Bharat Hamari Maa

Bharat Hamari Maa राष्ट्र प्रथम,भारतीय गौरवमयी इतिहास ?

25/12/2023

पवित्र मन ही
दुनिया का
उत्तम तीर्थ है

_____________"  #संयम "______________      स्वयं द्वारा स्वयं के विरुद्ध छेड़ा जाने वाला संग्राम ही संयम कहलाता है और सर...
13/12/2023

_____________" #संयम "______________

स्वयं द्वारा स्वयं के विरुद्ध छेड़ा जाने वाला संग्राम ही संयम कहलाता है और सरल करें तो संयम की परिभाषा मात्र इतनी कि-
"संयम अर्थात् एक युद्ध स्वयं के विरुद्ध"।
संयम मानवीय गुणों में एक प्रधान गुण है। पशुओं में स्वयं के विरुद्ध कोई युद्ध देखने को नहीं मिलता। पशुओं में इन्द्रिय निग्रह देखने को नहीं मिलता अर्थात् पशुओं में संयम नहीं होता है। इसका सीधा सा अर्थ यह हुआ कि जिस जीवन में संयम नहीं वह जीवन पशु भले न हो मगर मगर पशुवत जरूर हो जाता है।
असंयमितता जीवन को पतन की ओर ले जाती है। असंयमित जीवन एक असंतुलित वाहन की तरह होता है, जिसमें चालक वाहन के ऊपर से अपना नियंत्रण पूरी तरह खो चुका होता है।अब थोड़ी देर से सही मगर वाहन का दुर्घटनाग्रस्त होना सुनिश्चित हो जाता है।
जीवन में संयमी और शुभ कार्यों में अग्रणी, ये श्रेष्ठ व्यक्तियों के लक्षण होते हैं।

13 अगस्त 1947बंबई... जुहू हवाई अड्डा टाटा एयर सर्विसेज के काउंटर पर आठ-दस महिलाएं खड़ी हैं। सभी अनुशासित हैं और उनके चेह...
13/12/2023

13 अगस्त 1947
बंबई... जुहू हवाई अड्डा टाटा एयर सर्विसेज के काउंटर पर आठ-दस महिलाएं खड़ी हैं। सभी अनुशासित हैं और उनके चेहरों पर जबरदस्त आत्मविश्वास दिखाई दे रहा है। यह सभी 'राष्ट्र सेविका समिति' की सेविकाएं हैं।

प्रमुख संचालिका लक्ष्मीबाई केलकर,अर्थात 'मौसीजी', कराची जाने वाली हैं। कराची में जारी अराजकता एवं अव्यवस्था के माहौल में हैदराबाद (सिंध) की एक सेविका ने उनको एक पत्र भेजा है। उस सेविका का नाम है जेठी देवानी। देवानी परिवार सिंध का एक साधारण परिवार है, जो संघ से जुड़ा हुआ है।

जेठी देवानी का पत्र आने के बाद मौसीजी से रहा नहीं गया। सिंध क्षेत्र की सेविकाओं की मदद के लिए तत्काल वहां जाने का निश्चय उन्होंने किया। राष्ट्र सेविका समिति का गठन हुए केवल ग्यारह वर्ष ही हुए हैं। परन्तु समिति का काम तेजी से आगे बढ़ रहा हैं। यहां तक कि सिंध, पंजाब और बंगाल जैसे सीमावर्ती प्रान्तों में भी राष्ट्र सेविका समिति का नाम और काम पहुंच चुका हैं। कल कराची में कायदे आज़म जिन्ना, पाकिस्तान के राष्ट्र प्रमुख की शपथ लेने वाले हैं। वहां पर कल चारों तरफ स्वतंत्रता दिवस के समारोह मनाए जा रहे होंगे। परन्तु फिर भी वहां जाना आवश्यक है। इसीलिए मौसीजी,अपनी एक अन्य सहयोगी वेणुताई कलमकर के साथ कराची जाने के लिए हवाई अड्डे पर उपस्थित हैं।

चालीस-पचास यात्रियों की क्षमता वाले उस छोटे से विमान में नौ गज वाली महाराष्ट्रीयन साड़ी पहने हुए केवल यही दोनों महिलाएं हैं। यात्रियों में हिन्दू अधिक नहीं हैं। काँग्रेस में समाजवादी विचारधारा जीवित रखने वाले जयप्रकाश नारायण भी इस विमान में हैं। पूना के एक सज्जन हैं, जिनका उपनाम देव है और उन्हें मौसीजी ने पहचान लिया। परन्तु ये दोनों ही लोग अहमदाबाद में उतर गए। यहां से चढ़ने वाले भी अधिकांशतः मुसलमान ही हैं और ऐसे यात्रियों के बीच में केवल ये दोनों महिलाएं..!

विमान में कुछ उत्साही यात्री, 'पाकिस्तान जिंदाबाद' का नारा लगा रहे हैं। एक-दो यात्रियों ने 'लड़ के लिया है पाकिस्तान, हँस के लेंगे हिन्दुस्तान' जैसे नारे भी लगाए, परन्तु मौसी जी का आत्मविश्वास स्थिर बना रहा, उनका निर्णय पक्का था, उनके चेहरे पर एक कठोरता बनी हुई थी, यह देखकर धीरे-धीरे पाकिस्तान के नारे लगाने वाले चुपचाप बैठ गए...!

सुबह साढ़े दस बजे मुम्बई के जुहूहवाई अड्डे से निकला हुआ मौसीजी का विमान, अहमदाबाद में रुकते हुए लगभग साढ़े चार घंटे की यात्रा के बाद कराची के द्रीघरोड स्थित हवाईअड्डे पर दोपहर तीन बजे पहुंचा. हवाईअड्डे पर मौसीजी के जमाई, चोलकर स्वयं आए हुए हैं. चोलकरयानेमौसीजी की बेटी वत्सला के पति. वत्सला को पढ़ने का शौक था, इसलिए मौसीजी ने घर पर ही शिक्षक बुलाकर उसकी पढ़ाई पूर्ण की. वत्सला ने भी राष्ट्र सेविका समिति के कामों में काफी हाथ बंटाया. कराची की शाखा का विस्तार करने में वत्सला का बड़ा योगदान हैं.

हवाईअड्डे पर पन्द्रह-बीस सेविकाएं भी मौसीजी को लेने आई हुई हैं. सुरक्षा की दृष्टि से संघ के कुछ स्वयंसेवक भी साथ में उपस्थित हैं. एक सेविका की कार में बैठकर यह काफिला मौसीजी के साथ ही बाहर निकला....!

