28/12/2025
गोआ की जिन महिलाओं ने कन्वर्जन से इनकार किया उन्हें यह वहां के संत ने उपहार में दिया, यह किस काम मे आता है गूगल कर लीजिए। इस क्रूर बात को छिपाने के लिए वामपंथियों के फर्जी स्टोरी गढ़ी कि त्रावणकोर की महिलाओं के स्तन काट दिए गए।
महिलाओं की शील लूटने, बड़ी संख्या में उन्हें जलाने और उनकी छाती को नोचने वालों को इतिहास में महान बताया गया, उन्हें संत के नाम से संबोधित किया गया। उनके नाम पर शहर बसाए गए, प्रार्थना स्थल बनाए गए, त्योहार बनाए गए।
कुछ लोग कहते हैं कि विदेशों में दीपावली मनाई जाती है तो हम खुश होते हैं तो ललकी टोपी पहनने से गुरेज क्यों? पहली बात तो जो विदेशों में भारत के त्योहार मनाए जाते हैं वह अधिकांशतः भारतीयों की पहल और उनकी सहभागिता से ही मनाए जाते हैं। दूसरी बात यह कि जो छलपूर्वक हमारी संस्कृति को निम्न साबित कर इन त्योहारों के माध्यम से कपटपूर्वक हमारी स्वीकृति प्राप्त करने में लगा है, भूमंडलीकरण को एक विशेष संस्कृति से जोड़ कर भारत को सांस्कृतिक उपनिवेश बनाने के स्वप्न देख रहा है, मैं उसे पहचानता हूं और इसलिए उनके विरुद्ध मेरे स्वर में तल्खी है।
मैं जानता हूं कि इन त्योहारों पर क्या टारगेट मिलते हैं, पंजाब उत्तरपूर्व दक्षिण से लेकर अयोध्या कहीं कोई इनसे सुरक्षित नही है। हम भय और लालच से किसी का धर्म बदलने के लिए नही कहते।
यहां सवाल भारत के कल्चरल डेमोग्राफी को लेकर है। गिफ्ट थियरी को भारत पर आरोपित कर एक दिन यह कहा जाएगा कि हम भारत में गौ #मांस का सेवन कर उत्सव मनाएं तुम यहां की जर्सी गायों को खाकर उत्सव मनाओ। मल्टीकल्चरल व्यवस्थाएं रोहिंग्या जैसी हैं, जो आपके देश में घुसपैठ कर आपकी पहचान बदल देंगी।
यदि आप आज अपने स्वधर्मी को शुभकामना देते हैं, या ललकी टोपी पहनते हैं तो आपको उन स्त्रियों के अपराधी हो जाते हैं जिनके स्तन नोच डाले थे। आप उनके अपराधी होते हैं जिन्होंने मृत्यु स्वीकार की लेकिन धर्म नहीं छोड़ा।
मेरा कोई उत्सव मानने मनाने से कोई विरोध नहीं, लेकिन सच्चाई भी जानते चलो, बताते चलो।
हैप्पी ब्रेस्ट रिपर डे!
Pawan Vijay