पुरुआ

पुरुआ "पुरुआ" रउआ के भोजपुरी के मिठास,भोजपुरीया माटी के महक से गमकत संस्कार से मिलाई।www.Youtube.com/puruaa It's the very base of any ancient culture.

कवनो मानव समाज के पहिला पहचान..भाषा होखेला। भाषा रउरा रहन सहन...खान पान संस्कृति संस्कार के परिचय देले। पीढ़ी दर पीढ़ी..भाषा ही नदी नीयर पालन पोसन करे ले। नया भाव नया विचार के आगम के साधन बने ले। भोजपुरिया समाज बहुत दिन उपेक्षा के शिकार रहल बा। जबकि देश के बनावे में भोजपुरिया लोगन के बहुत बड़ योगदान बा। एगो साधारण मजदूर से लेके राष्ट्रपति तक भोजपुरिया समाज शुरू में ही ए देश के देले बा। हमनी के अपना भ

ाषा के हीन भावना से काहें देखत बानी जा...एकरा पर बहुत लंबा...कई तरह से चर्चा हो सकेला। लेकिन सवाल ई बा...कि हीन भावना से बाहर निकले खातिर हमनी के का करत बानी जा। पुरुआ ...एही कुल सोच से जनमल एगो संगठन बा...जवना में दुनिया भर के नवहा भोजपुरिया लोग अपना क्षमता के हिसाब से...तन मन धन..बुद्धि कौशल से...भोजपुरी के गौरव के सभका सामने राखे चाहत बा। बरिसन पहिले..हमनी के पूर्वज ट्रिनिडाड, टुबैगो, मारीशस, सूरीनाम...अंडमान में सजा काटे गइलें। अंगरेजन के अत्याचार रहे। लेकिन अपना जीवटता से ओ सब जगह के लोग विकसित सभ्यता वाला जगह बना दीहल। आईं सभे पुरुआ से जुड़ीं...आ अउरी लोगन के जोड़ीं।

Language is the base of any human civilization. The way we communicate with others defines our character, behavior and culture. Since generations, it's the language which has nourished them like a mother nourishes her child. It's the way we communicate which becomes the very base of our sole existence. It's language upon which we lay the foundations of our bright future for our upcoming generations. Bhojpuri has always remained one of the solid sphere of Indian culture, and has given such a strong support in building the nation through its dedicated sons of the soil. Be it Rajendra Prasad, Vashistha Narayan, Bhikhari Thakur, Rahul Sanskritayan, Premchand or anyone else. But somehow of late, it's been largely neglected by its own people. We have started looking at it with a sense of embarrassment. We feel awkward talking about this in our social circles, may be due to fear of getting typecasted as a villager. But with such an enriched culture, there is absolutely no point in getting embarrassed. Rather we should be embracing it with our both hands. Bhojpuri needs us at this hour. It needs our support. So the point is what could be done to uplift it? That's where Puruaa is formed. It's a platform which has been formed by a group of people to make people aware about the power of Bhojpuri. To make people embrace it with a sense of pride, not embarrassment. We strive to do whatever we could in our capacity. And thats not possible without your support. We need you as much as Bhojpuri needs us. Let's join together and take Bhojpuri to an even higher place. And let's also help us join others in this movement. Your every step to help us will be a small step to uplift Bhojpuri.

 #पुस्तक_समीक्षा आस्था, इतिहास आ विज्ञान के बीच : वैदिक सभ्यता के विमर्शकिताब : वैज्ञानिक वैदिक सभ्यतालेखक : डॉ० विजय कि...
06/09/2026

#पुस्तक_समीक्षा

आस्था, इतिहास आ विज्ञान के बीच : वैदिक सभ्यता के विमर्श

किताब : वैज्ञानिक वैदिक सभ्यता
लेखक : डॉ० विजय किशोर पाण्डेय
प्रकाशक : भोजपुरिया माटी त्रिमाही
समीक्षक : डॉ० दिनेश प्रसाद सिन्हा

सनातन धर्म आ वैदिक सभ्यता के संसार बहुते व्यापक बा। ई खाली पूजा-पद्धति भा धार्मिक आस्था ले सीमित नइखे, बलुक एहमें जीवन, समाज, परिवार, राज्य, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, चिकित्सा, दर्शन, गणित, खेती, व्यापार आ प्रकृति के प्रति मनुष्य के दृष्टिकोण तक के एगो विस्तृत परंपरा दिखाई देला। एही व्यापक परिप्रेक्ष्य में श्री विजय किशोर पाण्डेय के किताब ‘वैज्ञानिक वैदिक सभ्यता’ सामने आवेला। ई किताब वैदिक सभ्यता के खाली श्रद्धा के विषय मान के देखे के बजाय ओकर अलग-अलग पक्ष के तर्क, दर्शन, शास्त्रीय संदर्भ आ प्रमाण-सामग्री के माध्यम से समझे के प्रयास करेला।

भोजपुरी साहित्य विकास मंच द्वारा 2025 में आयोजित कार्यक्रम में मुझे मुख्य अतिथि के रूप में गइल रहीं वही डॉ० विजय किशोर पाण्डेय से हमरा पहिला भेंट भइल रहें। ओकरा बाद उ लोकघारा कवि सम्मेलन 2026 में आइल रहलन त ई किताब देले रहीं ।उनकर व्यक्तित्व में इतिहास आ संस्कृति के प्रति गहिर रुचि आ अपना परंपरा के प्रति आत्मीय लगाव साफ दिखाई देला। उनकर किताब ‘सिम्रौनगढ़ के इतिहास’ पढ़े के अवसर भी हमरा के मिलल बा। ओह किताब में सिम्रौनगढ़ के इतिहास आ ओकरा से जुड़ल तथ्यन के शोधपरक ढंग से प्रस्तुत करे के प्रयास भइल बा। उनकर ई प्रयास रहेला कि सनातन और भारत नेपाल संस्कृति पर ज्यादा लिखी पढ़ीपढ़ीं । उनकर एही शोधवृत्ति के विस्तार ‘वैज्ञानिक वैदिक सभ्यता’ में दिखाई देला।

किताब के केंद्रीय उद्देश्य वैदिक सभ्यता के प्राचीनता, ओकर सामाजिक संरचना आ ज्ञान-परंपरा के वैज्ञानिकता के रेखांकित कइल बा। लेखक वेद के अर्थ आ स्वरूप से चर्चा शुरू करत बाड़ें आ सृष्टि के उत्पत्ति, पृथ्वी के उत्पत्ति के काल-गणना आ सनातन चिंतन के अलग-अलग पक्ष तक आपन विचार विस्तार देत बाड़ें। ‘वेद’ शब्द के उत्पत्ति, ओकर अलग-अलग अर्थ, विशेषता आ प्रयोजन के स्पष्ट करे के प्रयास किताब के शुरुआती हिस्सा में मिलेला। एकरा बाद सृष्टि आ पृथ्वी के उत्पत्ति से जुड़ल अलग-अलग मत के सामने रख के भारतीय शास्त्रीय मान्यता के चर्चा कइल गइल बा।

किताब के एगो उल्लेखनीय विशेषता ओकर विषय-विस्तार बा। लेखक वैदिक सभ्यता के कवनो एगो धार्मिक अवधारणा तक सीमित नइखन रखले। ऊ वैदिक काल के गाँव, घर, घर में इस्तेमाल होखे वाला वस्तु, खेती आ जीवन-निर्वाह के साधन के चर्चा करत बाड़ें। हिन्दू धर्म के उत्पत्ति आ ओकर प्रकृति पर विचार करत ‘हिन्दू’ शब्द के व्युत्पत्ति आ ओकरा से संबंधित अलग-अलग मत के भी सामने रखले बाड़ें। एह क्रम में भारतीय धर्म आ संस्कृति के विकास के व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखे के कोशिश भइल बा।

लेखक वैदिककालीन वस्त्र आ मनोरंजन से लेके शिल्पकला, आभूषण, मुद्रा, ऋण आ व्यापार तक के विषय के आपन चर्चा में शामिल कइले बाड़ें। एहसे ई साफ होला कि लेखक के नजर में सभ्यता के मतलब खाली धार्मिक अनुष्ठान नइखे, बलुक मनुष्य के पूरा सामाजिक आ आर्थिक जीवन से बा। प्राचीन समाज में व्यापार कइसे होला, मुद्रा के प्रयोग कवन रूप में रहे, ऋण-लेनदेन के कइसन व्यवस्था रहे आ शिल्पकला कइसे विकसित भइल -एह विषय सभ के किताब में जगह दिहल गइल बा। निष्क नाम के स्वर्णमुद्रा के उल्लेख से लेके तत्कालीन आर्थिक गतिविधि तक के चर्चा एह दृष्टि से खास रुचिकर बा।

