Jayprakash-mund

Jayprakash-mund hanuman beniwal

02/03/2026

सिस्टम से हारे हुए व्यक्ति के लिए न्याय की अंतिम उम्मीद किसान कौम के लड़ाके , 36 कौम के नेता, हर दलित-पीड़ित की बुलंद आवाज़, नागौर सांसद एवं RLP सुप्रीमो आदरणीय श्री हनुमान बेनीवाल जी को जन्मदिन की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
Hanuman Beniwal

26/01/2026

"स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान को नमन, भारत के संविधान का सम्मान! 🇮🇳
समस्त देशवासियों को 77वें गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
जय हिंद, जय भारत! वंदे मातरम।
Kanika Beniwal

12/01/2026


26/12/2025

मोबाइल से टीपकर, शायद 'पर्ची' तैयार कर रहे हैं साहब...!! 😃😂 #खेजड़ी_बचाओ #अरावली_पर्वतमाला_बचाओ

26/12/2025
26/12/2025

सुरसुरा अजमेर में चल रही कथा में संतों ने Hanuman Beniwal जी से किया गौहत्या बंद की मुहिम में साथ देने का आह्वान

25/12/2025

अदम्य वीरता,त्याग और उदारता व लोक कल्याण के प्रतीक अजेय योद्धा महाराजा सूरजमल जी के बलिदान दिवस पर उन्हें शत -शत नमन |

23/12/2025

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री एवं किसानों के कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले "भारत रत्न" चौधरी चरण सिंह जी की जयंती पर उन्हें सादर नमन एवं देश के अन्नदाताओं को राष्ट्रीय किसान दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ।
#राष्ट्रीय_किसान_दिवस

23/12/2025

कैलेंडर अपडेट हुयो है 😄
आज 25 दिसम्बर है!🤦🏻‍♂️

18/12/2025

"विकास के नाम पर विनाश का रास्ता"

भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमाला अरावली आज अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रही है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के एक निर्देश के बाद 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों को “पहाड़” न मानने की व्याख्या सामने आई है, जिसने अरावली के विशाल भूभाग को कानूनी संरक्षण से बाहर करने का खतरा पैदा कर दिया है। यह केवल शब्दों का खेल नहीं है, बल्कि इसके दूरगामी परिणाम राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और पूरे उत्तर-पश्चिम भारत के पर्यावरणीय भविष्य को सीधे प्रभावित करने वाले हैं।

अरावली पर्वतमाला लगभग 692 किलोमीटर तक गुजरात से लेकर दिल्ली तक फैली है और इसे लगभग तीन अरब वर्ष पुरानी पर्वत श्रृंखला माना जाता है। इसका दो-तिहाई हिस्सा राजस्थान में स्थित है, जहाँ यह जलवायु संतुलन, वर्षा चक्र और भूजल रिचार्ज की रीढ़ के रूप में कार्य करती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि अरावली न होती, तो पश्चिमी, मध्य और दक्षिण भारत का बड़ा भूभाग रेगिस्तान में बदल चुका होता। ऐसे में इस प्राकृतिक ढाल को कमजोर करना दीर्घकालिक पर्यावरणीय आत्मघात से कम नहीं है।

फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया के आँकड़े इस संकट की गंभीरता को और स्पष्ट करते हैं। देश में मैप की गई 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 यानी महज 8.7 प्रतिशत ही 100 मीटर की ऊँचाई के मानक पर खरी उतरती हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि अरावली का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा इस नई व्याख्या के बाद कानूनी सुरक्षा खो सकता है। यह स्थिति खनन, रियल एस्टेट और निजी परियोजनाओं के लिए रास्ता खोलती है, जबकि पर्यावरण और स्थानीय समुदायों के लिए यह विनाश का संकेत है।

अरावली केवल पहाड़ियों की श्रृंखला नहीं है। यह 300 से अधिक जीव-जंतुओं और पक्षियों का प्राकृतिक आवास है, लाखों पशुपालकों के लिए चारागाह है और बनास, साबरमती तथा लूणी जैसी नदियों का उद्गम स्थल भी है। इसकी चट्टानी संरचना वर्षा जल को रोककर उसे जमीन के भीतर पहुँचाती है, जिससे पूरे क्षेत्र में भूजल रिचार्ज होता है। पहले से ही जल संकट से जूझ रहे पश्चिमी राजस्थान के लिए अरावली का कमजोर होना सूखे को स्थायी बना देने जैसा होगा।

सरकार की पर्यावरण नीति की वास्तविक तस्वीर जोजरी नदी की उपेक्षा और खेजड़ी वृक्षों के साथ हो रहे व्यवहार से भी साफ होती है। खेजड़ी, जिसे राजस्थान का राज्य वृक्ष माना जाता है और जो रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र की जीवनरेखा है, आज योजनाबद्ध कटाई का शिकार बन रहा है। सरकारी आँकड़ों और जमीनी आकलनों के अनुसार, सोलर परियोजनाओं और औद्योगिक लीज़ के नाम पर अब तक लगभग 26 लाख खेजड़ी पेड़ काटे जा चुके हैं, जबकि आने वाले समय में करीब 50 लाख और खेजड़ी पेड़ों की कटाई की तैयारी की जा रही है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि एक पूर्ण विकसित खेजड़ी पेड़ के साथ अन्य पेड़ो को तैयार होने में लगभग 100 वर्ष लगते हैं, जिससे मरुस्थल के इस अनमोल पारिस्थितिकी तंत्र पर दीर्घकालिक और गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

