06/09/2026
#पुस्तक_समीक्षा
आस्था, इतिहास आ विज्ञान के बीच : वैदिक सभ्यता के विमर्श
किताब : वैज्ञानिक वैदिक सभ्यता
लेखक : डॉ० विजय किशोर पाण्डेय
प्रकाशक : भोजपुरिया माटी त्रिमाही
समीक्षक : डॉ० दिनेश प्रसाद सिन्हा
सनातन धर्म आ वैदिक सभ्यता के संसार बहुते व्यापक बा। ई खाली पूजा-पद्धति भा धार्मिक आस्था ले सीमित नइखे, बलुक एहमें जीवन, समाज, परिवार, राज्य, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, चिकित्सा, दर्शन, गणित, खेती, व्यापार आ प्रकृति के प्रति मनुष्य के दृष्टिकोण तक के एगो विस्तृत परंपरा दिखाई देला। एही व्यापक परिप्रेक्ष्य में श्री विजय किशोर पाण्डेय के किताब ‘वैज्ञानिक वैदिक सभ्यता’ सामने आवेला। ई किताब वैदिक सभ्यता के खाली श्रद्धा के विषय मान के देखे के बजाय ओकर अलग-अलग पक्ष के तर्क, दर्शन, शास्त्रीय संदर्भ आ प्रमाण-सामग्री के माध्यम से समझे के प्रयास करेला।
भोजपुरी साहित्य विकास मंच द्वारा 2025 में आयोजित कार्यक्रम में मुझे मुख्य अतिथि के रूप में गइल रहीं वही डॉ० विजय किशोर पाण्डेय से हमरा पहिला भेंट भइल रहें। ओकरा बाद उ लोकघारा कवि सम्मेलन 2026 में आइल रहलन त ई किताब देले रहीं ।उनकर व्यक्तित्व में इतिहास आ संस्कृति के प्रति गहिर रुचि आ अपना परंपरा के प्रति आत्मीय लगाव साफ दिखाई देला। उनकर किताब ‘सिम्रौनगढ़ के इतिहास’ पढ़े के अवसर भी हमरा के मिलल बा। ओह किताब में सिम्रौनगढ़ के इतिहास आ ओकरा से जुड़ल तथ्यन के शोधपरक ढंग से प्रस्तुत करे के प्रयास भइल बा। उनकर ई प्रयास रहेला कि सनातन और भारत नेपाल संस्कृति पर ज्यादा लिखी पढ़ीपढ़ीं । उनकर एही शोधवृत्ति के विस्तार ‘वैज्ञानिक वैदिक सभ्यता’ में दिखाई देला।
किताब के केंद्रीय उद्देश्य वैदिक सभ्यता के प्राचीनता, ओकर सामाजिक संरचना आ ज्ञान-परंपरा के वैज्ञानिकता के रेखांकित कइल बा। लेखक वेद के अर्थ आ स्वरूप से चर्चा शुरू करत बाड़ें आ सृष्टि के उत्पत्ति, पृथ्वी के उत्पत्ति के काल-गणना आ सनातन चिंतन के अलग-अलग पक्ष तक आपन विचार विस्तार देत बाड़ें। ‘वेद’ शब्द के उत्पत्ति, ओकर अलग-अलग अर्थ, विशेषता आ प्रयोजन के स्पष्ट करे के प्रयास किताब के शुरुआती हिस्सा में मिलेला। एकरा बाद सृष्टि आ पृथ्वी के उत्पत्ति से जुड़ल अलग-अलग मत के सामने रख के भारतीय शास्त्रीय मान्यता के चर्चा कइल गइल बा।
किताब के एगो उल्लेखनीय विशेषता ओकर विषय-विस्तार बा। लेखक वैदिक सभ्यता के कवनो एगो धार्मिक अवधारणा तक सीमित नइखन रखले। ऊ वैदिक काल के गाँव, घर, घर में इस्तेमाल होखे वाला वस्तु, खेती आ जीवन-निर्वाह के साधन के चर्चा करत बाड़ें। हिन्दू धर्म के उत्पत्ति आ ओकर प्रकृति पर विचार करत ‘हिन्दू’ शब्द के व्युत्पत्ति आ ओकरा से संबंधित अलग-अलग मत के भी सामने रखले बाड़ें। एह क्रम में भारतीय धर्म आ संस्कृति के विकास के व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखे के कोशिश भइल बा।
