अतुल्य उत्तराखंड

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रास्ते में जंगली बेल की यह मीनार-सी लता दिखाई दी, जिस पर लाल, हरे और नारंगी रंग के खूबसूरत फल लगे हुए थे। 🌿🍊देखकर मन में...
07/09/2026

रास्ते में जंगली बेल की यह मीनार-सी लता दिखाई दी, जिस पर लाल, हरे और नारंगी रंग के खूबसूरत फल लगे हुए थे। 🌿🍊

देखकर मन में जिज्ञासा हुई—आखिर यह कौन-सी जंगली फल है? 🤔

क्या पहाड़ों में इसे कोई स्थानीय नाम से जानते हैं? और क्या इसकी कोई औषधीय उपयोगिता भी होती है?

जानकार लोग जरूर बताइएगा 🙏

इस तस्वीर में एक ही चीड़ के पेड़ पर लीसा निकालने की दो अलग-अलग तकनीकें दिखाई दे रही हैं—रिल विधि और बोर होल विधि।🔹 1. रि...
07/09/2026

इस तस्वीर में एक ही चीड़ के पेड़ पर लीसा निकालने की दो अलग-अलग तकनीकें दिखाई दे रही हैं—रिल विधि और बोर होल विधि।

🔹 1. रिल विधि (Rill Method)
यह पारंपरिक विधि है। इसमें पेड़ के तने की बाहरी छाल के एक हिस्से को हटाकर उस पर खांचे बनाए जाते हैं। इन खांचों से निकलने वाला लीसा नीचे लगाए गए संग्रह पात्र में जमा किया जाता है।

इस प्रक्रिया में तने का एक बड़ा हिस्सा खुल जाता है, इसलिए पेड़ पर अपेक्षाकृत अधिक चोट लगती है।

🔹 2. बोर होल विधि (Bore Hole Method)
यह अपेक्षाकृत आधुनिक तकनीक है। इसमें ड्रिल या बरमे की सहायता से तने में एक छोटा छेद बनाया जाता है। छेद में नोजल या पाइप लगाकर निकलने वाले लीसे को सीधे बंद बैग में एकत्र किया जाता है।

इस विधि में पेड़ के तने का कम हिस्सा प्रभावित होता है और बंद संग्रह प्रणाली के कारण लीसा बाहरी धूल-मिट्टी से भी अपेक्षाकृत सुरक्षित रहता है।

🌿 दोनों विधियों का उद्देश्य चीड़ के पेड़ से लीसा प्राप्त करना है, लेकिन तकनीक और पेड़ पर पड़ने वाले प्रभाव में अंतर है।

लीसा से मुख्य रूप से तारपीन का तेल, रोजिन (Rosin), वार्निश, पेंट और विभिन्न औद्योगिक उत्पाद तैयार किए जाते हैं।

वन संपदा का उपयोग जरूरी है, लेकिन वैज्ञानिक और नियंत्रित तरीके से किया गया दोहन ही जंगल और पेड़ दोनों के लिए बेहतर है। 🌲

उत्तराखंड के वाहन Registration/RTO Codes 🚍
07/09/2026

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जिस परिवार की चार पीढ़ियां भारतीय सेना से जुड़ी रही हों, वहां देशसेवा सिर्फ एक नौकरी नहीं बल्कि संस्कार बन जाती है। उत्त...
06/09/2026

जिस परिवार की चार पीढ़ियां भारतीय सेना से जुड़ी रही हों, वहां देशसेवा सिर्फ एक नौकरी नहीं बल्कि संस्कार बन जाती है। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ के रौलियागांव तोक, बेलतड़ी निवासी पारस भट्ट ने इसी गौरवशाली परंपरा को आगे बढ़ाते हुए भारतीय सेना में अधिकारी बनकर परिवार और पूरे क्षेत्र का नाम रोशन किया है। 👏🇮🇳

पारस भट्ट ने ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी (OTA), गया से अपना प्रशिक्षण पूरा किया। उनके पिता कैप्टन सीएस भट्ट (सेवानिवृत्त), दादा और परदादा भी सेना की EME शाखा में अपनी सेवाएं दे चुके हैं। यानी पारस से पहले तीन पीढ़ियों ने वर्दी पहनकर देश की सेवा की और अब चौथी पीढ़ी ने भी उसी राह को चुना है। 🎖️

पारस ने अपनी शुरुआती पढ़ाई पिथौरागढ़ से की और आगे चलकर ग्राफिक एरा विश्वविद्यालय, देहरादून से बीटेक की पढ़ाई पूरी की। बचपन से ही घर के सैन्य माहौल और अपने पूर्वजों की सेवा से प्रेरणा लेकर उन्होंने सेना में अधिकारी बनने का सपना देखा था। मेहनत, अनुशासन और लगन के दम पर आखिरकार उन्होंने यह सपना पूरा कर दिखाया। 💪

सबसे भावुक पल OTA गया की पासिंग आउट परेड के दौरान आया। जब लेफ्टिनेंट पारस भट्ट का मेडल उनके दादा-दादी को प्रदान किया गया, तो गर्व और भावुकता से उनकी आंखों में आंसू छलक पड़े। यह सिर्फ एक मेडल नहीं था, बल्कि चार पीढ़ियों की सैन्य परंपरा और त्याग की विरासत का सम्मान था। ❤️🎖️

