02/09/2026
जिन वे’श्याओं ( #स्वरा_भास्कर) के हर दिन बदलते हो शौहर ,
वह क्या ही समझेंगी सतीयों के जौहर🔥
तुछ मानसिकता से आने वाली स्वरा भास्कर ने सती माताओं के जौहर पर बोलते हुए एक बार फिर सारी सीमाएँ लाँघ दी हैं। इस तरह का बेतुका बयान उसने 2018 में भी दिया था। एक बार फिर वह अपनी घटिया सोच को तराश कर हाजिर हुई है!
इतिहास की किताबें पढ़ लेना और इतिहास की आत्मा को समझ लेना, दोनों अलग बातें हैं...
मुगलों के हाथों जाने के बजाय क्षत्राणियां जौहर क्यों करती थीं, इसे समझने के लिए मात्र यह समझ लेना पर्याप्त नहीं कि उन्होंने प्राण त्यागे। यह समझना होगा कि उन्होंने किस परिस्थिति में और किस संकल्प के साथ प्राण त्यागे...?
उनके सामने केवल जीवन और मृत्यु का प्रश्न नहीं था...प्रश्न था अपनी देह की गरिमा, अपने आत्मसम्मान , अपने कुल की मर्यादा और सती माता अनुसुइया के संस्कृति सतित्व कि रक्षार्थ का,
और जब उन्हें लगा कि जीवित रहना अपनी देह और सम्मान को शत्रु के हाथों सौंप देने की कीमत पर होगा, उन्होंने अग्नि का चुनाव किया।
• आज कुछ अनपढ़ लोग बड़ी सहजता से पूछते हैं, इतनी त्रासद मृत्यु क्यों चुनी?
किसी और तरीके से भी तो प्राण दे सकती थीं।
यही प्रश्न जौहर को समझने में उनकी असफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है!
विष से प्राण त्यागतीं, तलवार से प्राण त्यागतीं, तब भी मृत देह पीछे छूट सकती थी।
शत्रु के हाथ लग सकती थी, उन्होंने अपनी देह अग्नि को समर्पित की, ताकि मृत्यु के बाद भी उन्हें किसी घटिया और नी’ च उन्माद का हिस्सा न बनाया जा सके!
इसलिए उन वीरांगनाओं के निर्णय पर आज की सुविधाजनक धारणाओं से फैसला सुनाना इतिहास को समझना नहीं, इतिहास पर अपनी दृष्टि थोपना है।
और विडंबना देखिए...
चंद सिक्कों के लिए सर्वांग प्रदर्शित करने वाले...सती माताओं के निर्णय पर उंगली उठा रही है..?
स्वरा भास्कर के कहे शब्द तो मैं यहां नहीं लिखूंगा...पर उनकी सोच लगभग वैसी ही है जो स्त्री के शील भंग को भी वन नाइट स्टैंड की तरह मानकर आधुनिकता के झंडे लेकर घूमती हैं।
जौहर को केवल वादविवाद का विषय बनाकर देखना उचित नहीं है। यह युद्ध, पराजय और उस समय की भयावह परिस्थितियों में लिया गया निर्णय था!
वे स्त्रियाँ मात्र अपने परिवार की ही नहीं बल्कि उस क्षत्रिय चेतना की प्रतीक थीं, सनातन कि सतीत्व चेतना कि प्रतीक थी, जिसमें रणभूमि में 12 वर्ष के ऊपर के सभी क्षत्रिय अपने प्राणों की बाजी लगाता शाका (अंतिम बलिदान) करते थे, वही दुर्ग के भीतर स्त्री अपनी अस्मिता की अंतिम रक्षा के लिए अग्नि के सामने खड़ी होती थी।
एक ने तलवार थामी...दूसरी ने अग्नि ! दोनों ने पराधीनता के आगे झुकने से इंकार किया।
यही राजपूत गौरव है। यही वह इतिहास है,
जिसे आज की सुविधाओं और पूर्वाग्रहों से बैठकर छोटा नहीं किया जा सकता |
स्वरा, जिस अग्नि को देखकर आपको केवल मृ’त्यु दिखाई देती है, उसी अग्नि में क्षत्राणियों ने अपना अमर गौरव लिख दिया |
सदियाँ बीत गईं, साम्राज्य मिट गए, मुगल सत्ता का इतिहास भी धूल में दब गया, लेकिन उन वीरांगनाओं का स्वाभिमान आज भी उसी तेज के साथ खड़ा है |
प्राण त्यागे थे उन्होंने...अपना स्वाभिमान नहीं! देह अग्नि को समर्पित की थी...अपनी अस्मिता नहीं....🔥🙏
सुर्पनखा (स्वरा भास्कर) सुन ... जिन वीरांगनाओं की राख में भी क्षत्रिय स्वाभिमान की आग आज तक धधक रही है,
उनके गौरव पर उँगली उठाने से पहले इतिहास को नहीं... अपनी दृष्टि की औकात देख लेना चाहिए तुझ जैसी सुर्पनखाओं को ||
ये जाहिल समाज की जाहिल नाचने वाली औरत को क्या पता इतिहास का