वैदिक नारी शिक्षा, सामाजिक अधिकार, विवाह, संतान आ उत्तराधिकार से संबंधित विवेचन किताब के एगो महत्त्वपूर्ण पक्ष बा। आधुनिक समाज में स्त्री-अधिकार आ शिक्षा के लेके जवना तरह के विमर्श होला, ओकर संदर्भ में वैदिक समाज के स्थिति के समझल जरूरी बा। लेखक एह विषय में उपलब्ध वैदिक आ शास्त्रीय सामग्री के आधार पर आपन बात रखे के प्रयास कइले बाड़ें। एही तरह ‘वेद प्रदत्त व्यवस्था’ में व्यक्ति के जीवन से लेके परिवार, समाज, राज्य आ ज्ञान-विज्ञान तक के संचालन से संबंधित व्यवस्था पर विचार कइल गइल बा।

राजनीतिक आ प्रशासनिक दृष्टि से भी किताब उपयोगी सामग्री प्रस्तुत करेला। भाषा, राष्ट्र, राजा, शासन, राजदूत, राष्ट्रभावना, दुर्ग आ न्याय जइसन विषय के एक साथ लेके लेखक ई देखावे के कोशिश कइले बाड़ें कि वैदिक समाज में शासन आ सामाजिक संगठन के लेके भी व्यवस्थित चिंतन मौजूद रहे। आज के प्रशासनिक व्यवस्था से ओकर तुलना करत पाठक के प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन के कुछ पक्ष पर विचार करे के अवसर मिलेला।

चिकित्सा आ जीवन-विज्ञान से जुड़ल विषय भी किताब में आवेला। रोग, औषधि, जन्म, मृत्यु आ पुनर्जन्म के संदर्भ में वैदिक मान्यता के चर्चा कइल गइल बा। एही तरह दर्शन आ गणित के संदर्भ में ऋग्वेद आ अन्य शास्त्रीय स्रोत के उल्लेख मिलेला। आत्मतत्त्व पर चर्चा करत लेखक भारतीय आ पाश्चात्य दर्शन के अवधारणा के बीच के अंतर आ साम्य के समझावे के प्रयास करत बाड़ें। एह तरह किताब धार्मिक अध्ययन से आगे बढ़ के दार्शनिक विमर्श के रूप भी ग्रहण कर लेत बा।

‘राम के जन्म में विवाद काहे?’ किताब के एगो चर्चित विषय बा। श्री पाण्डेय जी रामजन्म के काल-गणना से जुड़ल विवाद पर विचार करत रामायण के अलग-अलग संदर्भ आ उपलब्ध मान्यता के सामने रखे के प्रयास कइले बाड़ें। एही तरह ‘हिन्दू धर्म में भी 786 अंक के चमत्कार’ शीर्षक से लेखक 786 अंक के भारतीय आ इस्लामी परंपरा में प्रचलित मान्यता पर विचार कइले बाड़ें। तीन, सात, आठ आ छह अंक से संबंधित भारतीय विशेषता के भी ऊ बिंदुवार प्रस्तुत कइले बाड़ें। अइसन विषय पाठक के जिज्ञासा बढ़ावेला आ किताब के सामान्य वैदिक विमर्श से कुछ अलग आयाम देला।

किताब में विदेशी विद्वान के कथन आ उनकर किताब से उद्धरण के भी पर्याप्त उपयोग भइल बा। एकर उद्देश्य संभवतः ई देखावल बा कि भारतीय वैदिक परंपरा के विशिष्टता के खाली भारतीय विद्वान नइखे मानले, बलुक अनेक विदेशी अध्येता भी ओकरा के स्वीकार कइले बाड़ें। लेखक सनातन धर्म के प्राचीनता आ ओकर प्रभाव के स्थापित करे के क्रम में बौद्ध, जैन, इस्लामी आ ईसाई परंपरा से जुड़ल संदर्भ के भी उठवले बाड़ें। ईसा मसीह, पैगम्बर मुहम्मद, भगवान बुद्ध आ महावीर जइसन धर्म-प्रवर्तक के सनातन परंपरा के संदर्भ में देखे के प्रयास किताब में मिलेला।

एहिजे किताब के एगो अइसन पक्ष भी सामने आवेला, जहाँ पाठक के लेखक के निष्कर्ष के साथ-साथ उनकर प्रमाण के स्वतंत्र रूप से जाँच करे के चाहीं। धर्म आ इतिहास दुनू संवेदनशील विषय ह। कवनो धर्म के प्राचीनता भा कवनो धार्मिक व्यक्तित्व के संबंध में कइल गइल दावा खाली उद्धरण प्रस्तुत कर देला से अंतिम ऐतिहासिक सत्य ना बन जाला। ओकरा खातिर स्रोत के प्रामाणिकता, काल, संदर्भ आ उपलब्ध अन्य ऐतिहासिक प्रमाण के तुलनात्मक परीक्षण भी जरूरी होला। एह दृष्टि से किताब के कुछ निष्कर्ष विमर्श के विषय ह आ पाठक के ओह निष्कर्ष से सहमत होखे से पहिले स्रोत के आलोचनात्मक अध्ययन करे के चाहीं। एही दृष्टि से किताब के अध्ययन अउरी गंभीर बन जाला।

आस्था, इतिहास आ विज्ञान के बीच : -

सनातन धर्म आ वैदिक सभ्यता के संसार बहुते व्यापक बा। ई खाली पूजा-पद्धति भा धार्मिक आस्था ले सीमित नइखे, बलुक एहमें जीवन, समाज, परिवार, राज्य, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, चिकित्सा, दर्शन, गणित, खेती, व्यापार आ प्रकृति के प्रति मनुष्य के दृष्टिकोण तक के एगो विस्तृत परंपरा दिखाई देला। एही व्यापक परिप्रेक्ष्य में श्री विजय किशोर पाण्डेय के किताब ‘वैज्ञानिक वैदिक सभ्यता’ सामने आवेला। ई किताब वैदिक सभ्यता के खाली श्रद्धा के विषय मान के देखे के बजाय ओकर अलग-अलग पक्ष के तर्क, दर्शन, शास्त्रीय संदर्भ आ प्रमाण-सामग्री के माध्यम से समझे के प्रयास करेला।

भोजपुरी साहित्य विकास मंच द्वारा 2025 में आयोजित कार्यक्रम में मुझे मुख्य अतिथि के रूप में गइल रहीं वही डॉ० विजय किशोर पाण्डेय से हमरा पहिला भेंट भइल रहें। ओकरा बाद उ लोकघारा कवि सम्मेलन 2026 में आइल रहलन त ई किताब देले रहीं ।उनकर व्यक्तित्व में इतिहास आ संस्कृति के प्रति गहिर रुचि आ अपना परंपरा के प्रति आत्मीय लगाव साफ दिखाई देला। उनकर किताब ‘सिम्रौनगढ़ के इतिहास’ पढ़े के अवसर भी हमरा के मिलल बा। ओह किताब में सिम्रौनगढ़ के इतिहास आ ओकरा से जुड़ल तथ्यन के शोधपरक ढंग से प्रस्तुत करे के प्रयास भइल बा। उनकर ई प्रयास रहेला कि सनातन और भारत नेपाल संस्कृति पर ज्यादा लिखी पढ़ीपढ़ीं । उनकर एही शोधवृत्ति के विस्तार ‘वैज्ञानिक वैदिक सभ्यता’ में दिखाई देला।

किताब के केंद्रीय उद्देश्य वैदिक सभ्यता के प्राचीनता, ओकर सामाजिक संरचना आ ज्ञान-परंपरा के वैज्ञानिकता के रेखांकित कइल बा। लेखक वेद के अर्थ आ स्वरूप से चर्चा शुरू करत बाड़ें आ सृष्टि के उत्पत्ति, पृथ्वी के उत्पत्ति के काल-गणना आ सनातन चिंतन के अलग-अलग पक्ष तक आपन विचार विस्तार देत बाड़ें। ‘वेद’ शब्द के उत्पत्ति, ओकर अलग-अलग अर्थ, विशेषता आ प्रयोजन के स्पष्ट करे के प्रयास किताब के शुरुआती हिस्सा में मिलेला। एकरा बाद सृष्टि आ पृथ्वी के उत्पत्ति से जुड़ल अलग-अलग मत के सामने रख के भारतीय शास्त्रीय मान्यता के चर्चा कइल गइल बा।