लेखक वैदिककालीन वस्त्र आ मनोरंजन से लेके शिल्पकला, आभूषण, मुद्रा, ऋण आ व्यापार तक के विषय के आपन चर्चा में शामिल कइले बाड़ें। एहसे ई साफ होला कि लेखक के नजर में सभ्यता के मतलब खाली धार्मिक अनुष्ठान नइखे, बलुक मनुष्य के पूरा सामाजिक आ आर्थिक जीवन से बा। प्राचीन समाज में व्यापार कइसे होला, मुद्रा के प्रयोग कवन रूप में रहे, ऋण-लेनदेन के कइसन व्यवस्था रहे आ शिल्पकला कइसे विकसित भइल -एह विषय सभ के किताब में जगह दिहल गइल बा। निष्क नाम के स्वर्णमुद्रा के उल्लेख से लेके तत्कालीन आर्थिक गतिविधि तक के चर्चा एह दृष्टि से खास रुचिकर बा।
वैदिक नारी शिक्षा, सामाजिक अधिकार, विवाह, संतान आ उत्तराधिकार से संबंधित विवेचन किताब के एगो महत्त्वपूर्ण पक्ष बा। आधुनिक समाज में स्त्री-अधिकार आ शिक्षा के लेके जवना तरह के विमर्श होला, ओकर संदर्भ में वैदिक समाज के स्थिति के समझल जरूरी बा। लेखक एह विषय में उपलब्ध वैदिक आ शास्त्रीय सामग्री के आधार पर आपन बात रखे के प्रयास कइले बाड़ें। एही तरह ‘वेद प्रदत्त व्यवस्था’ में व्यक्ति के जीवन से लेके परिवार, समाज, राज्य आ ज्ञान-विज्ञान तक के संचालन से संबंधित व्यवस्था पर विचार कइल गइल बा।
राजनीतिक आ प्रशासनिक दृष्टि से भी किताब उपयोगी सामग्री प्रस्तुत करेला। भाषा, राष्ट्र, राजा, शासन, राजदूत, राष्ट्रभावना, दुर्ग आ न्याय जइसन विषय के एक साथ लेके लेखक ई देखावे के कोशिश कइले बाड़ें कि वैदिक समाज में शासन आ सामाजिक संगठन के लेके भी व्यवस्थित चिंतन मौजूद रहे। आज के प्रशासनिक व्यवस्था से ओकर तुलना करत पाठक के प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन के कुछ पक्ष पर विचार करे के अवसर मिलेला।
चिकित्सा आ जीवन-विज्ञान से जुड़ल विषय भी किताब में आवेला। रोग, औषधि, जन्म, मृत्यु आ पुनर्जन्म के संदर्भ में वैदिक मान्यता के चर्चा कइल गइल बा। एही तरह दर्शन आ गणित के संदर्भ में ऋग्वेद आ अन्य शास्त्रीय स्रोत के उल्लेख मिलेला। आत्मतत्त्व पर चर्चा करत लेखक भारतीय आ पाश्चात्य दर्शन के अवधारणा के बीच के अंतर आ साम्य के समझावे के प्रयास करत बाड़ें। एह तरह किताब धार्मिक अध्ययन से आगे बढ़ के दार्शनिक विमर्श के रूप भी ग्रहण कर लेत बा।
‘राम के जन्म में विवाद काहे?’ किताब के एगो चर्चित विषय बा। श्री पाण्डेय जी रामजन्म के काल-गणना से जुड़ल विवाद पर विचार करत रामायण के अलग-अलग संदर्भ आ उपलब्ध मान्यता के सामने रखे के प्रयास कइले बाड़ें। एही तरह ‘हिन्दू धर्म में भी 786 अंक के चमत्कार’ शीर्षक से लेखक 786 अंक के भारतीय आ इस्लामी परंपरा में प्रचलित मान्यता पर विचार कइले बाड़ें। तीन, सात, आठ आ छह अंक से संबंधित भारतीय विशेषता के भी ऊ बिंदुवार प्रस्तुत कइले बाड़ें। अइसन विषय पाठक के जिज्ञासा बढ़ावेला आ किताब के सामान्य वैदिक विमर्श से कुछ अलग आयाम देला।
