14/02/2023
भक्त प्रह्लाद के द्वारा दिया गया नवविद्या भक्ति का ज्ञान श्रीमद्भागवत महापुराण के ७ वे स्कन्द के ५ में अध्याय के २३ एवं २४ श्लोक में अंकित है, प्रसंग कुछ इस प्रकार है।
हिरण्यकशिपु ( भक्त प्रह्लाद के पिता ) ने उनके पुत्र की श्रीहरि भक्ति देख उनको अपने गुरुपुत्रों ( षण्ड और अमर्क ) के पास राजनीति और कूटनीति की शिक्षा एवं किस प्रकार प्रजा को नियंत्रण में रखा जाये, दुसरो को कैसे अधीन बनाया जाये और मेरे जैसा शक्तिशाली कैसे बना जाये शिक्षा ग्रहण करने भेजा। ( षण्ड का अर्थ "बैल" और अमर्क का अर्थ "अलोकरहित" अर्थात "अंधकारमय" )
उन दोनों गुरुपुत्रों ने भक्त प्रह्लाद को भय दिखाकर धर्म ( आसुरिक धर्म, अर्थ, काम ) की शिक्षा दी। कुछ समय बाद वह भक्त प्रह्लाद को हिरण्यकशिपु के समक्ष लेकर आये।
हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र प्रह्लाद से पूछा - हे प्रह्लाद, हे आयुष्मान् ! तुमने अपनी पाठशाला में जो शिक्षा ग्रहण की है, उसमें से कुछ मुझे बताओं।
प्रह्लाद जी ने उत्तर देते हुए कहा :
श्रवणं कीर्तनं विष्णो: स्मरणं पादसेवनम् ।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥ २३
इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा ।
क्रियेत भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम् ॥ २४
भगवान् के नाम, रूप, गुण, लीला, परिकर और धामादि के सम्बन्ध में श्रवण, कीर्तन तथा स्मरण करना, उनके चरणकमलों की सेवा करना, अनेक श्रेष्ठ द्रव्यों से उनका पूजन करना, उनकी स्तुति करना, उनका दास बनना, उन्हें अपना सर्वश्रेष्ठ मित्र समझना और उनके प्रति पूर्ण समर्पण - ये नौ ( ९ ) भक्ति के अंग है। जो प्रथमतः स्वयं को भगवान् विष्णु के प्रति समर्पण करने के उपरान्त इस नवविद्या भक्ति का साक्षात् अनुष्ठान करता है, मेरे मतानुसार उसने ही उत्तम अध्ययन अथवा शिक्षा प्राप्त की है।