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बिहार के गहलौर में पहाड़ी को काटकर सड़क बनाने वाले दशरथ मांझी, 1989.
30/08/2026

बिहार के गहलौर में पहाड़ी को काटकर सड़क बनाने वाले दशरथ मांझी, 1989.

30/08/2026

पुरानी दिल्ली की तंग गलियों में बसी खारी बावली सिर्फ़ एक बाज़ार नहीं, बल्कि सदियों से जारी व्यापार की एक ज़िंदा कहानी है।

चांदनी चौक के पश्चिमी सिरे पर, फतेहपुरी मस्जिद के पास मौजूद इस जगह का नाम उस बावली से जुड़ा है, जिसे दिल्ली सरकार के Shahjahanabad Redevelopment Corporation के मुताबिक़ शाहजहाँ के दौर में बनाया गया था। ‘बावली’ यानी सीढ़ियों वाला कुआँ और ‘खारी’ यानी खारे पानी से जुड़ा नाम। आज उस बावली का कोई निशान मौजूद नहीं है और बताया जाता है कि वह मौजूदा सड़क के नीचे दफ़्न हो चुकी है।

फतेहपुरी मस्जिद 1650 में शाहजहाँ की बेगम फतेहपुरी बेगम ने बनवाई थी और इसके आसपास धीरे-धीरे व्यापारिक गतिविधियाँ बढ़ती चली गईं। आज यही इलाका खारी बावली के नाम से दुनिया भर में पहचाना जाता है।

यहाँ की गलियों में सिर्फ़ मसालों की दुकानें नहीं हैं। सूखे मेवे, जड़ी-बूटियाँ और अनगिनत तरह के खाद्य पदार्थों का थोक कारोबार भी होता है। भारत सरकार के पर्यटन स्रोत और दिल्ली के आधिकारिक heritage स्रोत खारी बावली को एशिया का सबसे बड़ा थोक मसाला बाज़ार बताते हैं।

वक़्त बदल गया, सड़कें बदल गईं, पुरानी बावली भी नज़र नहीं आती... मगर इन गलियों में मसालों की खुशबू और सदियों पुराना कारोबार आज भी दिल्ली की उसी पुरानी रौनक को ज़िंदा रखे हुए है।

खारी बावली को समझना हो तो सिर्फ़ इसे देखना काफी नहीं है बल्कि इन गलियों से गुज़रना पड़ता है।

30/08/2026

30 अगस्त 1659, मुगल सल्तनत की तारीख़ का एक ऐसा दिन, जब तख़्त की लड़ाई अपने सबसे दर्दनाक अंजाम तक पहुँच गई।

शाहजहाँ के सबसे बड़े बेटे और उनके सबसे चहेते शहज़ादे दारा शिकोह को आखिरकार उनके छोटे भाई औरंगज़ेब के हुक्म पर कत्ल कर दिया गया।

लेकिन दारा और औरंगज़ेब की कहानी को सिर्फ दो भाइयों की दुश्मनी कह देना शायद काफी नहीं होगा। मुगल सल्तनत में तख़्त की जानशीनी का कोई तय कानून नहीं था। बादशाह के बेटों में से कौन अगला बादशाह बनेगा, इसका फैसला अक्सर तलवार करती थी।

बाबर के बाद से ही मुगल खानदान में सत्ता के लिए अपनों का खून बहता रहा। हुमायूँ को अपने भाइयों से लड़ना पड़ा, जहाँगीर और शाहजहाँ के दौर में भी तख़्त के लिए रिश्ते कुर्बान हुए और फिर शाहजहाँ के चार बेटों दारा शिकोह, औरंगजेब, शाह शुजा और मुराद बख्श के बीच वही जंग शुरू हो गई।

29 मई 1658 को सामूगढ़ के मैदान में दारा और औरंगजेब की फौजें आमने-सामने थीं। इस जंग ने हिंदुस्तान की तारीख़ बदल दी। दारा हार गए और फिर आगरा, दिल्ली, पंजाब और सिंध की तरफ भटकते रहे।

आखिरकार उन्हें मलिक जीवन ने धोखे से पकड़वा दिया।

जब दारा को कैदी बनाकर दिल्ली लाया गया तो उन्हें जंजीरों में बांधकर शहर की गलियों से गुज़ारा गया। कहते हैं कि जिस शहज़ादे को कभी हिंदुस्तान के अगले बादशाह के तौर पर देखा जाता था, उसी को लोगों के सामने इस तरह ज़लील ओ रुसवा किया गया।

30 अगस्त 1659 को आखिरकार उनकी मौत का फरमान जारी हुआ और शाम होते-होते दारा शिकोह का कत्ल कर दिया गया।

दारा का धड़ हुमायूँ के मकबरे में दफन किया गया, जबकि उनके कटे हुए सिर को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक रिवायतें मिलती हैं। तख़्त तो आखिरकार औरंगज़ेब को मिल गया…