किताब में विदेशी विद्वान के कथन आ उनकर किताब से उद्धरण के भी पर्याप्त उपयोग भइल बा। एकर उद्देश्य संभवतः ई देखावल बा कि भारतीय वैदिक परंपरा के विशिष्टता के खाली भारतीय विद्वान नइखे मानले, बलुक अनेक विदेशी अध्येता भी ओकरा के स्वीकार कइले बाड़ें। लेखक सनातन धर्म के प्राचीनता आ ओकर प्रभाव के स्थापित करे के क्रम में बौद्ध, जैन, इस्लामी आ ईसाई परंपरा से जुड़ल संदर्भ के भी उठवले बाड़ें। ईसा मसीह, पैगम्बर मुहम्मद, भगवान बुद्ध आ महावीर जइसन धर्म-प्रवर्तक के सनातन परंपरा के संदर्भ में देखे के प्रयास किताब में मिलेला।
एहिजे किताब के एगो अइसन पक्ष भी सामने आवेला, जहाँ पाठक के लेखक के निष्कर्ष के साथ-साथ उनकर प्रमाण के स्वतंत्र रूप से जाँच करे के चाहीं। धर्म आ इतिहास दुनू संवेदनशील विषय ह। कवनो धर्म के प्राचीनता भा कवनो धार्मिक व्यक्तित्व के संबंध में कइल गइल दावा खाली उद्धरण प्रस्तुत कर देला से अंतिम ऐतिहासिक सत्य ना बन जाला। ओकरा खातिर स्रोत के प्रामाणिकता, काल, संदर्भ आ उपलब्ध अन्य ऐतिहासिक प्रमाण के तुलनात्मक परीक्षण भी जरूरी होला। एह दृष्टि से किताब के कुछ निष्कर्ष विमर्श के विषय ह आ पाठक के ओह निष्कर्ष से सहमत होखे से पहिले स्रोत के आलोचनात्मक अध्ययन करे के चाहीं। एही दृष्टि से किताब के अध्ययन अउरी गंभीर बन जाला।
आस्था, इतिहास आ विज्ञान के बीच : -
सनातन धर्म आ वैदिक सभ्यता के संसार बहुते व्यापक बा। ई खाली पूजा-पद्धति भा धार्मिक आस्था ले सीमित नइखे, बलुक एहमें जीवन, समाज, परिवार, राज्य, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, चिकित्सा, दर्शन, गणित, खेती, व्यापार आ प्रकृति के प्रति मनुष्य के दृष्टिकोण तक के एगो विस्तृत परंपरा दिखाई देला। एही व्यापक परिप्रेक्ष्य में श्री विजय किशोर पाण्डेय के किताब ‘वैज्ञानिक वैदिक सभ्यता’ सामने आवेला। ई किताब वैदिक सभ्यता के खाली श्रद्धा के विषय मान के देखे के बजाय ओकर अलग-अलग पक्ष के तर्क, दर्शन, शास्त्रीय संदर्भ आ प्रमाण-सामग्री के माध्यम से समझे के प्रयास करेला।
भोजपुरी साहित्य विकास मंच द्वारा 2025 में आयोजित कार्यक्रम में मुझे मुख्य अतिथि के रूप में गइल रहीं वही डॉ० विजय किशोर पाण्डेय से हमरा पहिला भेंट भइल रहें। ओकरा बाद उ लोकघारा कवि सम्मेलन 2026 में आइल रहलन त ई किताब देले रहीं ।उनकर व्यक्तित्व में इतिहास आ संस्कृति के प्रति गहिर रुचि आ अपना परंपरा के प्रति आत्मीय लगाव साफ दिखाई देला। उनकर किताब ‘सिम्रौनगढ़ के इतिहास’ पढ़े के अवसर भी हमरा के मिलल बा। ओह किताब में सिम्रौनगढ़ के इतिहास आ ओकरा से जुड़ल तथ्यन के शोधपरक ढंग से प्रस्तुत करे के प्रयास भइल बा। उनकर ई प्रयास रहेला कि सनातन और भारत नेपाल संस्कृति पर ज्यादा लिखी पढ़ीपढ़ीं । उनकर एही शोधवृत्ति के विस्तार ‘वैज्ञानिक वैदिक सभ्यता’ में दिखाई देला।