जिस समय 'राष्ट्र सेविका समिति' की प्रमुख, लक्ष्मीबाई केलकर का विमान कराची के द्रीघ रोड स्थित हवाईअड्डे पर उतर रहा था, लगभग उसी समय अखंड भारत के गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन को लेकर उनका खास डकोटा विमान कराची के मौरीपुर स्थित रॉयल एयरफोर्स के हवाईअड्डे पर उतर रहा था।

ऐसी विकट और अप्रत्याशित परिस्थितियों में अपनी सुरक्षा की चिंता न करते हुए, बहादुर, समर्पित वंदनीय मौसी जी के स्मृति दिवस पर‌ उनका कोटि कोटि वंदन और सादर नमन्।🙏🙏

प्रभु श्रीराम वनवासियों एवं वंचितों के अधिक करीब थेयह एक एतिहासिक तथ्य है कि प्रभु श्री राम ने लंका पर चढ़ाई करने के उद्...
13/12/2023

प्रभु श्रीराम वनवासियों एवं वंचितों के अधिक करीब थे

यह एक एतिहासिक तथ्य है कि प्रभु श्री राम ने लंका पर चढ़ाई करने के उद्देश्य से अपनी सेना वनवासियों एवं वानरों की सहायता से ही बनाई थी। केवट, छबरी, आदि के उद्धार सम्बंधी कहानियां तो हम सब जानते हैं। परंतु, जब वे 14 वर्षों के वनवास पर थे तो इतने लम्बे अर्से तक वनवास करते करते वे स्वयं भी एक तरह से वनवासी बन गए थे। इन 14 वर्षों के दौरान, वनवासियों ने ही प्रभु श्री राम की सेवा सुषुर्शा की थी एवं प्रभु श्री राम भी इनके स्नेह, प्रेम एवं श्रद्धा से बहुत अभिभूत थे। इसी तरह की कई कहानियां इतिहास के गर्भ में छिपी हैं। यह भी एक कटु सत्य है एवं इतिहास इसका गवाह है कि हमारे ऋषि मुनि भी वनवासियों के बीच रहकर ही तपस्या करते रहे हैं। अतः भारत में ऋषि, मुनि, अवतार पुरुष, आदि वनवासियों, जनजातीय समाज के अधिक निकट रहते आए हैं। इस प्रकार, हमारी परम्पराएं, मान्यताएं एवं सोच एक ही है। जनजातीय समाज भी भारत का अभिन्न एवं अति महत्वपूर्ण अंग है।
"आज भी भारत में वनवासी मूल रूप में प्रभु श्री राम की प्रतिमूर्ति ही नजर आते हैं। दिल से एकदम सच्चे, धीर गम्भीर, भोले भाले होते हैं। यह प्रभु श्री राम की उन पर कृपा ही है कि वे आज भी सतयुग में कही गई बातों का पालन करते हैं। परंतु, कई बार ईसाई मशीनरियों एवं कुछ विकृत मानसिकता वाले लोगों द्वारा वनवासियों को उनके मूल स्वभाव से भटकाकर लोभी, लालची एवं रावण का वंशज बताया जाता है। रावण स्वयं तो वनवासी कभी रहे ही नहीं थे एवं वे श्री लंका के एक बुद्धिमान राजा थे। इस बात का वर्णन जैन रामायण में भी मिलता है। अब प्रशन्न यह उठता है कि जब रावण स्वयं एक ब्राह्मण था तो वह वंचित वर्ग का मसीहा या पूर्वज कैसे हो सकता है? जैन रामायण की तरह गोंडी रामायण भी रावण को पुलत्स वंशी ब्राह्मण मानती है, न कि आदिवासियों का पूर्वज, कुछ गोंड पुजारी रावण को अपना गुरु भाई भी मानते हैं, चूंकि पुलत्स ऋषि ने उनके पूर्वजों को भी दीक्षा दी थी। इस तरह के तथ्य भी इतिहास में मिलते हैं कि रावण अपने समय का एक बहुत बड़ा शिव भक्त एवं प्रकांड विद्वान था। रावण जब मृत्यु शैया पर लेटा था तब प्रभु श्री राम ने अपने छोटे भाई लक्ष्मण से कहा था कि रावण अब मृत्यु के निकट है एवं प्रकांड विद्वान है अतः उनसे उनके इस अंतिम समय में कुछ शिक्षा ले लो। तब लक्ष्मण रावण के सिर की तरफ खड़े होकर शिक्षा लेने पहुंचे थे तो लक्ष्मण को कहा गया था कि शिक्षा लेना है तो रावण के पैरों की तरफ आना होगा। तब लक्ष्मण, रावण के पैरों के पास आकर खड़े हुए तब जाकर रावण ने लक्ष्मण को अपने अंतिम समय में शिक्षा प्रदान की थी। अतः रावण अपने समय का एक प्रकांड पंडित था।

भारतीय संस्कृति पर पूर्व में भी इस प्रकार के हमले किए जाते रहे हैं। भारत में समाज को आपस में बांटने के कुत्सित प्रयास कोई नया नहीं हैं। एक बार तो रामायण एवं महाभारत आदि एतिहासिक ग्रंथों को भी अप्रामाणिक बनाने के कुत्सित प्रयास हो चुके हैं। वर्ष 2007 में तो केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय के मातहत भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण ने एक हलफनामा (शपथ पत्र) दायर किया था, जिसमें कहा गया था कि वाल्मीकीय रामायण और गोस्वामी तुलसीदासजी कृत श्रीरामचरितमानस प्राचीन भारतीय साहित्य के महत्त्वपूर्ण हिस्से हैं, लेकिन इनके पात्रों को एतिहासिक रूप से रिकार्ड नहीं माना जा सकता है, जो कि निर्विवाद रूप से इनके पात्रों का अस्तित्व सिद्ध करता हो या फिर घटनाओं का होना सिद्ध करता हो। ये बातें कितनी दुर्भाग्यपूर्ण हैं। यह कहना कि प्रभु श्री राम और रामायण के पात्र (राम, भरत, लक्ष्मण, हनुमान, विभीषण, सुग्रीव और रावण, आदि) एतिहासिक रूप से प्रामाणिक सिद्ध नहीं होते, एक प्रकार से भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात ही था। हालांकि भारतीय जनमानस के आंदोलित होने पर उस समय की भारत सरकार को अपनी गलती का एहसास हुआ था और उसने अपने शपथ पत्र (हलफनामे) को न्यायालय से वापस मांग लिया था।

