Nasim Akhtar

Nasim Akhtar Student , blogger & Social- Activist with Principle of secularism, Equality, Humanity & Justice. , S

12/18/2022
11/26/2022

Live in Relationship का क्या मतलब हैं What is live in Relationship | Indian Society | Nasim Bukhari

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आज के बच्चें कल के भारत का निर्माण करेंगे। हम जिस तरह से बच्चों की परवरिश करते उससे भारत का भविष्य तय होता है।। - पं. जव...
11/14/2022

आज के बच्चें कल के भारत का निर्माण करेंगे। हम जिस तरह से बच्चों की परवरिश करते उससे भारत का भविष्य तय होता है।। - पं. जवाहर लाल नेहरू

बाल दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!

08/14/2022
08/11/2022

रक्षाबंधन के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।।


07/03/2022
04/02/2022

तमाम अहले ईमान को बरकतों व रहमतों वाला मुक़द्दस माहे रमज़ान मुबारक हो…

#इंसानवेलफेयरफाउंडेशन

03/29/2022

Insaan Welfare Foundation का सदस्यता या संस्था में पद लेने हेतु आज ही संपर्क करें।

| इंसान वेल्फेयर फाउंडेशन एक सामाजिक संस्था है।
इस संस्था को राजनीति से दूर दूर तक कोई मतलब नहीं है, इस संस्था का मुख्य उद्देश्य गरीबों की सेवा करना, मजलूमों के हक के लिए लड़ना एवं सामाजिक कार्य करना है।

निम्न क्षेत्रों में पिछले कई वर्षों से कार्य करती आ रही है :- शिक्षा, स्वस्थ्य,पर्यावरण, समाज कल्याण, समाज उत्थान इत्यादि।

संपर्क सूत्र :- +91 6299 397 671, +91 9773689665

#इंसानवेलफेयरफाउंडेशन

राष्टीय हिंदी साप्ताहिक पेपर (अचूक संघर्ष)  28/01/2022 जिन हाथों में होनी चाहिए कलम की दरकार उन्हीं हाथों से लहू बह रहा ...
01/29/2022

राष्टीय हिंदी साप्ताहिक पेपर (अचूक संघर्ष) 28/01/2022
जिन हाथों में होनी चाहिए कलम की दरकार उन्हीं हाथों से लहू बह रहा बारम्बार : नसीम अख्तर

अच्छा फैसला इंसान वेलफेयर फाउंडेशन टीम का ..
01/29/2022

अच्छा फैसला इंसान वेलफेयर फाउंडेशन टीम का ..

चंपारण क्रिकेट लीग जो कि कोरोना के बढ़ते संक्रमण के कारण स्थगित किया गया था, उसका पुनः आयोजन 7 फरवरी 2022 से किया जाएगा।
#इंसान_वेलफेयर_फाउंडेशन

साठी को प्रखंड का दर्जा देने के लिए बहुत वादे हुए यहां तक कि हमारे मुख्यमंत्री ने भी हमें तसल्ली दी की जल्द ही साठी को प...
11/14/2021

साठी को प्रखंड का दर्जा देने के लिए बहुत वादे हुए यहां तक कि हमारे मुख्यमंत्री ने भी हमें तसल्ली दी की जल्द ही साठी को प्रखंड का दर्जा दिया जाएगा अब दशकों हो चुका लेकिन किसी ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी लेकिन अब समय आ गया है कि हम अपनी हक की मांग को बुलंद आवाज दें ।इसलिए साठी के युवाओं ने यह सुनिश्चित किया है की, #साठी_मांगे_प्रखण्ड_का_दर्जा फेसबुक और ट्विटर के माध्यम से ट्रेन कराया जाएगा, और साथ ही साथ एक प्रदर्शन भी किया जाएगा जिसके लिए समय तारीख और स्थान के बारे में आप सभी को बता दिया जाएगा। कृपया कर यह मैसेज साठी इलाके के हर एक लोगों तक पहुंचा दें, ताकि जब समय सुनिश्चित हो जाए तो इस ट्रेंड को एक साथ चलाया जा सके।

धन्यवाद।

साठी युवा

आप साठी प्रखंड आंदोलन मंच ग्रुप से जुड़े 👇 https://chat.whatsapp.com/GzIfm7NW9Kq47UQOue7teI

Insaan Welfare Foundation
08/07/2021

Insaan Welfare Foundation

में भारत🇮🇳 के लिए प्रथम गोल्ड मेडल जीतने वाले Neeraj Chopra को बहुत-बहुत बधाई।

आप पर पूरे देश को गर्व है।



 #चम्पारण_मांगें_एयरपोर्ट       25 जुलाई को  #चम्पारण_मांगें_एयरपोर्ट मुहिम से जुड़कर social media और  twitter के माध्यम ...
07/24/2021

