Saroj Kumar

Saroj Kumar जनकल्याणकारी कार्य के प्रति अग्रसर

मेरे बड़े बेटे आर्या स्वामी के जन्मदिन के पावन अवसर पर आप सभी से स्नेह, आशीर्वाद एवं दुआओं की हार्दिक कामना करता हूँ।ईश्...
29/07/2026

मेरे बड़े बेटे आर्या स्वामी के जन्मदिन के पावन अवसर पर आप सभी से स्नेह, आशीर्वाद एवं दुआओं की हार्दिक कामना करता हूँ।
ईश्वर से प्रार्थना है कि उसे उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु, सुख, समृद्धि, सद्बुद्धि, सफलता और उज्ज्वल भविष्य का आशीर्वाद प्राप्त हो। वह अपने जीवन में निरंतर प्रगति करे, परिवार, समाज और देश का नाम रोशन करे तथा उसका जीवन सदैव सुखद, मंगलमय और वैभवशाली रहे।
आप सभी के स्नेह, शुभकामनाओं और आशीर्वाद के लिए हृदय से धन्यवाद। 🙏🎉🎂

26/07/2026

नया केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रहलाद जोशी तो पुराने धर्मेंद्र प्रधान से भी गया गुजरा है
इसका तो पहला ब्यान ही जुते खाने लायक है

मैं जब-जब अपने देश की असली हालत देखता हूँ, तब-तब सबसे ज्यादा गुस्सा अपने ही लोगों पर आता है।मैं पूरे विश्वास के साथ कह स...
22/07/2026

मैं जब-जब अपने देश की असली हालत देखता हूँ, तब-तब सबसे ज्यादा गुस्सा अपने ही लोगों पर आता है।

मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि आज देश की जो दुर्दशा हो रही है, उसके जिम्मेदार सिर्फ नेता नहीं, बल्कि आप और हम भी हैं। जब तक हम नहीं बदलेंगे, तब तक देश की हालत नहीं बदलेगी। हमारी ज़िंदगी और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी ऐसे ही बर्बाद होता रहेगा।

❓ ज़रा खुद से पूछिए… क्या हम भोले हैं या मूर्ख?

👉 हम अंगूठाछाप और भ्रष्ट नेताओं को प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री चुनते हैं, फिर उनसे विश्वस्तरीय शिक्षा व्यवस्था और पारदर्शी परीक्षा प्रणाली की उम्मीद करते हैं…

👉 जिन संवेदनहीन, क्रूर और भ्रष्ट हुक्मरानों के पास खुद बेटी-बेटा नहीं है, उनसे उम्मीद करते हैं कि वे हमारे बच्चों का दर्द समझेंगे…

👉 दंगाइयों और नफरत फैलाने वालों के हाथों में देश की बागडोर सौंपकर हम शांति और भाईचारे की उम्मीद करते हैं…

👉 बलात्कारियों, व्यभिचारियों और कुकर्मियों को वोट देकर हम अपनी बेटियों और महिलाओं की सुरक्षा की उम्मीद करते हैं…

👉 धर्म के नाम पर चंदा, चढ़ावा और ज़मीन हड़पने वालों को सत्ता में बैठाकर हम धर्म और संस्कृति की रक्षा की उम्मीद करते हैं…

👉 अपने धन्नासेठ मित्रों के हाथों देश को लुटाने वाले जुमलेबाज़ भ्रष्टाचारियों को चौकीदार मानकर उनसे “सबका साथ, सबका विकास” की उम्मीद करते हैं…

👉 अस्पतालों में वेंटिलेटर, ऑक्सीजन और डॉक्टरों की कमी के कारण अपने प्रियजनों को खोने के बाद भी, वोट के समय जाति और धर्म के नाम पर बँट जाते हैं और फिर बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की उम्मीद करते हैं…

👉 हाथों में डिग्री लेकर दफ्तर-दफ्तर भटकते बेरोज़गार युवाओं को “पकौड़े तलने” और “चाय बेचने” की सलाह देने वालों को तीन-तीन बार प्रधानमंत्री बनाकर हम अपने युवाओं के लिए रोजगार और उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद करते हैं…

👉 अपने हक़ की लड़ाई लड़ रहे अन्नदाता किसानों पर लाठियाँ और पानी की बौछारें चलवाने वालों से किसानों की आय दोगुनी करने की उम्मीद करते हैं…

👉 उद्योगपतियों और अपने कॉर्पोरेट मित्रों के लाखों करोड़ रुपये के कर्ज़ माफ करने वाली सरकारों से महंगाई कम करने और मिडिल क्लास को राहत देने की उम्मीद करते हैं…

👉 संसद में जनता के सवाल उठाने वाले विपक्षी सांसदों को निलंबित करने वाली ताकतों से मजबूत लोकतंत्र की उम्मीद करते हैं…

🔴 सबसे बड़ा सच

चुनाव आते ही हम नागरिक नहीं रहते, बल्कि हिंदू-मुसलमान, जाति और बिरादरी में बँट जाते हैं।

शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, महंगाई और सुरक्षा हमारे लिए चुनावी मुद्दे ही नहीं रह जाते। हम नेता नहीं चुनते, बल्कि अपनी जाति, धर्म और जमात का मसीहा चुनते हैं।

🔹 हम वोट अपनी भलाई के लिए नहीं देते, बल्कि किसी को हराने, किसी को सबक सिखाने या भावनाओं में बहकर देते हैं। फिर 500 रुपये, एक शराब की बोतल, कुछ मुफ्त की रेवड़ियों और लोकलुभावन वादों के बदले अपना सबसे कीमती अधिकार बेचकर अगले पाँच वर्षों तक विकास, सुशासन और ईमानदारी की उम्मीद करते रहते हैं।

👉🏾 सच तो यह है कि हम न भोले हैं, न मूर्ख… हम शायद जरूरत से ज्यादा “समझदार” बन चुके हैं। इतने समझदार कि यह सोचने की भी ज़रूरत नहीं समझते कि जिन्हें हम सत्ता सौंप रहे हैं, वे सत्ता मिलने के बाद हमारे साथ क्या करेंगे।

👉 इसलिए कह रहा हूँ—जब तक हम नहीं बदलेंगे, तब तक देश भी नहीं बदलेगा।

अगर कल को बदलना है, तो सबसे पहले आज अपनी भूमिका बदलिए। लोकतंत्र को बचाइए। सवाल पूछिए। अंधभक्ति छोड़िए। सरकार से जवाबदेही मांगिए।

यकीन मानिए, जिस दिन मतदाता बदल जाएगा, उसी दिन देश बदलना शुरू हो जाएगा।

अगर आपको लगता है कि इस देश में जागरूकता ज़रूरी है, तो इस कड़वे सच को हर जागरूक नागरिक तक ज़रूर पहुँचाइए। 📢

इतिहास हमेशा बड़ी-बड़ी इमारतों, भाषणों और फ़ैसलों में दर्ज नहीं होता.कभी-कभी वह ज़मीन पर छूटे हुए जूतों में भी लिखा जाता...
22/07/2026

इतिहास हमेशा बड़ी-बड़ी इमारतों, भाषणों और फ़ैसलों में दर्ज नहीं होता.

कभी-कभी वह ज़मीन पर छूटे हुए जूतों में भी लिखा जाता है.

क्योंकि जूते कभी अपने आप नहीं छूटते. वे तब छूटते हैं, जब हालात इंसान को पलटकर देखने की मोहलत भी नहीं देते.

ये जूते उन पैरों के हैं, जो उम्मीद लेकर घर से निकले थे.

बेहतर कल की उम्मीद में. लेकिन लौटते वक़्त... कई लोगों के पैरों में जूते नहीं थे. और उम्मीद?

लाठी चली... लोग भागे... जूते-चप्पल रह गए.

हो सकता है, इनमें से कोई जोड़ी किसी की सबसे कीमती चीज़ रही हो.

जिस देश में आज भी करोड़ों लोग एक ही जोड़ी जूतों में स्कूल जाते हैं, नौकरी के इंटरव्यू देते हैं, रिश्तेदारों के घर जाते हैं और त्योहार भी मना लेते हैं... वहाँ जूते सिर्फ़ जूते नहीं होते.

वो किसी की हैसियत होते हैं. किसी की मेहनत होते हैं. किसी की छोटी-सी जमा पूंजी. इनमें से किसी चप्पल को ख़रीदने के लिए शायद किसी ने कई हफ्ते इंतज़ार किया होगा.

किसी ने पुरानी चप्पल बार-बार सिलवाई होगी, ताकि नई लेने की नौबत देर से आए.

किसी ने पहली तनख्वाह से अपने लिए जूते खरीदे होंगे.

किसी ने शायद बेटे से कहा होगा - "अभी संभालकर पहनना... अगले साल भी यही चलेंगे"

हम नहीं जानते...

इनमें से कौन-सी जोड़ी किसकी है.

लेकिन इतना ज़रूर जानते हैं कि इस देश में हर किसी के लिए जूते छोड़कर चले जाना आसान नहीं होता.

फिर भी...

उस दिन लोग इन्हें पीछे छोड़कर भाग गए.

क्यों?

क्योंकि कुछ पल ऐसे होते हैं जब आदमी अपनी सबसे कीमती चीज़ भी उठाने के लिए नहीं रुकता.

उसे सिर्फ़ बच निकलना होता है.

इन चप्पलों का यूँ छूट जाना सिर्फ़ एक सामान का छूट जाना नहीं है, ये उस अफरातफरी की तस्वीर है... जहाँ किसी को अपने जूतों से ज़्यादा अपनी साँसों की फ़िक्र थी.

आज ये सब जंतर-मंतर की ज़मीन पर रखे हैं.

ये सिर्फ़ इस बात की गवाही है कि उस दिन वहाँ लोग थे.

लोग...

जो अपने-अपने घरों से निकले थे. हक़ मांगने.