विभिन्न देशों में वहां की स्थानीय भाषाओं में पाए जाने वाले ग्रंथों एवं विदेशों तक में किए गए कई शोध पत्रों के माध्यम से भी यह सिद्ध होता है कि प्रभु श्री राम 14 वर्ष तक वनवासी बनकर ही वनों में निवास किए थे। अतः यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि प्रभु श्रीराम भी अपने वनवास के दौरान वनवासियों के बीच रहते हुए एक तरह से वनवासी ही बन गए थे। साथ ही, वनों में निवासरत समुदायों ने सहज ही उन्हें अपने से जुड़ा माना और प्रभु श्री राम उनके लिए देव तुल्य होकर उनमें एक तरह से रच बस गए थे। कई वनवासी एवं जनजाति समाजों ने तो अपनी रामायण ही रच डाली है। जिस प्रकार, गोंडी रामायण, जो रामायण को अपने दृष्टिकोण से देखती है, हजारों सालों से गोंडी व पंडवानी वनों में रहने वाले जनजाति समाजों की सांस्कृतिक धरोहर का हिस्सा रही है। गुजरात के आदिवासियों में “डांगी रामायण” तथा वहां के भीलों में “भलोडी रामायण” का प्रचलन है। साथ ही, हृदय स्पर्शी लोक गीतों पर आधारित लोक रामायण भी गुजरात में राम कथा की पावन परम्परा को दर्शाती है।

इसके साथ ही, विदेशों में भी वहां की भाषाओं में लिखी गई रामायण बहुत प्रसिद्ध है। आज प्रभु श्री राम की कथा भारतीय सीमाओं को लांघकर विश्व पटल पर पहुंच गई है और निरंतर वहां अपनी उपयोगिता, महत्ता और गरिमा की दस्तक देती आ रही है। आज यह कथा विश्व की विभिन्न भाषाओं में स्थान, विचार, काल, परिस्थिति आदि में अंतर होने के बावजूद भी अनेक रूपों में, विधाओं में और प्रकारों में लिखी हुई मिलती है। यथा, थाईलेंड में प्रचलित रामायण का नाम “रामकिचेन” है। जिसका अर्थ है राम की कीर्ति। कम्बोडिया की रामायण “रामकेर” नाम से प्रसिद्ध है। लाओस में “फालक फालाम” और “फोमचक्र” नाम से दो रामायण प्रचलित हैं। मलेशिया यद्यपि मुस्लिम राष्ट्र है, परंतु वहां भी “हिकायत सिरीरामा” नामक रामायण प्रचलित है, जिसका तात्पर्य है श्री राम की कथा। इंडोनेशिया की रामायण का नाम “ककविन रामायण” है, जिसके रचनाकार महाकवि ककविन हैं। नेपाल में “भानुभक्त रामायण” और फिलीपीन में “महरादिया लावना” नामक रामायण प्रचलित है। इतना ही नहीं, प्रभु श्री राम को मिस्र (संयुक्त अरब गणराज्य) जैसे मुस्लिम राष्ट्र और रूस जैसे कम्युनिस्ट राष्ट्र में भी लोकनायक के रूप में स्वीकार किया गया है। इन सभी रामायण में भी प्रभु श्री राम के वनवास में बिताए गए 14 वर्षों के वनवास का विस्तार से वर्णन किया गया है।

भारतीय साहित्य की विशिष्टताओं और गहनता से प्रभावित होकर तथा भारतीय धर्म की व्यापकता एवं व्यावहारिकता से प्रेरित होकर समय समय पर चीन, जापान आदि एशिया के विभिन्न देशों से ही नहीं, यूरोप में पुर्तगाल, स्पेन, इटली, फ्रान्स, ब्रिटेन आदि देशों से भी अनेक यात्री, धर्म प्रचारक, व्यापारी, साहित्यकार आदि यहां आते रहे हैं। इन लोगों ने भारत की विभिन्न विशिष्टताओं और विशेषताओं के उल्लेख के साथ साथ भारत की बहुप्रचलित श्रीराम कथा के सम्बंध में भी बहुत कुछ लिखा है। यही नहीं, विदेशों से आए कई विद्वानों जहां इस संदर्भ में स्वतंत्र रूप से मौलिक ग्रंथ लिखे हैं, वहीं कई ने इस कथा से सम्बंधित “रामचरितमानस” आदि विभिन्न ग्रंथों के अनुवाद भी अपनी भाषाओं में किए हैं और कई ने तो इस विषय में शोध ग्रंथ भी तैयार किए हैं।

भारत के वनवासियों के तो रोम रोम में प्रभु श्री राम बसे हैं। उन्हें प्रभु श्रीराम से अलग ही नहीं किया जा सकता है। यह सोचना भी हास्यास्पद लगता है। प्रभु श्री राम की जड़ें आदिवासियों में बहुत गहरे तक जुड़ी हैं। अतः यह कहा जा सकता है कि विदेशी मशीनरियों के कुत्सित प्रयासों को विफल करते हुए भारतीय संस्कृति पर हमें गर्व करना होगा। धर्मप्राण भारत सारे विश्व में एक अद्भुत दिव्य देश है। इसकी बराबरी का कोई देश नहीं है क्योंकि भारत में ही प्रभु श्रीराम एवं श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। हमारे भारतवर्ष में भगवान स्वयं आए हैं एवं एक बार नहीं अनेक बार आए हैं। हमारे यहां गंगा जैसी पावन नदी है एवं हिमालय जैसा दिव्य पर्वत है। ऐसे भाग्यशाली कहां हैं अन्य देशों के लोग।"
-Prahlad Sabnani

#सबके_राम #सबके_लिए_राम #अयोध्याधाम

मनोहर पार्रिकर "13 दिसम्बर / जन्मदिन' मनोहर पार्रीकर भारत के एक राजनेता थे जो तीन बार गोवा के मुख्यमंत्री रहे। इसके अलाव...
13/12/2023

मनोहर पार्रिकर "13 दिसम्बर / जन्मदिन'

मनोहर पार्रीकर भारत के एक राजनेता थे जो तीन बार गोवा के मुख्यमंत्री रहे। इसके अलावा वे भारत के रक्षा मन्त्री भी रहे। वे उत्तर प्रदेश से राज्य सभा सांसद भी रहे थे। उन्होंने सन 1978 मे आई.आई.टी. मुम्बई से स्नातक की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। भारत के किसी राज्य के मुख्यमंत्री बनने वाले वह पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने आई.आई.टी. से स्नातक किया। उन्हें सन 2001 में आई.आई.टी. मुम्बई द्वारा विशिष्ट भूतपूर्व छात्र की उपाधि भी प्रदान की गयी थी।
मनोहर पर्रिकर का जन्म 13 दिसंबर 1955 को गोवा के मापुसा में हुआ था। उनकी शिक्षा लोयोला हाई स्कूल, मार्गो में हुई। उन्होंने अपनी माध्यमिक शिक्षा मराठी में पूरी की और 1978 में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, मुम्बई से धातुकर्म इंजीनियरिंग में बीटेक की डिग्री प्राप्त की। वे IIT के प्रथम पूर्वछात्र थे, जिन्होंने किसी भारतीय राज्य के विधायक के रूप में सेवा की। उन्हें 2001 में IIT उन्हे प्रतिष्ठित पूर्व छात्र पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

