22/07/2026
मैं जब-जब अपने देश की असली हालत देखता हूँ, तब-तब सबसे ज्यादा गुस्सा अपने ही लोगों पर आता है।
मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि आज देश की जो दुर्दशा हो रही है, उसके जिम्मेदार सिर्फ नेता नहीं, बल्कि आप और हम भी हैं। जब तक हम नहीं बदलेंगे, तब तक देश की हालत नहीं बदलेगी। हमारी ज़िंदगी और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी ऐसे ही बर्बाद होता रहेगा।
❓ ज़रा खुद से पूछिए… क्या हम भोले हैं या मूर्ख?
👉 हम अंगूठाछाप और भ्रष्ट नेताओं को प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री चुनते हैं, फिर उनसे विश्वस्तरीय शिक्षा व्यवस्था और पारदर्शी परीक्षा प्रणाली की उम्मीद करते हैं…
👉 जिन संवेदनहीन, क्रूर और भ्रष्ट हुक्मरानों के पास खुद बेटी-बेटा नहीं है, उनसे उम्मीद करते हैं कि वे हमारे बच्चों का दर्द समझेंगे…
👉 दंगाइयों और नफरत फैलाने वालों के हाथों में देश की बागडोर सौंपकर हम शांति और भाईचारे की उम्मीद करते हैं…
👉 बलात्कारियों, व्यभिचारियों और कुकर्मियों को वोट देकर हम अपनी बेटियों और महिलाओं की सुरक्षा की उम्मीद करते हैं…
👉 धर्म के नाम पर चंदा, चढ़ावा और ज़मीन हड़पने वालों को सत्ता में बैठाकर हम धर्म और संस्कृति की रक्षा की उम्मीद करते हैं…
👉 अपने धन्नासेठ मित्रों के हाथों देश को लुटाने वाले जुमलेबाज़ भ्रष्टाचारियों को चौकीदार मानकर उनसे “सबका साथ, सबका विकास” की उम्मीद करते हैं…
👉 अस्पतालों में वेंटिलेटर, ऑक्सीजन और डॉक्टरों की कमी के कारण अपने प्रियजनों को खोने के बाद भी, वोट के समय जाति और धर्म के नाम पर बँट जाते हैं और फिर बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की उम्मीद करते हैं…
👉 हाथों में डिग्री लेकर दफ्तर-दफ्तर भटकते बेरोज़गार युवाओं को “पकौड़े तलने” और “चाय बेचने” की सलाह देने वालों को तीन-तीन बार प्रधानमंत्री बनाकर हम अपने युवाओं के लिए रोजगार और उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद करते हैं…
👉 अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहे अन्नदाता किसानों पर लाठियाँ और पानी की बौछारें चलवाने वालों से किसानों की आय दोगुनी करने की उम्मीद करते हैं…
👉 उद्योगपतियों और अपने कॉर्पोरेट मित्रों के लाखों करोड़ रुपये के कर्ज़ माफ करने वाली सरकारों से महंगाई कम करने और मिडिल क्लास को राहत देने की उम्मीद करते हैं…
👉 संसद में जनता के सवाल उठाने वाले विपक्षी सांसदों को निलंबित करने वाली ताकतों से मजबूत लोकतंत्र की उम्मीद करते हैं…
🔴 सबसे बड़ा सच
चुनाव आते ही हम नागरिक नहीं रहते, बल्कि हिंदू-मुसलमान, जाति और बिरादरी में बँट जाते हैं।
शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, महंगाई और सुरक्षा हमारे लिए चुनावी मुद्दे ही नहीं रह जाते। हम नेता नहीं चुनते, बल्कि अपनी जाति, धर्म और जमात का मसीहा चुनते हैं।
🔹 हम वोट अपनी भलाई के लिए नहीं देते, बल्कि किसी को हराने, किसी को सबक सिखाने या भावनाओं में बहकर देते हैं। फिर 500 रुपये, एक शराब की बोतल, कुछ मुफ्त की रेवड़ियों और लोकलुभावन वादों के बदले अपना सबसे कीमती अधिकार बेचकर अगले पाँच वर्षों तक विकास, सुशासन और ईमानदारी की उम्मीद करते रहते हैं।
👉🏾 सच तो यह है कि हम न भोले हैं, न मूर्ख… हम शायद जरूरत से ज्यादा “समझदार” बन चुके हैं। इतने समझदार कि यह सोचने की भी ज़रूरत नहीं समझते कि जिन्हें हम सत्ता सौंप रहे हैं, वे सत्ता मिलने के बाद हमारे साथ क्या करेंगे।
👉 इसलिए कह रहा हूँ—जब तक हम नहीं बदलेंगे, तब तक देश भी नहीं बदलेगा।
अगर कल को बदलना है, तो सबसे पहले आज अपनी भूमिका बदलिए। लोकतंत्र को बचाइए। सवाल पूछिए। अंधभक्ति छोड़िए। सरकार से जवाबदेही मांगिए।
यकीन मानिए, जिस दिन मतदाता बदल जाएगा, उसी दिन देश बदलना शुरू हो जाएगा।
अगर आपको लगता है कि इस देश में जागरूकता ज़रूरी है, तो इस कड़वे सच को हर जागरूक नागरिक तक ज़रूर पहुँचाइए। 📢