12/03/2024
#ग्राम_स्वराज_संघ_निलपर_रापर_कच्छ
मां रवेची की पैदल यात्रा।
ग्राम स्वराज संघ माने बच्चों का स्वर्ग। इस स्वर्ग के देवता माने नकुलमामा। कुछ दिन नहीं हुए कि उन्हें बच्चों के लिए कुछ न कुछ नया करना होता है। कभी लंबा प्रवास, कभी छोटा, कभी शैक्षणिक सहल कभी पैदल यात्रा, कभी आनंद मेला, कभी समूह भोज, कभी बड़ों बच्चों के जन्म दिवस समारोह, कभी महेमानों की आवभगत। कभी राष्ट्रीय त्यौहार कभी सामाजिक। इन सब का एक ही मकसद बच्चों को खुश रखना, उन्हें खुशियां देना, उनके चहेरा का भाव खुसखुशाल बनाए रखना। साथ साथ बुनियादी शिक्षण भी मोहिया करना। सिर्फ बच्चे ही क्यों ऐसी सहल में सोनटेकरी के सारे सभ्यों को भी आमंत्रित करना ताकि वे भी अपने रोजमर्हा के जीवन से बाहर आकर इस मनोरंजन का हिस्सा बन सके।
बच्चों के लिए उत्सव माने उनके लाड़िले मामा। कुछ भी फरमाइश हो मामा के कान तक पहुंची नहीं कि उसे आकर मिलना तय हो जाता। हर साल की तरह इस बार भी बच्चों की पैदल सहल बाकी रह गई थी। व्यस्तता और निजी शारीरिक तकलीफों के चलते हुए भी मामा भूले नहीं थे बच्चों को रवेचि माता यात्रा ले जाना है। खुद को कितनी भी तकलीफ हो, उनके सदा हंसते हुए चहेरे पर कभी सिकन तक नहीं दिखाई देती। उनके रग रग में और प्राणों में बच्चों की खुशियां और विकास की सोच रमती रहती हैं। दो दिन पहले आनंद बाजार हुआ। कुछ दिनों बाद होली और फिर परीक्षाएं। उस बीच एक रविवार बचता था और अचानक से मीटिंग और पैदल प्रवास की घोषणा। सामिल हुए कक्षा एक से नव के बच्चे। छोटे और बड़े सब के लिए सर्त थी पैदल चलना। जो लोग थक्क जाय उनके लिए चार पांच किमी बाद भाव दीप, ट्रैक्टर्स की व्यवस्था। पैदल पंथ था २३ किमी चलना !
बच्चों का उत्साह देखते ही बनता था। सब सुबह जल्दी उठ कर साढ़े छह बजे मैदान में जमा हो गए। तैयारी क्या थी ? कुछ नहीं, सिर्फ पानी की बोतल। बाकी सब मामा थे न ! कई लड़के लड़कियों के पैरों में चप्पल तक नहीं। क्योंकि उन्हें बिना चप्पल ही चलना था। कम से कम पांच घंटे पक्के लगने थे। सुबह सुहानी और ठंडी थी। लेकिन दोपहर कड़ाके की धूप। सारी सुविधाएं साथ थी फिर भी इन बच्चों की हिम्मत के आगे सब कुछ बौना था। उनका उत्साह देखते ही बनता था। कई अभावों और सूखे प्रदेश में पले बढ़े इन बच्चों के लिए धूप, गर्मी, पैदल चलना, खुले पैरों चलाना बिलकुल सहज और स्वाभाविक था। उन्हें एक ही लगन थी की पैदल चल कर माता के मंदिर पहुंचना है। अब उन्हें कोई परास्त नहीं कर सकता था।
