Haye Karbala Wale

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 -E-Barsi  Abida Begum ( Zakko Baji) -Binte- Hamid Hussain  # Aali Janab Maulana Javed Abidi Sahab Qibla (Former Ministe...
26/05/2024

-E-Barsi
Abida Begum ( Zakko Baji) -Binte- Hamid Hussain
# Aali Janab Maulana Javed Abidi Sahab Qibla (Former Minister UP Government)
Azadari
Marhoom Hamid Hussain Abidi Sahab

Aap Hazrat se Shirqat ki Guzarish

16/08/2017
20/12/2015

Aap sabhi ko Eid~e~Zehra mubarak ho

17/12/2015

शेख़ इब्राहीम ज़कज़की को किस तरह बेरहमी से गिरफ़्तार किया मलऊनों ने आप सबने देखा होगा। वे तस्वीरें शदीद दर्दनाक हैं और हम सही नहीं समझते उनको यहाँ डालना।
याद रखें आज का दुश्मन 1400 साल पहले के दुश्मन से कम बेरहम नहीं है जिसने मौला हुसैन का सर कलम किया था और उनके लाशे को पामाल किया था।
शेख़ की ज़ख़्मी हाल में गिरफ़्तारी की तस्वीर हमारे क़रीबी दोस्तों से आई है और हक़ीक़ी सूरत ए हाल बयान कर रही है।
याद रखें ऐ भाइयों बहनों, बुज़ुर्गो, जवानों।
1400 साल पहले की करबला में और आज के दौर में फ़र्क़ न करना।
शुहदा ए करबला की अज़मत यक़ीनन सबसे आला है और उनका कोई बराबर नहीं।
लेकिन आज यहाँ हमें करबला की राह पे फिर लाकर खड़ा किया जाता है रोज़ाना।
रोज़ाना हुसैन के ज़िम्मेदार शियों को मौत या ज़िल्लत की ज़िन्दगी की दो राहों में से एक राह चुनने कहा जाता है।
कल मौला हुसैन और उनके असहाब तन्हा क़त्ल कर दिए गए क्योंकि लोगों ने आख़री मौके पर पीठ दिखा दी।
1200 साल से मौला साहेब अल अस्र (अ) परदा ए ग़ैबत में क्यों हैं?
क्योंकि ज़हूर की निशानियाँ नहीं पूरी हो रही हैं????
अल्लाहोअकबर।
नहीं!!!!
इमाम परदा ए ग़ैबत में हैं क्योंकि वे जो उनको ख़त लिख कर दावत दे रहे हैं कि मौला आइये ज़हूर कीजिये, दर हक़ीक़त अभी भी तैय्यार नहीं हैं, अफ़सोस है कि अब भी हमारे "अल-अजल" के ख़त में ख़ुलूस नहीं है।
क्या मौला साहेब अज़-ज़मान आएँ और दुश्मन उनके साथ भी करबला दोहराए और कूफ़ा की कड़वी याद फिरसे ताज़ा हो जाए?
ज़हूर की निशानियाँ आसमान और चाँद सितारों में नहीं हैं।
आपने गिरेबान में झाँक कर देखिए। क्या हम इमाम की नुसरत के लिए तैयार हैं?
ज़हूर की निशानी हमारे गिरेबान में है।

29/11/2015

जो लोग यज़ीद को मुसलमान कहते है वही लोग आतंकवादी है :
ज़ाकिरे अहलेबैत हसनैन नक़वी
क़स्बा मुस्तफाबाद ऊंचाहार में जनाब हैदर मेहदी साहब के अज़ाखाने में एक मजलिसे अज़ा मुनअक़िद हुई जिसमे सोज़ख़ानी जनाब ओवैस नक़वी और अज़ादार हुसैन साहब ने की और मजलिस को ज़ाकिरे अहलेबैत जनाब मोहम्मद हसनैन साहब ने ख़ेताब किया अपनी तक़रीर में आतंकवाद की मज़म्मत करते हुए कहा कि जो लोग यज़ीद और ISIS जैसे गिरोहों को मुसलमान मानता है वही असल में दहशतगर्द है वरना इस्लाम तो अम्न का मज़हब है, आज पूरी दुनिया इंटरनेट पे फेसबुक पे गूगल पे अख़बारो में और भी कई तरीक़ों से आतंकवाद, ज़ुल्म, दहशतगर्दी के खेलाफ़ लोग एहतेजाज कर रहे है, अगर मुसलमान अपने आपको बेगुनाह साबित करना चाहता है तो हर फ़िरक़े के मुसलमान को एक साथ मिल के ज़ुल्म और आतंकवाद के खेलाफ़ आवाज़ उठानी पड़ेगी और अगर मुसलमान ऐसा नही करेगा तो यूही पूरी दुनिया में बदनाम और रुसवा होता रहेगा और इसी आतंकवाद के खेलाफ़ कर्बला के मैदान में हज़रत इमाम हुसैन ने आवाज़ उठाई मजलिस के आखिर में हज़रत अब्बास के मसाएब बयान किया

