Bhartiya Jain Samaj

Bhartiya Jain Samaj page for social reform thinker. Highlighting issues faced by our community.

If any of my article or quote inspire you, please forward in your groups for social awareness and empowerment of jain community.

06/08/2026

*"जैन समाज की पहचान केवल सात्विक भोजन से नहीं, सात्विक नेतृत्व से बनती है।"*
हम थाली में अहिंसा ढूंढते हैं, पर कुर्सी पर बैठे व्यक्ति में?
जैन दर्शन नेतृत्व को सत्ता नहीं, साधना मानता है — जहाँ *अपरिग्रह* नेता को लालच से रोकता है, *अहिंसा* उसके हर निर्णय में करुणा भरती है, और *अनेकांतवाद* उसे यह सिखाता है कि सत्य पर उसका अकेला अधिकार नहीं।

सच्चा नेता वही है जो चार कषायों — क्रोध, मान, माया, लोभ — पर विजय पा चुका हो। जिसकी कथनी और करनी में भेद न हो। जो सफलता में विनम्र रहे और संकट में स्थिर।

*पर ऐसे नेतृत्व को पहचानें कैसे?*

पद के लिए आवेदन देखकर नहीं — बरसों के आचरण देखकर। जिसने संकट में समाज का साथ दिया हो, न कि सिर्फ मंच पर तालियाँ बटोरीं। जिसकी सेवा तब भी जारी रही जब कोई कैमरा नहीं था, कोई पद नहीं था। जो असहमति को दबाता नहीं, सुनता है। जिसका हिसाब-किताब जितना पारदर्शी हो, उतना ही उसका आचरण।

जो स्वयं की ब्रांडिंग की भूख से मुक्त हो — जिसकी कीर्ति पद या प्रचार से नहीं, बल्कि उसके कार्यों से स्वयं समाज में फैले। सच्चा सम्मान माँगा नहीं जाता, अर्जित होता है।

समाज को चाहिए ऐसी दृष्टि जो चेहरे नहीं, चरित्र चुने — जो प्रचार नहीं, प्रमाण मांगे।

जैन नेतृत्व सत्ता भोगने का नहीं, सेवा निभाने का व्रत है।

प्रश्न यह नहीं कि हमारे नेता कितने सक्षम हैं — प्रश्न यह है: *क्या वे भीतर से उतने ही शुद्ध हैं जितना हमारा आहार?*
- मानकचंद राठौड़

02/08/2026

*एक छोटी-सी बात...*
मैं स्वयं एक अन्यायपूर्ण सामाजिक घटना का शिकार हुआ था। उस अनुभव ने मुझे सिखाया कि *गलत के सामने समय रहते बोलना, बाद में पछताने से कहीं बेहतर है।* जब मैंने सच बोलने का साहस किया, तभी मैं उस पीड़ा से बाहर निकल पाया।

राजनीति में किसी नेता या सरकार के गलत निर्णय के खिलाफ शिकायत और विरोध के कई मंच उपलब्ध होते हैं। लेकिन *समाज के प्रभावशाली लोगों या सामाजिक सत्ताधारियों के विरुद्ध सच बोलना अक्सर उन्हें स्वीकार नहीं होता।* इसलिए समाज में चुप रहना आसान और बोलना कठिन माना जाता है।

आप अपने जीवन में किसी ऐसे हादसे का इंतज़ार मत कीजिए। हर छोटी बात पर विरोध करना आवश्यक नहीं, लेकिन *अन्याय और गलत परंपराओं के सामने हमेशा मौन रहना भी उचित नहीं।*

*सही समय पर उठाई गई आवाज़ केवल समाज को ही नहीं, कई बार स्वयं हमारे जीवन को भी बचा लेती है।*
- मानकचंद राठौड़

02/08/2026

*सत्ता पर बोलना आसान है, समाज पर बोलना सिर्फ़ साहस नहीं, चरित्र की पहचान है।*
आज सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या किसी दल की आलोचना करना बेहद आसान है। वहाँ तुरंत लाइक्स, रीट्वीट और "बौद्धिक" होने की वाहवाही मिल जाती है।

लेकिन क्या हमने कभी अपने ही समाज की कुरीतियों, दिखावे की दान-प्रतिस्पर्धा, पारदर्शिताहीन चुनावों, भाई-भतीजावाद और आर्थिक भेदभाव पर उतनी ही निर्भीकता से आवाज़ उठाई है?

