Ved Prakash Lakhotia, RPS

Ved Prakash Lakhotia, RPS जिनमें अकेले चलने के हौसले होते हैं,
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अभिनंदन...Office Reader Desh Raj Madhukar Ji को HC to ASI और LFC Foranta Ji को HC के पद पर पदोन्नति की बधाई और अभिनंदन।
02/02/2026

अभिनंदन...
Office Reader Desh Raj Madhukar Ji को HC to ASI और LFC Foranta Ji को HC के पद पर पदोन्नति की बधाई और अभिनंदन।

Big announcement for Ganganagar... CONGRATULATIONS 🎊
25/01/2026

Big announcement for Ganganagar... CONGRATULATIONS 🎊

08/12/2025

Only for best friend.... हंसना मना है।देखना जरूर

ये एक स्थिर इमेज है जापानी न्यूरोलॉजी प्रोफेसर यामामोटो ने तैयार की है उनके अनुसार ये1) यदि ये आपको स्थिर दिखती है  तो आ...
27/09/2024

ये एक स्थिर इमेज है जापानी न्यूरोलॉजी प्रोफेसर यामामोटो ने तैयार की है उनके अनुसार ये
1) यदि ये आपको स्थिर दिखती है तो आप स्वस्थ हैं।
2) यदि धीरे धीरे हिलती देखे तो आप थोड़े स्ट्रेस में हैं या रात में नींद पूरी नही हुई है।
3) यदि धीरे धीरे घूमती दिखे तो आप तनाव में हैं और आपको विश्रांति की जरूरत है।
4) यदि लगातार घूमती दिखती है तो आप बहुत तनाव में है और आपको उपचार की जरूरत है।

भाई-भाई  @ हरिराम जी मंदिर, झोरड़ा (नागोर)
27/09/2024

भाई-भाई @ हरिराम जी मंदिर, झोरड़ा (नागोर)

जय मां करणी...
27/09/2024

जय मां करणी...

27/09/2024
01/06/2024

संतोषी बनें या असंतोषी.....??
संतोष का अर्थ यह नहीं है कि प्रयत्न ही न किया जाए, अपितु प्रयत्न करने के बाद जो भी मिल जाए उसमें प्रसन्न रहना ही संतोष है।
बहुधा लोगों के द्वारा प्रयत्न न करना ही संतोष समझ लिया जाता है। कई लोग संतोष की आड़ में अपनी अकर्मण्यता को छिपा लेते है।
इसलिये प्रयत्न करने में, उद्यम करने में, पुरुषार्थ करने में असंतोषी रहो, खूब परिश्रम प्रयास की अंतिम सीमाओं तक जाओ। एक क्षण के लिए भी लक्ष्य को मत भूलो।
कोई भी कार्य करते समय सब कुछ मुझ पर ही निर्भर है, इस भाव से कर्म करो। कर्म करने के बाद सब कुछ प्रभु पर ही निर्भर है इस भाव से शरणागत हो जाओ।
परिणाम में जो प्राप्त हो, उसे प्रेम से स्वीकार कर लो। करने में सावधान और होने में प्रसन्न, यही सुखमय जीवन का रहस्य है।
*अजरामरवत् प्राज्ञ
विद्यामर्थं च चिन्तयेत्
गृहीत इव केशेषु
मृत्युना धर्म माचरेत्*
अर्थात विद्या और धन संग्रह करते समय सोचें कि मुझे अमर रहना है इतना धन, विद्या, ज्ञानादि का संग्रह करें।वहीं जब धर्म की बात हो तो समझ लेना कि मृत्यु ने (जट) सिर के केश पकड़ लिए हो अतः जितना अधिक हो सके धर्म कर लें।

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