किताब के केंद्रीय उद्देश्य वैदिक सभ्यता के प्राचीनता, ओकर सामाजिक संरचना आ ज्ञान-परंपरा के वैज्ञानिकता के रेखांकित कइल बा। लेखक वेद के अर्थ आ स्वरूप से चर्चा शुरू करत बाड़ें आ सृष्टि के उत्पत्ति, पृथ्वी के उत्पत्ति के काल-गणना आ सनातन चिंतन के अलग-अलग पक्ष तक आपन विचार विस्तार देत बाड़ें। ‘वेद’ शब्द के उत्पत्ति, ओकर अलग-अलग अर्थ, विशेषता आ प्रयोजन के स्पष्ट करे के प्रयास किताब के शुरुआती हिस्सा में मिलेला। एकरा बाद सृष्टि आ पृथ्वी के उत्पत्ति से जुड़ल अलग-अलग मत के सामने रख के भारतीय शास्त्रीय मान्यता के चर्चा कइल गइल बा।
किताब के एगो उल्लेखनीय विशेषता ओकर विषय-विस्तार बा। लेखक वैदिक सभ्यता के कवनो एगो धार्मिक अवधारणा तक सीमित नइखन रखले। ऊ वैदिक काल के गाँव, घर, घर में इस्तेमाल होखे वाला वस्तु, खेती आ जीवन-निर्वाह के साधन के चर्चा करत बाड़ें। हिन्दू धर्म के उत्पत्ति आ ओकर प्रकृति पर विचार करत ‘हिन्दू’ शब्द के व्युत्पत्ति आ ओकरा से संबंधित अलग-अलग मत के भी सामने रखले बाड़ें। एह क्रम में भारतीय धर्म आ संस्कृति के विकास के व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखे के कोशिश भइल बा।
लेखक वैदिककालीन वस्त्र आ मनोरंजन से लेके शिल्पकला, आभूषण, मुद्रा, ऋण आ व्यापार तक के विषय के आपन चर्चा में शामिल कइले बाड़ें। एहसे ई साफ होला कि लेखक के नजर में सभ्यता के मतलब खाली धार्मिक अनुष्ठान नइखे, बलुक मनुष्य के पूरा सामाजिक आ आर्थिक जीवन से बा। प्राचीन समाज में व्यापार कइसे होला, मुद्रा के प्रयोग कवन रूप में रहे, ऋण-लेनदेन के कइसन व्यवस्था रहे आ शिल्पकला कइसे विकसित भइल -एह विषय सभ के किताब में जगह दिहल गइल बा। निष्क नाम के स्वर्णमुद्रा के उल्लेख से लेके तत्कालीन आर्थिक गतिविधि तक के चर्चा एह दृष्टि से खास रुचिकर बा।
वैदिक नारी शिक्षा, सामाजिक अधिकार, विवाह, संतान आ उत्तराधिकार से संबंधित विवेचन किताब के एगो महत्त्वपूर्ण पक्ष बा। आधुनिक समाज में स्त्री-अधिकार आ शिक्षा के लेके जवना तरह के विमर्श होला, ओकर संदर्भ में वैदिक समाज के स्थिति के समझल जरूरी बा। लेखक एह विषय में उपलब्ध वैदिक आ शास्त्रीय सामग्री के आधार पर आपन बात रखे के प्रयास कइले बाड़ें। एही तरह ‘वेद प्रदत्त व्यवस्था’ में व्यक्ति के जीवन से लेके परिवार, समाज, राज्य आ ज्ञान-विज्ञान तक के संचालन से संबंधित व्यवस्था पर विचार कइल गइल बा।
राजनीतिक आ प्रशासनिक दृष्टि से भी किताब उपयोगी सामग्री प्रस्तुत करेला। भाषा, राष्ट्र, राजा, शासन, राजदूत, राष्ट्रभावना, दुर्ग आ न्याय जइसन विषय के एक साथ लेके लेखक ई देखावे के कोशिश कइले बाड़ें कि वैदिक समाज में शासन आ सामाजिक संगठन के लेके भी व्यवस्थित चिंतन मौजूद रहे। आज के प्रशासनिक व्यवस्था से ओकर तुलना करत पाठक के प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन के कुछ पक्ष पर विचार करे के अवसर मिलेला।