इन जूतों का कोई नाम नहीं है. ना ही इन पर कोई नाम है.

लेकिन हर जोड़ी के पीछे एक चेहरा है.

एक घर है.

एक परिवार है.

एक इंतज़ार है.

और शायद...

एक सपना भी.
ये तस्वीरें दिल्ली के जंतर-मंतर की हैं. ये तस्वीरें उन लोगों के छूटे जूते-चप्पलों की हैं, जो 20 जुलाई को 'चलो संसद' मार्च में शामिल हुए...अब इन्हें जंतर-मंतर पर मंच के पास रखा गया है.

22/07/2026
21/07/2026

देश को बांग्लादेश बना दो
कानून को अपने हाथ में ले लो
बहुत हुआ अत्याचार
फेंक दो अहंकारी सरकार

21/07/2026

दिल्ली में जंतर-मंतर से संसद मार्च के दौरान प्रदर्शनकारियों पर हुए लाठीचार्ज, बम व आंसू गैस के इस्तेमाल ने साबित कर दिया कि पुलिस सिर्फ सत्ता के तलवे चाटने के लिए ही होता है

बार-बार पेपर लीक जैसी परिस्थितियों के कारण असफलताओं का सामना करने के बावजूद, अपने लक्ष्य से कभी विचलित न होने वाले मेरे ...
16/07/2026

बार-बार पेपर लीक जैसी परिस्थितियों के कारण असफलताओं का सामना करने के बावजूद, अपने लक्ष्य से कभी विचलित न होने वाले मेरे छोटे भाई सुमित राज ने आखिरकार अपने सपनों को साकार कर दिखाया।
यह सफलता मेरे छोटे मौसा श्री अशोक यादव और मौसी श्रीमती नूतन देवी के अथक त्याग, समर्पण, संघर्ष और निरंतर प्रोत्साहन का परिणाम है।
NEET UG 2026 में AIR 14059 हासिल कर सुमित राज ने न केवल अपने माता-पिता का, बल्कि पूरे #संझौती और #अलौली का नाम भी गर्व से रोशन कर दिया है।
इस शानदार उपलब्धि पर सुमित राज, मौसा जी और मौसी जी को हार्दिक बधाई एवं उज्ज्वल भविष्य के लिए अनंत शुभकामनाएँ। ईश्वर उन्हें एक सफल, संवेदनशील और सेवाभावी चिकित्सक बनने का आशीर्वाद दें। 💐👏

शायद बहुत लोग भूल चुके होंगे।यह है इरोम शर्मिला, जिन्हें कभी "मणिपुर की आयरन लेडी" कहा जाता था। उन्होंने 16 वर्षों तक अन...
15/07/2026

शायद बहुत लोग भूल चुके होंगे।
यह है इरोम शर्मिला, जिन्हें कभी "मणिपुर की आयरन लेडी" कहा जाता था। उन्होंने 16 वर्षों तक अनशन किया। लेकिन जब उन्होंने लोकतांत्रिक रास्ता अपनाकर विधानसभा चुनाव लड़ा, तो उन्हें मात्र 90 वोट मिले। बाद में उन्होंने सार्वजनिक जीवन से दूरी बनाई, विवाह किया और अपना जीवन आगे बढ़ाया।
यह बात मुझे इसलिए याद आई क्योंकि आज सोनम वांगचुक का संघर्ष भी चर्चा में है। मन में एक प्रश्न उठता है — जो लोग समाज और देश के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं,

क्या समाज उनके त्याग को उतनी ही गंभीरता से याद रखता है?
क्या समाज तटस्थता से सोनम वांगचुक के साथ खड़ा है?
अभी पूरे देश में जंतर-मंतर पर अनशन कर रहे युवाओं के लिए आवाज गूँजना चाहिए
सरकार में बैठे लोगों का कुर्सी हिलना चाहिए लेकिन अभी सरकार पर येसा कुछ भी नहीं हो रहा क्युकी सरकार लोकतंत्र से नहीं बल्कि EVM तंत्र से बनी है इसलिए आम आवाम का कोई वैल्यू नहीं रह गया
सरकार तानाशाह बन गया है
सम्मानित युवाओ बुजुर्गों बुद्धिजीवियों देश को बचा लो नहीं तो लोकतंत्र अब धन तंत्र में बदल रहा है

अभी समय है, जल्दबाज़ी में किसी के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने का नहीं।बल्कि खामोशी से हर संभावित पंचायत प्रत्याशी को पर...
11/07/2026

अभी समय है, जल्दबाज़ी में किसी के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने का नहीं।
बल्कि खामोशी से हर संभावित पंचायत प्रत्याशी को परखने का।
देखिए कि उसकी विचारधारा क्या है, उसका चरित्र कैसा है, समाज के प्रति उसका योगदान क्या है और राजनीति में आने का उसका उद्देश्य क्या है। क्या वह जनसेवा के लिए आया है, या केवल स्वार्थ, महत्वाकांक्षा, तस्करी, पद, प्रतिष्ठा और निजी लाभ के लिए?

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