किताब के एगो उल्लेखनीय विशेषता ओकर विषय-विस्तार बा। लेखक वैदिक सभ्यता के कवनो एगो धार्मिक अवधारणा तक सीमित नइखन रखले। ऊ वैदिक काल के गाँव, घर, घर में इस्तेमाल होखे वाला वस्तु, खेती आ जीवन-निर्वाह के साधन के चर्चा करत बाड़ें। हिन्दू धर्म के उत्पत्ति आ ओकर प्रकृति पर विचार करत ‘हिन्दू’ शब्द के व्युत्पत्ति आ ओकरा से संबंधित अलग-अलग मत के भी सामने रखले बाड़ें। एह क्रम में भारतीय धर्म आ संस्कृति के विकास के व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखे के कोशिश भइल बा।

लेखक वैदिककालीन वस्त्र आ मनोरंजन से लेके शिल्पकला, आभूषण, मुद्रा, ऋण आ व्यापार तक के विषय के आपन चर्चा में शामिल कइले बाड़ें। एहसे ई साफ होला कि लेखक के नजर में सभ्यता के मतलब खाली धार्मिक अनुष्ठान नइखे, बलुक मनुष्य के पूरा सामाजिक आ आर्थिक जीवन से बा। प्राचीन समाज में व्यापार कइसे होला, मुद्रा के प्रयोग कवन रूप में रहे, ऋण-लेनदेन के कइसन व्यवस्था रहे आ शिल्पकला कइसे विकसित भइल -एह विषय सभ के किताब में जगह दिहल गइल बा। निष्क नाम के स्वर्णमुद्रा के उल्लेख से लेके तत्कालीन आर्थिक गतिविधि तक के चर्चा एह दृष्टि से खास रुचिकर बा।

वैदिक नारी शिक्षा, सामाजिक अधिकार, विवाह, संतान आ उत्तराधिकार से संबंधित विवेचन किताब के एगो महत्त्वपूर्ण पक्ष बा। आधुनिक समाज में स्त्री-अधिकार आ शिक्षा के लेके जवना तरह के विमर्श होला, ओकर संदर्भ में वैदिक समाज के स्थिति के समझल जरूरी बा। लेखक एह विषय में उपलब्ध वैदिक आ शास्त्रीय सामग्री के आधार पर आपन बात रखे के प्रयास कइले बाड़ें। एही तरह ‘वेद प्रदत्त व्यवस्था’ में व्यक्ति के जीवन से लेके परिवार, समाज, राज्य आ ज्ञान-विज्ञान तक के संचालन से संबंधित व्यवस्था पर विचार कइल गइल बा।

राजनीतिक आ प्रशासनिक दृष्टि से भी किताब उपयोगी सामग्री प्रस्तुत करेला। भाषा, राष्ट्र, राजा, शासन, राजदूत, राष्ट्रभावना, दुर्ग आ न्याय जइसन विषय के एक साथ लेके लेखक ई देखावे के कोशिश कइले बाड़ें कि वैदिक समाज में शासन आ सामाजिक संगठन के लेके भी व्यवस्थित चिंतन मौजूद रहे। आज के प्रशासनिक व्यवस्था से ओकर तुलना करत पाठक के प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिंतन के कुछ पक्ष पर विचार करे के अवसर मिलेला।

चिकित्सा आ जीवन-विज्ञान से जुड़ल विषय भी किताब में आवेला। रोग, औषधि, जन्म, मृत्यु आ पुनर्जन्म के संदर्भ में वैदिक मान्यता के चर्चा कइल गइल बा। एही तरह दर्शन आ गणित के संदर्भ में ऋग्वेद आ अन्य शास्त्रीय स्रोत के उल्लेख मिलेला। आत्मतत्त्व पर चर्चा करत लेखक भारतीय आ पाश्चात्य दर्शन के अवधारणा के बीच के अंतर आ साम्य के समझावे के प्रयास करत बाड़ें। एह तरह किताब धार्मिक अध्ययन से आगे बढ़ के दार्शनिक विमर्श के रूप भी ग्रहण कर लेत बा।

‘राम के जन्म में विवाद काहे?’ किताब के एगो चर्चित विषय बा। श्री पाण्डेय जी रामजन्म के काल-गणना से जुड़ल विवाद पर विचार करत रामायण के अलग-अलग संदर्भ आ उपलब्ध मान्यता के सामने रखे के प्रयास कइले बाड़ें। एही तरह ‘हिन्दू धर्म में भी 786 अंक के चमत्कार’ शीर्षक से लेखक 786 अंक के भारतीय आ इस्लामी परंपरा में प्रचलित मान्यता पर विचार कइले बाड़ें। तीन, सात, आठ आ छह अंक से संबंधित भारतीय विशेषता के भी ऊ बिंदुवार प्रस्तुत कइले बाड़ें। अइसन विषय पाठक के जिज्ञासा बढ़ावेला आ किताब के सामान्य वैदिक विमर्श से कुछ अलग आयाम देला।

किताब में विदेशी विद्वान के कथन आ उनकर किताब से उद्धरण के भी पर्याप्त उपयोग भइल बा। एकर उद्देश्य संभवतः ई देखावल बा कि भारतीय वैदिक परंपरा के विशिष्टता के खाली भारतीय विद्वान नइखे मानले, बलुक अनेक विदेशी अध्येता भी ओकरा के स्वीकार कइले बाड़ें। लेखक सनातन धर्म के प्राचीनता आ ओकर प्रभाव के स्थापित करे के क्रम में बौद्ध, जैन, इस्लामी आ ईसाई परंपरा से जुड़ल संदर्भ के भी उठवले बाड़ें। ईसा मसीह, पैगम्बर मुहम्मद, भगवान बुद्ध आ महावीर जइसन धर्म-प्रवर्तक के सनातन परंपरा के संदर्भ में देखे के प्रयास किताब में मिलेला।

एहिजे किताब के एगो अइसन पक्ष भी सामने आवेला, जहाँ पाठक के लेखक के निष्कर्ष के साथ-साथ उनकर प्रमाण के स्वतंत्र रूप से जाँच करे के चाहीं। धर्म आ इतिहास दुनू संवेदनशील विषय ह। कवनो धर्म के प्राचीनता भा कवनो धार्मिक व्यक्तित्व के संबंध में कइल गइल दावा खाली उद्धरण प्रस्तुत कर देला से अंतिम ऐतिहासिक सत्य ना बन जाला। ओकरा खातिर स्रोत के प्रामाणिकता, काल, संदर्भ आ उपलब्ध अन्य ऐतिहासिक प्रमाण के तुलनात्मक परीक्षण भी जरूरी होला। एह दृष्टि से किताब के कुछ निष्कर्ष विमर्श के विषय ह आ पाठक के ओह निष्कर्ष से सहमत होखे से पहिले स्रोत के आलोचनात्मक अध्ययन करे के चाहीं। एही दृष्टि से किताब के अध्ययन अउरी गंभीर बन जाला।

आस्था आ इतिहास के बीच संतुलन : -

ई किताब के मूल प्रेरणा सनातन धर्म आ वैदिक सभ्यता के प्रति लेखक के गहिर आस्था से आवेला। ई आस्था किताब के ताकत भी ह आ कहीं-कहीं ओकर सीमा भी बन जाला। अपना संस्कृति, धर्म आ परंपरा के प्रति गौरवबोध कवनो लेखक खातिर स्वाभाविक बात ह; बाकिर जब ओही विषय इतिहास, पुरातत्त्व आ वैज्ञानिक अध्ययन के दायरा में आवेला, त आस्था के साथ प्रमाण, तर्क आ आलोचनात्मक विवेक के संतुलन जरूरी हो जाला।

श्री पाण्डेय जी वेद, पुराण, उपनिषद, ऐतिहासिक दस्तावेज आ विदेशी विद्वानन के लेखन से अनेक उद्धरण आ संदर्भ प्रस्तुत कइले बाड़ें। एहसे उनकर अध्ययन आ सामग्री-संग्रह के गंभीरता के परिचय मिलेला। बाकिर कवनो ग्रंथ में कवनो मत के उल्लेख होखल आ ओह मत के ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित होखल -ई दुनू अलग बात ह। एही तरह धार्मिक परंपरा में प्रचलित कवनो मान्यता के सांस्कृतिक आ आध्यात्मिक महत्त्व अपना जगह बा, जबकि इतिहासकार खातिर ओकर काल, स्रोत, संदर्भ आ स्वतंत्र प्रमाण के जाँच जरूरी होला।