चिकित्सा आ जीवन-विज्ञान से जुड़ल विषय भी किताब में आवेला। रोग, औषधि, जन्म, मृत्यु आ पुनर्जन्म के संदर्भ में वैदिक मान्यता के चर्चा कइल गइल बा। एही तरह दर्शन आ गणित के संदर्भ में ऋग्वेद आ अन्य शास्त्रीय स्रोत के उल्लेख मिलेला। आत्मतत्त्व पर चर्चा करत लेखक भारतीय आ पाश्चात्य दर्शन के अवधारणा के बीच के अंतर आ साम्य के समझावे के प्रयास करत बाड़ें। एह तरह किताब धार्मिक अध्ययन से आगे बढ़ के दार्शनिक विमर्श के रूप भी ग्रहण कर लेत बा।
‘राम के जन्म में विवाद काहे?’ किताब के एगो चर्चित विषय बा। श्री पाण्डेय जी रामजन्म के काल-गणना से जुड़ल विवाद पर विचार करत रामायण के अलग-अलग संदर्भ आ उपलब्ध मान्यता के सामने रखे के प्रयास कइले बाड़ें। एही तरह ‘हिन्दू धर्म में भी 786 अंक के चमत्कार’ शीर्षक से लेखक 786 अंक के भारतीय आ इस्लामी परंपरा में प्रचलित मान्यता पर विचार कइले बाड़ें। तीन, सात, आठ आ छह अंक से संबंधित भारतीय विशेषता के भी ऊ बिंदुवार प्रस्तुत कइले बाड़ें। अइसन विषय पाठक के जिज्ञासा बढ़ावेला आ किताब के सामान्य वैदिक विमर्श से कुछ अलग आयाम देला।
किताब में विदेशी विद्वान के कथन आ उनकर किताब से उद्धरण के भी पर्याप्त उपयोग भइल बा। एकर उद्देश्य संभवतः ई देखावल बा कि भारतीय वैदिक परंपरा के विशिष्टता के खाली भारतीय विद्वान नइखे मानले, बलुक अनेक विदेशी अध्येता भी ओकरा के स्वीकार कइले बाड़ें। लेखक सनातन धर्म के प्राचीनता आ ओकर प्रभाव के स्थापित करे के क्रम में बौद्ध, जैन, इस्लामी आ ईसाई परंपरा से जुड़ल संदर्भ के भी उठवले बाड़ें। ईसा मसीह, पैगम्बर मुहम्मद, भगवान बुद्ध आ महावीर जइसन धर्म-प्रवर्तक के सनातन परंपरा के संदर्भ में देखे के प्रयास किताब में मिलेला।
एहिजे किताब के एगो अइसन पक्ष भी सामने आवेला, जहाँ पाठक के लेखक के निष्कर्ष के साथ-साथ उनकर प्रमाण के स्वतंत्र रूप से जाँच करे के चाहीं। धर्म आ इतिहास दुनू संवेदनशील विषय ह। कवनो धर्म के प्राचीनता भा कवनो धार्मिक व्यक्तित्व के संबंध में कइल गइल दावा खाली उद्धरण प्रस्तुत कर देला से अंतिम ऐतिहासिक सत्य ना बन जाला। ओकरा खातिर स्रोत के प्रामाणिकता, काल, संदर्भ आ उपलब्ध अन्य ऐतिहासिक प्रमाण के तुलनात्मक परीक्षण भी जरूरी होला। एह दृष्टि से किताब के कुछ निष्कर्ष विमर्श के विषय ह आ पाठक के ओह निष्कर्ष से सहमत होखे से पहिले स्रोत के आलोचनात्मक अध्ययन करे के चाहीं। एही दृष्टि से किताब के अध्ययन अउरी गंभीर बन जाला।
आस्था आ इतिहास के बीच संतुलन : -
ई किताब के मूल प्रेरणा सनातन धर्म आ वैदिक सभ्यता के प्रति लेखक के गहिर आस्था से आवेला। ई आस्था किताब के ताकत भी ह आ कहीं-कहीं ओकर सीमा भी बन जाला। अपना संस्कृति, धर्म आ परंपरा के प्रति गौरवबोध कवनो लेखक खातिर स्वाभाविक बात ह; बाकिर जब ओही विषय इतिहास, पुरातत्त्व आ वैज्ञानिक अध्ययन के दायरा में आवेला, त आस्था के साथ प्रमाण, तर्क आ आलोचनात्मक विवेक के संतुलन जरूरी हो जाला।