#चम्पारण_मांगें_एयरपोर्ट 25 जुलाई को #चम्पारण_मांगें_एयरपोर्ट मुहिम से जुड़कर social media और twitter के माध्यम से चम्पारण में एयरपोर्ट की मांग के समर्थन में आवाज बुलंद करें ,
Nasim Bukhari, Deputy Coordinator Media and publicity wing's Insaan Welfare Foundation (IWF)
Insaan Welfare Foundation Sunil Kumar Renu Devi

Thank you very much ❤️❤️❤️ Sunil Kumar ji
07/24/2021

Thank you very much ❤️❤️❤️ Sunil Kumar ji

06/18/2021

आज ही के दिन 18 जून 1576 को हल्दीघाटी का ऐतिहासिक जंग मुग़ल बादशाह अकबर और राणा प्रताप के बीच लड़ी गयी। अक़बर की तरफ से उनके सेनापति मानसिंह थे जबकि राणाप्रताप की तरफ से उनके सेनापति हकीम खान सूरी और उनकी अफ़ग़ान लड़ाकों की फौज थी।

इस जंग की दो वज़ह थी, पहला मानसिंह अपने अपमान का बदला राणाप्रताप से लेना चाहते थे जिन्हें राणाप्रताप ने एक भोज में अपमानित किया था। दूसरा अकबर ने लगभग ज़्यादातर राजपूत राजाओं को अपने अधीन कर लिया था लेकिन मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप ने मुग़लो के अधीन होने से इनकार कर दिया था। मेवाड़ छेत्र राजनीति और व्यवसायिक दोनो तरह से अकबर के लिए ज़रूरी था। अकबर मेवाड़ को जीतकर गुजरात के लिए मेवाड़ से होकर रास्ता चाहते थे जो व्यापारिक नज़रिए से फायदेमंद था।

अक़बर ने मान सिंह और टोडरमल सहित अपने कई मंत्रियों को राणाप्रताप के पास भेजा लेकिन राणा प्रताप तैयार नही हुए। और आखिरकार जंग की नौबत आ गयी। दोनों सेनाएं जंग के लिए हल्दीघाटी के पास इकट्ठा हुई।

जंग शुरू होने के तीन घण्टो के अंदर ही मुग़ल सेना राणाप्रताप की सेना पर हावी हो गयी थी। बिखरती सेना देख राणा प्रताप जंग का मैदान छोड़कर भाग गए। उनके अंगरक्षक ने राणा प्रताप की शाही छतरी अपने ऊपर लगा कर मुग़ल सेना को भृमित किया और राणा प्रताप को भागने में मदद की। जंग सिर्फ़ आधे दिन में ही ख़त्म हुई और राजा मान सिंह के नेतृत्व में मुग़ल सेना ने फ़तह हासिल की।

यह जंग राजनीतिक वजहों से लड़ी गयी थी लेकिन आज इस जंग को हिंदू और मुस्लिम जोड़कर पेश किया जाता है जबकि इस जंग में अक़बर शामिल भी नही थे उनकी सेना की कमान राजपूतों के हाथ मे थी जबकि राणा प्रताप की तरफ से मुस्लिम सेनापति और अफगानों ने भी लड़ाई लड़ी थी।

 #साठी_मदरसा मदरसा रेयाजूल उलूम साठी पश्चिमी चंपारण की खूबसूरत तस्वीर
06/01/2021

#साठी_मदरसा
मदरसा रेयाजूल उलूम साठी पश्चिमी चंपारण की खूबसूरत तस्वीर

05/11/2021
05/04/2021

कोरोना: आसमान से दलित बस्ती पर कभी फूल क्यों नहीं बरसता?

गरीबों की कौन सुनता है? अगर आपको जात बिरादरी के ‘स्केल’ पर नीचे रखा गया है, और संसाधन से भी महरूम किया गया है, तो समझ लीजिए आसमान में स्थित हेल्पलाइन आपका कॉल नहीं लेता। क्यों आसमान से फूलों की वर्षा कभी किसी दलित बस्ती पर नहीं होती? मगर धार्मिक किताबों में इसका उल्लेख ज़रूर मिलता है जब कभी भी दलित अपने अधिकार की लड़ाई लड़ने को आगे आता है, तो इससे स्वर्ग के खम्भे हिलने लगते हैं। आइए, एक ऐसे ही दलित मजदूर की बात आज करते हैं, जो आजकल कोरोना से संक्रमित है और जिंदगी और मौत से लड़ रहा है। पहले सिस्टम ने उससे रोटी छीन ली थी, और अब कोरोना वायरस उसे जीने नहीं दे रहा है।

