19/12/2025
" सत्ता उनकी, मेहनत हमारी! "
आज राजनीति का सबसे बड़ा सच यही है —
हर जाति को अपना मुख्यमंत्री चाहिए।
कुर्मियों को कुर्मी, लोधियों को लोधी, निषादों को निषाद, राजभरों को राजभर,
और गड़रियों को गड़रिया CM चाहिए।
पर सच्चाई यह है कि हर जाति का मुख्यमंत्री कभी बन नहीं सकता।
यही बिखराव इन सभी जातियों को कमजोर करता है और अंततः इन्हीं की मेहनत और वोटों पर सत्ता उन हाथों में चली जाती है जो सदैव एकजुट रहते हैं।
ब्राह्मण, ठाकुर और बनिया कभी नहीं कहते कि CM उनकी जाति का हो,
वे बस यह चाहते हैं कि सत्ता उनकी सोच और नियंत्रण में रहे।
फाइलों से लेकर नौकरियों तक, दफ्तरों से लेकर ठेकों तक
उनकी पकड़ बनी रहे।
यही कारण है कि भाजपा जैसी पार्टी सत्ता में स्थिर है
क्योंकि उनका संगठन जाति नहीं, हित के आधार पर चलता है।
वहीं पिछड़ी जातियों के पास
न राजनीतिक एकता है, न आर्थिक ताकत, न शिक्षा में निवेश।
इनके अपने नेता भी जाति के नाम पर टिकट लेकर
सिर्फ स्वार्थ की राजनीति करते हैं।
पाँच साल जनता को एक हैंडपंप तक नहीं दिला पाते,
लेकिन चुनाव के समय जाति का नारा ज़रूर लगा देते हैं।
सच्चाई यह है कि इन जातियों के वोट से सरकार बनती है,
पर इनकी झोली खाली रहती है —
मिलता है तो सिर्फ राशन, लाठी और बुलडोज़र।
यदि यही पिछड़ी जातियाँ एकजुट होकर
जाति नहीं, मुद्दों आरक्षण, शिक्षा, रोज़गार और सम्मान पर वोट दें,
तो सत्ता की दिशा और दशा दोनों बदल सकती हैं।
फिर मुख्यमंत्री भी वही बनेगा जो सच में दलित, पिछड़ों और किसानों की भलाई करे।
हम यादवों ने हमेशा यही रास्ता चुना
हमने जगदेव बाबु, चरण सिंह, कांशीराम, मुलायम सिंह और लालू प्रसाद यादव जैसे नेताओं को
जाति नहीं, विचार से चुना।
हमने कभी संघी सोच नहीं अपनाई,
क्योंकि हमें CM वही चाहिए जो पिछड़ों, दलितों, मुसलमानों, किसानों और छात्रों का भला करे।
और यही वह सोच है जो अगर सब पिछड़ी जातियाँ अपना लें —
तो सत्ता की चाबी सदा उनके ही हाथ में रहेगी। Saroj Kumar
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