Bol Palwal

Bol Palwal Voice of Palwal people's

07/11/2025

हमारे जीवन की प्रगति और उत्थान में तीन प्रमुख बाधाएँ सबसे बड़ी भूमिका निभाती हैं-

1. दिखावा (Show Off)
2. अहंकार (Ego)
3. रवैया / दृष्टिकोण (Attitude)

यदि हम इन तीनों से बचें और इन्हें अपने जीवन में न अपनाएँ, तो हम अनेक समस्याओं से बच सकते हैं और जीवन को सुखमय ढंग से व्यतीत कर सकते हैं।

यह हरियाणा की मिट्टी की खुशबू, हमारी संस्कृति की असली पहचान है फोटो में दिखाई गई दूध बिलौने की मधाणी सिर्फ एक बर्तन नहीं...
02/11/2025

यह हरियाणा की मिट्टी की खुशबू, हमारी संस्कृति की असली पहचान है
फोटो में दिखाई गई दूध बिलौने की मधाणी सिर्फ एक बर्तन नहीं, बल्कि हमारी विरासत, मेहनत और प्यार की निशानी है।
पिताजी- दादाजी के जमाने की वो सुबहें, जब आँगन में मधाणी की खट-खट के साथ घर भर में ताज़े माखन की खुशबू फैल जाती थी…
यही है हरियाणा – सादगी में शान, मेहनत में मान, और संस्कार में जान।

चले मिलकर अपनी संस्कृति, बोली, खानपान और लोक रीति-रिवाजों को गर्व से आगे बढ़ाएँ।
"जितनी मिट्टी, उतना प्यार… जितना खेत, उतना संस्कार… हरियाणा म्हारा छाती का हार!"

#मिट्टी_की_खुशबू #लोकसंस्कृति #मधाणी

दूध दही का देसी खाणा,धोती खंडके का सीधा बाणा ।खेल हो या फ़ौज, सब तै आगे पाणा,जिंदाबाद रहे सदा म्हारा हरियाणा।।हरियाणा दि...
01/11/2025

दूध दही का देसी खाणा,
धोती खंडके का सीधा बाणा ।
खेल हो या फ़ौज, सब तै आगे पाणा,
जिंदाबाद रहे सदा म्हारा हरियाणा।।

हरियाणा दिवस की सारा नै राम राम अर घणी-घणी बधाई।
#हरियाणा_दिवस

प्राचीन श्वास तकनीक - 5000 साल पुराना रहस्य जो वैज्ञानिकों को अचंभित कर रहा है। 🟥🟦🟨🟥🟦🟨🟥🟦🟨🟥🟦🟨🟥कल्पना कीजिए, आप ऐसी प्राची...
27/10/2025

प्राचीन श्वास तकनीक - 5000 साल पुराना रहस्य
जो वैज्ञानिकों को अचंभित कर रहा है।
🟥🟦🟨🟥🟦🟨🟥🟦🟨🟥🟦🟨🟥

कल्पना कीजिए, आप ऐसी प्राचीन, शक्तिशाली चीज की खोज करें जो आपके दिमाग के काम करने के तरीके को बदल दे, लेकिन बाहरी दुनिया को यह कभी पता न चले।
हिमालय के पर्वतों में छिपा एक रहस्य, 5000 सालों से मौन और अनुशासन से सुरक्षित। आज पहली बार विज्ञान ने समझा है जो भिक्षु पहले से जानते थे। एक ही सांस में मानव मस्तिष्क के पुनर्निर्माण, दर्द को मिटाने और विचार से कहीं बड़ी चीज को जगाने की शक्ति छिपी है।

2024 का चौंकाने वाला प्रयोग।
टेनफोर्ड की प्रयोगशाला में तंत्रिका वैज्ञानिकों ने प्राचीन तिब्बती ग्रंथों से एक श्वास क्रम का अध्ययन किया। यह क्रम ध्यान जैसा कम, तंत्रिका तंत्र के लिए कोड जैसा ज्यादा लगता था। परिणाम?
इस साधारण क्रम ने BDNF (मस्तिष्क विकास कारक) को सामान्य ध्यान से 300% ज्यादा बढ़ा दिया। न्यूरोप्लास्टिसिटी को विज्ञान द्वारा अब तक देखी किसी भी चीज से तेजी से बढ़ाता है।

