27/07/2023
कृष्ण बलदेव वैदः एक परिचय
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मूल गाँव डेरा बख़्शियान, ज़िला रावलपिण्डी, तहसील गुज्जर खान।
पिता की नौकरी डिंगा गाँव में और इसी गाँव में कृष्ण बलदेव वैद का जन्म।
डिंगा से मंगोवाल गाँव जाना। कई साल यहीं रहना और चौथी कक्षा यहीं से पास करना।
डिंगा में 'साहनीयों की गली' और 'शेखों की गली' में किराये के घर पर रहना।
घर में माता पिता के अलावा एक बहन और एक छोटा भाई।
माँ सिर्फ़ गुरमुखी ही पढ़ सकती थी। कभी कभी गुरमुखी में गीता पढ़ती। बहन देवकी जो रामचरितमानस पढ़ने का शौक़ रखती थी और सारी उम्र उसे पढ़ती रही।
आठवीं या नौवीं के साथ ही फ़ारसी में मुंशी का इम्तिहान पास कर लेना।यहाँ से फिर डिंगा जाना और यहाँ के सरदार हाकम सिंह हाई स्कूल से 10वीं तक पढ़ना।
इंटरमीडिएट के समय 'क्राइम एंड पनिशमेंट' पढ़ना और कई दिन इस नॉवल में डूबे रहना।
कॉलेज के दिनों में सुदर्शन और प्रेम चंद को उर्दू में पढ़ा।अंग्रेज़ी के नावलकारों में डिकेन्स, हार्डी और लॉरेंस पसंद थे। और फिर 1942 में लाहौर कॉलेज में दाख़िला लेना।
रावलपिंडी के कॉलेज में बी ऐ डिगरी की और एक स्कूल में दो तीन महीने मास्टरी।
सिविल सप्लाई विभाग में आवेदन पत्र और इंटरव्यू देने जाना। ड्यूटी कमिश्नर से मिलना।
इसी ड्यूटी कमिशनर के समझाने पर आगे पढ़ने का फ़ैसला लेना।
सियालकोट में साइकिल चलाना सीखना।
गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर में अंग्रेज़ी ऐम ऐ में दाख़िल होना।
उर्दू अख़बार 'प्रताप' या 'मिलाप' में छपी उनकी पहली कविता की पहली पंक्ति–
'मोहब्बत की देवी का घर चाहता हूँ'।
अंग्रेज़ी की बुनियाद सरदार नरोत्तम सिंह जौहर से मिली; उर्दू फ़ारसी के उस्ताद बशीर अहमद शाह।
1950 तक ये फ़ैसला कर लेना कि 'लिखूँगा हिन्दी में और जीविका के लिए अंग्रेज़ी पढ़ाऊँगा'।
1952 तक पक्का फ़ैसला, मुल्कराज आनंद की प्रेरणा से, कर लेना के अपनी क़िस्म की हिंदी में लिखना जिसमें उर्दू फ़ारसी के लिए सब दरवाज़े खुले रहेंगे और पंजाबी वे अंग्रेज़ी के लिए कुछ खिड़कियां भी।
विभाजन के बाद लुटे-पिटे परिवार समेत दिल्ली पहुँचना। कैंप कॉलेज में अंग्रेज़ी में एम ऐ पूरा करना।
हिंदी में पहली कहानी "बीच का दरवाज़ा" पत्रिका 'साहित्यकार' में प्रकाशित हुई।
अम्बाला सनातन धर्म कॉलेज में भी दो महीने पढ़ाया।
डी ऐ वी कॉलेज जालंधर के प्रिंसिपल लाला ज्ञानचंद्र से मिलाप, एक साल यहीं नौकरी करना।
और फिर पंजाब यूनिवर्सिटी टीचर्स यूनियन से जनरल सेक्रेटरी भीष्म साहनी की मुअत्तली का खामियाजा भुगतना और डी ऐ वी कॉलेज में रेगुलर न किए जाना।
हंसराज कॉलेज में आठ साल पढ़ाना।
1957 में तीन साल के लिए हावर्ड चले जाना पी ऐच डी के लिए। 1961 में हंसराज कॉलेज में वापस लौटना। 1962 से 1966 तक फिर हावर्ड में शोध करने जाना और फिर स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ़ न्यूयॉर्क पॉस्टडम में एक दो साल के लिए पढ़ाने जाना।
1983 में चंडीगढ़ आना। कोई दिलचस्प दोस्त या लोग जिनसे मिलकर कुछ रूहानी या अदबी तौर पर हासिल हो न होने के कारण चंडीगढ़ में मन न लगना।
पंजाब को विभाजन की तरफ़ बढ़ते हुए देखा और यह कि 'आम लोग अहिंसा के आदी होते जा रहे हैं, और शायद शौक़ीन भी'। इन सब हालातों के बीच 1987 में चंडीगढ़ वाला घर डॉक्टर मनमोहन सिंह को बेच पंजाब से चले जाना।
लिखने में रुचि और शैली को बनाने में काफ़्का,कामु, सापर, दोस्तोयव्सकी, चेख़व, तुर्गनेव, गोरकी, हैनरी जेम्स, जेम्स जॉयसी, प्रूस्त, लॉरेंस, वर्जीनिया वोल्फ, ई ऐम फ़ॉस्टर, डिकेंस, हार्डी, प्रेमचंद, ज्ञानेंद्र, अज्ञ्य, राजेंद्र सिंह बेदी, इस्मत चुगताई, हैदर, हज़ारी प्रसाद, फणीश्वरनाथ रेणु का योगदान रहा।