04/08/2026
*शिनाख्त कार्यवाही पर इलाहाबाद*
*हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला,*
देरी होने पर खत्म हो जाता है साक्ष्य का महत्व
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक लूट के मामले में सुनवाई करते हुए पहचान परेड *(शिनाख्त कार्यवाही) को लेकर अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।* न्यायमूर्ति संतोष राय की पीठ ने स्पष्ट किया है कि उत्तर प्रदेश पुलिस और कारागार नियमावली के तहत निर्धारित सुरक्षा उपायों का हर हाल में सख्ती से पालन होना चाहिए। न्यायालय ने कहा कि यदि पहचान कार्यवाही आयोजित करने में बिना किसी स्पष्ट कारण के अत्यधिक देरी होती है, तो इसका सीधा लाभ आरोपियों को मिलता है। इस देरी से गवाहों द्वारा आरोपियों को पहले ही देख लिए जाने की आशंका बढ़ जाती है, जिससे साक्ष्य का महत्व गंभीर रूप से कम हो जाता है। इसी आधार पर न्यायालय ने दशकों पुराने एक मामले में आरोपियों को गवाहों के सामने पेश करने में हुई बयालीस दिन की देरी और प्रक्रियात्मक चूक को अनुचित मानते हुए उन्हें दोषमुक्त कर दिया।
पहचान परेड मुख्य साक्ष्य नहीं, यह केवल
गवाह की याददाश्त परखने का माध्यम है
अपने निर्णय में उच्च न्यायालय ने कानूनी स्थिति को पूरी तरह से स्पष्ट करते हुए कहा कि शिनाख्त कार्यवाही अपने आप में कोई ठोस या मुख्य साक्ष्य नहीं है, बल्कि यह मुकदमे में केवल एक सहायक साक्ष्य के रूप में कार्य करती है। इस कार्यवाही का मूल उद्देश्य उस गवाह की याददाश्त और सच्चाई की जांच करना होता है, जो किसी अज्ञात अपराधी को घटना के समय देखने का दावा करता है। न्यायालय ने बताया कि किसी भी मामले का वास्तविक और ठोस साक्ष्य वह होता है, जब गवाह न्यायालय में सुनवाई के दौरान जज के सामने आरोपी की पहचान करता है। जांच की शुरुआत से ही जांच अधिकारी को यह सुनिश्चित करना होता है कि गवाह किसी भी परिस्थिति में आरोपी को पहचान परेड से पहले न देख पाएं, अन्यथा इस पूरी कार्यवाही की प्रामाणिकता संदिग्ध हो जाती है।
न्यायालय ने तय किए कड़े नियम, पुलिस की भूमिका रहेगी शून्य और कारागार में होगी पूरी प्रक्रिया
निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए न्यायालय ने पहचान परेड की संपूर्ण प्रक्रिया को रेखांकित किया है। इसके अनुसार, जब आरोपी को न्यायिक हिरासत में भेजा जाता है, तब जांच अधिकारी को तत्काल आवेदन करना चाहिए और यह कार्यवाही पुलिस थाने के बजाय अनिवार्य रूप से कारागार के भीतर ही होनी चाहिए। इस पूरी प्रक्रिया का संचालन एक न्यायिक दंडाधिकारी द्वारा किया जाएगा, जिसमें पुलिस अधिकारियों का कोई दखल नहीं होगा। कारागार अधीक्षक की यह जिम्मेदारी होगी कि आरोपी की वेशभूषा, दाढ़ी, बाल या मूंछें गिरफ्तारी के समय जैसी ही रहें और उनमें कोई बदलाव न हो। साथ ही, आरोपी को समान आयु, कद, रंग, पहनावे और शारीरिक बनावट वाले कई अन्य व्यक्तियों के बीच खड़ा किया जाना चाहिए। हर गवाह को अलग-अलग बुलाकर स्वतंत्र रूप से पहचान करानी चाहिए ताकि किसी भी निर्दोष को झूठे पहचान के आधार पर सजा न मिल सके।