वैज्ञानिकों की चिंता।
कुछ तंत्रिका वैज्ञानिक सफेद झूठ बोलने लगे कि मानव मस्तिष्क इतने तेज पुनर्निर्माण के लिए तैयार नहीं। क्योंकि जब मस्तिष्क इतनी तेजी से बदलता है, आत्मबोध भी बदल जाता है। सांस लेना न केवल मस्तिष्क को बल्कि अपनी पहचान को नया आकार देने की क्षमता रखती है। भिक्षुओं ने सहस्त्राब्दियों तक इसे छिपाया, कभी लिखा नहीं, आम लोगों को नहीं दिया। शायद इसलिए क्योंकि सांस सिर्फ हवा नहीं, बुद्धि है।

मठों का पवित्र अनुष्ठान।
मठों में इसे पवित्र माना जाता था। केवल दीक्षा लेने वाले, दशकों तक मन तैयार करने वाले करते थे। उनका मानना: गलत इस्तेमाल से ऐसे द्वार खुल सकते हैं जिनसे हर कोई गुजरने को तैयार न हो। सोचिए, सांस लेने जैसी सरल क्रिया वास्तविकता की धारणा बदल सकती है। आधुनिक दुनिया ने इसे भूल दिया, उथली तेज सांसें लीं जो बेचैन मन को प्रतिबिंबित करती हैं। हम लगातार हल्की घुटन में जी रहे हैं जो जागरूकता की कमी से।

विज्ञान vs प्राचीन ज्ञान।
विज्ञान अब समझ रहा है जो भिक्षु जानते थे। सवाल ये क्या वे दुनिया को रहस्य से बचा रहे थे या रहस्य को दुनिया से?
प्रगति हमें वापस सरल मानवीय क्रिया पर ले आती है एक सचेत सांस यह विश्राम या तनाव राहत नहीं, सुप्त तंत्रिका को खोलना है। यह मस्तिष्क और अंगों का राजमार्ग है। सही लय पर सांस से संकेत भेजती है जो चिंता दूर करते, भावनात्मक आघात मरम्मत करते, कोशिकीय पुनर्जीवन देते। यह जीव विज्ञान है, मापने योग्य।

5-5-5 प्रोटोकॉल का रहस्य।।
यह 500 प्रोटोकॉल- 5 सेकंड अंदर, 5 सेकंड रोकें, 5 सेकंड बाहर। प्रत्येक चरण शरीर में विशिष्ट प्रवाह सक्रिय करता है। सांस अंदर जब जो ऑक्सीजन बढ़ता है, मस्तिष्क को ईंधन मिलता है।
रोकना अर्थ CO2 थोड़ा ऊपर, ऊतकों में ऑक्सीजन गहराई तक।
बाहर का अर्थ पैरासिम्पेथेटिक सिस्टम सक्रिय, सुरक्षा-शांति। यह चक्र आंतरिक स्थिति रीसेट करता है।
असली जादू: धारणा में जागृत करता। सांस रोकने पर समय खिंचता है ।मन शांत, विचार फीके हो जाते हैं।

मस्तिष्क पर प्रभाव।

प्रयोगों में- थेटा-गामा तरंगें बढ़ीं (गहन ध्यान जैसी)।
सुप्त तंत्रिका जागी, हृदय परिवर्तनशीलता सुधरी। अभ्यासी दृश्य, भावनाएं बताते हैं ,शरीर पुरानी बुद्धिमत्ता याद करता है। चेतना शायद मस्तिष्क उत्पन्न नहीं करती, तब प्रकट होती है जब शोर शांत हो। भिक्षु व्यवधान दूर कर रहे थे, सृजन नहीं। प्राचीन सांस आधुनिक मन से मिलती तो क्या होता।

दैनिक जीवन में बदलाव।
रोज पहले गहरी सांस लें, फेफड़ों से नहीं, जागरूकता से हवा अंदर। कंधे झुकें, अराजकता कम। एक सांस शांत और संगठित करती है। मन सांस का अनुसरण करता है। भिक्षु का हर सांस ब्रह्मांड से संवाद है। विज्ञान सांस बदलने से मस्तिष्क, हृदय, भावनाएं बदलतीं।