कुछ रोज पहले की बात है, सोशल मीडिया पर जेएनयू के साथियों ने एक पोस्ट को कई बार शेयर किया। पोस्ट में बतलाया गया कि जेएनयू का एक सफाई कर्मचारी को इलाज के लिए पैसे की सख्त ज़रूरत है। कोरोना से बीमार सफाई कर्मचारी को सांस से संबंधित बहुत सारे ‘कॉम्प्लिकेशन’ जकड़ चुके थे।

इलाज के लिए अस्पताल में जगह पाना आज के दौर में कितना मुश्किल है, यह आप को मुझे बतलाने की जरूरत नहीं है। हेल्थ सर्विस को पहले से ही पैसे के बाजार में बेच दिया गया है कोरोना ने तो सिर्फ इस तल्ख हकीकत को सामने ला दिया है।

मैं बिहार से हूं, और बिहार के आम लोग नेताओं से अक्सर एक ही वरदान मांगते हैं कि वे उन्हें दिल्ली में स्थित एम्स में इलाज कराने की सिफारिस कर दें। मुझसे भी मेरे इलाके के कई सारे लोगों ने पूछा कि "आप का एम्स में कोई जान पहचान है, कोई पैरवी है?"

पिछले साल लॉकडाउन लगने से पहले, कुछ साथी आगरा से दूर और भरतपुर के पास अकबर के द्वारा बसाया गया फतेहपुर सीकरी किला देखने गये थे। फूल पैंट और शर्ट के ऊपर ‘नेहरू जैकेट’ पहने और छोटी दाढ़ी रखे हुए, हमारा स्थानीय गाइड मुझे अचानक से एक कोने में ले गया और पूछा, "आप को तो कुछ जुगाड़ होगा एम्स में...?"

दूसरों की क्या बात करूं, बहुत पहले मेरे सगे बड़े भाई दिल के मर्ज से बीमार थे। उस वक्त मैं पटना में ‘ग्रेजुएशन’ कर रहा था। एम्स में भैया को ले जाने के बारे में लोगों ने मुझे सलाह दी। उन दिनों में पटना से प्रकाशित होने वाला मशहूर उर्दू अखबार ‘कौमी तंजीम’ से जुड़ा हुआ था। मैं वहां रिपोर्टिंग करता था। मेरे चीफ रिपोर्टर बड़े बड़े नेताओं के करीब से जानते थे। एक दिन मुझे वे गोलघर ले गए। गंगा के किनारे और गांधी मैदान से सटा हुआ गोलगर है। पास में राजनीतिक सभा चल रही थी। सभा में उस वक्त के केन्द्रीय मंत्री सी.पी ठाकुर मौजूद थे। मेरे सीनियर रिपोर्टर ने मुझे उनसे मिलाया और सारी बात बताई। बाद में उनहोंने ठाकुरजी से एम्स के लिए एक सिफरिसी लेटर ले लिया। लेटर पा कर मुझे बड़ी खुशी हुई। मन ही मन इतरा भी रहा था कि "रिपोर्टर हूं कोई मामूली इंसान थोड़े ही हूं... अब तो मेरा काम कोई नहीं रोक सकता...वीआईपी ट्रीटमेंट होगा....."

मंत्रीजी के खत को मैंने सबको दिखाया। फिर कुछ दिन बाद भाई साहेब को लेकर दिल्ली पहुंचा। एम्स में लाइन लगाई और पुर्जी बना। इलाज भी शुरू हुआ। मगर धक्के बहुत खाने पड़े और चक्कर बहुत लगाना पड़ा। फिर मंत्रीजी की चिट्ठी की याद आई। पेशे से और आदत से पत्रकार तो था ही, इसलिए एम्स का ‘हार्ट डिपार्टमेंट’ खोजने में देर न लगी। उस ज़माने में ह्रदय विभाग में कोई प्रोफेसर तलवार थे। उनको बड़ा डाक्टर समझा जाता था। एम्स में स्थित उनके चेम्बर में दाखिल हुआ और उनको बड़े ‘कॉन्फिडेंस’ से मंत्रीजी की चिट्ठी को थमा दिया।

मगर मेरी सारी उम्मीदों के खिलाफ, चिट्ठी का कोई असर न दिखा। डॉक्टर तलवार ने इसे पढने या फिर देखने में एक सेकंड से भी कम वक्त लगाया। फिर उसे अपने टेबल पर रख दिया। न मुझ से हाल चाल पुछा और न मुझे वीआइपी ट्रीटमेंट दिया। बग़ैर किसी देरी के मुझसे चैम्बर से बहार जाने के लिए कहा। बाद में मुझे और मेरे भाई को दिल्ली के अस्पतालों में क्या क्या दिक्कत सहनी पड़ी, क्या क्या मुसीबत सहनी पड़ी, उसके लिए हजारों पेज कम पड़ जायेंगे।