मिसाल खातिर सृष्टि के उत्पत्ति, पृथ्वी के आयु, वैदिक काल के निश्चित समय-सीमा, रामजन्म के काल-गणना, हिन्दू धर्म के प्राचीनता आ अन्य धर्मन के उद्भव से जुड़ल विषय पर भारतीय धार्मिक ग्रंथन में अनेक धारणा मिलेला। एह धारणन के सांस्कृतिक आ दार्शनिक महत्त्व निस्संदेह बहुत बड़ बा, बाकिर ओकरा के आधुनिक ऐतिहासिक निष्कर्ष के रूप में प्रस्तुत करे खातिर पुरातात्त्विक, भाषावैज्ञानिक, अभिलेखीय आ अन्य स्वतंत्र प्रमाणन के साथ तुलनात्मक परीक्षण भी जरूरी बा। किताब में एह दिशा में सामग्री उपलब्ध करावे के प्रयास भइल बा, बाकिर कुछ जगह निष्कर्षन के अउरी सावधानी आ संदर्भ-व्याख्या के साथ रखल गइल रहित त ओकर अकादमिक विश्वसनीयता अउरी बढ़त।

एही तरह ईसा मसीह, पैगम्बर मुहम्मद, भगवान बुद्ध आ महावीर जइसन धार्मिक व्यक्तित्वन के सनातन परंपरा के संदर्भ में देखे के लेखक के प्रयास एगो विशिष्ट वैचारिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करेला। ई दृष्टिकोण धार्मिक-सांस्कृतिक विमर्श में चर्चा के विषय हो सकेला, बाकिर इतिहास के दृष्टि से अइसन दावन खातिर प्राथमिक स्रोत, समकालीन प्रमाण आ अलग-अलग विद्वानन के मत के तुलनात्मक समीक्षा जरूरी बा। कवनो मत से सहमत भा असहमत होखे से पहिले ओकर प्रमाण के प्रकृति के समझल स्वस्थ बौद्धिक परंपरा के आधार ह।

‘वैदिक सभ्यता के वैज्ञानिकता’ के सवाल भी एही संतुलन के माँग करेला। प्राचीन भारतीय ग्रंथन में गणित, खगोल, चिकित्सा, दर्शन, भाषा आ प्रकृति से संबंधित चिंतन के समृद्ध परंपरा रहल बा। ओकर अध्ययन आ मूल्यांकन बहुत जरूरी बा। बाकिर कवनो प्राचीन विचार के आधुनिक विज्ञान के कवनो खोज के समान भा ओकर पूर्वरूप सिद्ध करे से पहिले दुनू के मूल सिद्धांत, पद्धति, काल आ प्रमाण के तुलना जरूरी होला। समानता भा साम्य मिल जाइल अपने आप में प्रत्यक्ष वैज्ञानिक पूर्वानुमान के प्रमाण ना बन जाला। एह सूक्ष्म अंतर के ध्यान में राखल जाव त वैदिक ज्ञान के वास्तविक उपलब्धियन के मूल्यांकन अउरी प्रभावशाली ढंग से कइल जा सकेला।

लेखक के दृष्टि में सनातन संस्कृति खाली अतीत के स्मृति नइखे, बलुक जीवन के व्यवस्थित करे वाली एगो व्यापक ज्ञान-परंपरा ह। एह विचार से किताब के एगो महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक पक्ष सामने आवेला। ‘वेद प्रदत्त व्यवस्था’, नारी शिक्षा, सामाजिक अधिकार, विवाह, उत्तराधिकार, शासन, न्याय, कृषि, व्यापार आ चिकित्सा जइसन विषय के एक साथ देखला से वैदिक समाज के बहुआयामी स्वरूप के समझे के अवसर मिलेला। एहिजा किताब के योगदान ई बा कि ई पाठक के अपना परंपरा के मूल स्रोतन के ओर देखे खातिर प्रेरित करेला।

असल में कवनो सभ्यता के महानता सिद्ध करे के सबसे प्रभावशाली तरीका खाली ई कहल नइखे कि ऊ सबसे प्राचीन भा सबसे श्रेष्ठ रहे, बलुक ओकर ज्ञान, विचार आ संस्थान के प्रमाण के आधार पर वस्तुनिष्ठ अध्ययन कइल ह। भारतीय सभ्यता के वास्तविक उपलब्धि एतना व्यापक बा कि ओकरा के स्थापित करे खातिर अतिशयोक्ति के जरूरत नइखे। जेतना अधिक शोध निष्पक्ष, तुलनात्मक आ प्रमाण-आधारित होई, ओतने अधिक भारतीय ज्ञान-परंपरा के वैश्विक महत्त्व मजबूत होई।

एह दृष्टि से ‘वैज्ञानिक वैदिक सभ्यता’ के आस्था आ इतिहास के बीच संवाद स्थापित करे वाली कृति के रूप में देखल जा सकेला। लेखक के आग्रह आस्था से प्रेरित बा, उनकर सामग्री शोध से आवेला आ उनकर अनेक निष्कर्ष विमर्श के माँग करेला। पाठक के दायित्व बा कि ऊ ना त पूर्वाग्रह के कारण एह बातन के अस्वीकार करे आ ना खाली श्रद्धा के कारण एकरा के अंतिम सत्य मान ले। प्रमाण जहाँ उपलब्ध होखे, उहाँ ओकरा के स्वीकार कइल; जहाँ मतभेद होखे, उहाँ ओकरा के समझल; आ जहाँ प्रमाण अधूरा होखे, उहाँ निष्कर्ष के खुला रखल -ईहे इतिहास आ आस्था के बीच स्वस्थ संतुलन के आधार ह।

एह संतुलित दृष्टि से पढ़ल जाव त ‘वैज्ञानिक वैदिक सभ्यता’ खाली सनातन संस्कृति के प्रशंसा करे वाली कृति बन के ना रह जाला, बलुक वैदिक सभ्यता पर सवाल उठावे, प्रमाण खोजे आ नया सिरे से विचार करे के अवसर भी देला। एही में एह किताब के वास्तविक उपयोगिता आ स्थायी महत्त्व निहित हो सकेला।

वर्तनी, व्याकरण आ तथ्यगत : -

वर्तनी -

किताब में भोजपुरी के सामान्य शब्दन के साथ-साथ तत्सम आ संस्कृतनिष्ठ शब्दन के वर्तनी में भी कई जगह त्रुटि दिखाई देला। जइसे -‘मे’ के जगह ‘में’, ‘उत्पति’ के जगह ‘उत्पत्ति’, ‘सृष्ट’/‘सुष्टि’ के जगह ‘सृष्टि’, ‘पाणिणी’ के जगह ‘पाणिनि’, ‘इश्वरीय’ के जगह ‘ईश्वरीय’, ‘आबश्यक’ के जगह ‘आवश्यक’, ‘अवोर/अबर’ के जगह ‘अउर/और’, ‘सम्बन्धी’ के जगह ‘संबंधी’ आदि। ‘सिद्धांत कौमुदी’ के जगह ग्रंथ के प्रचलित रूप ‘सिद्धान्तकौमुदी’ होखे के चाहीं। एही तरह संस्कृत के मंत्र, सूत्र आ तत्सम शब्दन में हलन्त, मात्रा, विसर्ग आदि के भी सावधानी से प्रयोग अपेक्षित बा। भोजपुरी के क्षेत्रीय प्रकृति के बनाए रखत भी मुद्रित रूप में वर्तनी के एकरूपता जरूरी बा।

व्याकरण आ वाक्य-विन्यास -

किताब में कई जगह कारक-चिह्न, परसर्ग, वचन-क्रिया सामंजस्य आ वाक्य-विन्यास से जुड़ल समस्या मिलेला। उदाहरण खातिर - -‘एकरा बारे मे’ के जगह ‘एकरे बारे में’, ‘गाँव के व्यवस्था’ के संदर्भ में लिंग के अनुसार उचित वाक्य-संरचना, आ ‘आज के विद्वान लोग के कथन’ के जगह ‘आज के विद्वान लोगन के कथन’ अधिक व्याकरणसम्मत होई। एही तरह ‘ई काहेकि’ के जगह ‘ई काहे से कि’ तथा ‘बहुत विद्वान लोग के पुस्तक के अध्ययन कर के लिखे के कोशिश करत बानी’ जइसन वाक्यन में वचन, पुरुष आ क्रिया-पद के उचित सामंजस्य जरूरी बा। कई वाक्य अधूरा अथवा अस्पष्ट भी बाड़ें, जवना से अर्थ ग्रहण करे में कठिनाई होला। ‘ए (मूर्ख)’ जइसन अनौपचारिक आ संदर्भहीन प्रयोग भी लेखकीय भाषा के गंभीरता के प्रभावित करेला।