श्री पाण्डेय जी वेद, पुराण, उपनिषद, ऐतिहासिक दस्तावेज आ विदेशी विद्वानन के लेखन से अनेक उद्धरण आ संदर्भ प्रस्तुत कइले बाड़ें। एहसे उनकर अध्ययन आ सामग्री-संग्रह के गंभीरता के परिचय मिलेला। बाकिर कवनो ग्रंथ में कवनो मत के उल्लेख होखल आ ओह मत के ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित होखल -ई दुनू अलग बात ह। एही तरह धार्मिक परंपरा में प्रचलित कवनो मान्यता के सांस्कृतिक आ आध्यात्मिक महत्त्व अपना जगह बा, जबकि इतिहासकार खातिर ओकर काल, स्रोत, संदर्भ आ स्वतंत्र प्रमाण के जाँच जरूरी होला।
मिसाल खातिर सृष्टि के उत्पत्ति, पृथ्वी के आयु, वैदिक काल के निश्चित समय-सीमा, रामजन्म के काल-गणना, हिन्दू धर्म के प्राचीनता आ अन्य धर्मन के उद्भव से जुड़ल विषय पर भारतीय धार्मिक ग्रंथन में अनेक धारणा मिलेला। एह धारणन के सांस्कृतिक आ दार्शनिक महत्त्व निस्संदेह बहुत बड़ बा, बाकिर ओकरा के आधुनिक ऐतिहासिक निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत करे खातिर पुरातात्त्विक, भाषावैज्ञानिक, अभिलेखीय आ अन्य स्वतंत्र प्रमाणन के साथ तुलनात्मक परीक्षण भी जरूरी बा। किताब में एह दिशा में सामग्री उपलब्ध करावे के प्रयास भइल बा, बाकिर कुछ जगह निष्कर्षन के अउरी सावधानी आ संदर्भ-व्याख्या के साथ रखल गइल रहित त ओकर अकादमिक विश्वसनीयता अउरी बढ़त।
एही तरह ईसा मसीह, पैगम्बर मुहम्मद, भगवान बुद्ध आ महावीर जइसन धार्मिक व्यक्तित्वन के सनातन परंपरा के संदर्भ में देखे के लेखक के प्रयास एगो विशिष्ट वैचारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करेला। ई दृष्टिकोण धार्मिक-सांस्कृतिक विमर्श में चर्चा के विषय हो सकेला, बाकिर इतिहास के दृष्टि से अइसन दावन खातिर प्राथमिक स्रोत, समकालीन प्रमाण आ अलग-अलग विद्वानन के मत के तुलनात्मक समीक्षा जरूरी बा। कवनो मत से सहमत भा असहमत होखे से पहिले ओकर प्रमाण के प्रकृति के समझल स्वस्थ बौद्धिक परंपरा के आधार ह।
‘वैदिक सभ्यता के वैज्ञानिकता’ के सवाल भी एही संतुलन के माँग करेला। प्राचीन भारतीय ग्रंथन में गणित, खगोल, चिकित्सा, दर्शन, भाषा आ प्रकृति से संबंधित चिंतन के समृद्ध परंपरा रहल बा। ओकर अध्ययन आ मूल्यांकन बहुत जरूरी बा। बाकिर कवनो प्राचीन विचार के आधुनिक विज्ञान के कवनो खोज के समान भा ओकर पूर्वरूप सिद्ध करे से पहिले दुनू के मूल सिद्धांत, पद्धति, काल आ प्रमाण के तुलना जरूरी होला। समानता भा साम्य मिल जाइल अपने आप में प्रत्यक्ष वैज्ञानिक पूर्वानुमान के प्रमाण ना बन जाला। एह सूक्ष्म अंतर के ध्यान में राखल जाव त वैदिक ज्ञान के वास्तविक उपलब्धियन के मूल्यांकन अउरी प्रभावशाली ढंग से कइल जा सकेला।
लेखक के दृष्टि में सनातन संस्कृति खाली अतीत के स्मृति नइखे, बलुक जीवन के व्यवस्थित करे वाली एगो व्यापक ज्ञान-परंपरा ह। एह विचार से किताब के एगो महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक पक्ष सामने आवेला। ‘वेद प्रदत्त व्यवस्था’, नारी शिक्षा, सामाजिक अधिकार, विवाह, उत्तराधिकार, शासन, न्याय, कृषि, व्यापार आ चिकित्सा जइसन विषय के एक साथ देखला से वैदिक समाज के बहुआयामी स्वरूप के समझे के अवसर मिलेला। एहिजा किताब के योगदान ई बा कि ई पाठक के अपना परंपरा के मूल स्रोतन के ओर देखे खातिर प्रेरित करेला।