भारतीय जनता पार्टी से गोवा के मुख्यमंत्री बनने वाले वह पहले नेता हैं। 1994 में उन्हें गोआ की द्वितीय व्यवस्थापिका के लिये चयनित किया गया था। जून 1999 से नवम्बर 1999 तक वह विरोधी पार्टी के नेता रहे। 24 अक्टूबर् 2000 को वह गोवा के मुख्यमन्त्री बने किंतु उनकी सरकार 27 फ़रवरी 2002 तक ही चल पाई। जून 2002 में वह पुनः विधानसभा के सदस्य बने तथा 5 जून 2002 को पुनः गोवा के मुख्यमन्त्री पद के लिये चयनित हुए।
13 मार्च 2017 को भाजपा नेता मनोहर पर्रिकर ने गोवा के मुख्यमंत्री के रूप में चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

बी.जे.पी. को गोवा की सत्ता में लाने का श्रेय उनको ही जाता है। इसके अतिरिक्त भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव को अकेले गोवा लाने का तथा किसी भी अन्य सरकार से कम समय मे एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर की मूलभूत संरचना खड़ी करने का श्रेय भी उन्ही को जाता है। कई समाज सुधार योजनाओं जैसे दयानन्द सामाजिक सुरक्षा योजना जो कि वृद्ध नागरिकों को आर्थिक सहायता प्रदान करती है, साइबरएज योजना, सी.एम. रोजगार योजना इत्यादि में भी उनका प्रमुख योगदान रहा है। उन्हें कई प्रतिष्ठित प्रतिभाओं जैसे डॉ॰ अनुपम सराफ तथा आर. सी. सिन्हा इत्यादि को सरकार में सलाहकार के तौर पर शामिल करने का श्रेय भी जाता है। प्लानिंग कमीशन ऑफ इन्डिया तथा इंडिया टुडे के द्वारा किय गए सर्वे़क्षण के अनुसार उनके कार्यकाल में गोवा लगातार तीन साल तक भारत का सर्वश्रेष्ठ शासित प्रदेश रहा। कार्यशील तथा सिद्धांतवादी श्री पारिकर को गोवा में मि. क्लीन के नाम से जाना जाता है।

29 जनवरी 2005 को 4 बी.जे.पी. नेताओं के इस्तीफा देने के कारण उनकी सरकार अल्पमत में आ गयी। श्री पारिकर ने दावा किया कि वह अपना बहुमत साबित करेंगे तथा फरवरी 2005 में ऐसा हुआ भी. किंतु बाद मे किसी कारणवश उन्हें अपना पद खोना पड़ा। लगातार विवादों के पश्चात मार्च 2005 में गोवा में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया किंतु जून 2005 में विरोधी नेता प्रताप सिंह राणे गोवा के मुख्यमंत्री बना दिये गये। दिनांक 17 मार्च 2019 की शाम को पहले मुख्यमंत्री कार्यालय से जारी सूचना में उनका स्वास्थ्य अत्यधिक खराब होने की बात कही गयी थी परंतु कुछ ही देर बाद राष्ट्रपति कार्यालय से उनकी मृत्यु पर संवेदना व्यक्त करने से उनकी मृत्यु की पुष्टि हो गयी
#हरदिनपावन

*कभी सनातन पाखंड , कभी गोबर प्रदेश और अब गौमूत्र बैल्ट ।* उत्तर भारत  , पश्चिमी भारत और महाराष्ट्र तक के मध्य भारत को यह...
13/12/2023

*कभी सनातन पाखंड , कभी गोबर प्रदेश और अब गौमूत्र बैल्ट ।*

उत्तर भारत , पश्चिमी भारत और महाराष्ट्र तक के मध्य भारत को यह संज्ञा स्टालिन की डीएमके पार्टी के नेता एक एककर प्रदान कर रहे हैं । डीएमके सांसद ने तो संसद में ही कह दिया कि गौमूत्र प्रदेश मोदी को वोट देते हैं ।

*स्टालिन के बेटे पहले सम्पूर्ण सनातन को ही गाली दे रहे थे , अब पूरी हिन्दी बैल्ट को गौमूत्र एरिया बता रहे हैं ।* वैसे थोड़ी गलती कर गए , देश के तमाम हिंदुओं का नाता जन्म संस्कार से मृत्यु संस्कार तक गौमूत्र से रहता है । पांडेचेरी को मिलाकर दक्षिण भारत के छह राज्यों में भी गौमूत्र हिन्दू संस्कारों में काम आता है ।

हिंदुओं को कोई परहेज गौमूत्र से कभी रहा नहीं । उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक देश के 115 करोड़ हिन्दू गाय को माता और गौमूत्र को अमृत के समान मानते हैं ।
नरेंद्र सिंह

कैलाश पीठाधीश्वर स्वामी विद्यानन्द गिरि "13 दिसम्बर/पुण्य-तिथि"उत्तराखण्ड में चार धाम की यात्रा हरिद्वार और ऋषिकेश से प्...
13/12/2023

कैलाश पीठाधीश्वर स्वामी विद्यानन्द गिरि "13 दिसम्बर/पुण्य-तिथि"

उत्तराखण्ड में चार धाम की यात्रा हरिद्वार और ऋषिकेश से प्रारम्भ होती है। प्रायः गंगा जी में स्नान कर ही लोग इस यात्रा पर निकलते हैं। गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और फिर बदरीनाथ भगवान के दर्शन कर यह यात्रा पूर्ण होती है। इसके बाद फिर से गंगा माँ का पूजन-अर्चन कर श्रद्धालु अपने घर की ओर प्रस्थान करते हैं। हरिद्वार और ऋषिकेश में गंगा के तट पर अनेक आश्रम बने हैं, जहाँ तेजस्वी सन्त रहकर साधना करते हैं और देश-विदेश से आने वाले तीर्थयात्रियों को उचित सहयोग प्रदान करते हैं।

ऐसे ही प्रसिद्ध आश्रमों में ऋषिकेश का कैलास आश्रम भी है, जहाँ के अधिष्ठाता पूज्य स्वामी विद्यानन्द जी महाराज 13 दिसम्बर, 2007 को ब्रह्म मुहूर्त में अनन्त की यात्रा पर चले गये। स्वामी जी ने अपने सान्निध्य में कई विद्वान् एवं अद्वैत वेदान्त के मर्मज्ञ निर्माण किये। देश और विदेश में प्रवास करते हुए उन्होंने अपने प्रवचनों के माध्यम से प्रस्थान त्रयी (गीता, ब्रह्मसूत्र एवं उपनिषद) को जन-जन तक पहुँचाया।

