेंस है, न भविष्य की योजना, न प्रतिष्ठा की चिंता। फिर भी वह अपनी भूख मिटाकर, अपने बच्चों के साथ कुछ क्षण बिताकर और रात को चैन से सोकर जीवन पूरा कर लेता है। मनुष्य के पास महल है, साधन हैं, सुविधाएं हैं, लेकिन नींद के लिए दवा और सुकून के लिए बहाने खोजने पड़ते हैं।

मनुष्य की सबसे बड़ी पीड़ा अभाव नहीं, अधिक सोचने की आदत है। वह उस घटना को भी बार-बार जीता है जो बीत चुकी है और उस संकट से भी डरता है जो अभी आया ही नहीं। उसके पास आज होता है, लेकिन उसका मन या तो कब्र में दफन अतीत में रहता है या अभी जन्म भी न लिए भविष्य में।

शायद इसलिए मनुष्य जन्म को केवल पुण्य का फल कहना अधूरा है। यह एक परीक्षा भी है—इच्छाओं की, अहंकार की, रिश्तों की और सबसे बढ़कर अपने मन की।

संभव है कि कर्मों का हिसाब सचमुच इसी जन्म में चुकाना पड़ता हो। लेकिन शायद प्रकृति ने मनुष्य को एक अतिरिक्त अवसर भी दिया है—दुख को समझने का, स्वयं को बदलने का और उस जीवन को सचमुच जीने का, जिसे पाने के लिए हम जन्म लेते हैं।

क्योंकि अंत में सवाल यह नहीं होगा कि हमने कितना पाया; सवाल सिर्फ इतना होगा—जो जीवन मिला था, क्या हमने उसे जिया भी था?

08/08/2026

CBG की असली ताकत गांव की पंचायतों में छिपी है.
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भारत की ऊर्जा जरूरतों का समाधान केवल बड़े उद्योगों और महानगरों में खोजने की भूल अब छोड़नी होगी। कंप्रेस्ड बायो गैस यानी CBG के क्षेत्र में भारत की सबसे बड़ी ताकत उसके गांवों और खेतों में है—और इस ताकत को संगठित करने की सबसे महत्वपूर्ण संस्था ग्राम पंचायत हो सकती है।

भारत में हर वर्ष करोड़ों टन कृषि अवशेष, गोबर और जैविक कचरा पैदा होता है। उपलब्ध जैविक संसाधनों से लगभग 6.2 करोड़ टन सालाना CBG उत्पादन की सैद्धांतिक क्षमता बताई जाती है। इसके बावजूद वास्तविक उत्पादन अभी बहुत कम है। यह अंतर बताता है कि समस्या संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि उन्हें व्यवस्थित ढंग से जुटाने की है।

यहीं पंचायतों की भूमिका निर्णायक हो जाती है। प्रत्येक पंचायत अपने क्षेत्र में पराली, गोबर, कृषि अवशेष और जैविक कचरे का स्थानीय सर्वेक्षण कर सकती है। किसानों से अवशेष खरीदने, संग्रह केंद्र बनाने, परिवहन की व्यवस्था करने और CBG संयंत्रों के लिए भूमि उपलब्ध कराने में पंचायतें केंद्रीय भूमिका निभा सकती हैं। इससे किसान को पराली जलाने के बजाय उसकी कीमत मिलेगी और गांव के कचरे को आर्थिक संसाधन बनाया जा सकेगा।

पंचायत आधारित CBG मॉडल केवल ऊर्जा पैदा नहीं करेगा; यह गांव में रोजगार, किसानों की अतिरिक्त आय, स्वच्छता और जैविक खाद का नया आर्थिक चक्र भी तैयार कर सकता है। छोटे-छोटे स्थानीय संयंत्र बड़े केंद्रीकृत संयंत्रों की तुलना में कच्चे माल के परिवहन की लागत भी घटा सकते हैं।

जरूरत है कि केंद्र और राज्य सरकारें पंचायतों को केवल योजनाओं के क्रियान्वयन की एजेंसी न मानें, बल्कि उन्हें स्थानीय ऊर्जा प्रबंधन की संवैधानिक इकाई के रूप में सशक्त करें। वित्त, तकनीक, प्रशिक्षण और बाजार की गारंटी पंचायतों तक पहुंचनी चाहिए।

CBG की सफलता बड़े संयंत्रों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि कितने गांव अपनी पराली और कचरे को ऊर्जा में बदलकर आत्मनिर्भर बन पाए। यदि पंचायत जागी, तो गांव बदलेगा; गांव बदला तो भारत की ऊर्जा तस्वीर भी बदल सकती है।

 #चिल्लूपार में बदलाव के नए राजनीतिक समीकरण :---------------------------------सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं के अनुसार, य...
06/08/2026

