14/08/2026
बलिदान की नींव पर खड़ा सौ वर्षों का महायज्ञ: अनगिनत शहादतों से सिंचित संघ का 'शतक वर्ष’_
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) अपने सौ वर्षों की ऐतिहासिक यात्रा पूर्ण करने के मुहाने पर खड़ा है। एक शताब्दी की यह यात्रा केवल संगठन विस्तार, शाखाओं के नेटवर्क या सामाजिक प्रभाव की कहानी भर नहीं है; यह कहानी उन अनगिनत समर्पित स्वयंसेवकों के त्याग, तपस्या और आत्म-उत्सर्ग की नींव पर रची गई है, जिन्होंने राष्ट्र निर्माण के इस महायज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे दी।
संघ के इस शताब्दी पर्व का आलोक जितना भास्वर है, उसकी जड़ें स्वयंसेवकों के रक्त और बलिदान से उतनी ही सिंचित हैं। संघ या उससे जुड़े वैचारिक, सामाजिक और राजनीतिक प्रकल्पों—चाहे वह भारतीय जनता पार्टी हो, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP), या बजरंग दल—का इतिहास इस बात का साक्षी है कि राष्ट्रीय चेतना के प्रसार और सांस्कृतिक संरक्षण की राह में स्वयंसेवकों को हर कदम पर भारी कीमत चुकानी पड़ी है।
_संघर्ष और शहादत के विविध आयाम_
यद्यपि किसी भी सरकारी एजेंसी द्वारा ऐसे बलिदानों का कोई एकल एकीकृत (मास्टर) डेटाबेस प्रकाशित नहीं किया गया है, लेकिन इतिहास के पन्नों, राज्य विधानसभाओं के अभिलेखों और संघ के आधिकारिक प्रकाशनों में दर्ज आँकड़े इस संघर्ष की भयावहता और स्वयंसेवकों की अटूट निष्ठा को स्पष्ट रूप से उजागर करते हैं:-
_केरल में वैचारिक संघर्ष:-_
केरल की धरती पर वामपंथी हिंसा और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के बीच संघ के विचारों को जीवंत रखने के लिए 250 से अधिक स्वयंसेवकों ने अपनी शहादत दी। केवल वर्ष 2000 से 2017 के बीच ही दर्जनों कार्यकर्ताओं को असमय अपनी जान गंवानी पड़ी।
_पंजाब में आतंकवाद के विरुद्ध अडिग निष्ठा:-_
1980 और 90 के दशक में जब पंजाब खालिस्तानी आतंकवाद के साये में था, तब संघ के स्वयंसेवकों ने राष्ट्रीय अखंडता के लिए अभूतपूर्व संबल दिखाया। जून 1989 का मोगा हत्याकांड इसका दर्दनाक प्रमाण है, जहाँ प्रभात शाखा पर हुए उग्रवादी हमले में 25 स्वयंसेवक एक साथ वीरगति को प्राप्त हुए। इस दौर में 200 से अधिक कार्यकर्ताओं ने देश की एकता के लिए बलिदान दिया।
_आपातकाल का दौर (1975-1977):-_ लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के संघर्ष में सत्याग्रह करते हुए और जेलों में अमानवीय यातनाएं सहते हुए 100 से अधिक स्वयंसेवकों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
_पूर्वोत्तर में राष्ट्रवाद की अलख:-_
त्रिपुरा और असम के दुर्गम क्षेत्रों में उग्रवाद के प्रभाव के बावजूद राष्ट्र-निर्माण में जुटे वरिष्ठ प्रचारकों का अपहरण और हत्या (जैसे 1999 में NLFT द्वारा 4 वरिष्ठ प्रचारकों का बलिदान) यह दर्शाता है कि संघ कार्य की कीमत स्वयंसेवकों ने हर क्षेत्र में चुकाई है।
_हालिया राजनीतिक हिंसा:-_
पश्चिम बंगाल हो या देश के अन्य संवेदनशील अंचल, हाल के वर्षों में चुनाव और चुनाव-पश्चात् हुई हिंसा में सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने अपने वैचारिक संकल्प के लिए शहादत दी है।
_आत्म-उत्सर्ग से निर्मित 'शतक वर्ष'_
संघ का कोई भी प्रकल्प ऐसा नहीं है चाहे वह सीमावर्ती क्षेत्रों में शिक्षा का कार्य हो, जनजातीय अंचलों में सेवा कार्य हो, या राजनीतिक और छात्र आंदोलनों के माध्यम से राष्ट्रीय मुद्दों को उठाना हो जहाँ किसी स्वयंसेवक ने अपने रक्त से उस विचार को न सींचा हो।
सौ वर्षों की यह यात्रा केवल उपलब्धियों का उत्सव मनाने का अवसर नहीं है, बल्कि उन अनगिनत गुमनाम नायकों और *शहीदों को नमन करने का समय है,* जिनकी अस्थियों पर इस विशाल वटवृक्ष की नींव टिकी है। संघ का शताब्दी वर्ष वास्तव में इन्हीं राष्ट्रभक्त स्वयंसेवकों के अक्षुण्ण संकल्प, निष्काम सेवा और अमर बलिदानों का जीवंत प्रतीक है।