विराम-चिह्न के स्तर पर भी उद्धरण-चिह्न, पूर्णविराम, अल्पविराम आ कोष्ठक के प्रयोग कई जगह असंगत बा। खासकर संस्कृत मंत्र आ श्लोकन के आरंभ आ अंत में उद्धरण-चिह्न के एकरूपता तथा सूचीबद्ध सामग्री में उचित विराम-चिह्न के ध्यान रखल जरूरी रहे।

तथ्यात्मक आ ऐतिहासिक -

भाषागत त्रुटि से अधिक गंभीर समस्या किताब में प्रस्तुत कुछ ऐतिहासिक, वैज्ञानिक आ तथ्यात्मक दावन से जुड़ल बा। उदाहरण के रूप में किताब में नासा द्वारा ऋग्वेद के विश्व के सबसे प्राचीन साहित्य प्रमाणित कइले जाए के दावा कइल गइल बा, जबकि नासा के ओर से अइसन कवनो प्रमाणित आधिकारिक दावा ज्ञात नइखे। एही तरह महाभारत के लाक्षागृह के एक हजार मंजिला भवन बतावल आ घटोत्कच के एक हजार मंजिला भवन में रहे के बात प्रामाणिक महाभारतीय वर्णन से पुष्ट नइखे होत।

सबसे उल्लेखनीय ऐतिहासिक भूल पाणिनि आ सिद्धान्तकौमुदी के संबंध में बा। पाणिनि ‘अष्टाध्यायी’ के रचना कइले रहलें, जबकि ‘सिद्धान्तकौमुदी’ भट्टोजि दीक्षित के कृति ह। अतः एकरा के पाणिनि के रचना बतावल गंभीर ऐतिहासिक त्रुटि ह।

विज्ञान संबंधी विवेचन में भी मनुष्य के सीधे वर्तमान बंदरन के संतान बतावल विकासवाद के गलत व्याख्या ह। आधुनिक मनुष्य आ वर्तमान कपि/बंदरन के विकासक्रम में एगो साझा पूर्वज के अवधारणा बा। एही तरह बिग बैंग के पहिले से मौजूद गैस के बादर में भइल विस्फोट बतावल भी वैज्ञानिक दृष्टि से सही नइखे। एह उदाहरणन से स्पष्ट होला कि किताब में आस्था, लोकविश्वास आ वैज्ञानिक अथवा ऐतिहासिक तथ्य के बीच पर्याप्त अंतर नइखे रखल गइल। एह कारण अइसन दावन के साथ प्रामाणिक स्रोत के स्पष्ट उल्लेख अपेक्षित रहे।

किताब में वर्तनी आ व्याकरण के जे अशुद्धियन बाड़ी, ऊ लेखक के भाव आ विचार के व्यक्त करे में बहुत बड़ बाधा नइखे बनत, बाकिर एकरा के संपादकीय स्तर पर दूर कइल जरूरी रहे। तथ्यात्मक प्रसंगन में प्रस्तुत कुछ स्रोत सनातन धर्म के आस्था आ परंपरागत मान्यतान के दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बाड़ें, हालांकि ओह में से कुछ बात वैज्ञानिक दृष्टि से सर्वमान्य भा प्रमाणित नइखी आ ओह पर मतभेद भी मिलेला। एकरा बावजूद सनातन धर्म के विचार, मान्यता आ परंपरा के भोजपुरी भाषा में प्रस्तुत करे के लेखक के प्रयास निस्संदेह साहसिक आ महत्त्वपूर्ण बा। उचित संपादन आ तथ्य-सत्यापन के साथ ई किताब भविष्य में भोजपुरी के माध्यम से सनातन चिंतन के व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुँचावे के एगो बेहतर माध्यम बन सकेला।

✍️ डॉ० दिनेश प्रसाद सिन्हा
मुजफ्फरपुर, बिहार

 #शिक्षक_दिवस_परचटिया-पटिया परबईठीं जा टटिए के स्कूल रहे कठही  पाटी परभाठा से खिलत सबद के फूल रहेभेंगरईया का रस सेपाटी क...
05/09/2026

#शिक्षक_दिवस_पर

चटिया-पटिया पर
बईठीं जा
टटिए के स्कूल रहे

कठही पाटी पर
भाठा से खिलत
सबद के फूल रहे

भेंगरईया का रस से
पाटी के काया
फरिछात रहे

गोल-गोल अच्छर
लिखे के कला
सिखावल जात रहे

मास्टर साहेब
गिनती ,पहड़ा
बिटकहरा सब
रटवईनीं

कबिता आ इतिहास
समूचा छड़ी देखा के
चटवईनीं

धूरा-माटी में लोटात
माटी के मूरत
चमक उठल

ज्ञानदीप जब
जरल हिया में
मरकल मुखड़ा
दमक उठल

रहल कहां अब
चाव-भाव
ऊ मान-दान
कतहूं नईखे

चरण दबाईं
शिक्षा पाईं
ई सुभाव
कतहुँ नईखे

तब के बात
रहे कुछ दोसर
दानी रहस
सकल गुरुवर

अज्ञानी का
तपत मगज के
छाप लेस
बनके तरुवर

पाटी आ
चांटी के बीचे
सरस्वती के
बास रहे

गुरु किरपा से
विद्या आई
चेलन का
विश्वास रहे

चेला के चित
जगा गुरु जी
ज्ञान -बोध
रहनीं बांटत

प्यार-दुलार
दबा के दिल मे
ऊपर से
रहनीं डांटत

अईसन पावन
गुरुदेव के
कतनो नमन
करीं कम बा

गुरु के करज
चुका दे अईसन
कवना चेला
में दम बा!

✍️ हरीन्द्र 'हिमकर'
रक्सौल (पुर्वी चम्पारण), बिहार

गुरु ऊ दीया हउवें जे अपना ज्ञान, संस्कार आ मार्गदर्शन से जिनगी के अन्हार दूर करके सफलता के राह देखावेलें।आज के दिन हमनी ...
05/09/2026

गुरु ऊ दीया हउवें जे अपना ज्ञान, संस्कार आ मार्गदर्शन से जिनगी के अन्हार दूर करके सफलता के राह देखावेलें।
आज के दिन हमनी अपना सभे गुरुजन, शिक्षक आ मार्गदर्शक लोगन के चरण में कोटि-कोटि प्रणाम करत बानी।
रउआ सभे के समर्पण, मेहनत आ शिक्षा के बदौलत समाज आ राष्ट्र के भविष्य मजबूत बनत बा।
पुरुआ परिवार के ओर से रउआ सभे के शिक्षक दिवस के हार्दिक शुभकामना आ बधाई!
🍁🙏🍁

"पहिला सपनवा देवकी देखेली"आज श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर सुनी सभे प्रभाकर पांडेय जी के गावल एगो सुघर सोहर गीत। पुरुआ ...
04/09/2026

"पहिला सपनवा देवकी देखेली"

आज श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर सुनी सभे प्रभाकर पांडेय जी के गावल एगो सुघर सोहर गीत।
पुरुआ के अनमोल कृति ई सोहर पिछला आठ बरिस से भोजपुरी जवार के सबसे पसंदीदा गीत रहल बा।
पुरुआ के यु ट्यूब चैनल पर अइसने ढ़ेर गीत आ सिनेमा मौजुद बा।
एक बेर जरुर देखीं आ निमन लागे त शेयर करीं।
साथे पुरुआ के यु ट्यूब चैनल के सब्स्क्राइब जरुर करीं।

#भोजपुरी परंपरागत गीत #सोहर के बिना अधूरा बा। एह प्रस्तुति में कई प...