29/11/2015

चेहलुम के महत्व का रहस्य क्या है? सिर्फ यही कि शहीद की शहादत को चालीस दिन हो गए, इसमें क्या खास बात है? अगर इतिहास में यह महान शहादत तो अंजाम पा जाती लेकिन बनी उमय्या इसमें सफल हो जाते कि जिस तरह उन्होंने देखने में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और उनके सभी साथियों को मार डाला था और उनके पाक जिस्मों को मिट्टी के नीचे छुपा दिया था, उनकी याद को भी उस युग और आइंदा पीढ़ियों के दिलों से मिटा देते तो क्या इस स्थिति में इस शहादत का इस्लाम को कोई फ़ायदा पहुंचता?चेहलुम के महत्व का रहस्य क्या है?केवल यही कि शहीद की शहादत को चालीस दिन हो गए तो इसका क्या फ़ायदा है? चेहलुम की विशेषता यह है कि चेहलुम के दिन इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत की याद ताज़ा हो गई और यह बात बहुत महत्वपूर्ण है। मान लें कि अगर यह महान शहादत इतिहास में अंजाम पा जाती यानी हुसैन इब्ने अली और बाकी शहीद करबला में जामे शहादत पी लेते लेकिन बनी उमय्या केवल इतना करने में सफल हो जाते कि जिस तरह से उन्होंने इमाम हुसैन (अ) और उनके साथियों व रिश्तेदारों को बेदर्दी से मार दिया था उनके पाक जिस्मों को मिट्टी में छिपा दिया था इसी तरह उनकी याद को भी दुनिया भर के इंसानों के दिलों से भुला देते तो ऐसी स्थिति में इस्लाम को इस शहादत से क्या फायदा पहुंचता? या अगर उस दौर में कुछ असर होभी जाता तो क्या इतिहास में इस घटना को बाद की पीढ़ियों को, मुज़लूमों को इतिहास के आने वाले समय के यज़ीदों की यज़ीदयत को फ़ाश करने के संदर्भ में कोई फ़ायदा मिलता? अगर हुसैन (अ) शहीद हो जाते लेकिन उस युग के लोग और आने वाली पीढ़ियां न जान पाती कि हुसैन (अ)शहीद हो गए हैं तो यह घटना राष्ट्रों और इंसानी समाजों और इतिहास को क्रांतिकारी मोड़ देने में अपना कोई प्रभाव और भूमिका छोड़ पाती? आप देख रहे हैं कि इसका कोई असर न होता, जी हां हुसैन (अ) शहीद हो गए और दुनिया के बहुत से दूसरे शहीद भी जो ग़ुरबत व परदेस में बेदर्दी से शहीद किये गये वह जन्नत में तो अपने उच्च स्थान तक पहुँच गए, उनकी आत्माएं कामयाब हो गईं और अल्लाह की बारगाह पहुंच गईं। लेकिन उनकी शहादत से इस्लाम व इंसानियत को कितना फ़ायदा पहुंचा? वही शहीद सीख व शिक्षा का कारण बनती है कि जिसकी शहादतव मज़लूमियत के बारे में उसके समकालीन और आने वाली पीढ़ियां सुनें और जानें। वह शहीद मॉडल बनता है जिसका ख़ून हमेशा जोश मारता कहे और इतिहास के साथ बहता चला जाए। किसी क़ौम की मज़लूमियत केवल उस समय तक राष्ट्रोंके मज़लूम व घायल जिस्म को मरहम लगाकर ठीक करसकती है कि जब उसकी मज़लूमियत फरियाद बन जाए। उस मज़लूमियत की आवाज़ दूसरे इंसानों के कानों तक पहुंचे। यही कारण है कि आज बड़ी शक्तियों ने शोर मचा रखा है ताकि हमारी आवाज बुलंद न होने पाए। इसलिए वह तैयार हैं कि चाहे जितनी पूंजी खर्च हो लेकिन दुनिया यह न समझ पाए कि हम पर जंग क्यों थोपी गई और उस दौरमें भी साम्राज्यवादी शक्तियां तैयार थीं कि चाहे जितनी पूंजी लग जाए मगर हुसैन (अ) का नाम और उनकी याद व शहादत एक पाठ बनकर उस युग के लोगों और बाद की पीढ़ियों के मन व दिल में न बैठने पाए। वह शुरुआत में नहीं समझ पाए कि समस्या कितनी गंभीर है लेकिन जैसे-जैसे समय गुज़रता गया लोग ज़्यादा से ज़्यादा आगाह होने लगे। बनी अब्बास की हुकूमत के दौरान यहां तक कि इमाम हुसैन की मुबारक क़ब्र को भीउजाड़ दिया गया, पाक रौज़े को पानी से भर दिया उनकी कोशिश यह थी कि उसका कोई नामोनिशान बाक़ी न रहे। शहादत और शहीदों की याद मनाने का यही फ़ायदा है शहादत तब तक अपनाप्रभाव नहीं दिखाती जब तक कि शहीद का ख़ून जोश न मारे और उसकी याद दिलों में ताज़ा न की जाए और चेहलुम का दिन वह दिन है जिस दिन पहली बार करबला की शहादत के संदेश के झंडे को बुलंद किया गया। यह शहीदों के परिवार के ज़िंदा बच जाने वालों का दिन है अब चाहे पहलेही चेहलुम के अवसर पर इमाम हुसैन के अहले हरमकर्बला में आ गए हों या न आए हों लेकिन पहला चेहलुम वह दिन है जब पहली बार हुसैन इब्ने अली के मशूर ज़ाएर जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह अंसारी और अतीयः कि जो पैग़म्बर के सहाबी थे कर्बला की ज़मीन पर पहुँचे, जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह अंधे थे और जैसा कि रिवायतों मेंआया है अतीयः ने उनका हाथ पकड़ा और उसे हुसैनइब्ने अली की कब्र पर रखा उन्होंने कब्र को छुआ और रोये और उनसे राज़ो नियाज़ किया हुसैन इब्ने अली अ. की याद को जीवित किया और शहीदों की क़ब्रों की ज़ियारत की, अच्छी रीत को प्रचलित किया, चेहलुम का दिन एक ऐसा ही महत्वपूर्ण दिन है। इमाम हुसैन के आंदोलन काउद्देश्य। इमाम हुसैन अ. ने सच्चाई और न्याय के लिये आंदोलन किया थाः (’’انما خرجت لطلب الصلاح فی امۃ جدی ارید ان امر بالمعروف و انھیٰ عن المنکر ‘‘) चेहलुम की ज़ियारत में जो एक बेहतरीन ज़ियारत है हम पढ़ते हैः (’’و