यह बात आज से तकरीबन पन्द्रह साल पुरानी है। इसलिए मैं यह मानने को तैयार नहीं हूं कि पब्लिक हेल्थ से सम्बंधित सारी मुसीबत आज ही पैदा हुई है। मगर, मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं है कि आज सुरत-ए-हाल पहले के मुकाबले हजार गुना ज्यादा खराब हो चुकी है। कल के हुक्मरां ईंट से बने हुए दिल रखते थे, आज का शासक वर्ग पत्थर का बना हुआ हृदय रखता है। शायद यह एक मशीन बन चुका है, जिसके पास अब दिल विल नाम का कोई अंग नहीं है, और न उसे उसकी ज़रुरत है। उसका हृदय संवेदनहीन मशीन है, जो मुनाफा और माल बनाने के फ़िक्र से चलता है। यह मशीन बे-हिस है। यह मशीन ऑक्सीजन के बगैर मर रहे लोगों की चीख पुकार सुनकर अपने टारगेट से ज़रा भी इधर उधर नहीं होता।

जेएनयू का दलित सफाई कर्मचारी आज चीख रहा है। मगर संवेदनहीन सिस्टम को कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा है। उसका चीख आसमान में लगे हेल्पलाइन तक भी नहीं पहुँचती। इस बीमार सफाई मजदूर को मैं बहुत दिनों से जानता हूँ। हाल के दिनों तक वह स्वस्थ था। उसे मैं जेएनयू लाइब्रेरी के आस-पास देखा करता था।

मगर उससे मेरी जान-पहचान कुछ दिनों पहले ज्यादा बढ़ गयी थी। आपने सुना होगा कि जेएनयू लाइब्रेरी में काम करने वाले दो दर्जन सफाई कर्मचारीयों को पिछले पांच महीनों से वेतन नहीं मिला था। जिस के खिलाफ वे हड़ताल पर बैठे थे।

कोरोना काल के दौरान वेतन बहुत लोगों को नहीं मिल रहा है। दूसरों की क्या कहूँ मुझे भी मेरी मजदूरी साल भर से नहीं मिली है। मेरे जैसे सैकड़ों और शिक्षक हैं, जो अपनी तनख्वाह के लिए रोज़ इंतज़ार कर रहे हैं। संक्षेप में बात यह है की हमलोग दिल्ली यूनिवर्सिटी के तहत चल रहे ‘एन.सी.वेब’ में पढ़ाते हैं। जिस दिन कॉलेज में छुट्टी रहती है, उस दिन एन.सी.वेब की क्लास लगती है। समझ लीजिये यह एक तरह का रेगुलर और ओपन स्कूल के बीच का सिस्टम है।

यहां पढ़ने वाली सारी महिलाएं हैं। नंबर कम होने की वजह से इनको डीयू के रेगुलर कोर्स में जगह नहीं मिल पाती है। आखिर में इनको एन.सी.वेब में दाखिला लेना पड़ता है। याद रखिए कोर्स का ‘सिलेबस’ रेगुलर कोर्स की तरह ही होता है। पिछले सेमेस्टर में, मैंने तुलनात्मक राजनीति पढ़ाई और इस सेमेस्टर अंतराष्ट्रीय राजीनिति। कोर्स में लगे सारे मटेरियल वही पढाये जो कोई हिन्दू या मिरांडा कॉलेज में पढ़ता है। यह सब करने के बावजूद भी हमें हमारी मजदूरी साल भर से नहीं मिली है। दो सेमेस्टर गुजर जाने के बाद भी हमें एक पैसा नहीं मिला है। हमारे दिल में कई बार यह सवाल उठता है कि “क्या हम इंसान नहीं है?” “जब छात्रों को कोरोना के दौरान भी फीस देना होता है, और इसमें एक कौड़ी भी कम नहीं किया गया है, तो मुझ जैसे टीचर को साल भर से पैसा क्यों नहीं मिलता?”

फिर गुस्सा भी आता है। “कोई है इस नाइंसाफी के खिलाफ बोलने वाला?” “क्या भारत का सिस्टम मुर्दा नहीं हो चुका है?” “क्या आसमान को हमारी परेशानी नहीं दिखती?” सोचिये ज़रा इस देश में कैसे जालीम लोग है जो नीति बनाते हैं?