मगर दारा शिकोह की मौत आज भी मुगल इतिहास के उन पन्नों में दर्ज है, जहाँ सत्ता की लड़ाई सिर्फ सल्तनतें नहीं बदलती थी, बल्कि एक ही खानदान के लोगों को हमेशा के लिए एक-दूसरे से छीन लेती थी।

30/08/2026

आगरा के सिकंदरा इलाक़े में शहंशाह अकबर के मकबरे में मौजूद ये क़ब्र मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब आलमगीर की सबसे बड़ी बेटी जेब उन निसा बेगम की है। 26 मई 1702 ई. में 64 साल की उम्र में सलीमगढ़ किले में उम्रकैद की सज़ा काटने के दौरान उनकी वफ़ात हुयी थी। उनकी मौत के बाद पहले तो उन्हें कश्मीरी दरवाजे के बाहर तीस हजारी बगीचे में दफन किया गया था लेकिन जब दिल्ली में रेलवे लाइन बिछाई गयी तो उनकी कब्र को उनके नक्शो-निगार के साथ सिकंदरा में अकबर के मकबरे में मुंतकिल कर दिया गया था।

शहज़ादी ज़ेब-उन-निसा बेगम मुग़ल बादशाह औरंगजेब की सबसे बड़ी बेटी थीं और उनके तमाम बच्चों में सबसे पसंदीदा थीं। जैसा की उस दौर में शाही ख़्वातीन का रिवाज़ था, उनकी तालीम का खास ख्याल रखा जाता था। वह सूफियाना ज़ेहनियत रखती थीं और अक्सर फ़ारसी में काफी खूबसूरत अशआर लिखा करती थीं, अब चूंकि उनके वालिद औरंगज़ेब को मौसिकी और शायरी का शौक नहीं था, तो अक्सर उन्हें छिप-छिपाकर लिखना पड़ता था।

ज़िन्दगी के शुरूआती मरहले में तो वह अपने वालिद के लिए बेहद अज़ीज़ थीं, उनके वालिद औरंगज़ेब हर ज़रूरी मुआमलात में उनसे राय जरूर लिया करते थे, लेकिन वक्त के साथ-साथ उनके ख्यालात बदलने लगे और ज़िन्दगी के 40वें दशक में वो कुछ ऐसा कर गुजरीं जो उनके वालिद जिल्ले सुब्हानी को रास न आया वो इतने खफा हुए की अपनी हरदिलअजीज बेटी को ताउम्र कैद में रखने का फरमान जारी कर दिया था।

उनकी खता क्या थी ये तो वाजेह नहीं है लेकिन तारीखदानों का कहना है की किसी के साथ उनका अफेयर था जो की उनके वालिद को नागवार गुजरा। जबकि कुछ इस बात से इत्तेफाक रखते हैं की शहजादी ने औरंगज़ेब के बागी बेटे शहजादा अकबर से उसकी बगावत के दौरान खतो-किताबत की थी। वजह जो भी रही हो औरंगज़ेब ने उसके बाद उनकी सारी दौलत जब्त कर ली और उनकी 4 लाख की सालाना पेंशन भी मंसूख कर दिया।

शहजादी को तारीख में एक शायरा के तौर पर याद किया जाता है। उनकी तहरीरें बाद-ए-अज़मर्ग दीवान-ए-मख़फ़ी के नाम से जमा की गयीं थीं।

30/08/2026

ये मज़ार आलमी शोहरत याफ्ता शायर मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग खान' उर्फ़ मिर्ज़ा ग़ालिब साहब की है। 15 फरवरी 1869 में, यहीं शहरे दिल्ली में उनकी वफ़ात हुयी थी। दिल्ली दरवाजे के बाहर उनकी नमाज-ए-जनाजा पढ़ी गयी और यहां खानदाने- लोहारू की कब्रिस्तान में उन्हें दफ़न किया गया। ये जगह हज़रत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह से बेहद करीब है बल्कि अगर आप मरकज़ होते हुए जायेंगे तो रास्ते में पड़ेगी ये जगह। मिर्जा गालिब ने फारसी शायरी को हिंदुस्तानी जुबान में लाने के लिए एक अहम् किरदार अदा किया था। 1850 में आखिरी मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने मिर्जा गालिब को दबीर-उल-मुल्क और नज्म-उद-दौला के खिताब से नवाजा था।

30/08/2026

आमेर का किला जिसे 16वीं सदी के आखिर में राजा मान सिंह प्रथम ने बनवाया, जयपुर की पहाड़ियों पर आज भी ख़ामोशी से खड़ा है मगर इसकी कहानी इसकी दीवारों से कहीं आगे जाती है। जयपुर बसने से पहले, यही कछवाहा राजपूतों की राजधानी था, जो मुग़ल दरबार से गहराई से जुड़ा हुआ था।