*सच यह है कि राजनीति पर बोलने का सामाजिक जोखिम लगभग शून्य है, लेकिन समाज की गलतियों पर बोलने की कीमत बहुत भारी होती है।*

राजनीतिक नेता हमारा व्यापार, रिश्ते या सामाजिक पहचान तय नहीं करते, लेकिन समाज करता है। इसलिए लोग सत्ता से तो सवाल पूछ लेते हैं, पर अपने ही समाज के प्रभावशाली लोगों, संस्थाओं या परंपराओं के सामने मौन साध लेते हैं। क्योंकि वहाँ असहमति की कीमत कई बार रिश्तों, प्रतिष्ठा और अवसरों से चुकानी पड़ती है।

*धन, दान और मौन का कड़वा सच*

अक्सर देखा जाता है कि जब किसी व्यक्ति के पास अपार धन, बड़ा व्यापार और व्यापक सामाजिक प्रभाव होता है, तो वह किसी भी विवाद से दूर रहने लगता है। उसे लगता है कि किसी भी पक्ष को नाराज़ करना उसकी साख, व्यापार या संबंधों के लिए नुकसानदेह हो सकता है।

इसी कारण कई साधन-संपन्न लोग समाज में उदारतापूर्वक दान तो देते हैं, लेकिन उन्हीं संस्थाओं की कमियों, अपारदर्शिता या अन्याय पर बोलने से बचते हैं। ऐसे में *दान सम्मान दिलाता है, जबकि मौन व्यवस्था को चुनौती देने से बचा लेता है।* समाज को संसाधन तो मिल जाते हैं, लेकिन सुधार के लिए आवश्यक निर्भीक नेतृत्व नहीं मिल पाता।

विडंबना यह है कि जिन लोगों के पास समाज में सबसे अधिक प्रभाव और परिवर्तन लाने की क्षमता होती है, वे ही कई बार सबसे अधिक मौन रहते हैं। परिणामस्वरूप कुरीतियाँ समाप्त नहीं होतीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थानांतरित होती रहती हैं।

*असली अहिंसा क्या है?*

यदि हमारी अहिंसा केवल सूक्ष्म जीवों की रक्षा तक सीमित रह जाए, और अपने ही समाज में अन्याय, अपमान या आर्थिक भेदभाव सह रहे निरीह व्यक्ति के प्रति हम मौन रहें, तो वह अहिंसा नहीं, बल्कि *सुविधाजनक मौन* है।

समाज से प्रेम करने वाला व्यक्ति उसकी केवल प्रशंसा नहीं करता; वह उसकी कमियों को दूर करने का साहस भी रखता है। क्योंकि जो समाज अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं करता, वह समय के साथ भीतर से कमजोर होता जाता है।

*याद रखिए*: राजनीति पर बोलना केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, लेकिन अपने समाज को आईना दिखाना चरित्र की परीक्षा है। समाज तब नहीं बदलता जब हम केवल सत्ता को कोसते हैं; समाज तब बदलता है जब हम अपनी गलतियों पर ईमानदारी से चुप्पी तोड़ते हैं।

*समाज को सबसे बड़ा खतरा उसके आलोचकों से नहीं, बल्कि उन अच्छे लोगों की चुप्पी से होता है जो सच जानते हुए भी बोलते नहीं।*

*सवाल यह नहीं कि समाज कब बदलेगा—सवाल यह है कि जब आपकी बारी आएगी, तब आप चुप रहेंगे या बोलेंगे?*

*– मानकचंद राठौड़*

31/07/2026
*समय रहते न चेते तो अवसर हाथ से निकल जाते हैं: 7 हिल्स अस्पताल का फैसला और जैन समाज के लिए एक सबक*28 मई 2020 को जब कोरोन...
29/07/2026

*समय रहते न चेते तो अवसर हाथ से निकल जाते हैं: 7 हिल्स अस्पताल का फैसला और जैन समाज के लिए एक सबक*
28 मई 2020 को जब कोरोना महामारी के बीच 'भारतीय जैन समाज' के माध्यम से मैंने आवाज उठाई थी, तब विचार स्पष्ट था—मुंबई का सक्षम और दूरदर्शी जैन समाज एकजुट होकर आर्थिक तंगी से जूझ रहे *सेवन हिल्स अस्पताल (7 Hills Hospital)* का अधिग्रहण करे या समाज के लिए एक बड़ा सर्वसुविधायुक्त अस्पताल बनाए।
हाल ही में अखबार में छपी खबर *"रिलायंस को मिला 7 हिल्स अस्पताल"* इस बात का कड़वा सच उजागर करती है कि *अगर समाज सही समय पर सामूहिक निर्णय नहीं लेता, तो बड़े अवसर हाथ से फिसल जाते हैं।* जो अस्पताल कभी समाज की साझी ताकत से एक ऐतिहासिक धरोहर बन सकता था, वह अब कॉर्पोरेट हाथों में चला गया है।