सब मिला के २०० से ज्यादा विद्यार्थी, शिक्षक गण और स्टाफ के सदस्य थे। नकुलमामा ने आवश्यक सुचनाएं दी। ७:१० को यात्रा का प्रस्थान हुआ। ठंड हवा के जोकें और रथों पर सवार अरुणोदय की लालिमा चारों ओर से प्रसन्नता बरसा रही थी। चार किमी आगे हनुमान मंदिर के सबने दर्शन किया। एक से चार कक्षा के बच्चों को रोका गया ताकि वे गाड़ी में बैठ जाए लेकिन सबके हौसले बुलंद थे। किसी को बैठना नहीं था। कुछेक बच्चे मामा के साथ बैठे। बाकी फौज कदमताल मिला रही थी। छह किमी आगे रापर
शहर में चहल पहल होने लगी थी। दुकानों से बच्चों ने अपना मनपसंद बिस्किट /पिपरमेंट ली। आज उनके लिए उत्सव का दिन था। शहर छोड़ते ही हमारा ट्रैक्टर हमें चैलेंज में कितने पक्के है उसकी परीक्षा करने खड़ा था। हम बड़े और कुछ बच्चों के हौसले परास्त हो चुके थे और हमने ’ट्रेक्टर शरणांम ’ गच्छामि कर दिया। लेकिन अभी भी चुलबुल चुटकियां चलने के लिए तैयार थी। पुरुष पावर आगे निकल चुका था। हमारे कुछ मित्र अपनी दुपैया से आगे पीछे हो रहे थे ताकि किसी के परास्त पैरों को पनाह दे सकें। लेकिन ये तो विरानों में पले वीर बच्चे सब को ठेंगा बता रहे थे। नकुलमामा जो उनके साथ थे। कुछ दूरी पर हमारा छहपैया इनकी हिम्मत को आजमा रहे थे। आखिर हम पहुंचे नंदासर से आगे वीराने में बने एक कुटिया कम सेवाश्रम कम, चिड़ियाश्रय कम, एक खान पान की कुटियानुमा दुकान पर। जहां एक पहेलवान जैसे दिखने वाले लेकिन अंतर से रुजु सेवाभावी भाई के पास। यहां नास्ते का ब्रेक था। कुछ लाए थे कुछ वहीं बनाया। बच्चें काफी थक्के थे। जम कर नाश्ता किया और फिर अपनी रफ्तार के लिए तैयार हो गए।
यहां आते ही एक आश्चर्य ये देखा कि इतना वीराना और सुखा प्रदेश होते हुए भी इस भाई ने वहां पशुओं के पीने के लिए पानी का हवाडा बना रखा था। सैंकड़ों चिड़ियाघर और घोंसले थे वहां जहां हजारों की संख्या में चिड़ियां चहचहा रही थी। कुछ कदम दूर ऊंचाई पर एक और चिड़ियों के सैंकड़ों मिट्टी के घोंसले लटकाए गए थे। साथ साथ दाने पानी की पूरी व्यवस्था भी की ही थी। इस इंसान का हुलिया और काम मैच नहीं करते थे। मैंने जिज्ञासा वश उनको पूछ लिया तब पता चला कि इस मोटे शरीर, कद और चहेरे के पीछे एक दयालु, पक्षी-प्राणी प्रेमी इंसान छुपा हुआ है। उनके दो बेटों की रापर में दुकान है और बाकी कई दुकानों से आय मिलती है। हर महीने वे लाखो का अनाज पानी इन जीवों के पीछे खर्चतें हैं। आगे का भाव व्यक्त करते हुए कहा कि वे यहां एक नंदीशाला खोलना चाहते हैं। गायों की सेवा और घर तो हर कोई करता और बनाता है, लेकिन नंदी जो हर गांव और शहरों की गलियों में दुत्कारे जातें हैं उन्हें कोई नही देखता और कई लोग तो अपने स्वाद और स्वार्थ की खातिर उन्हें मार भी देते हैं। उनकी बातें और कार्य दोनों ही ऊंचे थे। कभी कभी बिलकुल सामान्य से दिखनेवाले लोग भी कितना कुछ बिना किसी लोभ, नाम, पद, प्रतिष्ठा की लालच के बिना करते हैं। समान्य से दिखने वाले चहरे और छोटी सी दुकान में बैठा एक इंसान इतना अदभुत कार्य करता होगा वह कोई मान नहीं सकता।