स्वामी जी का जन्म ग्राम गाजीपुर (जिला पटना, बिहार) में सन 1921 ई. में हुआ था। इनके बचपन का नाम चन्दन शर्मा था। स्वामी जी के समृद्ध एवं पावन परिवार की दूर-दूर तक बहुत ख्याति थी। ये अपने माता-पिता की एकमात्र सन्तान थे। बचपन से ही सन्तों के प्रवचन और सेवा में उन्हें बहुत आनन्द आता था।

संस्कृत के प्रति रुचि होने के कारण इन्होंने स्वामी विज्ञानानन्द और स्वामी नित्यानन्द गिरि जी के सान्निध्य में गीता, ब्रह्मसूत्र तथा उपनिषदों का गहन अध्ययन किया। इसके बाद इन्होंने अवधूत श्री ब्रह्मानन्द जी के पास रहकर पाणिनि की अष्टाध्यायी और इसके महाभाष्यों का अध्ययन किया।

इसके बाद और उच्च अध्ययन करने के लिए स्वामी जी काशी आ गये। यहाँ दक्षिणामूर्ति मठ में रहकर इन्होंने आचार्य, वेदान्त और सर्वदर्शनाचार्य तक की सभी परीक्षाएँ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कीं। इसके बाद इन्होंने बिना किसी वेतन के वहीं अध्यापन किया। इनकी योग्यता और प्रबन्ध कौशल देखकर मठ के महामण्डलेश्वर स्वामी नृसिंह गिरि जी ने इन्हें अपने दिल्ली स्थित विश्वनाथ संस्कृत महाविद्यालय का प्राचार्य बनाकर भेज दिया।

इससे इनकी ख्याति सब ओर फैल गयी। 1968 में इन्होंने आचार्य महेशानन्द गिरि जी से संन्यास की दीक्षा ली। अब इनका नाम विद्यानन्द गिरि हो गया। नृसिंह गिरि जी इन्हें दक्षिणामूर्ति मठ का महामण्डलेश्वर बनाना चाहते थे; पर किसी कारण से वह सम्भव नहीं हो पाया।

इधर सुयोग्य व्यक्ति के अभाव में कैलास आश्रम की गतिविधियाँ ठप्प थीं। ऐसे में उसके पीठाचार्य स्वामी चैतन्य गिरि जी की दृष्टि विद्यानन्द जी पर गयी। उनका आदेश पाकर स्वामी जी कैलास आश्रम आ गये और 20 जुलाई, 1969 को वैदिक रीति से उनका विधिवत अभिषेक कर दिया गया।

इसके बाद स्वामी जी ने लगातार 39 वर्ष तक आश्रम की गतिविधियों का कुशलता से स॰चालन किया। उन्होंने अनेक प्राचीन आश्रमों का जीर्णोद्धार और लगभग 125 दुर्लभ ग्रन्थों का प्रकाशन कराया। धर्म एवं राष्ट्र जागरण के लिए किये जाने वाले किसी भी प्रयास को सदा उनका आशीर्वाद एवं सहयोग रहता था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिन्दू परिषद के प्रति उनके मन में अतिशय प्रेम था। स्वामी जी की स्मृति को शत-शत प्रणाम
#हरदिनपावन

12/12/2023

भाइयों मंगलवार आ रहा है। हर मंगलवार को आप मंदिर में पहुंचने की आदत डालें ।
जैसे अन्य सभी धर्मों के भक्त निश्चित दिन अवश्य अपने धार्मिक स्थल ज़रूर जाते हैं।
वैसे ही हमें भी मंगलवार का दिन तय करना पड़ेगा बल और बुद्धि का दिवस शक्ति का दिवस हनुमान जी का दिवस।
आप सभी को शिकायत होती है कि हिंदू कभी हिंदू के लिए खड़ा नहीं होता। कैसे होगा क्या आपने ऐसा कोई नियम बना रखा है जिसमें आप कम से कम सप्ताह में एक बार एक दूसरे से मिले।
आइए हम अपने वीरान पड़े मंदिरों को शक्ति और संगठन स्थल के रूप में विकसित करें।
हर मंगलवार को सायं 6:00 से 6.30 के बीच आप चाहे कहीं भी है मंदिर अवश्य पहुंचे ।हनुमान चालीसा एवं आरती का समय यही होता है।
आप अपने घर पर हैं तो घर के पास के मंदिर में ।दुकान पर है तो दुकान के पास के मंदिर में ऑफिस में है तो ऑफिस के पास किसी मंदिर में ।अगर आप यात्रा पर भी हैं तो आप जहां भी हैं वहां पर आसपास किसी भी मंदिर में हर मंगलवार सायं 6:30 से 7.00 के बीच जरूर पहुंचे।
कल्पना कीजिए भारतवर्ष में लाखों लाखों मंदिर है अगर हर मंदिर में सिर्फ 50 से 100 लोग भी पहुंचेंगे और एक साथ उनके घंटों की शंख की और आरती की आवाजें गूंज आएगी तो एक मिश्रित संगीत जब पूरे भारतवर्ष में हर मंगलवार ठीक सायं 6:00 से 6.30के बीच में गूंजेगा तो यह आवाज पूरी दुनिया में जाएगी इसका असर बहुत ही दूरगामी होगा। विश्वास कीजिए आज की सभी समस्याएं कपूर की तरह उड़ जाएगी इतनी बड़ी संख्या में जब हिंदू अपने मंदिरों में पहुंचेगा वह भी हर सप्ताह तो किसी माई के लाल में हिम्मत नहीं होगी कि हिंदू को छेड़ सके।
हो सके तो अपने साथ अपने बीवी बच्चों को हुई लेकर मंदिर जाए जब आप इस तरह से नियमित रूप से हर मंगलवार मंदिर पहुंचेंगे तो वहां आपके आस पड़ोस में एक ही जो लोग हैं वह भी आपसे मिलेंगे आपकी जान पहचान पड़ेगी आपस में संबंध बढ़ेंगे और फिर आप एक दूसरे के सुख दुख में भी शामिल होंगे इसी तरह से हम सभी एकता के सूत्र में बंध जाएंगे।
अगर संदेश पसंद आया है तो इसे सभी ग्रुपों में प्रसारित करें। और आज ही प्रण करें चाहे हम कुछ भी कर रहे हैं हर मंगलवार सायं 6:00 से 6.30 के बीच हम मंदिर जरूर पहुंचेंगे अपने लिए नहीं अपने समाज और अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा के लिए। ध्यान रहे अब यह आवश्यक हो चुका है अगर आप इसे अभी भी डालते रहे तो बहुत बड़े खतरे में आप पढ़ने वाले हैं। जितना शीघ्र आप इसे शुरू करेंगे इतना जल्दी आप एक दूसरे से एकता के सूत्र में बंध जाएंगे।!