🎉🦚 नंद के आनंद भइल, जय कन्हैयालाल की! 🦚🎉भगवान श्रीकृष्ण के पावन जन्मोत्सव श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर रउआ सभे के...
04/09/2026

🎉🦚 नंद के आनंद भइल, जय कन्हैयालाल की! 🦚🎉

भगवान श्रीकृष्ण के पावन जन्मोत्सव श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर रउआ सभे के हार्दिक शुभकामना आ बधाई।
🙏💙🙏
मुरलीधर के कृपा रउआ जीवन में सुख, शांति, समृद्धि आ प्रेम के मधुर सुर भर देवे। कान्हा जी के आशीर्वाद से हर सपना साकार होखे आ हर घर-आँगन खुशियन से भरल रहे।
जय श्रीकृष्ण! राधे-राधे!
🍁🙏🍁
पुरुआ परिवार
भोजपुरिया सांस्कृतिक पुनर्जागरण




 #पुस्तक_समीक्षासमीक्षात्मक किताब : 'हमर गाँव' रचनाकार : राम बहादुर राय भाषा : भोजपुरीप्रकाशक : न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, न...
03/09/2026

#पुस्तक_समीक्षा

समीक्षात्मक किताब : 'हमर गाँव' रचनाकार : राम बहादुर राय
भाषा : भोजपुरी
प्रकाशक : न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली
प्रथम संस्करण : 2025 मूल्य : ₹399 समीक्षक : डॉ० दिनेश प्रसाद सिन्हा

हम हाल फिलहाल में राम बहादुर राय जी के कई गो किताब के अध्ययन कइले बानी। हम पावतानी कि ऊ ग्रामीण परिवेश में हो रहल सामाजिक क्षरण आ शहरीकरण पर बहुत गहिराई के साथ लिखेलन। ई काव्य-संग्रह 214 पन्ना में कविता के माध्यम से भारत के सांस्कृतिक बदलाव आ मशीनीकरण से हो रहल परिवर्तन के बीच गाँव-गवई के अच्छाई जिन्दा रखे खातिर पाठक के आमंत्रित करेला।

भोजपुरी साहित्य में गाँव खाली एगो भौगोलिक इकाई ना रहल बा। ऊ लोकजीवन, संबंध, श्रम, संस्कार, प्रकृति, उत्सव, विश्वास आ सामुदायिक जीवन के जीवंत संसार रहल बा। एही गाँव के केंद्र में रख के राम बहादुर राय के काव्य-संग्रह ‘हमर गाँव’ सामने आइल ह। ई संग्रह अपना शीर्षक के अनुरूप गाँव के खाली स्मृति के रूप में ना देखेला, बलुक ओकर बदलत रूप, टूटत सामाजिक ताना-बाना आ आधुनिकता के दबावन के भी अपना रचनात्मक चिंता के विषय बनावेला। युवा जे गाँव छोड़ के शहर जाला आ गाँव के भुला जाला, ओकरा कवि लिखलन -

'जाताड़ऽ तू दिल्ली रजधनिया में
गंवुआ घरवा के धियान रखिह ऽ'

कवि के दृष्टि में गाँव कबो पीपल के छाँव, पोखर, खेत, मेड़, चिरई, कोयल, मड़ई, दही-दूध, भाईचारा आ आत्मीय संबंधन से भरल संसार बा, त कबो बेरोजगारी, कर्ज, दहेज, सामाजिक विभाजन, राजनीतिक स्वार्थ आ आधुनिक जीवन के विसंगतियन से जूझत समाज। विषय-सूची भी ई व्यापक रचनात्मक संसार के संकेत देला -‘भोजपुरी के हिम रऽ अब पिघलवे करी’, ‘बड़ा याद आवे लड़िकइयाँ’, ‘बहुते कठिन बाटे किसान के किसनियाँ’, ‘गाँवों शहर भइले’, ‘खेती अब लहलहा गइल’, ‘लड़का-लड़की में अब भेद होता’ आ ‘आदमी से ढेर कुकुरे पसिन बा’ जइसन रचना संग्रह के विषय-विविधता के स्पष्ट करेला। कवि के दृष्टि में गाँव के वातावरण आ पूरा समाजे सब कुछ बा -

'होते भोरहरिया जगावेली किरिनिया
गंगा जी क पनिया में अमृत के गाँव'

गाँव के बहाने पूरा समाज :

‘हमर गाँव’ के सबसे बड़ा गुण एकर विषय-विस्तारिता बा। कवि गाँव के कवनो एगो स्थिर चित्र के रूप में ना प्रस्तुत करेलन। उनका हियाँ पुरनको के गाँव भी बा, आजुक के गाँव भी आ भविष्य के लेके चिंता भी बा। एकरा नीचे पढ़ीं—
'का कहीं ए सखी कइसन गाँव हो गइल
बनला में शहर, गवुंओ बेकार हो गइल'

गाँव के स्मृति आ लोकजीवन :

संग्रह के सबसे आत्मीय पक्ष गाँव के स्मृतियन के संसार बा। ‘बड़ा याद आवे लड़िकइयाँ’ जइसन रचनन में बचपन के गाँव, बरखा, कच्चा घर, चनर-चउकी, पीपल के छाँव आ सामूहिक जीवन के स्मृतियाँ बार-बार लवट के आवेली। कवि खातिर बचपन खाली निजी स्मृति ना ह, बलुक ओह सामुदायिक जीवन के स्मृति ह जवना में लोग एक-दूसरा के सुख-दुःख में सहभागी रहले।

‘हमर गाँव स्वर्ग लागे’ में गाँव के बेहद मोहक आ भावपूर्ण चित्र उपस्थित होला। नदी किनारे के हरियाली, पनघट, माई के आँचल, आरती, मंगलगान, भाई-बहिन के प्रेम आ लोकजीवन के सहजता मिल के गाँव के कवि खातिर स्वर्ग बना देला।

इहाँ गाँव के सुंदरता खाली प्रकृति के सुंदरता ना ह; ऊ मानवीय संबंधन के सुंदरता भी ह।

बदलत गाँव :

कवि के दृष्टि खाली अतीत-मोह में अटकल नइखे। ‘गाँवों शहर भइले’ में ऊ आधुनिकता के चलते बदलत गाँव के देखेलन। बाग-बगीचा, पीपल के छाँव, चरागाह, पोखर आ लोकगीत धीरे-धीरे लुप्त होत जात बा आ गाँव शहरी जीवन के नकल में आपन मूल स्वरूप खोवत जात बा।

‘शहरिया से नीन आपन गाँव बा’ में एकरा उलट कवि गाँव के आत्मीयता के शहर के कृत्रिम जीवन से बेहतर मानेलन। उहाँ हवा-पानी, लोगन के निर्मलता, बोली के मिठास आ पारस्परिक सहयोग के ऊ गाँव के असली संपत्ति मानेलन।

एह तरह संग्रह में गाँव बनाम शहर के सवाल खाली भौगोलिक ना ह। ई जीवन-मूल्य आ सामाजिक-दर्शन के विषय बन जाला। राम बहादुर राय किताब के कथ्य में एकरा के अइसन पिरोवले बाड़न कि पाठक एह में आपन जिनगी, बचपन आ गाँव खोजे लागेला।

किसान आ खेती :

‘हमर गाँव’ के सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक सरोकार किसान बा। ‘बहुते कठिन बाटे किसान के किसनियाँ’ में किसान के श्रम, मौसम के मार, पानी के कमी आ फसल के संकट के मार्मिक ढंग से उभारल गइल बा। खेत आ किसान इहाँ खाली ग्रामीण जीवन के अंग ना, बलुक भारतीय अर्थव्यवस्था आ जीवन के आधार के रूप में उपस्थित बाड़ें।

‘खेत अब लहलहा गइल’ में फसल के हरियाली आ किसान के खुशी दिखाई देला, बाकिर दूसरा ओर ‘एह घरी आ पहिले के खेती-किसानी’ आ संबंधित रचनन में आधुनिक कृषि-पद्धति के कारण परंपरागत खेती, देशी बीज, पशु, पंछी आ कृषि-संस्कृति के क्षरण के चिंता भी दिखाई देला।

कवि एह बदलाव के अंध-विरोध के दृष्टि से ना देखेलन; उनकर चिंता ई बा कि विकास के साथ कृषि के आत्मा आ किसान के गरिमा नष्ट ना होखे।

सामाजिक विसंगतियाँ :

संग्रह में सामाजिक चेतना पर्याप्त मुखर बा। जाति, धर्म, स्वार्थ, राजनीतिक अवसरवाद, बेरोजगारी, कर्ज, दहेज आ स्त्री-असुरक्षा जइसन सवालन पर कवि खुल के लिखले बाडें।

‘लड़का-लड़की में अब भेद होता’ में शिक्षा के विस्तार के बावजूद दहेज-प्रथा के बनल रहला के विडंबना सामने आवेला। बेटी के बियाह खातिर जमीन बेचला आ कर्ज लेवे के मजबूरी के कवि सामाजिक त्रासदी के रूप में देखेलन।