शरीर की प्रतिक्रिया।
पहले चक्र- सूक्ष्म। फिर झनझनाहट, हल्कापन। बीटा (तनाव) से थेटा (ज्ञान) तरंगें। सुप्त संदेश ठीक होने का समय। मिनटों में मस्तिष्क तरंगें बदलती है और साधुओं जैसी अवस्था हो जाती है। शारीरिक बदलाव ये मांसपेशियां ढीली, रक्तचाप कम हो जाता है। भावनात्मक रूप से बदलाव, पुरानी भावनाएं सतह पर, मुक्ति अग्रसर । इंसुला सक्रिय हो जाता है जागरूकता-करुणा बढ़ती है।

लंबे प्रभाव।
सप्ताह में ही तनाव कम, स्पष्टता। 3 सप्ताह में ग्रे मैटर बढ़ा, रचनात्मकता। कहानियां भी बहुत लोगो की बताती है कि उनका बहुत पुराना सिरदर्द गायब, PTSD वाले को शांत नींद। कोर्टिसोल 40-65% कम 10 दिनों में। हृदय लचीला। सांस रिमोट कंट्रोल: चिंता से बाहर एक मिनट में। सांस मन-शरीर भ्रम तोड़ती।
भिक्षुओं एवं योगियों का दर्शन कहता है।

सांस पवित्र संवाद है यंत्रणा से। अमृत है भय मुक्ति से। हर सांस मरण-प्रमाण कि जीवन मौका देता है। गलत सांस तनाव पोषित होती है। सांस जागृत रखती है, जीवित नहीं।
प्राचीन: सांस पर नियंत्रण से दुनिया पर नियंत्रण । सच्चाई: सांस याद दिलाती है, आप कभी अलग न थे।

चुनौतियां और परिवर्तन।
धीमा होना मुश्किल है, शोर में मौन भयावह होता है। लेकिन पवित्र शून्य होकर भीतर ही उपचार शुरू हो जाता है। न्यूरोप्लास्टिसिटी कहती है ये सांस नया कोड है।
महीने उपरांत लगेगा कि चुनी प्रतिक्रियाएं, सांस मार्गदर्शक है। जीवन लय में सांस संचालक है।

अभ्यास की शुरुआत।
7 दिन में सुबह-रात 5 मिनट 5-5-5। सोने से पहले। लॉग रखें। 21 दिन में ये आदत बना लीजिए। संदेह ना करें वापसी ही परिवर्तन है। सांस प्रार्थना आपको आपके भीतर जोड़ती।

अंतिम रहस्य।
सांस तकनीक नहीं, इंसान होने की याद है। ज्ञान अभ्यास से आता है। पहली सचेत सांस से जागृति होती है। सांस लेते रहें, बाकी होने दें।

🌹🙏🏻🌹

भारतीय ऋषि-मुनियों ने लोक-कल्याण के लिए अनेक चमत्कारिक शास्त्र रचे, जिनमें स्वर-शास्त्र प्रमुख है। यह विद्या सुख, सौभाग्य, सफलता, स्वास्थ्य और दीर्घायु प्रदान करती है।

स्वर + उदय = स्वरोदय, अर्थात नासिका से निकलने वाली वायु की गति से शुभ-अशुभ और भविष्य का ज्ञान प्राप्त करना। यह प्राचीन विज्ञान आज दुर्लभ है, पर इसके ज्ञाता सदैव सुखी और सफल रहते हैं। स्वर-विज्ञान न केवल भविष्य बताता है, बल्कि शरीर की आरोग्यता बनाए रखने में भी अत्यंत उपयोगी है।
स्वर-विज्ञान’ वह ज्ञान है जो नासिका से निकलने वाली वायु की दिशा, गति और उसके प्रभाव को समझने की विद्या सिखाता है।

स्वर अभ्यास के माध्यम से मनुष्य अपनी छिपी हुई शक्तियों को जाग्रत कर सकता है और प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर सकता है। वास्तव में वही व्यक्ति जीवन में सफल होता है जो प्रकृति के अनुरूप चलता है, क्योंकि प्रकृति के विपरीत चलने पर असफलता निश्चित होती है। स्वर-विज्ञान मनुष्य को प्रकृति से जोड़ने का एक सहज और दिव्य मार्ग है।
साधक को चाहिए कि वह शांत मन से एकांत में बैठकर अपने गुरु और इष्ट देव का स्मरण करे, फिर नासिका से निकलने वाले स्वर का निरीक्षण करे। यदि वह शास्त्र में बताए अनुसार कार्य करे तो स्वर की अनुकूलता से उसे सफलता और शुभ फल प्राप्त होते हैं। यह विद्या अत्यंत पवित्र और कल्याणकारी है, जिससे जीवन और परलोक दोनों सुधरते हैं।