तजाद देखिये कि सरकार के पास हमें साल भर से मजदूरी देने के लिए वक्त और पैसा नहीं है, मगर करोड़ों की नई पार्लियामेंट इमारत, जिसकी कोई जरूरत नहीं है, इस कोरोना काल में भी बन रही है।

मगर आप की मज़बूरी से मकान मालिक को कुछ नहीं लेना देना। महीना नया शुरू हो गया, उसे तो सिर्फ किराया चाहिए। मकान मालिक किराया लेने के लिए किसी भी वक़्त दरवाजे को पीट सकता है।

जेएनयू से पीएचडी करने के बाद भी मेरी हालत और ऊपर ज़िक्र किये गए सफाई कर्मचारी की हालत में बहुत समानता है। मगर सफाई कर्मचारी की दिक्कत इस वजह से ज्यादा बढ़ जाती है कि ज़ात पात पर आधारित समाज में उनकी हैसियत एक दलित की है। जात पर आधारित समाज के दिलों में जानवरों के लिए हमदर्दी होती है, मगर दलितों के लिए नहीं।सफाई कर्मचारी ज्यादा पढ़े लिखे भी नहीं और उनकी जान पहचान भी सीमित है। बेशक, ‘सोशल कैपिटल’ न होने की वजह से उनकी हालत मेरे से बहुत ज्यादा कमज़ोर हो जाती है।

कुछ हफ्ते पहले, जब मुझे मालूम हुआ कि पांच महीनों से सैलरी न मिलने के विरोध में, सफाई कर्मचारी जेएनयू लाइब्रेरी के पास हड़ताल पर बैठे हुए हैं, तो मैं वहां पहुंचा। उनसे बात की। इजाज़त मिलने पर, उनकी बातों को रिकॉर्ड किया उसे सोशल मीडिया पर पोस्ट किया। बहुत सारे इंसाफ-पसंद लोगों ने उनके हक में आवाज़ उठाई। बिहार के मेरे एक जेएनयू के बहुत ही सीनियर और अंबेडकरवादी लेखक, विद्वान और कार्यकर्ता ने खुल कर इस ज़ुल्म के खिलाफ बात की और इसे भी रिकॉर्ड कर अपलोड किया गया।

मगर पत्थर-दिल जेएनयू प्रशासन और उनके चमचे टीचर कुछ भी न बोले। बार-बार गार्ड का सहारा लेकर, सफाई कर्मचारी को धमकी दी गई। उनसे मिलने वालों को रोका जा रहा था। मगर हड़ताल तीन हफ्ते से ज्यादा चली। धूप में चालीस डिग्री के आसपास के तापमान में, जब प्रशासन के लोग ए.सी. में ठंडी काट रहे थे, तब सफाई कर्मचारी लाइब्रेरी के बाहर एहतेजाज करते रहे। वे भूखे भी रहे, मगर हार न मानी। कभी-कभी मैं उनसे बड़ी गुजारिश करता कि “खाना कंटीन से ऑर्डर कर दूं?”। हर बार उनका यही जवाब होता था "सर रहने दो...खाना खा लिया है।" बहुत जिद करने पर वे एक दो बार समोसा और नींबू पानी के लिए राजी हुए।

सफाई कर्मचारी की यह हड़ताल कोरोना के दौर में हुई थी। उनकी सैलरी भी कोरोना के दौर में भी रोकी गई थी। अब आप ही बताइए इतना सड़ा हुआ सिस्टम है कहीं दुनिया में? मगर सफाई कर्मचारी फौलाद की तरह डटे रहे। आखिर में उनको एक महीना की सैलरी रिलीज की गई और उनसे काम पर लौटने को कहा गया। वक्त की मजबूरी को देखते हुए, उन्होंने हड़ताल खत्म कर काम ज्वाइन किया।

इस हड़ताल को कामयाब बनाने में सब कर्मचारियों का योगदान रहा। मगर जो सफाई कर्मचारी अभी कोरोना से बीमार हैं, उन्होंने बड़ी मेहनत की। हमेशा वह धरने पर रहे और अपने साथियों का हौसला बढ़ाया। यह सफाई कर्मचारी जेएनयू के पास कुसुमपुर पहाड़ी झुग्गी में रहता है। पिछले कई महीनों से वह खाने और रहने के लिए संघर्ष कर रहा था। अब कोरोना ने भी उसपर हमला कर दिया है। राहत की बात यह है कि जेएनयू के कुछ साथियों ने एक बड़ी रकम जमा की और सफाई कर्मचारी की मदद की।

अब सफाई कर्मचारी खतरे से बाहर है। मगर अभी भी वह अस्पताल से घर नहीं लौटा है। उसकी नौ साल की बिटिया और मां अभी भी उसके घर आने का इंतजार कर रही हैं, वहीं उसकी बीवी अपनी जान की परवाह किए बगैर उसकी देखभाल हॉस्पिटल में कर रही है।

अब आप ही बताइए, क्या इस देश में गरीब, दलित और मजदूर का कोई सुनने वाला है? क्या आम आदमी को बुनियादी सुविधा कभी मिल पायेगी? बग़ैर सेंसिटिव हुए और पब्लिक हेल्थ को दुरुस्त किए, क्या किरोना को हराया जा सकता है?

