20/02/2026
🌍 पृथ्वी स्तोत्रम् (Brahmavaivarta Purana से)
विष्णुरुवाच -
यह स्तोत्र भगवान विष्णु द्वारा कहा गया है और ब्रह्मवैवर्त महापुराण में वर्णित है। यह अत्यंत पुण्यदायी एवं फलदायी है।
🪷 श्लोक एवं सरल अर्थ हिंदी में
॥ १ ॥
यज्ञसूकरजाया त्वं जयं देहि जयावहे ।
जयेऽजये जयाधारे जयशीले जयप्रदे ॥
अर्थ:
हे देवी! आप यज्ञवराह (भगवान विष्णु के वराह अवतार) की पत्नी हैं। आप जयस्वरूपा हैं, अजयस्वरूपा हैं, जय की आधार हैं, जयशीला हैं और जय प्रदान करने वाली हैं। हमें विजय प्रदान करें।
॥ २ ॥
सर्वाधारे सर्वबीजे सर्वशक्तिसमन्विते ।
सर्वकामप्रदे देवि सर्वेष्टं देहि मे भवे ॥
अर्थ:
हे देवी! आप सबका आधार हैं, सब बीजों के उद्गम हैं, सब शक्तियों से युक्त हैं। आप सबकी मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली हैं। मुझे मेरी सभी इच्छाओं की पूर्ति प्रदान करें।
॥ ३ ॥
सर्वशस्यालये सर्वशस्याढ्ये सर्वशस्यदे ।
सर्वशस्यहरे काले सर्वशस्यात्मिके भवे ॥
अर्थ:
हे देवी! आप सब शस्यों (अन्नों) के निवास स्थान हैं, सब शस्यों से परिपूर्ण हैं, सब शस्यों को देने वाली हैं, समय आने पर सब शस्यों का हरण करने वाली हैं और आप स्वयं सब शस्यों के रूप में विराजमान हैं।
॥ ४ ॥
मङ्गले मङ्गलाधारे मङ्गल्ये मङ्गलप्रदे ।
मङ्गलार्थे मङ्गलेशे मङ्गलं देहि मे भवे ॥
अर्थ:
हे देवी! आप स्वयं मंगलस्वरूपा हैं, मंगल की आधार हैं, मंगलमयी हैं, मंगल प्रदान करने वाली हैं, मंगल के लिए ही सब कुछ हैं, मंगल की ईश्वरी हैं। मुझे मंगल (कल्याण) प्रदान करें।
॥ ५ ॥
भूमे भूमिपसर्वस्वे भूमिपालपरायणे ।
भूमिपाहङ्काररूपे भूमिं देहि च भूमिदे ॥
अर्थ:
हे भूमि देवी! आप राजाओं की सर्वस्व हैं, राजाओं द्वारा पालन किए जाने वाली हैं, राजाओं के अहंकार के रूप में विराजमान हैं। हे भूमि प्रदान करने वाली देवी! मुझे भूमि (धरती पर स्थान, सम्पत्ति, आधार) प्रदान करें।
✨ स्तोत्र पाठ की महिमा एवं लाभ
॥ ६ ॥
इदं स्तोत्रं महापुण्यं तां सम्पूज्य च यः पठेत्।
कोटिकोटि जन्मजन्म स भवेद् भूमिपेश्वरः॥
अर्थ:
जो मनुष्य पृथ्वी देवी की पूजा करके इस महापुण्यदायी स्तोत्र का पाठ करता है, वह करोड़ों-करोड़ जन्मों तक राजा (भूमिपति) बनता है। (अर्थात उसे सम्मान, ऐश्वर्य और स्थायित्व की प्राप्ति होती है)
॥ ७ ॥
भूमिदानकृतं पुण्यं लभते पठनाज्जनः ।
भूमिदानहरात्पापान्मुच्यते नात्र संशयः ॥
अर्थ:
इस स्तोत्र का पाठ करने मात्र से मनुष्य वह पुण्य प्राप्त कर लेता है, जो भूमिदान (जमीन दान) करने से मिलता है। साथ ही, भूमि का अपहरण/अनादर करने से लगने वाले पापों से भी मुक्त हो जाता है - इसमें कोई संदेह नहीं है।
॥ ८ ॥
भूमौ वीर्यत्यागपापाद् भूमौ दीपादिस्थापनात् ।
पापेन मुच्यते प्राज्ञः स्तोत्रस्य पाठनान्मुने ।
अश्वमेधशतं पुण्यं लभते नात्र संशयः ॥
अर्थ:
हे मुने! जो प्राज्ञ (बुद्धिमान) व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह भूमि पर वीर्यत्याग (अपवित्रता) के पाप से और भूमि पर दीप आदि न रखने (या गलत स्थापना) के दोष से मुक्त हो जाता है। उसे सौ अश्वमेध यज्ञों के बराबर पुण्य की प्राप्ति होती है - इसमें कोई संदेह नहीं है।
🌱 पृथ्वी स्तोत्र पाठ की विधि एवं विशेष लाभ
कब करें पाठ?
· प्रतिदिन प्रातः काल स्नान के बाद
· विशेष रूप से गुरुवार, शुक्रवार और रविवार को
· भूमि पूजन के अवसर पर
· नया घर या जमीन खरीदते समय
· वास्तु दोष निवारण हेतु
पाठ विधि:
1. स्वच्छ स्थान पर बैठें
2. पृथ्वी (मिट्टी) का एक छोटा सा ढेर बनाकर उस पर रोली, अक्षत, फूल और दीप अर्पित करें
3. "ॐ भूम्यै नमः" कहकर धूप-दीप दिखाएं
4. पृथ्वी स्तोत्र का पाठ करें
5. अंत में क्षमा प्रार्थना करें
विशेष लाभ:
✅ भूमि एवं भवन संबंधी समस्याओं का निवारण
✅ वास्तु दोष से मुक्ति
✅ स्थिरता एवं समृद्धि में वृद्धि
✅ कृषि एवं व्यवसाय में लाभ
✅ पितृ दोष एवं भूमि पूर्वज दोष से मुक्ति
✅ राजमान सम्मान एवं यश की प्राप्ति
✅ घर में सुख-शांति एवं ऐश्वर्य
🙏 क्षमा प्रार्थना
हे पृथ्वी माता!
हमसे अनजाने में जो भी अपराध हुआ हो उसे क्षमा करें। आप हमें धैर्य, स्थिरता और समृद्धि प्रदान करें।
ॐ भूम्यै नमः।
ॐ पृथिव्यै नमः।
ॐ धरित्र्यै नमः॥
📌 सावधानियाँ:
· यह स्तोत्र ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार अत्यंत फलदायी है
· इसे श्रद्धा और भक्ति भाव से करें
· भूमि देवी की प्रतिदिन अनदेखी न करें - उनका सम्मान करें
॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्तमहापुराणे पृथ्वीस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥
🌍 जय पृथ्वी माता! 🙏