सबका नास्ता पानी हो गया तो फिर एक बार हमारी सवारी आगे बढ़ी। हम लोग बीच बीच में रुक जाते जब तक बच्चे आ नहीं जातें। फिर पूछा जाता कि जो थक गए हो या अब नहीं चलाना चाहते वे गाड़ी में बैठ जाए। दो पांच को छोड़ कर बाकी सब चलने लगते। बड़े क्या छोटे सब के हौसले बुलंद थे। आखिरी दो किमी पर बाकी बच्चे भी उतर गए और चलने लगे। हम और छोटी बच्चियां बैठे रहे और कुछ देर में माताजी के स्थान पर पहुंचे। बाइक और स्कूटर वाले स्टाफ के लोग भी आ पहुंचे थे।
वागड़ के अंतरियाल विस्तरों में कहीं कहीं बड़े तालाब और मंदिर ही लोगों के पर्यटक आकर्षण के स्थल होते हैं। पिछले दो साल से देश विदेश में ख्याति प्राप्त मोरारी बापू की कथा इस वागड़ विस्तार के इन धार्मिक स्थानों पर होने लगी है। इस साल भी ये सद्भाग्य वागड़ की भूमि को प्राप्त हुआ है। वो पवित्र स्थान इस बार यह रवेचि ज्ञ
माता का देवस्थान हुआ है। यहां बड़े विशाल पैमाने पर तैयारिया चल रही थी। इस रामकथा से यहां के पिछड़े वर्ग में जागृति, व्यसन मुक्ति और धार्मिकता एवम जीवन मूल्यों का पाठ शिखाया जायेगा। कुछ दिनों तक स्थानीय लोगों को जागरूकता के साथ आमदनी का जरिया भी प्राप्त होगा।
हम ग्यारह बजे पहुंच गए। सबने दर्शन किए और तालाब के पास गए। वहां आनंद उठाया और फिर भोजन कक्ष में गए। यहां विशाल भोजनशाला में नि:शुल्क प्रशाद दिया जाता है। सब लोगों ने प्रशाद के रूप में भोजन किया। कुछ देर खेले और खरीददारी की। तब तक पैदल यात्री, हमारा पूरा दल पहुंच आया। सब सकुशल एवं प्रसन्न थे।
सबने दर्शन, भोजन इत्यादि किए। नकुलमामा ने सबको पॉकेट मनी दी। ताकि बच्चे अपनी लाई हुई छोटी सी रक्कम में उसे जोड़ कर अपनी मनपंसद खानी पीनी या वस्तु ले सके। सब बच्चों के चहरे खिल उठे थे। आज उनकी घूमने, पैदल चलने और खाने पीने की इच्छा पूरी हुई थी। इन सब के लिए आनंद माने कोई बड़े बड़े गिफ्ट, फिल्म, होटल, महंगी वस्तुएं नहीं अपितु कम से कम साधनों और सुविधाओं में भी मन का निश्छल आनंद प्राप्त कर लेना कोई इनसे सीखे। आज कोई बड़ी उपलब्धि हासिल हुई हो इतनी खुशी इन बच्चों के पास थी। लौटते वक्त, दो ट्रैक्टर और भावदीप में सब को बैठना था। छोटे बच्चे स्थानीय बस की मुसाफरी करके लौटानेवाले थे। वह इसलिए की आधी टिकट ही उनकी लगनी थी। यहां एक एक पैसे को कैसे बचाया जाय और उपयोग किया जाय वे सब सीखना इस संस्था का मुख्य लक्ष है। यहां बड़े बड़े सपने या सोच नहीं अपितु उनकी वास्तविकता और भविष्य के आधार पर नक्कर भूमि पर योग्य कार्य सिखाया और किया जाता है। सब दोपहर तक अपनी सहल का भरपूर आनंद उठाकर वापस लौटे तब उनकी आंखों में संतोष, आनंद और आभार के साथ धन्यवाद के भाव प्रगट हो रहे थे।
अस्तु।
Photo and report
Jyoti mota