शास्त्रों में स्वर-विज्ञान की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि स्वरों की अनुकूलता से भगवान राम ने रावण जैसे शक्तिशाली राक्षस का वध किया, और स्वरों की प्रतिकूलता के कारण रावण जैसे अपराजेय योद्धा का पतन हुआ। पांडवों ने स्वरों के अनुरूप कार्य कर विजय प्राप्त की, जबकि कौरव स्वरों की विपरीतता से पराजित हुए।
वास्तव में मानव शरीर में मेरुदंड के दोनों ओर दो प्रमुख नाड़ियाँ होती हैं बाईं ओर की इड़ा नाड़ी, जिसमें चंद्र ऊर्जा का वास है (शीतल स्वभाव), और दाहिनी ओर की पिंगला नाड़ी, जिसमें सूर्य ऊर्जा का वास है (उष्ण स्वभाव)।
इड़ा बाँई नासिका से और पिंगला दाहिनी नासिका से चलती है। ये नाड़ियाँ लगभग हर ढाई घड़ी (लगभग एक घंटे) में परिवर्तन करती रहती हैं। इन्हीं नाड़ियों के प्रभाव से स्वर बदलते हैं और उसी के अनुसार मनुष्य के कार्य शुभ या अशुभ होते हैं।
मानव शरीर की नाड़ियों में सुषुम्णा नाड़ी सबसे महत्वपूर्ण है। यही मोक्ष का मार्ग और ब्रह्मांड की आधार रेखा मानी गई है। यह गुदा के पीछे से शुरू होकर मेरुदंड के साथ ऊपर ब्रह्मरंध्र तक जाती है। इसके दाहिनी ओर पिंगला (सूर्य नाड़ी) और बाँई ओर इड़ा (चंद्र नाड़ी) होती हैं।

जब सुषुम्णा जाग्रत होती है, तब योगी की साधना सफल होती है उसे समाधि लगने लगती है और वह सांसारिक मोह से मुक्त होता है।
इसी नाड़ी से कुण्डलिनी शक्ति ऊपर उठकर षट्चक्रों का भेदन करती है, जिससे अद्भुत शक्तियाँ और दिव्य आनंद की अनुभूति होती है।
सुषुम्णा को ब्रह्मनाड़ी भी कहा जाता है; इसमें प्राण प्रवाहित करने से योगी शीघ्र सिद्धि और मुक्ति प्राप्त करता है।
गुह्य स्थान से दो अंगुल ऊपर और लिंग मूल से नीचे चार अंगुल तक का भाग मूलाधार चक्र कहलाता है। यहीं ब्रह्मनाड़ी के मुख में स्वयम्भू लिंग स्थित है, जिसके चारों ओर साढ़े तीन फेरे में कुण्डलिनी शक्ति सर्पाकार रूप में कुण्डली मारे रहती है।

🌹🙏🏻🌹

प्राणायाम दो प्रकार का होता है अगर्भ (बिना जप या ध्यान के) और सगर्भ (जप व ध्यान सहित)।
सगर्भ प्राणायाम फलदायी होता है और योगाभ्यास को सिद्धि तक पहुँचाता है। इसमें पूरक, कुम्भक और रेचक के दौरान इष्टदेव का नाम जप और ध्यान किया जाता है।
ध्यान करते समय दृष्टि नासिकाग्र या भृकुटि-मध्य पर स्थिर रखनी चाहिए। नियमित अभ्यास से मन एकाग्र होता है और साधक को इष्टदेव के दर्शन तक होने लगते हैं।
प्राकृतिक प्राणायाम हमें नींद की अवस्था में स्वयं प्राप्त होता है जब शरीर पूर्ण विश्रांति में होता है, तब प्रकृति स्वयं श्वास के माध्यम से शरीर को शुद्ध और स्वस्थ रखती है। यही प्राकृतिक श्वसन योग की सर्वोच्च अवस्था का आधार है।
यदि प्रश्नकर्ता उस व्यक्ति के चल रहे स्वर (साँस के सक्रिय नासिका पक्ष) की दिशा में बैठकर प्रश्न करे, तो रोगी के स्वस्थ होने की संभावना अधिक होती है।
यदि प्रश्नकर्ता बन्द स्वर (जहाँ साँस नहीं चल रही) की ओर से प्रश्न करे, तो रोगी को स्वास्थ्य-लाभ नहीं होगा।
यदि प्रश्नकर्ता पहले बन्द स्वर की ओर से प्रश्न करता हुआ बाद में चल रहे स्वर की ओर आकर बैठ जाए, तो मृतप्राय रोगी भी जीवित हो सकता है।
परंतु यदि प्रश्नकर्ता चल रहे स्वर की ओर से प्रश्न करता हुआ बन्द स्वर की ओर जाए, तो रोगी की स्थिति पुनः बिगड़ सकती है, चाहे वह पहले ठीक हो रहा हो।
जब निर्गुण स्वर (शून्य या मिश्र स्वर) चल रहा हो, तो रोग घातक समझना चाहिए। और जब सगुण स्वर (शुद्ध तत्त्व वाला स्वर) चल रहा हो, तो रोगी के जीवित रहने की संभावना होती है।