#चिल्लूपार में बदलाव के नए राजनीतिक समीकरण :
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सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं के अनुसार, यदि #अस्मिता चंद जी बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) से चिल्लूपार विधानसभा की प्रत्याशी बनती हैं, तो यह सिर्फ एक राजनीतिक घोषणा नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए नई उम्मीद होगी जो वर्षों से सम्मान, सामाजिक न्याय और ईमानदार नेतृत्व की तलाश में हैं।

बीएसपी ने हमेशा समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को ताकत देने का काम किया है। लेकिन यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि कई नेताओं ने जनता के वोट और पार्टी के विश्वास से जीत हासिल करने के बाद अपने निजी स्वार्थ के लिए पार्टी छोड़ दी। इससे सबसे अधिक पीड़ा उन समर्पित कार्यकर्ताओं और समर्थकों को हुई, जिन्होंने पूरे मन से संघर्ष किया था।

ऐसे में अस्मिता चंद जी से विनम्र आग्रह है कि यदि पार्टी आप पर विश्वास जताती है और जनता आपको अपना आशीर्वाद देती है, तो उस विश्वास को जीवनभर निभाइए। राजनीति केवल पद और सत्ता का माध्यम नहीं, बल्कि जनसेवा, सिद्धांत और सामाजिक परिवर्तन का संकल्प है।

चिल्लूपार की जनता आज ऐसे नेतृत्व की प्रतीक्षा कर रही है जो हर सुख-दुख में उनके साथ खड़ा रहे, अपने #वचन पर अडिग रहे और क्षेत्र के विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दे।

अस्मिता चंद जी को अग्रिम शुभकामनाएँ।
उम्मीद है कि आप विश्वास, निष्ठा और जनसेवा की एक नई मिसाल कायम करेंगी।

04/08/2026

भाजपा का कांग्रेसीकरण या सत्ता के चरित्र में बदलाव?
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कभी भाजपा की राजनीति की पहचान थी—संगठन, अनुशासन, जवाबदेही और व्यवस्था परिवर्तन का वादा। लेकिन आज सत्ता के कई स्तरों पर जो तस्वीर दिखाई दे रही है, वह गंभीर आत्ममंथन की मांग करती है। विभागीय भ्रष्टाचार की शिकायतें, प्रशासनिक लापरवाही, अधिकारियों की मनमानी और जनता की समस्याओं के प्रति जनप्रतिनिधियों का उदासीन रवैया धीरे-धीरे उस भरोसे को कमजोर कर रहा है, जो वर्षों की राजनीतिक मेहनत से अर्जित हुआ था।

सवाल यह नहीं है कि भाजपा कांग्रेस जैसी हो गई है या नहीं; असली सवाल यह है कि क्या भाजपा उस राजनीतिक संस्कृति से दूर होती जा रही है, जिसके कारण जनता ने उसे कांग्रेस के विकल्प के रूप में स्वीकार किया था?

आज आम नागरिक को भाषण नहीं, समाधान चाहिए। युवा को आश्वासन नहीं, रोजगार और अवसर चाहिए। व्यापारी को दिखावटी सुविधाएं नहीं, सरल और पारदर्शी व्यवस्था चाहिए। किसान और गरीब को योजनाओं की घोषणाएं नहीं, उनका वास्तविक लाभ चाहिए।

सबसे चिंताजनक बात युवाओं में बढ़ता असंतोष है। जिस युवा पीढ़ी ने परिवर्तन के सपने के साथ भाजपा का समर्थन किया, यदि वही व्यवस्था से निराश होने लगे तो यह केवल सरकार के लिए नहीं, पूरे राजनीतिक संगठन के लिए चेतावनी है।

भाजपा के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं, अपनी ही कार्यशैली और जनप्रतिनिधियों के व्यवहार को सुधारने की है। सत्ता में रहकर जनता से दूरी बनाना किसी भी दल के लिए आत्मघाती साबित हो सकता है।

जनता चुप जरूर है, लेकिन वह देख रही है, समझ रही है और मूल्यांकन कर रही है। चुनाव के समय उसका फैसला केवल नारों पर नहीं, बल्कि पांच वर्षों के अनुभव पर होगा।

सत्ता का अहंकार जितनी तेजी से बढ़ता है, जनता का धैर्य उतनी ही तेजी से समाप्त होता है।

(एक विचारात्मक लेख)

शिव की नगरी काशी … श्रावण का दिव्य संदेश-----—-------------------------जब गंगा की लहरें हर-हर महादेव का स्वर सुनाती हैं,...
03/08/2026

शिव की नगरी काशी … श्रावण का दिव्य संदेश
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जब गंगा की लहरें हर-हर महादेव का स्वर सुनाती हैं, जब काशी की गलियों में श्रद्धा का दीप जलता है, जब बाबा श्री काशी विश्वनाथ के दरबार में लाखों शीश एक साथ झुकते हैं—तब अनुभव होता है कि श्रावण केवल एक मास नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की जीवंत अनुभूति है।