इन्सान तो इन्सान दलित के लिए तो आसमान भी बेहिस है। क्यूँ आसमान कभी रहमत के फूल किसी सफाई कर्मचारी की झुग्गी पर नहीं बरसाता? अगर आसमान के पास करूणा और प्रेम होता, तो अब तक वह पिघल कर मोम न बन जाता?

अभय कुमार
जेएनयू
4 मई, 2021

05/03/2021

We the people of India, who want to implementation of justice in our country must raise their voice against this institutional conspiracy like

05/01/2021

पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन साहब का कोरोना की वजह से इंतकाल की ख़बर सुनकर बड़ा अफ़सोस हुआ। परवरदिगार मरहूम को मगफिरत के साथ जन्नतुल फिरदौस में आला मकाम अता फरमाए और उनके परिवार को सब्र अता करें।


05/01/2021

पूर्व सांसद मोहम्मद शहाबुद्दीन साहब का कोरोना की वजह से इंतकाल की ख़बर सुनकर बड़ा अफ़सोस हुआ। परवरदिगार मरहूम को मगफिरत के साथ जन्नतुल फिरदौस में आला मकाम अता फरमाए और उनके परिवार को सब्र अता करें।

 #साठी_में_कोरोना_से_अब_तक_हो_चुका_है_10_से_12_मौतनसीम बुखारी 🖊️ इस कोरोना महामारी के दूसरे चरण में साठी थाना क्षेत्र मे...
05/01/2021

#साठी_में_कोरोना_से_अब_तक_हो_चुका_है_10_से_12_मौत
नसीम बुखारी 🖊️
इस कोरोना महामारी के दूसरे चरण में साठी थाना क्षेत्र में लगातार कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है इसका मुख्य कारण यह है कि प्रदेश से आ रहे लोगों की कोरोना की जांच न होना और आइसोलेशन का न होना बताया जा रहा है अभी तक साठी थाना क्षेत्र में लगभग 10 से 12 मौत हो चुके है।

जनता का आरोप है कि स्वास्थ विभाग के साथ साथ यहां के विधायक और सांसद कि वजह से जिनको हम लोगों ने चुन कर विधानसभा और लोकसभा में भेजे है अपने आवाज़ को सरकार तक पहुंचने और अपने क्षेत्र की विकास के लिए लेकिन कोइ विकास साठी में नही दिख रहा है

सबसे पहले आपको ये बताना जरूरी है साठी ने कितने स्वतंत्रता सेनानी जो देश के स्वतंत्रता संग्राम में अपनी अहम भूमिका निभाई और देश को अंग्रेजी हुक़ूमत से आज़ादी दिलाई जैसे कि श्री राजकुमार शुक्ला जो महात्मा गांधी को चंपारण आने पर मजबूर कर दिया और गांधी को लाया भी गांधी को महात्मा भी बनाया , श्री शेख गुलाब जिनको कहा जाता है की अंग्रेजो से लोहा लेना यानी कि अंग्रेजो को साठी छोड़ने पे मजबूर कर दिए थे जब इनको बेतिया कोर्ट में पेश होना था तब वो औरतों के लिबास पहन कर पेश हुए थे की अंग्रेजी पुलिस कोर्ट में पेश होने से पहले गिरफ्तार ना कर ले , बाबू शीतल राय इत्यादि...।

आजादी के 75 सालो बाद भी कोई साठी में तकनीकी स्वास्थ केंद्र नहीं है और एक प्राथमिक स्वास्थ केंद्र है उसका भी दैनीय हाल बना हुआ है साठी सरकारी अस्पताल में 2017 मे स्टाप की स्थानांतरण के बाद एक डॉक्टर और दो स्टाप कार्यरत है इस अस्पताल में ना तो किसी मरीज को दावा मिलता नही सही से कोइ भी बीमारी की जांच होती ।

इस समय कोरोना का दूसरा चरण चल रहा है साठी 9 से 10 पंचायतों से जुड़ा हुआ है और इतनी बड़ी क्षेत्र में एक प्राथमिक स्वास्थ केंद्र है जिसमे कोरोना की जांच की व्यवस्था होनी चाहिए और आइसोलेशन की व्यवस्था होनी चाहिए जो प्रदेश से गांव आ रहे है उनके लिए लेकिन इस तरह की कोई व्यवस्था नहीं साठी सरकारी अस्पताल में ।