लेकिन यह खबर निराशा की नहीं, बल्कि *एकजुट होकर चेतने की घंटी* है। यह घटना हमसे सीधे सवाल करती है:

* *दूरदर्शिता या चूक?* हमारे पास अरबपतियों, भामाशाहों और अद्वितीय नेतृत्व की कोई कमी नहीं है। फिर भी, जब पूरे समाज के लिए एक स्थायी चिकित्सीय आधारशीला रखने की बात आती है, तो हम सामूहिक कदम उठाने में पीछे क्यों रह जाते हैं?

* *वजूद और जरूरत:* मुंबई अब हमारी केवल कर्मभूमि नहीं, बल्कि जन्मभूमि है। हमारे पूज्य साधु-संतों, साध्वीजी भगवंतों और जरूरतमंद साधार्मिक भाइयों-बहनों की चिकित्सा सेवा के लिए एक अत्याधुनिक 'जैन सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल' की जरूरत आज भी उतनी ही जलती हुई हकीकत है।

* *भविष्य का संकल्प:* 7 हिल्स हाथ से निकला है, लेकिन हमारा सपना नहीं। मुंबई के सक्षम परिवार और सैकड़ों सामाजिक-धार्मिक संस्थाएं यदि एक मंच पर आ जाएं, तो 7 हिल्स से भी भव्य और आधुनिक *'जैन मेडिकल एंड रिसर्च सेंटर'* का निर्माण शून्य से किया जा सकता है।

* *जैन महासंघ का आह्वान:* यदि मुंबई में *जैन महासंघ* के रूप में सामाजिक तौर पर सभी जैन परिवार एक झंडे तले इकट्ठा हो जाएं, तो ऐसे भगीरथ कार्य आसानी से पूरे किए जा सकते हैं। संगठन की यही शक्ति समाज को नई दिशा दे सकती है।

आगामी चातुर्मास के पावन अवसर पर, पूज्य संतों के सानिध्य में मुंबई के सभी संप्रदायों, फिरकों और उद्योगपतियों को एक जाजम पर आना होगा। विचार को अब संकल्प और ठोस कार्य में बदलने का समय है।

*कल जो विचार एक चेतावनी था, आज वह एक कड़वा सबक बन चुका है। अब सोचने का नहीं, मुंबई में अपनी जड़ों को मजबूत करने और आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य को सुरक्षित करने का समय है।*
*"कल तक मैं अपनी शोहरत की तलाश में था,*
*आज वजूद को बचाने के लिए इलाज की तलाश में हूँ।"*
- *मानकचंद राठौड़*

मुंबई में जैन हॉस्पिटल का सपना साकार होना चाहिए।
मुंबई के जैन समाज को एक होकर आर्थिक रूप से बीमार पड़ी सेवन हिल्स हॉस्पिटल मुंबई को खरीदने का प्रयास करना चाहिए या नए हॉस्पिटल का निर्माण करना चाहिए। हम सब ने कोराना के माहौल में जैन समाज द्वारा संचालित एक बड़े हॉस्पिटल की कमी को महसूस किया है।

जैन समाज के 10 अरबपति या 100 करोड़पति मिलकर इस अस्पताल को अधिग्रहण करने के लिए जरूरी धन की व्यवस्था कर सकते हैं। मुंबई जैन समाज के 10,000 परिवार इस प्रोजेक्ट में शेरहोल्डर की भूमिका निभा सकते हैं। मुंबई का जैन समाज अपनी सामाजिक जवाबदारी को समझते हुए समाज उपयोगी जैन अस्पताल के सपने को पूरा करने के लिए साथ मिलकर खड़ा हो सकता है।

जैन समाज के दिग्गज लोगों को आगे आकर इस हॉस्पिटल का अधिग्रहण कर सुचारू रूप से चलाने के लिए समाज को साथ देने की अपील करनी चाहिए। यह कार्य आसान नहीं है लेकिन जिस तरह की लीडरशिप मुंबई के जैन समाज में मौजूद है, उनके लिए यह कार्य मुश्किल नहीं है। मुंबई में इतना बड़ा जैन समाज और जैन समाज की इतनी सारी धार्मिक एवं सामाजिक मजबूत संस्थाएं साथ में आकर यह भगीरथ कार्य को आसानी से पूरा कर सकते हैं।