उत्तराखंड की धरती ने हमेशा देश को वीर जवान दिए हैं। पारस भट्ट की सफलता उसी गौरवशाली परंपरा की एक और कड़ी है। उनकी उपलब्धि न सिर्फ परिवार के लिए गर्व का विषय है, बल्कि पिथौरागढ़ और पूरे उत्तराखंड के युवाओं के लिए भी प्रेरणा है।

एक पीढ़ी ने देशसेवा की राह दिखाई, दूसरी ने उसे निभाया और अब चौथी पीढ़ी उसी विरासत को आगे बढ़ा रही है। 🇮🇳
लेफ्टिनेंट पारस भट्ट को उज्ज्वल सैन्य भविष्य के लिए हार्दिक शुभकामनाएं। जय हिंद! ❤️🇮🇳

नंदा देवी बड़ी जात यात्रा — 1968 से 2026 तक 🙏समय बदला, तस्वीरें बदलीं, लेकिन आस्था और परंपरा आज भी वही है।उत्तराखंड की स...
06/09/2026

नंदा देवी बड़ी जात यात्रा — 1968 से 2026 तक 🙏
समय बदला, तस्वीरें बदलीं, लेकिन आस्था और परंपरा आज भी वही है।
उत्तराखंड की समृद्ध लोक-संस्कृति और मां नंदा देवी के प्रति अटूट श्रद्धा की यह अनमोल झलक है। ❤️🚩

#उत्तराखंड

लैन्सडौन का फेमस व्यू-पॉइंट टिफिन टॉप 🏞️
06/09/2026

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भीगी-भीगी सड़कें और कंडोलिया का फेमस तिराहा…बारिश के बाद की खूबसूरती ही कुछ अलग है 🏔️☁️
06/09/2026

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देहरादून से पहाड़ जाने वाले यात्रियों के लिए बड़ी राहत की खबर है। अब तक हरिद्वार और ऋषिकेश से संचालित होने वाली गढ़वाल म...
06/09/2026

देहरादून से पहाड़ जाने वाले यात्रियों के लिए बड़ी राहत की खबर है। अब तक हरिद्वार और ऋषिकेश से संचालित होने वाली गढ़वाल मोटर ऑनर्स यूनियन (GMOU) की बसें पहली बार देहरादून से भी सीधे पर्वतीय रूटों पर चलने जा रही हैं। नए परमिट मिलने के बाद 11 सितंबर 2026 से पहले चरण में रोजाना 11 बस सेवाएं शुरू करने की तैयारी है।

इन बसों का संचालन चांदनी चौक स्थित भुड्डी गांव से किया जाएगा। बसें हिमगिरी एक्सप्रेस के नाम से संचालित होंगी और शिमला बाईपास, ISBT तथा रिस्पना पुल होते हुए ऋषिकेश जाएंगी। इसके बाद अलग-अलग पर्वतीय मार्गों पर यात्रियों को पहुंचाएंगी।

पहले चरण में GMOU की बसें जोशीमठ, गोपेश्वर, ऊखीमठ, नागनाथ पोखरी, तिरपालीसैंण, बीरोंखाल और धुमाकोट जैसे पर्वतीय रूटों पर संचालित की जाएंगी। GMOU प्रबंधन ने इन सेवाओं के लिए समय-सारणी भी तैयार कर ली है और भुड्डी गांव में शाखा कार्यालय भी खोला गया है।

खास बात यह है कि बस सेवा शुरू होने की तारीख पहले 1 सितंबर, फिर 4 सितंबर तय की गई थी, लेकिन परमिट से जुड़े दस्तावेज में परिवहन विभाग के अधिकारियों के हस्ताक्षर की प्रक्रिया पूरी नहीं होने के कारण संचालन टल गया। अब नई तारीख 11 सितंबर तय की गई है।

GMOU के अनुसार, शुरुआती चरण में 11 दैनिक सेवाएं चलेंगी। यदि इन रूटों पर यात्रियों की मांग बढ़ती है तो दूसरे चरण में बसों की संख्या बढ़ाई जा सकती है।

इस फैसले से खासतौर पर उन यात्रियों को फायदा मिलने की उम्मीद है, जिन्हें देहरादून से सीधे गढ़वाल के पर्वतीय क्षेत्रों में जाना पड़ता है और अभी उन्हें ऋषिकेश या हरिद्वार जाकर बस पकड़नी पड़ती थी।

हालांकि, कुछ क्षेत्रों से नए रूट में अपने इलाके को शामिल करने की मांग भी उठने लगी है। रिखणीखाल क्षेत्र के लोगों ने देहरादून से रिखणीखाल वाया रथुवाढाब-गाड़ियों पुल सीधी बस सेवा शुरू करने की मांग उठाई है।

👉 यानी 11 सितंबर से देहरादून से पहाड़ों की ओर सफर करने वाले यात्रियों के लिए परिवहन का एक नया विकल्प मिलने जा रहा है।

तहसील श्रीनगर जनपद पौड़ी गढ़वाल
06/09/2026

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