असल में कवनो सभ्यता के महानता सिद्ध करे के सबसे प्रभावशाली तरीका खाली ई कहल नइखे कि ऊ सबसे प्राचीन भा सबसे श्रेष्ठ रहे, बलुक ओकर ज्ञान, विचार आ संस्थान के प्रमाण के आधार पर वस्तुनिष्ठ अध्ययन कइल ह। भारतीय सभ्यता के वास्तविक उपलब्धि एतना व्यापक बा कि ओकरा के स्थापित करे खातिर अतिशयोक्ति के जरूरत नइखे। जेतना अधिक शोध निष्पक्ष, तुलनात्मक आ प्रमाण-आधारित होई, ओतने अधिक भारतीय ज्ञान-परंपरा के वैश्विक महत्त्व मजबूत होई।
एह दृष्टि से ‘वैज्ञानिक वैदिक सभ्यता’ के आस्था आ इतिहास के बीच संवाद स्थापित करे वाली कृति के रूप में देखल जा सकेला। लेखक के आग्रह आस्था से प्रेरित बा, उनकर सामग्री शोध से आवेला आ उनकर अनेक निष्कर्ष विमर्श के माँग करेला। पाठक के दायित्व बा कि ऊ ना त पूर्वाग्रह के कारण एह बातन के अस्वीकार करे आ ना खाली श्रद्धा के कारण एकरा के अंतिम सत्य मान ले। प्रमाण जहाँ उपलब्ध होखे, उहाँ ओकरा के स्वीकार कइल; जहाँ मतभेद होखे, उहाँ ओकरा के समझल; आ जहाँ प्रमाण अधूरा होखे, उहाँ निष्कर्ष के खुला रखल -ईहे इतिहास आ आस्था के बीच स्वस्थ संतुलन के आधार ह।
एह संतुलित दृष्टि से पढ़ल जाव त ‘वैज्ञानिक वैदिक सभ्यता’ खाली सनातन संस्कृति के प्रशंसा करे वाली कृति बन के ना रह जाला, बलुक वैदिक सभ्यता पर सवाल उठावे, प्रमाण खोजे आ नया सिरे से विचार करे के अवसर भी देला। एही में एह किताब के वास्तविक उपयोगिता आ स्थायी महत्त्व निहित हो सकेला।
वर्तनी, व्याकरण आ तथ्यगत : -
वर्तनी -
किताब में भोजपुरी के सामान्य शब्दन के साथ-साथ तत्सम आ संस्कृतनिष्ठ शब्दन के वर्तनी में भी कई जगह त्रुटि दिखाई देला। जइसे -‘मे’ के जगह ‘में’, ‘उत्पति’ के जगह ‘उत्पत्ति’, ‘सृष्ट’/‘सुष्टि’ के जगह ‘सृष्टि’, ‘पाणिणी’ के जगह ‘पाणिनि’, ‘इश्वरीय’ के जगह ‘ईश्वरीय’, ‘आबश्यक’ के जगह ‘आवश्यक’, ‘अवोर/अबर’ के जगह ‘अउर/और’, ‘सम्बन्धी’ के जगह ‘संबंधी’ आदि। ‘सिद्धांत कौमुदी’ के जगह ग्रंथ के प्रचलित रूप ‘सिद्धान्तकौमुदी’ होखे के चाहीं। एही तरह संस्कृत के मंत्र, सूत्र आ तत्सम शब्दन में हलन्त, मात्रा, विसर्ग आदि के भी सावधानी से प्रयोग अपेक्षित बा। भोजपुरी के क्षेत्रीय प्रकृति के बनाए रखत भी मुद्रित रूप में वर्तनी के एकरूपता जरूरी बा।
व्याकरण आ वाक्य-विन्यास -
किताब में कई जगह कारक-चिह्न, परसर्ग, वचन-क्रिया सामंजस्य आ वाक्य-विन्यास से जुड़ल समस्या मिलेला। उदाहरण खातिर - -‘एकरा बारे मे’ के जगह ‘एकरे बारे में’, ‘गाँव के व्यवस्था’ के संदर्भ में लिंग के अनुसार उचित वाक्य-संरचना, आ ‘आज के विद्वान लोग के कथन’ के जगह ‘आज के विद्वान लोगन के कथन’ अधिक व्याकरणसम्मत होई। एही तरह ‘ई काहेकि’ के जगह ‘ई काहे से कि’ तथा ‘बहुत विद्वान लोग के पुस्तक के अध्ययन कर के लिखे के कोशिश करत बानी’ जइसन वाक्यन में वचन, पुरुष आ क्रिया-पद के उचित सामंजस्य जरूरी बा। कई वाक्य अधूरा अथवा अस्पष्ट भी बाड़ें, जवना से अर्थ ग्रहण करे में कठिनाई होला। ‘ए (मूर्ख)’ जइसन अनौपचारिक आ संदर्भहीन प्रयोग भी लेखकीय भाषा के गंभीरता के प्रभावित करेला।