साठी थाना क्षेत्र के ग्रामीणों का ये भी आरोप है की जो लोग कोरोना से संक्रमित है उनकी संक्रमित होने कि जानकारी दूसरे लोगो नही हो रही है लेकिन जानकारी होने तक दुसरे लोग भी संक्रमित हो रहे है । साठी थाना अध्यक्ष उदय कुमार का ने बताया कि साठी थाना क्षेत्र में लगातार दिन रात एक कर के सख्ती से मास्क जांच के साथ जुर्माना भी वसूला जा रहा है इस दौरान साठी थाना के एक अधिकारी भी कोरोना से ग्रसित है इसके बावजूद भी अपनी पूरी टीम के साथ साठी की जनता की कोरोना से बचाव के लिए सख्ती बरती जा रही है ।

मै नसीम बुखारी , इंसान वेल्फेयर फाउंडेशन , सेमरी साठी परिवार से और अपने माननीय सांसद श्री सुनील कुमार जी , माननीय विधायक श्रीमती रेशमी वर्मा , और राज्यसभा सांसद श्री सतीश चन्द्र दुबे जी से मांग कर रहा हूं की जल्द से जल्द साठी सरकारी अस्पताल में कोरोना की जांच और प्रदेश से आ रहे लोगों के लिए आइसोलेशन की व्यवस्था कराई जाए क्योंकि साठी में प्रतिदिन कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है इससे साठी के लोगों में काफ़ी दहशत का माहौल है।
Insaan welfare foundation


ुमार #बिहार #मंगल_पांडेय
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04/29/2021

देश और हिंदू समाज का बड़ा दुश्मन कौन है? कोरोना पॉजिटिव एक भक्त का जवाब....
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जिंदगी और मौत के बीच दूरी इतनी घट जायेगी, कभी यह बुरे ख़्वाब में भी सोचा न था। कल तक जिनके साथ चाय पिया करता था, और राजनीतिक मामलों पर खूब बहस और लड़ाई झगड़ा हुआ करता था, उनमें से एक अचानक बीमार पड़ गए।

कुछ दिन पहले एक मनहूस फोन कॉल आया। "भैया मैं कोरोना पॉजिटिव हो गया हूं। बदन में काफी दर्द है। पीठ पर ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने सौ लाठी मारी हो। स्वाद बिलकुल गायब है। सूंघने की ताकत भी खत्म हो गई है। तेज बुखार अभी भी है।"

बीमार व्यक्ति मुझे "भैया" इसलिए कहते हैं कि मैं उम्र में उनसे थोड़ा ज्यादा बड़ा हूं। दोनों की आबाई रियासत बिहार है।

भैया कहने का मतलब यह नहीं है कि श्रीमान मेरे साथ बहस करने, बात काटने और सामाजिक न्याय की पार्टियों और वामपंथ की विचारधारा को जीभर के बुरा भला कहने से पीछे हटे हों।

बार बार उन्होंने मुझ पर यादव की "गुंडागर्दी", सामाजिक न्याय की पार्टी के द्वारा किए गए "भ्रष्टाचार" पर खामोशी इख्तेयार करना का आरोप लगाया।

वह मेरी बातों को काटते हुए अक्सर कहते "भैया, आप लोग सामाजिक न्याय की पार्टियों के खिलाफ नहीं बोलेंगे, क्यूंकि इससे आप का धंधा बिगड़ता है। आप लोग सिर्फ पंडित और ऊंची जाति के लोगों के खिलाफ जहर उगलते हैं, क्योंकि इससे आप की प्रगतिशीलता और चमक उठती है। सच्चाई बोलने की हिम्मत कीजिए।"

मेरा तर्क यही होता कि सामाजिक न्याय की पार्टियों और नेताओं में बहुत कमियां हैं, मगर इसका विकल्प कभी भी धर्म और नफरत की राजनीति नहीं हो सकती।

मगर श्रीमान जी मेरी बात न सुनते और मुस्लिम के खिलाफ खूब बोलते। उन्होंने धारा 370 खत्म होने पर जश्न मनाया। मंदिर का भी समर्थन किया। और पिछली बार साहेब को भी वोट दिया। बिहार चुनाव के दौरान लालटेन को बुझाने में भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और कई बार दलित बहुजन समर्थक लोगों से मार करते करते बचे। धर्म और नफरत की राजनीति करने वाली पार्टी के छात्र संगठन के नेताओं से भी दोस्ती बनाई और खुद के स्वर्ण होने का फायदा जहां मौका मिला उठाया।

