24/08/2026
बिहार में पिछले एक साल में दो फिल्मों का ग्रैंड स्तर पर प्रमोशन हुआ—
1️⃣ पुष्पा 2 — स्मगलिंग पर आधारित फिल्म
2️⃣ मिर्जापुर — रंगदारी, गुंडागर्दी और अपराध की दुनिया पर आधारित कहानी
सवाल यह है कि बिहार की पहचान आखिर किस चीज़ से बनाई जा रही है?
स्मगलिंग और गुंडागर्दी से?
और सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि इसमें बिहार के नेताओं की भूमिका भी सवालों के घेरे में है—जो इसे रोकने के बजाय ऐसे नैरेटिव को बढ़ावा देते दिखाई देते हैं।
जिस बिहार की धरती नालंदा और विक्रमशिला जैसी महान शिक्षण परंपराओं की भूमि रही है, जहाँ कभी दुनिया ज्ञान लेने आती थी—आज उसी बिहार में शिक्षा से ज्यादा अपराध और गुंडागर्दी के नैरेटिव को ग्लैमराइज किया जा रहा है।
यह सिर्फ फिल्मों का सवाल नहीं है।
यह बिहार की पहचान और आने वाली पीढ़ियों की दिशा का सवाल है।
प्रशांत किशोर को अपना नेता मानने का मेरा सबसे बड़ा कारण यही है।
वो बिहार में शिक्षा की बात करते हैं।
बिहार की शिक्षा व्यवस्था सुधारने की बात करते हैं और बिहार को फिर से ज्ञान की भूमि बनाने का संकल्प लेते हैं।
बिहार को कट्टा, रंगदारी और अपराध के नैरेटिव से बाहर निकालकर किताब, शिक्षा, रोजगार और उद्योग की पहचान देनी होगी।
उम्मीद है बिहार के बाकी नेता भी प्रशांत किशोर से कुछ सीखेंगे क्योंकि बिहार को अपराध की नहीं, शिक्षा की राजनीति चाहिए।
जय बिहार! ✊🙏