12/12/2023
06/12/2023

पर्यावरण संरक्षण के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा उन सबका इगो है, जो बदलना नहीं चाहते. दरअसल, ज़्यादातर बड़ी कंपनियों को चलाने वाले वो व्यक्ति जिनको पर्यावरण के विषय में अच्छी जानकारी है अपनी इगो के कारण ध्यान नही दे पा रहे है. इन प्रदूषण फैलाने वालों को पता है कि उनके फ़ैसलों की वजह से धरती पर लोग मर रहे हैं. इसलिए अपने फ़ैसले न बदलने की उनके पास कोई वजह नहीं है.

04/12/2023

RSS अर्थात् राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ

क्या है ये आरएसएस अथवा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ

अगर जानना है तो अपने जीवन काल का लगभग 17.30 मिनट निकालिए और देखिए,सुनिए और मनन कीजिए।

आपने जो भी धारणा संघ (आरएसएस) के बारे में बना रखी है किंचित वो ऐसी ही हो अथवा कुछ इतर (भिन्न) हो।

स्वयं सेवक बनना एवम् समर्पण करना साधारण है या असाधारण ये निर्णय आप पर छोड़ता हूं।जय श्री कृष्ण

02/12/2023

पितरों के समान हैं ये
3 वृक्ष,
3 पक्षी,
3 पशु और
3 जलचर
धर्मशास्त्रों अनुसार पितरों का पितृलोक चंद्रमा के उर्ध्वभाग में माना गया है।
दूसरी ओर अग्निहोत्र कर्म से आकाश मंडल के समस्त पक्षी भी तृप्त होते हैं। पक्षियों के लोक को भी पितृलोक कहा जाता है।
तीसरी ओर कुछ पितर हमारे वरुणदेव का आश्रय लेते हैं और वरुणदेव जल के देवता हैं। अत: पितरों की स्थिति जल में भी बताई गई है।

तीन वृक्ष:-
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1. पीपल का वृक्ष:-
पीपल का वृक्ष बहुत पवित्र है। एक ओर इसमें जहां विष्णु का निवास है वहीं यह वृक्ष रूप में पितृदेव है। पितृ पक्ष में इसकी उपासना करना या इसे लगाना विशेष शुभ होता है।

2. बरगद का वृक्ष:-
बरगद के वृक्ष में साक्षात शिव निवास करते हैं। अगर ऐसा लगता है कि पितरों की मुक्ति नहीं हुई है तो बरगद के नीचे बैठकर शिव जी की पूजा करनी चाहिए।

3. बेल का वृक्ष:-
यदि पितृ पक्ष में शिवजी को अत्यंत प्रिय बेल का वृक्ष लगाया जाय तो अतृप्त आत्मा को शान्ति मिलती है। अमावस्या के दिन शिव जी को बेल पत्र और गंगाजल अर्पित करने से सभी पितरों को मुक्ति मिलती है।
इसके अलावा अशोक, तुलसी, शमी और केल के वृक्ष की भी पूजा करना चाहिए।

तीन पक्षी:-
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1. कौआ:-
कौए को अतिथि-आगमन का सूचक और पितरों का आश्रम स्थल माना जाता है। श्राद्ध पक्ष में कौओं का बहुत महत्व माना गया है। इस पक्ष में कौओं को भोजन कराना अर्थात अपने पितरों को भोजन कराना माना गया है। शास्त्रों के अनुसार कोई भी क्षमतावान आत्मा कौए के शरीर में स्थित होकर विचरण कर सकती है।

2. हंस:-
पक्षियों में हंस एक ऐसा पक्षी है जहां देव आत्माएं आश्रय लेती हैं। यह उन आत्माओं का ठिकाना हैं जिन्होंने अपने ‍जीवन में पुण्यकर्म किए हैं और जिन्होंने यम-नियम का पालन किया है। कुछ काल तक हंस योनि में रहकर आत्मा अच्छे समय का इंतजार कर पुन: मनुष्य योनि में लौट आती है या फिर वह देवलोक चली जाती है। हो सकता है कि आपके पितरों ने भी पुण्य कर्म किए हों।

3. गरुड़:-
भगवान गरुड़ विष्णु के वाहन हैं। भगवान गरुड़ के नाम पर ही गुरुढ़ पुराण है जिसमें श्राद्ध कर्म, स्वर्ग नरक, पितृलोक आदि का उल्लेख मिलता है। पक्षियों में गरुढ़ को बहुत ही पवित्र माना गया है। भगवान राम को मेघनाथ के नागपाश से मुक्ति दिलाने वाले गरूड़ का आश्रय लेते हैं।
पितर... इसके अलावा क्रोंच या सारस का नाम भी लिया जाता है।

तीन पशु:-
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1. कुत्ता:-
कुत्ते को यम का दूत माना जाता है। कहते हैं कि इसे ईधर माध्यम की वस्तुएं भी नजर आती है।
दरअसल कुत्ता एक ऐसा प्राणी है, जो भविष्‍य में होने वाली घटनाओं और ईथर माध्यम (सूक्ष्म जगत) की आत्माओं को देखने की क्षमता रखता है।
कुत्ते को हिन्दू देवता भैरव महाराज का सेवक माना जाता है। कुत्ते को भोजन देने से भैरव महाराज प्रसन्न होते हैं और हर तरह के आकस्मिक संकटों से वे भक्त की रक्षा करते हैं। कुत्ते को रोटी देते रहने से पितरों की कृपा बनी रहती है।

2. गाय:-
जिस तरह गया में सभी देवी और देवताओं का निवास है उसी तरह गाय में सभी देवी और देवताओं का निवास बताया गया है।
दरअसल मान्यता के अनुसार 84 लाख योनियों का सफर करके आत्मा अंतिम योनि के रूप में गाय बनती है। गाय लाखों योनियों का वह पड़ाव है, जहां आत्मा विश्राम करके आगे की यात्रा शुरू करती है।

3. हाथी:-
हाथी को हिन्दू धर्म में भगवान गणेश का साक्षात रूप माना गया है। यह इंद्र का वाहन भी है। हाथी को पूर्वजों का प्रतीक भी माना गया है। जिस दिन किसी हाथी की मृत्यु हो जाती है उस दिन उसका कोई साथी भोजन नहीं करता है। हाथियों को अपने पूर्वजों की स्मृतियां रहती हैं।
अश्विन मास की पूर्णिमा के दिन गजपूजा विधि व्रत रखा जाता है।सुख-समृद्धि की इच्छा रखने वाले उस दिन हाथी की पूजा करते हैं।
इसके अलावा वराह, बैल और चींटियों का यहां उल्लेख किया जा सकता है। जो चींटी को आटा देते हैं और छोटी-छोटी चिड़ियों को चावल देते हैं, वे वैकुंठ जाते हैं।