27/11/2015

KYA KAIF KYA SURUR MILA MAA KI GOD
ME
MAIN SARE DARD BHOOL GAYA MAA KI
GOD ME
YE BHI NAMAZIYON K MUSALLE SE KAM
NAHIN
MANGA KARO KHUDA SE DUA MAA KI GOD
ME
AYE KHULD TERI BAHON ME WOH LUTF HI
NAHIN
AATA HAI MUJHKO JITNA MAZA MAA KI
GOD ME
ZAHRA(sa) JAWAN HONE KI DENE LAGIN
DUA
JAB MAINE YA HUSSAIN(as) KAHA MAA KI
GOD ME

26/11/2015

कोई सलमान कोई मीसम कोई अबुज़र निकले,
जो भी निकले वो मुक़द्दर के सिकन्दर निकले,
ये जो असग़र (अ0) के लिए माँग रहा है पानी,
मार दे ख़ाक पे ठोकर तो समन्दर निकले,
माल इस्लाम ने बाँटा तो हज़ारों मौजूद,
ख़ून इस्लाम ने माँगा तो बहत्तर निकले।

14/11/2015

Kar leya karo subah subah maa ki chehre ki ziyaraat dostoo→→
phata nahi kal ko tumhe haajj karni ka mauqa mile na mile:→→→

14/11/2015

Jinko Maloom Nahi Rooh-E-Ibadat Kya Hai
Bas Wahi Kehte Hai Matam Ki Zarurat Kya Hai
Maan Le Hum Bhi Ke Hai Majliso Matam bekar
Aap Samjha De Agar Ajr-E-Risalat Kya Hai
Waris-E-Ilm-E-Payambar Ke Hai Pairo'n Humlog
Khoob Maloom Hai Buniyaad-E-Shariyat Kya Hai
Shirk-O-Biddat Ke Masayal Na Bataye Humko
Humko Maloom Hai Sarkar Ki Niyat Kya Hai
Kyu Yeah Kehte Ho Ki Ek Rasm Hai Sheh Ka
Matam
Tumko Maloom Bhi Hai Asl Haqeeqat Kya Hai
Maa Ki Agosh Hi Mein Seekha Hai Matam Karna
Hai Agar Rasm Toh Batlaeye Fitrat Kya Hai
Deene Fitrat Hai Jise Kehte Hai Deene Islam
Ab Na Kahiyega Ki Matam Ki Zarurat Kya Hai
Hai Kabool Uske Amal Jiske Namaaze Maqbool
Ho Namaaze Bhi Kabool Iski Zamanat Kya Hai
Zikr-E-Shabbir Karo Taki Namaaze Hou Maqbool
Warna Socha Hi Karoge Ki Shafa'at Kya Hai

14/11/2015

Hasil Ye Zamane Main Faqat Humko Sharaf Hai.
Dil Ban Ke Ali Walon Ke Seene Main Najaf Hai.
Jeene Ka Isi Baat Pe To Lutf Hai Dosto
Duniya Meri Dushman Hai Ali Meri Taraf Hai.
Naare Haidry Ya Ali as
Labbaik Ya Hussain as

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261203

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