मगर इन दिनों श्रीमान जी कोरोना से बीमार रहें। वैचारिक मतभेद होने के बावजूद भी हमने और दीगर दोस्तों ने उनकी हाल पुरसी की। सब ने उनकी मदद की। एक दोस्त ने खाना भी उनके पास पहुंचाया। खुशी की बात है कि अब वह कोरोना नेगेटिव हो गए हैं और तकरीबन सेहतमंद हो गए हैं।

कल रात ही उन्होंने फोन करके शुक्रिया अदा करना चाहा। मैंने कहा शुक्रिया किस बात की। मैंने तो कुछ किया भी नहीं आपके लिए। "नहीं भैया आपलोगों ने बहुत कुछ किया। मेरा हौसला बढ़ाया। पिछले अठारह दिन में कभी भी ऐसा नहीं लगा कि मैं अकेला हूं...।"

मैंने कहा, "ठीक है भाई। अपना ख्याल रखिए। अभी रूम में ही रहिए। आराम कीजिए। और अच्छा खाना खाइए।"

उनका जवाब था कि "मैं आराम ही कर रहा हूं। मगर कोरोना बड़ा खतरनाक है। लोगों को इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। यह कोई मामूली बुखार नहीं है। यह शरीर को तोड़ देता है।"

इतना कहने के बाद वह और भी कुछ बोल दिए, जिसकी मैं उम्मीद नहीं कर रहा था। शायद इसकी वजह उनकी "सफरिंग" है। शायद आज उनके दिल और दिमाग से कोरोना वायरस के साथ साथ धर्म और नफरत की राजनीति का वायरस भी निकल पड़ा है।

वह बोलते रहें " भैया, कसम खा कर कह रहा हूं जो गलती मैंने पिछली बार की थी अब नहीं करूंगा। जिनको वोट दिया था, वह मुझे मरने के लिए छोड़ दिए थे। न कोई बेड है, न कोई अस्पताल। सत्ता में बैठे लोगों को गरीब की जान से कोई हमदर्दी नहीं। मंदिर बन रहा है। क्या मंदिर की कमी है इस देश मे? मुसलमानों के खिलाफ बुरा भला कहा जाता है। मेरा एक मुस्लिम दोस्त ने इस संकट में मेरे लिए फल भेजा। मुस्लिम और सिख भाइयों ने बहुत मदद की है। मैने बहुत बड़ी गलती की है जो हिंदू धर्म के ठेकेदारों को वोट दे दिया। अब कभी नहीं दूंगा। मुझे आज एहसास हो गया हिंदू धर्म और देश को किस से खतरा है...।"

इस तरफ मोबाइल फोन को पकड़े, मैं इन सारी बातें सुन रहा था.....।

ुमार
जेएनयू
अप्रैल 29, 2021

समय बड़ा ही कठिन होता जा रहा है अब कुछ पैसे बचाना बहुत मुश्किल हो गया है।  सड़क पर बैठे कुछ लोगों से चीजें खरीदें, भले ही...
04/28/2021

समय बड़ा ही कठिन होता जा रहा है अब कुछ पैसे बचाना बहुत मुश्किल हो गया है। सड़क पर बैठे कुछ लोगों से चीजें खरीदें, भले ही आपको ज़रूरत न हो। आपके छोटे-छोटे प्रयास परिवार के चेहरे पर मुस्कान ला देंगे। ऐसे लोगों से कुछ चीजें जरूर खरीदें और उपद्रव किए बिना उन्हें सम्मान के साथ जीने दें।
आप सभी से यही मेरा अनुरोध है🙏

04/28/2021

दो गज दूरी मास्क है ज़रूरी!
इस वायरस से सुरक्षित रहने के लिए मास्क पहनना जरूरी है, बिना मतलब घर से न निकलें बहुत ज़रूरी समय पर ही घर से निकलें।
यह कठीन समय ज़रूर है हमारे लिए लेकिन ये दिन भी गुज़र जाएगा बस हमे थोड़ी सावधानी बरतनी होगी।

अगर आप भी साठी प्रखंड अंदोलन मंच पर अपना मास्क वाला फोटो डलाना चाहते हैं तो मास्क पहनकर फ़ोटो लें और दिए गए वॉट्सएप नंबर पर भेजें।
Mob:- 9773689665

#साठी
District Administration, West Champaran, Bettiah

04/27/2021

ज्ञान एक ऐसी तत्व है जो किसी भी काल किसी भी समय किसी भी वक्त में आपकी काम आ सकती है इसलिए आप ज्ञान किसी बुजुर्ग या अपने माता पिता अपने गुरु अपने सीनियर या अपने बड़े भाई बहनों से प्राप्त कर सकते हैं और उस ज्ञान को अपने आने अपने भविष्य में उपयोग कर सकते हैं ...


#ज्ञान_की_बात

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