एक पेड़ औसतन 1,200 किलोलीटर ऑक्सीजन प्रतिवर्ष देता है। इस आधार पर, जो 26 लाख पेड़ काटे गए, वे हर साल लगभग 25 करोड़ किलोलीटर ऑक्सीजन प्रदान करते थे जो अब पूरी तरह बंद हो चुकी है। पेड़ों के कटने और बड़े पैमाने पर ऊर्जा परियोजनाओं की स्थापना के कारण तापमान में 3 से 4 डिग्री तक वृद्धि दर्ज की गई है। पर्यावरणविदों के अनुसार, पश्चिमी राजस्थान में बारिश कम होने का यह एक प्रमुख कारण बन गया है। तापमान बढ़ने और आवास नष्ट होने के चलते रेगिस्तान के कई छोटे जीव भी विलुप्ति के कगार पर पहुँच गए हैं। जबकि यही पारिस्थितिकी तंत्र है जो न्यूनतम पानी में पनपता है, मिट्टी को बाँधकर मरुस्थलीकरण को रोकता है, पशुओं के लिए चारा देता है और स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार है।

विडंबना यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने अतीत में अरावली की रक्षा के लिए ऐतिहासिक भूमिका निभाई है। 1990 के दशक से लेकर एम.सी. मेहता बनाम यूनियन ऑफ इंडिया जैसे मामलों में कोर्ट ने राजस्थान और हरियाणा में अनियंत्रित खनन पर रोक लगाई और यह स्वीकार किया कि इससे होने वाला पर्यावरणीय नुकसान अपूरणीय है। ऐसे में आज उसी अरावली को कमजोर करने वाली व्याख्या सामने आना न केवल चिंताजनक है, बल्कि न्यायिक परंपरा के भी विपरीत प्रतीत होता है।

और भी चिंताजनक तथ्य यह है कि जिस मंत्रालय ने कोर्ट में अरावली की परिभाषा से जुड़े तथ्यों को प्रस्तुत किया है, उसके मंत्री स्वयं अरावली क्षेत्र से निर्वाचित होकर संसद तक पहुँचे हैं। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या राजस्थान का पारिस्थितिकी तंत्र इतना सस्ता है कि बाहरी कंपनियाँ आएँ, पहाड़ और पेड़ काटें और मुनाफा समेटकर चली जाएँ। क्या सरकार यह मान चुकी है कि जनता को भ्रमित कर किसी भी प्रकार के पर्यावरण विरोधी निर्णय पारित कराए जा सकते हैं।

साथ ही एक तरफ सरकार द्वारा अरावली पर्वतमाला के संरक्षण व इसे हरित बनाये रखने के उद्देश्य से बजट 2025–26 में, 250 करोड़ रुपये राशि की 'हरित अरावली विकास परियोजना शुरू करने की घोषणा करी गई थी। दूसरी तरफ उसी अरावली पर्वतमाला को अब खनन के लिए सौंपा जा रहा है। ये विडंबना नहीं है तो क्या है?

अरावली वह प्राकृतिक दीवार है जो पश्चिम से आने वाली जानलेवा लू और थार रेगिस्तान को पूर्वी राजस्थान, दिल्ली और उत्तर प्रदेश के उपजाऊ मैदानों में प्रवेश करने से रोकती है। इस दीवार को कमजोर करना आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के साथ सीधा खिलवाड़ है।

कुल मिलाकर, अरावली और खेजड़ी दोनों पर हो रहा यह हमला विकास नहीं, बल्कि विनाश की राजनीति है। यह फैसला खनन माफियाओं और कॉरपोरेट हितों को बढ़ावा देने जैसा है, जबकि पर्यावरण, ग्रामीण आजीविका और भविष्य की पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। इतिहास ऐसे फैसलों को न तो भूलता है और न ही माफ करता है। सरकार को अब स्पष्ट करना होगा कि वह विकास चाहती है या विनाश क्योंकि प्रकृति के साथ किया गया अन्याय अंततः समाज को ही लौटकर मिलता है।

माननीय सर्वोच्च न्यायालय से विनम्र आग्रह है कि इस विषय पर पुनर्विचार किया जाए और आमजन से भी अपील है कि इस लड़ाई को केवल पहाड़ों की नहीं, बल्कि अपने भविष्य की लड़ाई समझकर अपनी आवाज बुलंद करें। इतिहास ऐसे फैसलों को न भूलता है, न माफ करता है और प्रकृति के साथ किया गया अन्याय अंततः समाज को ही लौटकर मिलता है।
Ravindra Singh Bhati
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#खेजड़ी_बचाओ अरावली पर्वतमाला बचाओ..... 🌳🏔️

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