‘ध्यान तू हम दिहल करऽ’ में देश, समाज, संविधान, सीमा आ राष्ट्रीय एकता के लेके कवि के चिंता व्यक्त होला।

‘ई का कर रहल बाटे आदमी?’ जइसन रचना आधुनिक मनुष्य के हिंसक आ अमानवीय प्रवृत्तियन पर तीखा सवाल खड़ा करेला। स्त्री पर अत्याचार, जाति-धर्म के नाम पर हिंसा आ आधुनिकता के साथ बढ़त बर्बरता के कवि कठघरा में खड़ा कर देले बाड़न।

भोजपुरी भाषा के सवाल :

‘हमर गाँव’ के एगो महत्वपूर्ण पक्ष भोजपुरी भाषा के प्रति कवि के गहिर अनुराग बा। ‘भोजपुरी के हिम रऽ अब पिघलवे करी’ में भोजपुरी के प्रति आत्मगौरव आ ओकर मान्यता के आकांक्षा स्पष्ट बा। कवि भोजपुरी के आपन पहचान आ जीवन के भाषा के रूप में स्वीकार करेलन।

भोजपुरी के संविधान के आठवीं अनुसूची में स्थान दिलावे के माँग भी रचना में स्पष्ट रूप से आवेला। एह तरह भाषा इहाँ खाली अभिव्यक्ति के माध्यम ना, बलुक सांस्कृतिक अस्मिता के सवाल बन जाला।

प्रेम आ विरह :

संग्रह के दूसरा प्रमुख स्वर प्रेम आ विरह बा। ‘अब ना सहाला आवे मोर सजनवा’, ‘कब अइहें मोरे साँवरिया’, ‘नयन से देखत नयन लोर हो गइल’ आदि रचनन में कवि के प्रेम-संसार दिखाई देला। एह रचनन में प्रेम बहुत अधिक कृत्रिम या बौद्धिक ना ह; ऊ लोकजीवन से निकलल सहज प्रेम बा।

विरह में आँसू, प्रतीक्षा, स्मृति, प्रिय के छवि आ मिलन के आकांक्षा बार-बार उभर के आवेला। ‘अब ना सहाला आवे मोर सजनवा’ में विरह के पीड़ा क्रमशः गहिर होत दिखाई देला।

ऋतु आ प्रकृति :

फागुन, सावन, भादो, बरखा, सरसों, गेहूँ, आम, महुआ, कोयल, पपीहा, चिरई आदि संग्रह के प्राकृतिक दुनिया के प्रमुख तत्व ह। ‘आइल फागुन के महिनवा’, ‘उड़े लागल रंग अबीर गुलाल’, ‘चढ़ गइल फागुन के खुमार’ आदि रचनन में प्रकृति आ मानवीय उल्लास के सुंदर सामंजस्य मिलेला।

प्रकृति कवि के हियाँ खाली सजावटी तत्व ना ह। ऊ मनोदशा के वाहक बा। बरखा आवेला त किसान के जीवन बदल जाला; फागुन आवेला त मन में रंग भर जाला; सूखत नदी आ बदलत खेत सामाजिक संकट के संकेत बन जाला।

धार्मिक आ लोक-आस्था :

मंगलामाई, छठी मइया, शारदा, महादेव, शिव आदि के प्रति कवि के आस्था संग्रह में पर्याप्त जगह पावेला। ‘महिमा बा राउर अपरंपार, ए मंगलामाई’, ‘हे छठी माई सुनि लऽ विनती हमार’, ‘देवों के देव महादेव हो’ आदि रचना लोकविश्वास आ धार्मिक भावभूमि से जुड़ल बाड़ी स।

ई धार्मिकता कर्मकांड तक सीमित ना रहेला; कई जगह कवि लोकमंगल आ पीड़ित मनुष्य के सहायता खातिर देवी-देवता से प्रार्थना कइले बाड़न।

भाषा :

एह संग्रह के सबसे बड़ा उपलब्धियन में एकर भोजपुरी भाषा बा। कवि अपना अनुभूति के भोजपुरी के स्वाभाविक लोकस्वर में व्यक्त कइले बाड़न। भाषा में गाँव के बोलचाल, देशज शब्द, लोक-प्रयोग आ ग्रामीण जीवन से जुड़ल शब्दन के प्रचुरता बा। ‘मड़ई’, ‘खपरैल’, ‘चरवाही’, ‘पनघट’, ‘चउका-चूल्हा’, ‘महुआ’, ‘पिपरा’, ‘मड़ई-टाटी’, ‘ओखर-मूसल’ जइसन शब्द कविता के स्थानीय जीवन से जोड़ेला। एही शब्द संग्रह के भाषिक प्रामाणिकता बढ़ावेला।

भाषा के एगो विशेष गुण ई बा कि कवि कठिन भावन के भी सामान्य पाठक के समझ में आवे वाली भाषा में कहे के प्रयास करेलन। एह कारण संग्रह के पाठक-वर्ग खाली साहित्यिक अभिजात तक सीमित ना रह जाला। कुछ शब्द हिन्दी के तरह हूबहू रखल गइल बाड़ें
यथा -शहर।

व्याकरण आ वर्तनी :

भाषा के दृष्टि से संग्रह में भोजपुरी के लोकप्रचलित रूपन के पर्याप्त उपयोग भइल बा। कवि मानकीकृत हिंदी के कठोर व्याकरण के अपेक्षा भोजपुरी के बोलचाल वाला व्याकरण के प्रधानता दिहले बाड़न। ई उनकर रचनात्मक नीति के हिस्सा समझल जाए के चाहीं।

फेर भी मुद्रण आ वर्तनी के दृष्टि से संपादकीय परिष्कार के गुंजाइश दिखाई देला। अनेक जगह शब्द-रूप, विराम-चिह्न, पंक्ति-विन्यास आ मुद्रण-प्रस्तुति के अधिक एकरूप बनावल जा सकत रहे। कुछ रचनन में पुनरावृत्ति आ वाक्य-विन्यास के असंतुलन भी दिखाई देला। एहसे भाषा के सहजता के बचावत अगिला संस्करण में भोजपुरी के मानक वर्तनी-रूप आ संपादकीय अनुशासन पर विशेष ध्यान दिहल उपयोगी होई।

ई कमी रचनन के मूल संवेदना के नष्ट ना करेला, लेकिन किताब के साहित्यिक प्रस्तुति के आउर अधिक परिष्कृत बनावल जा सकत रहे।

शैली :

राम बहादुर राय के शैली मूलतः लोकधर्मी, आत्मीय, संवादात्मक आ कथनप्रधान बा। ऊ पाठक से दूरी बना के कविता ना कहेलन, बलुक अइसन लागेला जइसे गाँव के कवनो आपन आदमी सामने बइठ के गाँव के कथा सुना रहल होखे।

उनकर शैली में तीन गो प्रमुख स्वर दिखाई देला -
पहिला : स्मृति के स्वर। बचपन, गाँव, माता-पिता, खेत, त्योहार आ पुरान संबंधन के स्मृतियाँ।
दूसरा :सामाजिक चेतना के स्वर। किसान, बेरोजगारी, दहेज, राजनीति, जातीय विभाजन आ बदलत सामाजिक व्यवस्था।
तीसरा :भावात्मक स्वर। प्रेम, विरह, भक्ति, मातृभाव आ देशप्रेम।

एह तीनों स्वरन के सम्मिलन संग्रह के एकरंगी होखे से बचावेला।

शिल्प :

शिल्प के दृष्टि से कवि मुख्यतः तुकांतता, लय, पुनरावृत्ति, लोकधुन आ गीतात्मक संरचना के सहारा लिहले बाड़न। अनेक रचना अइसन बाड़ी स जिनमें मुखड़ा के पुनरावृत्ति गीत के प्रभाव के बढ़ावेला।

उदाहरण खातिर ‘रहि-रहि गाँववाँ के याद सतावेला’ में आवृत्ति खाली तुक ना, बलुक स्मृति के बेचैनी के भी व्यक्त करेला।

एही तरह ‘बहुते कठिन बाटे किसान के किसनियाँ’ में शीर्ष पंक्ति के पुनरावर्तन किसान के पीड़ा के केंद्रीय स्वर प्रदान करेला।

