08/07/2020
D.SP देवेन्द्र मिश्रा द्वारा लिखा गया पत्र,वारदात की आहट थी।हर जुर्म के आने की आहट होती है।पर कई बार हम उसे नजरंदाज कर देते हैं।आज टीवी के माध्यम से पता चला विकास दुबे का एक गुर्गा मारा गया और एक पकड़ा गया है।
लेकिन साथ साथ यह भी ज्ञात हुआ कि घटना के बाद से अपराधी विकास दुबे फरीदाबाद में अपने रिश्तेदार के घर में छिपा था।जहा जब पुलिस दबिश देने गई तो वह इसके पहले वहा से भी फरार हो गया।अब ये बातें दो बातों की तरफ इशारा करती हैं।
पहला तो यह की 40 जिलों की पुलिस ,UP STF के 700 कर्मी,चार राज्यो(UP,राजस्थान,हरियाणा और दिल्ली) की क्राइम ब्रांच जिस व्यक्ति को इतनी बेताबी से ढूंढ़ रहे है,उसे एन वक़्त पर कैसे पुलिस मुभमेंट की खबर कैसे मिल गई,जिस से कि वह फरीदाबाद से फरार हो पाया।याने कि विकास को पकड़ने से पहले पुलिस विभाग के जयचंदो को चिन्हित कर कार्यवाही होनी चाहिए।
दूसरी बात मुझे यह नहीं समझ आ रहा है कि हमारे समाज के मानवीय मूल्यों का किस हद तक क्षरण हो चुका है? आज तरस आता है विकास के उस फरीदाबाद वाले रिश्तेदार की बुद्धि के ऊपर की उसने क्या सोच कर ऐसे नराधम को शरण दी होगी।जो व्यक्ति इंसान हो कर 8 घरों के चिराग बुझा कर आया हो,और इसके पहले भी 60 वारदातो में अभियुक्त हो,उसे किसी भी तरह इंसान नहीं कहा जा सकता।शायद इसी प्रकृति के लोगो को पौराणिक काल में असुरों कि श्रेणी में रखा जाता होगा।सिंह ,विकृत मुख भंगिमा वाले असुर तो कल्पना है हमारी,यथार्थ में ऐसी प्रवृति वालो को असुर की संज्ञा दी जाती होगी।ऐसा मेरा मानना है।और इस असुर को शरण देने वाले या किसी भी तरह मदद करने वाले भी असुर की श्रेणी में ही रखा जाना चाहिए और उन्हें भी उपयुक्त दंड मिलना चाहिए।
ये मेरे अपने विचार हैं,पाठक विचारो के मूल्यांकन के लिए स्वतंत्र हैं।