यह वही पावन समय है जब श्रद्धा, सेवा, संयम और भक्ति जीवन का उत्सव बन जाते हैं। बाबा विश्वनाथ के दर्शन और जलाभिषेक का सौभाग्य भक्तों के लिए आध्यात्मिक आनंद का प्रतीक माना जाता है। काशी हमें यह संदेश देती है कि जीवन का वास्तविक वैभव धन में नहीं, बल्कि विश्वास, विनम्रता और ईश्वर से जुड़े रहने में है।

इस पावन श्रावण में प्रार्थना है कि बाबा श्री काशी विश्वनाथ आपके जीवन से हर बाधा दूर करें, आपके मन में अटूट विश्वास, परिवार में प्रेम, कर्म में सफलता और जीवन में सुख-समृद्धि का अखंड प्रकाश भर दें। माँ गंगा आपके विचारों को निर्मल करें और माँ अन्नपूर्णा आपके घर को सुख, शांति एवं संपन्नता से परिपूर्ण रखें।

काशी की कृपा, गंगा का आशीष और महादेव का स्नेह—यही श्रावण का सबसे बड़ा प्रसाद है।

हर हर महादेव!
आप एवं आपके परिवार को पावन श्रावण मास की शिवमय, मंगलमय एवं कल्याणमय शुभकामनाएँ।

02/08/2026

आज की युवा पीढ़ी के हाथों में केवल तकनीक नहीं, बल्कि भारत का भविष्य भी है। आधुनिकता को अपनाइए, पर अपनी संस्कृति, मर्यादा और इतिहास को कभी मत भूलिए। यह वही भूमि है जिसने कभी अखंड भारत की सांस्कृतिक चेतना के माध्यम से विश्व को ज्ञान, अध्यात्म और मानवता का मार्ग दिखाया था। इतिहास हमें गौरव के साथ यह भी सिखाता है कि जब समाज अपनी पहचान, एकता और राष्ट्रीय चेतना से दूर होता है, तब विभाजन और दुर्बलता जन्म लेती है।

आज आवश्यकता किसी के प्रति वैमनस्य की नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों, राष्ट्रप्रेम और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति जागरूक होने की है। अपने और पराए का भेद राष्ट्रहित, चरित्र और कर्तव्य के आधार पर समझना होगा।

याद रखिए, देश की दिशा और दशा अब आपके निर्णयों से तय होगी। यदि आज का युवा अपने इतिहास से प्रेरणा लेकर एकता, अनुशासन और राष्ट्र निर्माण का संकल्प ले, तो भारत पुनः विश्व में अपनी गौरवपूर्ण पहचान को और अधिक सशक्त बना सकता है।

31/07/2026

#राजनीति के लिए आस्था का मजाक क्यों?
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राजनीतिक विरोध लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन क्या सत्ता के विरोध में करोड़ों लोगों की आस्था और विश्वास को भी मजाक का विषय बना दिया जाएगा? आज दिनांक 31 जुलाई 2026 को संसद परिसर में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और उनके सहयोगियों द्वारा जिस तरह आस्था से जुड़े विषय का मंचन किया गया, वह केवल राजनीतिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि जनभावनाओं के प्रति असंवेदनशीलता का उदाहरण है।

किसी आयोजन में प्रशासनिक चूक हुई हो, व्यवस्था में कमी रही हो या किसी स्तर पर अनियमितता हुई हो, तो उसकी जांच होनी चाहिए और दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन प्रशासनिक चूक और आस्था के बीच अंतर समझना जरूरी है। चूक व्यवस्था की हो सकती है, आस्था करोड़ों लोगों की होती है।

राहुल गांधी और उनके राजनीतिक सहयोगियों को सरकार पर हमला करने के लिए अनेक मुद्दे मिल सकते हैं, लेकिन धर्म और आस्था को राजनीतिक तमाशे में बदलना न तो लोकतांत्रिक परिपक्वता है और न ही विपक्ष की गरिमा के अनुरूप।

हिन्दुस्तान की पहचान केवल उसकी संसद, सरकार और राजनीतिक दलों से नहीं, बल्कि उसकी गहरी सांस्कृतिक चेतना और करोड़ों लोगों के विश्वास से भी है। उस विश्वास का उपहास किसी एक दल या व्यक्ति का अपमान नहीं, बल्कि उन करोड़ों नागरिकों की भावनाओं का अपमान है।

राजनीति में आरोप लगाइए, सवाल पूछिए, सरकार को घेरिए—लेकिन आस्था का मजाक बनाकर नहीं। क्योंकि सत्ता बदलती रहती है, राजनीतिक चेहरे बदलते रहते हैं, लेकिन जनआस्था किसी राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं होती।
(एक विचारात्मक लेख)

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