और यहीं से कहानी दिलचस्प हो जाती है…
इसे अक्सर Akbar का “ससुराल” कहा जाता है। उनकी शादी Harka Bai (जिन्हें आम तौर पर जोधा बाई कहा जाता है) से सिर्फ एक शाही निकाह नहीं था बल्कि एक सियासी रिश्ता था, जिसने हिंदुस्तान की तारीख़ बदल दी।

इस रिश्ते के बाद मुग़लों और राजपूतों के बीच जंग की जगह भरोसा कायम हुआ। राजा मान सिंह जैसे राजपूत सरदार, अकबर के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार बने, और बदले में उन्हें इज़्ज़त, ओहदा और अपनी रियासतों में काफी हद तक आज़ादी मिली।

और हरका बाई… वो सिर्फ पर्दे के पीछे रहने वाली मलिका नहीं थीं। उनका असर मुग़ल दरबार में साफ़ दिखता था, सियासत हो या तिजारत, उनकी मौजूदगी एक मजबूत कड़ी थी, जो इस रिश्ते को और गहरा बनाती थी।

तो जब आप आमेर के इस किले में चलते हैं, सिर्फ इसकी ख़ूबसूरत दीवारें या शीश महल नहीं देखते, आप उस जगह से गुज़रते हैं, जहाँ रिश्तों, सियासत और भरोसे ने एक पूरी सल्तनत की दिशा बदल दी।

ये महज एक किला नहीं एक ख़ामोश गवाह है उस इत्तेहाद का, जिसने हिंदुस्तान की कहानी को नया मोड़ दिया।

1947 में भारत का एक स्कूल
30/08/2026

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चीन के शहर शंघाई में मौजूद आजाद हिंद फौज का ट्रेनिंग कैंप
30/08/2026

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आज के दिन ही, 30 अगस्त 1659 ई. को, जानशीनी की जंग जीतने के बाद मुगल बादशाह औरंगजेब आलमगीर के हुक्म पर उनके भाई शहजादे दा...
30/08/2026

आज के दिन ही, 30 अगस्त 1659 ई. को, जानशीनी की जंग जीतने के बाद मुगल बादशाह औरंगजेब आलमगीर के हुक्म पर उनके भाई शहजादे दारा शिकोह का कत्ल कर दिया गया था। उनके धड़ को हुमायूँ के मकबरे में दफन किया गया था जबकि उनके सर को ताजमहल के सहन में दफन किया गया था।

अगर हम मुग़ल सल्तनत के इतिहास के पन्ने को पलटें तो ये मालूम होता है की बाबर के बाद से ही तख़्त की जानशीनी के लिए जंग होती रही है। जहां हुमायूँ को हिंदुस्तान में वापसी के लिए अपने भाइयों तक से जंग लड़नी पड़ी तो वहीं अकबर के बेटे जहाँगीर भी अपने छोटे भाई दान्याल की मौत के ज़िम्मेदार बने। यही किस्सा शाहजहां के साथ भी हुआ। शाहजहाँ ने न सिर्फ़ अपने दो भाइयों ख़ुसरो और शहरयार की मौत का हुक्म दिया बल्कि 1628 में तख़्त पर काबिज होने के बाद अपने दो भतीजों और 2 चचेरे भाइयों को भी मरवाया। यही सिलसिला शाहजंहा के बाद भी जारी रहा।

शाहजंहा की बीमारी के बाद चारों मुग़ल शहजादों में सत्ता पाने की होड़ लग गयी। इसी कड़ी में 30 मई 1658 को आगरा से महज 13 किमी दूर, सामुगढ़ में औरंगजेब और दारा शिकोह के बीच जंग लड़ी गयी।

इस जंग में औरंगज़ेब को फैसलाकुन फतह हासिल हुयी और दारा शिकोह अपनी जान बचा कर आगरा के किले की ओर भाग गए वंहा से वो दिल्ली पहुंचे वहाँ से पंजाब और फिर अफ़ग़ानिस्तान। वहाँ 10 जून 1659 को मलिक जीवन ने उन्हें धोखे से पकड़वा कर औरंगजेब के सिपाहियों के हवाले कर दिया। जिसके बाद दारा 30 अगस्त 1659 के दिन एक कैदी के रूप में दिल्ली पहुंचे वहां उन्हें बहुत बेइज़्ज़त कर के एक छोटी और गन्दी हथिनी की पीठ पर बिना ढ़के हुए हौदे पर बैठा कर राजधानी की सड़कों पर जंजीरों में बांधकर घुमाया गया।

उसी दिन दीवाने खास में लगे दरबार में औरंगज़ेब ने उनकी मौत के फरमान पर मोहर लगा दिया। दिन ढलते-ढलते दारा का सर तन से जुदा कर दिया गया।

मुंबई का भिंडी बाज़ार - अंग्रेज़ इस जगह को Behind the Bazar बोलते थे, भारतीयों ने इसे भिंडी बाज़ार बना दिया।
29/08/2026

मुंबई का भिंडी बाज़ार - अंग्रेज़ इस जगह को Behind the Bazar बोलते थे, भारतीयों ने इसे भिंडी बाज़ार बना दिया।

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