कवि के शिल्प में लोकगीत के लयात्मकता स्पष्ट बा। कहीं-कहीं ई लय कविता के गेय बनावेला, त कहीं अत्यधिक पुनरावृत्ति काव्य-संक्षेप के संभावना के कम कर देला। फेर भी लोकभाषा के स्वाभाविक गीतात्मक संस्कार के कारण ई शिल्प संग्रह के प्रकृति के अनुकूल बा। अधिकांशतः तुकबंदी बैठावे के कवि के प्रयास सफल रहल बा, लेकिन कहीं-कहीं पर ई टूट भी गइल बा।

अलंकार आ बिंब :

संग्रह में अलंकारन के प्रदर्शनात्मक प्रयोग कम आ स्वाभाविक प्रयोग अधिक बा। उपमा, रूपक, अनुप्रास, मानवीकरण आ पुनरुक्ति जइसन उपकरण सहज रूप में आवेला।

प्रकृति-बिंब विशेष रूप से प्रभावशाली बाड़ें -फागुन के रंग, सरसों के फुलाइल, आम के मोजराइल, महुआ के झरना, कोयल के बोलना, बरखा के आना आदि ग्रामीण जीवन के दृश्यात्मकता निर्मित करेला।

एही तरह ‘पीपल के छाँव’ खाली पेड़ के छाया ना रह जाला; ऊ सुरक्षा, अपनापन आ सामुदायिक जीवन के प्रतीक बन जाला।

भाव-पक्ष :

‘हमर गाँव’ के भाव-पक्ष अत्यंत व्यापक बा। एह में मातृभाव, वात्सल्य, प्रेम, विरह, करुणा, भक्ति, हास्य, व्यंग्य, देशप्रेम आ सामाजिक आक्रोश एक साथ मिलेला।

माई से संबंधित रचनन में कवि के भाव अत्यंत आत्मीय हो जाला। ‘सब दिहीं लेबऽ, माई ना किनाई’ में माई के जीवन के अइसन सत्ता के रूप में देखल गइल बा जेकर तुलना कवनो वस्तु से ना कइल जा सकेला।

पिता के स्मृति से जुड़ल रचनन में भी व्यक्तिगत शोक सामूहिक अनुभव के रूप ले लेला। ‘बड़ा याद आवेला बाबूजी के बतिया’ में पिता के स्मृति खाली निजी वियोग ना, बलुक जीवन-मूल्यन के छूट जाए के अनुभूति बन जाला।

व्यंग्य-बोध :

कवि के व्यंग्य भी उल्लेखनीय बा। ‘आदमी से ढेर कुकुरे पसिन बा’ में मनुष्य के बदलत व्यवहार आ कुकुर के प्रति बढ़त आकर्षण के बहाने सामाजिक संबंधन के विडंबना पर चोट कइल गइल बा।

‘अब त कुरसी से पहचान, ओहि बनावे विद्वान’ जइसन रचना सत्ता, पद आ प्रतिष्ठा के संबंध पर व्यंग्य करेला। कुर्सी के कारण विद्वता आ पहचान मिले के प्रवृत्ति के कवि हास्य-व्यंग्य के माध्यम से सामने ले आवेलन।

इहाँ कवि के व्यंग्य खाली हँसावे खातिर ना ह; ओकरा पीछे सामाजिक विसंगति के उजागर करे के बेचैनी बा।

राजनीतिक आ सामाजिक चेतना :

संग्रह के कवि राजनीति से उदासीन नइखन। चुनाव के समय नेता लोग के गाँव आवे आ फेर गायब हो जाए के प्रवृत्ति पर ‘जब-जब आवेला देसवा में चुनउवा’ जइसन रचना तीखा व्यंग्य करेला।

एही तरह बेरोजगारी के समस्या ‘ढग-ढग घूमेला बेरोजगार हो’ में सामने आवेला। पढ़ल-लिखल युवक के नौकरी के तलाश, परिवार के आर्थिक परेशानी आ भविष्य के चिंता एह रचना के समकालीन बनावेला।

कवि के सामाजिक दृष्टि के केंद्र सामान्य मनुष्य बा -किसान, मजदूर, बेरोजगार युवक, गरीब परिवार, बेटी आ गाँव के साधारण आदमी।

आधुनिकता के प्रति दृष्टिकोण :

‘हमर गाँव’ आधुनिकता के अंध-विरोध ना करेला, लेकिन अइसन आधुनिकता पर सवाल उठावेला जे मनुष्य के ओकर जड़ से काट देला।

ट्रैक्टर, मशीन, रासायनिक खाद, कीटनाशक, फ्लैट, बोतलबंद पानी आ बदलत खान-पान के चित्रन के माध्यम से कवि बतावेला कि विकास सुविधा त दिहलस, लेकिन ओकरा साथे अनेक पारंपरिक जीवन-मूल्य भी कमजोर भइल।

एहसे संग्रह के मूल सवाल ई ना ह कि आधुनिकता आवे कि ना, बलुक ई बा कि आधुनिकता के बीच मनुष्यता, प्रकृति, लोकसंस्कृति आ संबंध कइसे बचें।

संग्रह के विशेष उपलब्धियाँ :

‘हमर गाँव’ के प्रमुख उपलब्धियन के हम एह तरह देखतानी -

1. भोजपुरी में ग्रामीण जीवन के विस्तृत आ बहुआयामी चित्रण।

2. गाँव के स्मृति के साथ वर्तमान सामाजिक यथार्थ के संयोजन।

3. किसान आ कृषि-संकट के प्रमुख काव्य-विषय बनावल।

4. भोजपुरी भाषा के प्रति स्पष्ट आत्मीयता आ अस्मिताबोध।

5. लोकगीतात्मक लय आ गेयता।

6. प्रेम, विरह, भक्ति आ सामाजिक चेतना के संतुलित सह-अस्तित्व।

7. दहेज, बेरोजगारी, जाति-विभाजन आ राजनीतिक स्वार्थ पर स्पष्ट टिप्पणी।

8. लोक-संस्कृति आ परंपरागत ग्रामीण जीवन के संरक्षण के चिंता।

9. सरल आ जनसुलभ भाषा।

10. व्यक्तिगत स्मृति के सामूहिक अनुभव में बदल देवे के क्षमता।

जहाँ संग्रह आउर बेहतर हो सकत रहे :

साहित्यिक दृष्टि से कवनो भी संग्रह के मूल्यांकन खाली प्रशंसा से पूरा ना होला। ‘हमर गाँव’ में रचनात्मक ऊर्जा प्रचुर बा, किंतु संपादकीय स्तर पर कुछ जगह अधिक कसाव के जरूरत महसूस होला।

कुछ कवितन में विचार के पुनरावृत्ति दिखाई देला। कहीं-कहीं भाव के अपेक्षा कथन अधिक हो गइल बा। कुछ रचना गीतात्मक प्रभाव में बहुत सफल बाड़ी स, जबकि कुछ में पंक्तियन के विस्तार कम कइल जा सकत रहे।

एही तरह वर्तनी, विराम-चिह्न, पद-विन्यास आ मुद्रण के एकरूपता पर अधिक ध्यान दिहल जात त किताब के बाह्य आ साहित्यिक रूप दुनो अधिक सुघड़ बनत।

लेकिन ई कमियन मुख्यतः संपादकीय आ शिल्पगत परिष्कार से जुड़ल बाड़ी स; संग्रह के मूल संवेदना आ विषयगत महत्त्व एहसे कम ना होला।

ग्रामीण नब्ज के साहित्यिक वैज्ञानिक :

अतः ‘हमर गाँव’ के भोजपुरी के लोकधर्मी काव्य-परंपरा में एगो अइसन संग्रह के रूप में देखल जा सकेला जवना में माटी के गंध, मनुष्य के पीड़ा आ समय के बेचैनी -तीनों एक साथ बोलत बा। राम बहादुर राय के रचनात्मक यात्रा के समग्रता में देखीं त स्पष्ट होला कि गाँव उनका खातिर खाली कविता के विषय ना, बलुक जीवन के एगो विस्तृत अध्ययन-क्षेत्र बा। ऊ गाँव के माटी, किसान, खेत-खलिहान, लोक-संस्कृति, सामाजिक संबंधन आ बदलत ग्रामीण जीवन के नब्ज के जवना निरंतरता आ सूक्ष्मता से पकड़ेलन, ऊ उनकर विशिष्ट पहचान बन जाला। एह अर्थ में उनका के ‘गाँव के वैज्ञानिक’ कहल अतिशयोक्ति ना, बलुक उनकर रचनात्मक प्रवृत्ति के एगो सार्थक पहचान बा।

✍️ डॉ० दिनेश प्रसाद सिन्हा
मुजफ्फरपुर, बिहार

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