मुंबई के जैन समाज में stalwart की कोई कमी नहीं है, हमारे समाज में ऐसे लोग मौजूद है जो यह कार्य अकेले खुद के कंधों पर वहन करने की क्षमता रखते हैं। मुंबई के जैन समाज में इतने दिग्गज मौजूद है कि यह काम मुश्किल नहीं है। मुंबई में बहुत सारे जैन समाज के लोग अपने आप में एक संस्था का रूप है। यह सभी लोग साथ मिलकर एक संकल्प कर ले तो जैन अस्पताल की कल्पना को आसानी से आकार प्रदान किया जा सकता हैं।

कोरोना के कारण पैदा हुए माहौल में जैन समाज के पीड़ित व्यक्ति इलाज के लिए दर बदर की ठोकरें खा रहे है। ऐसे में हम अगर जैन अस्पताल के सपने को साकार करने की कोशिश की जाती है तो मुंबई के जैन समाज के सभी संप्रदाय एवं फिरको का सहयोग मिलने की पूरी संभावना पैदा हो सकती हैं।

मुंबई हमारी कर्मभूमि ही नहीं जन्मभूमि बन चुकी है। इतने बड़े महामारी के संकट में हम सबका मुंबई में टिके रहना, इस बात का प्रमाण है कि हम प्रवासी या परप्रांतीय नहीं है। जैन समाज के किसी भी व्यक्ति ने मुंबई से पलायन नहीं किया है। हम सब का भविष्य एवं हमारे आने वाली पीढ़ी का भविष्य मुंबई से जुड़ा हुआ है।

हमने हमारे पूर्वजों की जन्मभूमि के लिए बहुत कुछ किया है। वहां पर बहुत सारे लोगों ने स्कूल और अस्पताल बनवाएं है लेकिन मुंबई जो हमारी एवं हमारे बच्चों की जन्मभूमि बन चुकी है, वहां पर हमारा सामाजिक योगदान कमजोर है। अब हमें मुंबई में अपनी जड़ों को मजबूत बनाना पड़ेगा।

यह अस्पताल पुरे भारतवर्ष के जैन समाज की बडे अस्पताल की जरूरतों को पूरा करेगा, साथ में हमारे जरूरतमंद साधार्मिक भाई-बहनों को भी हम आसानी से मेडीकल सुविधाएं उपलब्ध करा पायेंगे।

अगर कोई अच्छा काम समय पर नहीं किया जाता तो समाज के लिए उसकी उपयोगिता खत्म हो जाती हैं। इस महान कार्य को अंजाम तक पहुंचाने के लिए इस वर्ष मुंबई में हम सभी चातुर्मास सादाई में संपन्न कर, संतों की मदद लेकर अस्पताल के लिए जरूरी दान जमा करने की पहल शुरू करनी चाहिए।
कल तक मैं अपनी शोहरत की तलाश में था,
आज वजूद को बचाने लिए इलाज की तलाश हूँ।
मानकचंद राठौड़
https://m.facebook.com/bhartiyajainsamaj

*खारघर जैन समाज जैसे छोटे संघ का जैन समाज की बेटियों के लिए शिक्षा सेवा कार्य वास्तव में अनुकरणीय और प्रेरणादायक है।*समा...
28/07/2026

*खारघर जैन समाज जैसे छोटे संघ का जैन समाज की बेटियों के लिए शिक्षा सेवा कार्य वास्तव में अनुकरणीय और प्रेरणादायक है।*

समाज के लिए स्थायी आधारभूत संरचना (Infrastructure) का निर्माण करना और साधर्मिक भाई-बहनों के कल्याण के लिए दूरदृष्टि के साथ कार्य करना केवल महान सोच और समर्पित नेतृत्व का परिचायक है।

छोटे से खारघर जैन समाज ने वह कर दिखाया, जिसके बारे में बड़े समाज भी अभी तक सोच नहीं पाए हैं।

*खारघर जैन समाज के सभी पदाधिकारियों, दानदाताओं और कार्यकर्ताओं को हार्दिक अनुमोदना।* आपका यह प्रयास अनेक समाजों के लिए प्रेरणा बने। - मानकचंद राठौड़

27/07/2026

जिसकी बेटी सुखी, वह राजा;
जिसका बेटा आत्मनिर्भर, वह योद्धा;
और जिसके दोनों, वही सच्चे अर्थों में 'सुखी'।
- मानकचंद राठौड़

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