विराम-चिह्न के स्तर पर भी उद्धरण-चिह्न, पूर्णविराम, अल्पविराम आ कोष्ठक के प्रयोग कई जगह असंगत बा। खासकर संस्कृत मंत्र आ श्लोकन के आरंभ आ अंत में उद्धरण-चिह्न के एकरूपता तथा सूचीबद्ध सामग्री में उचित विराम-चिह्न के ध्यान रखल जरूरी रहे।
तथ्यात्मक आ ऐतिहासिक -
भाषागत त्रुटि से अधिक गंभीर समस्या किताब में प्रस्तुत कुछ ऐतिहासिक, वैज्ञानिक आ तथ्यात्मक दावन से जुड़ल बा। उदाहरण के रूप में किताब में नासा द्वारा ऋग्वेद के विश्व के सबसे प्राचीन साहित्य प्रमाणित कइले जाए के दावा कइल गइल बा, जबकि नासा के ओर से अइसन कवनो प्रमाणित आधिकारिक दावा ज्ञात नइखे। एही तरह महाभारत के लाक्षागृह के एक हजार मंजिला भवन बतावल आ घटोत्कच के एक हजार मंजिला भवन में रहे के बात प्रामाणिक महाभारतीय वर्णन से पुष्ट नइखे होत।
सबसे उल्लेखनीय ऐतिहासिक भूल पाणिनि आ सिद्धान्तकौमुदी के संबंध में बा। पाणिनि ‘अष्टाध्यायी’ के रचना कइले रहलें, जबकि ‘सिद्धान्तकौमुदी’ भट्टोजि दीक्षित के कृति ह। अतः एकरा के पाणिनि के रचना बतावल गंभीर ऐतिहासिक त्रुटि ह।
विज्ञान संबंधी विवेचन में भी मनुष्य के सीधे वर्तमान बंदरन के संतान बतावल विकासवाद के गलत व्याख्या ह। आधुनिक मनुष्य आ वर्तमान कपि/बंदरन के विकासक्रम में एगो साझा पूर्वज के अवधारणा बा। एही तरह बिग बैंग के पहिले से मौजूद गैस के बादर में भइल विस्फोट बतावल भी वैज्ञानिक दृष्टि से सही नइखे। एह उदाहरणन से स्पष्ट होला कि किताब में आस्था, लोकविश्वास आ वैज्ञानिक अथवा ऐतिहासिक तथ्य के बीच पर्याप्त अंतर नइखे रखल गइल। एह कारण अइसन दावन के साथ प्रामाणिक स्रोत के स्पष्ट उल्लेख अपेक्षित रहे।
किताब में वर्तनी आ व्याकरण के जे अशुद्धियन बाड़ी, ऊ लेखक के भाव आ विचार के व्यक्त करे में बहुत बड़ बाधा नइखे बनत, बाकिर एकरा के संपादकीय स्तर पर दूर कइल जरूरी रहे। तथ्यात्मक प्रसंगन में प्रस्तुत कुछ स्रोत सनातन धर्म के आस्था आ परंपरागत मान्यतान के दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बाड़ें, हालांकि ओह में से कुछ बात वैज्ञानिक दृष्टि से सर्वमान्य भा प्रमाणित नइखी आ ओह पर मतभेद भी मिलेला। एकरा बावजूद सनातन धर्म के विचार, मान्यता आ परंपरा के भोजपुरी भाषा में प्रस्तुत करे के लेखक के प्रयास निस्संदेह साहसिक आ महत्त्वपूर्ण बा। उचित संपादन आ तथ्य-सत्यापन के साथ ई किताब भविष्य में भोजपुरी के माध्यम से सनातन चिंतन के व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचावे के एगो बेहतर माध्यम बन सकेला।
✍️ डॉ० दिनेश प्रसाद सिन्हा
मुजफ्फरपुर, बिहार