तत्त्व के अनुसार फल।
पृथ्वी या जल तत्त्व के उदय में प्रश्न-फल शुभ होता है।
अग्नि, वायु या आकाश तत्त्व के उदय में प्रश्न-फल अशुभ होता है।
यदि कोई पूछे कि “रोगी को क्या रोग है?”, तो दैवज्ञ को अपने स्वर में चल रहे तत्त्व के आधार पर उत्तर देना चाहिए।
यदि स्वर में स्वयं का तत्त्व चल रहा हो, तो समझना चाहिए कि रोगी को एक ही रोग है।
बाँएँ स्वर (इड़ा) में पृथ्वी तत्त्व हो तो कफज रोग है।
दाहिने स्वर (पिंगला) में अग्नि तत्त्व हो तो पित्तज रोग है।
दाहिने स्वर में वायु तत्त्व हो तो वातज रोग है।

यदि दूसरे स्वर में भिन्न तत्त्व चल रहा हो, तो कहना चाहिए कि रोग मिश्र प्रकृति का है जैसे यदि दाहिने स्वर में अग्नि तत्त्व हो, तो रोग कफ-पित्त मिश्रित, और बाँएँ स्वर में वायु तत्त्व हो, तो रोग कफ-वात मिश्रित माना जाएगा।

स्वर बदलने के लिए नाड़ी शोधन का महत्व।

दिन में चार बार सुबह, दोपहर, शाम और रात
ये अभ्यास करना चाहिए।
वाम (बाईं) नाक से गहरी सांस लें और बिना रोके दाईं नाक से धीरे-धीरे छोड़ें।
फिर दाईं नाक से गहरी सांस लें और बिना रुके बाईं नाक से छोड़ें।
ऐसे 80 बार करें।
लगातार 6 महीने तक करने से नाड़ियाँ (सांस की ऊर्जा-धाराएँ) शुद्ध हो जाती हैं,
शरीर हल्का और ऊर्जावान लगता है, भूख खुल जाती है, मन प्रसन्न रहता है, और चाहें तो इच्छा-शक्ति से सूर्य स्वर (दाईं नाक) या चंद्र स्वर (बाईं नाक) चला सकते हैं।
यह अभ्यास केवल स्वस्थ शरीर में करना चाहिए। बीमार होने पर या गर्भावस्था में यह नहीं करना चाहिए।

रोग दूर करने और शरीर को स्वस्थ रखने के उपाय।
सूक्ष्म-वायु परिवर्तन का यह विज्ञान “धारणा योग” का हिस्सा है।
यह योग का गहरा अभ्यास है जो यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार के बाद शुरू होता है।
बिना किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन के यह ठीक से नहीं हो पाता।

प्राणायाम की तीन अवस्थाएँ होती हैं

1. निकृष्ट अवस्था: शरीर में पसीना आने लगता है।

2. मध्यम अवस्था: शरीर हल्का होकर कांपता या हलचल महसूस करता है।

3. उत्तम अवस्था: साधक को ऐसा अनुभव होता है मानो शरीर भूमि से ऊपर उठ गया हो।

साधारण लोगों के लिए यह कठिन होता है, इसलिए भगवान पशुपति ने इसके सरल रूप का उपदेश दिया कि पहले मन में विश्वास, आस्था और निष्ठा लानी जरूरी है।

🟥🟦🟨🟥🟦🟨🟥🟦🟨🟥🟦🟨🟥

लियो गोवरधन नख पै धार, दाऊ हल मूसर लियौ संभार।संग में गोपी, गऊ और ग्वारि, कियौ गिरि तले ब्रजविस्तार।।आप सभी को प्रकृति औ...
22/10/2025

लियो गोवरधन नख पै धार, दाऊ हल मूसर लियौ संभार।
संग में गोपी, गऊ और ग्वारि, कियौ गिरि तले ब्रजविस्तार।।

आप सभी को प्रकृति और गोवंश के संरक्षण-संवर्धन के प्रतीक गोवर्धन पूजा की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।

श्री गिरिराज धरण की जय!
जय श्रीकृष्ण!