तीन जलचर जंतु:-
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1. मछली:-
भगवान विष्णु ने एक बार मत्स्य का अवतार लेकर मनुष्य जाती के अस्त्वि को जल प्रलय से बचाया था। जब श्राद्ध पक्ष में चावल के लड्डू बनाए जाते हैं तो उन्हें जल में विसर्जित कर दिया जाता है।

2. कछुआ:-
भगवान विष्णु ने कच्छप का अवतार लेकर ही देव और असुरों के लिए मदरांचल पर्वत को अपनी पीठ पर स्थापित किया था। हिन्दू धर्म में कछुआ बहुत ही पवित्र उभयचर जंतु है जो जल की सभी गतिविधियों को जानता है।

3. नाग:-
भारतीय संस्कृति में नाग की पूजा इसलिए की जाती है, क्योंकि यह एक रहस्यमय जंतु है। यह भी पितरों का प्रतीक माना गया है।
इसके अलावा मगरमच्छ भी माना जाता है।

नए भारत का वैश्विक संकल्प...
सनातन वैदिक धर्म...विश्व धर्म
अखंड हिंदु राष्ट्र भारत...विश्व गुरु भारत

धर्मो रक्षति रक्षितः...🚩

02/12/2023

पिता कभी नहीं कहते, मेरे पास पैसे नहीं है। मां ने कभी नहीं कहा, मेरी तबीयत खराब है। इन्हीं दो झूठ की वजह से आप की दुनिया सुंदर बनी हुई है।

01/12/2023

*ललितपुर, झांसी, तालबेहट, ग्वालियर, चंदेरी समेत समस्त बुंदेलखंड में फैला हुआ था संकरी “सुरंगों” अर्थात “रैट टनेल्स” का जाल*

आज जब “रैट टनल” खोदने वालों द्वारा जीवटता से अत्याधुनिक मशीनों को धता बताते हुए उत्तराखंड की धंस चुकी सिल्कयारा सुरंग में से 41 लोगों की जान बचाने का लोमहर्षक वाकया सबकी जुबान पर है, तभी इस तथ्य का बड़े ही हलके तरीके से उल्लेख हुआ है कि *बुंदेलखंड के दो महत्वपूर्ण गढ़ “झांसी और कालिंजर” के किलों से भी ऐसी सुरंगें निकलती थीं। ऐसी ही एक सुरंग से वीरता और बुंदेलखंड ही नहीं पूरी दुनिया की महिलाओं के साहस और शक्ति की प्रतीक महारानी लक्ष्मीबाई के प्रयोग कर सुरक्षित निकलने और ब्रिटिश सेना के विरुद्ध सैन्य संगठन खड़ा करने में समर्थ होने का इतिहासकार उल्लेख करते हैं।*

बुंदेलखंड के जागीरदारों के वंशज इस बात से भलीभांति वाकिफ होंगे कि हमारे यहाँ ऐसी सुरंगों का होना आम बात हुआ करती थी|

कई पुरानी कोठियों और कच्ची कोठियों में कच्चे फर्शों के नीचे खुदाई करने पर लंबी और अनंत दूरी तक दिखाई पड़ने वाली सुरंग के दर्शन होना आम घटना थी । इनमें बड़े मटकों, हंडियों में, एयर टाइट, पैक करके, पानी, अनाज और धन संपत्ति भी छुपाकर रखी जाती थी। जिससे किसी आपातकालीन स्थिति में घर से बाहर निकलने के अलावा, राशन पानी का भी इंतजाम रहे। इनमें कई दिनों तक पानी और राशन प्राकृतिक रूप से सुरक्षित रहता था खराब नहीं होता था। में टॉर

*ललितपुर में “रावर स्कूल” (रावर का बुंदेली में मतलब होता है “रनिवास” या “रानी का महल”) में जो बावड़ी है वहाँ एकदम तलहटी में एक दरवाज़ा है, जिसे पत्थरों से पूरी तरह ढँक दिया गया था, वह और कुछ नहीं बल्कि एक लंबी सुरंग का दरवाजा है|* बावड़ी में लबालब पानी होने पर यह दरवाज़ा पानी में डूबा रहता और सुरंग तिरछी ऊपर की तरफ उठती हुई जाती जिससे पानी आगे सुरंग में न भरे| बचपन में हम लोग खेलते कूदते या गेंद नीचे चली जाने पर उस बावड़ी की सीढ़ियों से नीचे जाते लेकिन भय से कांपते भी रहते| कारण, ऐसा कहते थे कि उस बावड़ी में चुड़ैलें रहतीं हैं| शायद ऐसे गुप्त स्थानों से लोगों को दूर रखने के लिए ही इस तरह की अफवाहें फैला दी जाती होंगीं|

कोई कहता था सुरंग सीधी टीकमगढ़ जाती है, कोई कहता था चंदेरी| कोई कोई तो ये भी कहते थे कि रानी लक्ष्मीबाई का जब अंग्रेज़ सेना पीछा कर रही थी तो वे पानी से भरी इसी बावड़ी में कूद गईं, और गायब हो गईं। अंग्रेज़ हैरत में थे कि कहाँ गायब हो गईं।

*बुंदेलखंड की सुरंग निर्माण की इस प्राचीन विधा जिसे अब रैट माइनिंग तकनीक के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त है, इस पर गर्व करने का बुन्देलखंडियों को पूरा पूरा अधिकार है, जिसने 41 लोगों की जानें बचाने का वह करिश्माई चमत्कार कर दिखाया जहाँ बाकी सब तकनीक असफल हो गईं ।*

जय हिंद।
🌷

27/11/2023

स्कंदपुराण में एक सुंदर श्लोक है
अश्वत्थमेकम् पिचुमन्दमेकम्
न्यग्रोधमेकम् दश चिञ्चिणीकान्।
कपित्थबिल्वाऽऽमलकत्रयञ्च पञ्चाऽऽम्रमुप्त्वा नरकन्न पश्येत्।।

अश्वत्थः*= पीपल (100% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
पिचुमन्दः = नीम (80% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
न्यग्रोधः = वटवृक्ष (80% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
चिञ्चिणी = इमली (80% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
कपित्थः = कविट (80% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
बिल्वः = बेल (85% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
आमलकः = आवला (74% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
आम्रः = आम (70% कार्बन डाइऑक्साइड सोखता है)
(उप्ति = पौधा लगाना)

अर्थात् - जो कोई इन वृक्षों के पौधो का रोपण करेगा, उनकी देखभाल करेगा उसे नरक के दर्शन नही करना पड़ेंगे।