12/09/2025

अगर आपको लगता है कि,
आपका मोबाइल फ़ोन सुरक्षित नहीं है तो अपने मोबाइल को सुरक्षित करने हेतु आज ही भारत सरकार द्वारा संचालित “संचार साथी” ऐप को डाउनलोड करें। यह ऐप आपके हाथों में आपके मोबाइल के सुरक्षा की ताक़त देता है।

संचार साथी ऐप का मुख्य कार्य
———————————
• चोरी एवं खोए मोबाइल को तुरंत ब्लॉक
• अपने नाम पर चल रहे सभी सिम कार्ड्स की जानकारी
• संदिग्ध कॉल और फ़र्जी मैसेज की रिपोर्टिंग
• मोबाइल का IMEI नंबर चेक करके असली-नकली की पहचान

डिजिटल धोखाधड़ी से बचें,
अपने मोबाइल को हमेशा सुरक्षित रखें।

~ साभार: National Crime Investigation Bureau

Innovation vs. Decoration 🎯
19/08/2025

Innovation vs. Decoration 🎯

29/04/2025
29/04/2025

नई उमंग, उल्लास एवं उत्साह के प्रतीक  ंक्रांति पर्व की आप सभी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ.
14/01/2025

नई उमंग, उल्लास एवं उत्साह के प्रतीक ंक्रांति पर्व की आप सभी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ.

हरि आए थे म्हारे देश मैं जिब नाम पडया हरियाणा रै सीधा साधा रहन सहन यो सादा सा म्हारा बाणा रै.... टेक म्हारे हरियाणै की स...
01/11/2024

हरि आए थे म्हारे देश मैं जिब नाम पडया हरियाणा रै
सीधा साधा रहन सहन यो सादा सा म्हारा बाणा रै.... टेक

म्हारे हरियाणै की सारी भूमि ऋषियां की बतलाई सै
कुरुक्षेत्र मैं श्री कृष्ण नै खुद गीता आप सुणाई सै
सनेहत के मां एक दिन आकें ठहरी गंगे माई सै
गुडगामे मैं माता जी की धजा जोर की छाई सै
पीर फकीरां का ओड नहीं आडै मुश्किल नाम गिनाणा रै....

एक तैं एक कवि होए जो धार ज्ञान की बा गे थे
जाटी के मां लख्मीचंद अवतार रुप मैं छा गे थे
वेद शास्त्र उपनिषदां नै छंद रुप मैं गा गे थे
मांगे बाजे मुंशीराम बी बेजोड काफिए ला गे थे
धनपत सिंह की चली आंगली वो गुंज्या उठ निंदाणा रै....२

चंदगीराम सिसाइयै कै एक बोल गात नै छणग्या था
बाबा लालदास की मेहर फिरी हिंद केसरी बणग्या था
सेठ किरोडी भैणी आला छो मैं गात कति तणग्या था
जिब बेटा ले पाणी के रपिए बाप वो कुवा चिणग्या था
कदे करी कराई नै खो दे जड तैं बिन संतान कै जाणा रै....३

सुण्डै आली सीसर नै सब जाणैं उसकै नाम तैं
बणी रसोई उसके घर पै आरया हो कोएसे गाम तैं
पंचातां मैं करै फैसले डरया नहीं किसे जाम तैं
रिश्तेदारी दुश्मन बणगी हटया नहीं मुकाम तैं
घासी नाम था मर्द जाम का गाम था खास उल्हाणा रै....४

जडै गऊ उडै रहैं देवता नु लिख्या वेद की वाणी मैं
गऊ रक्षा मैं नाम कमाया हरफुल जाट जुलाणी मैं
गुरु विकास की मेहर फिरी नादान उम्र इस याणी मैं
राहुल वशिष्ठ हरि की भगति नहीं रहण दे हाणी मैं
रामजस क्यामैं जन्म मिल्या पुरयां सै ठयोड ठिकाणा रै....५

Address

Palwal

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Bol Palwal posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share