इस सीख का अनुसरण न करने के कारण हमें आज इस परिस्थिति के स्वरूप में नरक के दर्शन हो रहे हैं।
अभी भी कुछ बिगड़ा नही है, हम अभी भी अपनी गलती सुधार सकते हैं।
औऱ
गुलमोहर , निलगिरी - जैसे वृक्ष अपने देश के पर्यावरण के लिए घातक हैं।

पश्चिमी देशों का अंधानुकरण कर हम ने अपना बड़ा नुकसान कर लिया है।

पीपल, बड और नीम जैसे वृक्ष रोपना बंद होने से सूखे की समस्या बढ़ रही है।

ये सारे वृक्ष वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ाते है। साथ ही, धरती के तापनाम को भी कम करते है।

हमने इन वृक्षों के पूजने की परंपरा को अन्धविश्वास मानकर फटाफट संस्कृति के चक्कर में इन वृक्षो से दूरी बनाकर *यूकेलिप्टस* ( *नीलगिरी* ) के वृक्ष सड़क के दोनों ओर लगाने की शुरूआत की। यूकेलिप्टस झट से बढ़ते है लेकिन ये वृक्ष दलदली जमीन को सुखाने के लिए लगाए जाते हैं। इन वृक्षों से धरती का जलस्तर घट जाता है। विगत ४० वर्षों में नीलगिरी के वृक्षों को बहुतायात में लगा कर पर्यावरण की हानि की गई है।

शास्त्रों में पीपल को * वृक्षों*का राजा कहा गया है⤵️

मूले ब्रह्मा त्वचा विष्णु शाखा शंकरमेवच।
पत्रे पत्रे सर्वदेवायाम् वृक्ष राज्ञो नमोस्तुते।।
भावार्थ -जिस वृक्ष की जड़ में ब्रह्मा जी तने पर श्री हरि विष्णु जी एवं शाखाओं पर देव आदि देव महादेव भगवान शंकर जी का निवास है और उस वृक्ष के पत्ते पत्ते पर सभी देवताओं का वास है ऐसे वृक्षों के राजा पीपल को नमस्कार है.

आगामी वर्षों में प्रत्येक ५०० मीटर के अंतर पर यदि एक एक पीपल, बड़ , नीम आदि का वृक्षारोपण किया जाएगा, तभी अपना भारत देश प्रदूषणमुक्त होगा।

घरों में तुलसी के पौधे लगाना होंगे।
आइए हम पीपल , बड़ , बेल , नीम , आंवला एवं आम आदि वृक्षों को लगाकर आने वाली पीढ़ी को निरोगी पर्यावरण " देने का प्रयत्न करें.
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25/11/2023

संतानों को धन नहीं, संस्कार दीजिए

परिवार के पालने में आमतौर से यह दृष्टिकोण रहता है कि किसके लिए क्या सुविधा-साधन जुटाए गए ? स्त्री-बच्चों के लिए भोजन, वस्त्र एवं मनोविनोद के विविध पदार्थों एवं परिस्थितियों के लिए चेष्टा चलती रहती है। इसमें जितनी सफलता मिली, उतना ही संतोष कर लिया जाता है कि हमने परिवार पालन का आवश्यक कर्त्तव्य पालन कर लिया।

विचार करने पर यह दृष्टिकोण अधूरा और ओछा ही सिद्ध होता है। सुविधा-साधन उतनी ही मात्रा में जुटाए जाने चाहिए जितने कि निर्वाह की आवश्यक जरूरतें पूरी करने के लिए अभीष्ट हैं। *"विलासिता" और "अहंकारिता" का प्रदर्शन करने के लिए जो भी साधन जुटाए जाते हैं, वे तात्कालिक प्रसन्नता भले ही दे सकें, उनके परिणाम अंततः बुरे ही होते हैं।

विलासिता के साधनों का उपभोग करने की आदत यदि छोटेपन से ही पड़ जाए तो अनावश्यक खर्च भी आवश्यक जैसे प्रतीत होने लगेंगे और उनकी पूर्ति न हो सकने पर निरंतर दुःख बना रहेगा। जीवन की पगडंडी बड़ी ऊबड़-खाबड़ है। कहा नहीं जा सकता कि कब, किसे, किस स्थिति का सामना करना पड़े ? आवश्यक नहीं कि जो संपन्नता आज है, वह भविष्य में भी बनी ही रहेगी। जो आज की आमदनी है वह भविष्य में भी बच्चों को उपलब्ध होती ही रहेगी। *यदि घटिया परिस्थितियाँ सामने आई और कम खर्च में गुजारा करना पड़ा तो वे विलासी आदतें जो अभिभावकों ने लाड़ में लगा दी थीं, समस्त जीवन काल में दुःखदाई रहेंगी।

अभावग्रस्तता यदि सहन न हो सकी तो वे अपराधी रीति-नीति अपना लेंगे और अपना लोक-परलोक दोनों ही बिगाड़ेंगे। इन दूरगामी परिणामों पर जो ध्यान नहीं दे सकते वे ही अपने परिवार को अनावश्यक विलासी साधनों का अभ्यस्त बनाते चले जाते हैं। वे नहीं जानते कि यह लाड़-चाव प्रकारांतर से परिवार के सदस्यों के साथ शत्रुता बरतने जैसा व्यवहार ही है।
परिवार के प्रत्येक सदस्य को सुसंस्कारी बनाना गृहपति का सबसे महत्त्वपूर्ण और सबसे आवश्यक कर्त्तव्य है। सद्‌गुणों को स्वभाव का अंग बनाया जा सके, कर्मनिष्ठा में उत्साह स्थिर रह सके ऐसे अभ्यास आरंभ से ही कराए जाने चाहिए।

परिस्थितियाँ ऐसी उत्पन्न करनी चाहिए, जिनमें रहकर बालक मानवोचित सद्‌गुणों की शिक्षा प्राप्त कर सके और जीवन संग्राम में तैयारी के साथ उतर सके। परिजनों में ऐसी कर्मठता और साहसिकता उत्पन्न करने के लिए जिन अभिभावकों ने प्रबल प्रयत्न किए उन्हीं को सच्चे अर्थों में परिवार का पालनकर्ता कह सकते हैं। बुरी आदतों का अभ्यासी बनाकर जिंदगी भर कँटीली झाड़ियों में भटकने के लिए जिन्होंने अपनी संतान को असहाय छोड़ दिया, उन्होंने प्रकारांतर से शत्रुता ही बरती। बालकों को विलासिता, अहंकारिता और उच्छृंखलता बरतने के अवसर देना वस्तुतः गृह संचालन के पवित्र कर्तव्य से सर्वथा विपरीत स्तर की बात है।
🪴पं.श्रीराम शर्मा आचार्य🪴

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