Bhartiya Jain Samaj

  • Home
  • Bhartiya Jain Samaj

Bhartiya Jain Samaj page for social reform thinker. Highlighting issues faced by our community.

If any of my article or quote inspire you, please forward in your groups for social awareness and empowerment of jain community.

04/06/2026

*जैन समाज की सबसे बड़ी चुनौती: विश्वास का संकट*
जब भी जैन समाज की एकता की बात होती है, तो चर्चा संप्रदायों, संस्थाओं, नेताओं और संसाधनों पर आकर रुक जाती है। लेकिन शायद हम उस मूल कारण को नजरअंदाज कर देते हैं, जो हमें बार-बार बिखेर देता है—आपसी विश्वास की कमी।

आज समाज में धन की कमी नहीं है, प्रतिभाओं की कमी नहीं है, संस्थाओं और साधु-साध्वियों की भी कमी नहीं है। यदि किसी चीज की सबसे ज्यादा कमी है, तो वह है एक-दूसरे पर विश्वास।

दुर्भाग्य से यह विश्वास का संकट केवल व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहा। समाज के विभिन्न संप्रदायों, संस्थाओं, नेताओं और साधु भगवंतों के बीच भी अविश्वास की दीवारें खड़ी होती दिखाई देती हैं। प्रभाव, संसाधनों और नेतृत्व पर पकड़ बनाए रखने की स्वाभाविक इच्छा कई बार सहयोग के स्थान पर संदेह को जन्म देती है।

समय के साथ यह प्रवृत्ति इतनी गहरी हो गई कि हम एक समाज के बजाय अनेक छोटे-छोटे समूहों में बंटते चले गए। श्वेतांबर-दिगंबर, विभिन्न पंथ, गच्छ, ओसवाल-पोरवाल, गुजराती-मारवाड़ी और न जाने कितनी पहचानें हमारे बीच मौजूद हैं। इन पहचानों का अपना महत्व है, लेकिन जब ये पहचानें "जैन" पहचान से बड़ी हो जाती हैं, तब एकता का मार्ग कठिन हो जाता है।

आज स्थिति यह है कि कई बार एक संस्था दूसरी संस्था पर, एक समूह दूसरे समूह पर और यहां तक कि एक गली में रहने वाला व्यक्ति दूसरी गली में रहने वाले व्यक्ति पर भी सहज विश्वास नहीं कर पाता।

ऐसे समय में कुछ प्रयास आशा भी जगाते हैं। जीतो ने पिछले वर्षों में व्यापार, शिक्षा, खेलकूद, नवकार मंत्र दिवस और विभिन्न सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से बिना किसी संप्रदायगत भेदभाव के जैनों को जोड़ने का सराहनीय प्रयास किया है। यह एक महत्वपूर्ण उदाहरण है कि जब साझा उद्देश्य सामने रखा जाता है, तो श्वेतांबर-दिगंबर, गुजराती-मारवाड़ी और विभिन्न पंथों के लोग भी एक मंच पर आ सकते हैं।

हालांकि जीतो की अपनी एक संरचना और कार्यक्षेत्र है, इसलिए वह संपूर्ण जैन समाज का प्रतिनिधि मंच नहीं बन पाया है। लेकिन उसने यह अवश्य सिद्ध किया है कि यदि नीयत समावेशी हो और उद्देश्य साझा हो, तो जैन समाज को जोड़ना असंभव नहीं है।

यहीं से एक गहरा प्रश्न जन्म लेता है—

*जब हम व्यापार के लिए एक हो सकते हैं, खेलकूद के लिए एक हो सकते हैं, नवकार मंत्र के लिए एक हो सकते हैं, तो केवल "जैन" के नाम पर एक क्यों नहीं हो सकते?*

समस्या यह भी है कि इतिहास में समाज अक्सर बड़े संकटों के समय एकजुट हुआ है। लेकिन आज जो चुनौतियां हमारे सामने हैं, वे धीरे-धीरे बढ़ रही हैं। इसलिए अधिकांश लोग सोचते हैं—"इससे मेरा क्या लेना-देना?"

*यही सोच भविष्य का सबसे बड़ा खतरा बन सकती है।*

जब जनसंख्या घटती है, तो वह किसी एक पंथ की नहीं घटती; पूरे जैन समाज की घटती है। जब युवा समाज से दूर होते हैं, तो उसका प्रभाव सभी पर पड़ता है। जब समाज की सामूहिक शक्ति कमजोर होती है, तो उसका नुकसान भी सबको होता है।

*शायद हमें किसी बड़े संकट का इंतजार नहीं करना चाहिए।*

शायद हमें इस बात पर चर्चा कम करनी चाहिए कि हम श्वेतांबर हैं या दिगंबर, किस पंथ से हैं, किस जाति या क्षेत्र से हैं; और इस बात पर अधिक चर्चा करनी चाहिए कि हम केवल जैन होकर एक मंच पर कैसे आ सकते हैं।

मतभेद रहें, विचार अलग हों, परंपराएं भिन्न हों—यह स्वाभाविक है। एकता का अर्थ एकरूपता नहीं होता। लेकिन समाजहित सर्वोपरि रहे, यह भावना अवश्य होनी चाहिए।

क्योंकि समाज को तोड़ने के लिए संसाधनों की कमी नहीं, केवल अविश्वास ही काफी है।

और समाज को जोड़ने के लिए किसी चमत्कार की आवश्यकता नहीं, केवल विश्वास पर्याप्त है।

प्रश्न यह नहीं है कि जैन समाज कब एक होगा।

प्रश्न यह है कि क्या हम अपनी सभी उप-पहचानें बनाए रखते हुए भी स्वयं को सबसे पहले और सबसे ऊपर "जैन" मानने का साहस कर पाएंगे?

शायद जैन समाज की एकता का उत्तर किसी एक संगठन, किसी एक नेता या किसी एक संप्रदाय के पास नहीं है।

शायद उसका उत्तर विश्वास, संवाद और "मैं पहले जैन हूँ" की सामूहिक चेतना में छिपा है।

आपके विचार में जैन समाज की एकता का सबसे बड़ा आधार क्या हो सकता है?

03/06/2026

*हमारा जैन समाज हो एक संयुक्त परिवार*
*आज एक प्रश्न हर जैन के मन में उठना चाहिए—
क्या हम वास्तव में एक समाज हैं, या केवल एक ही धर्म के हजारों अलग-अलग परिवार?*

हम मंदिरों में मिलते हैं, समारोहों में मिलते हैं, सोशल मीडिया पर जुड़े हुए दिखाई देते हैं, लेकिन क्या हम वास्तव में एक-दूसरे के जीवन से जुड़े हुए हैं?

हमारे पूर्वजों ने हमें एक अद्भुत शब्द दिया है—"साधर्मिक"।

यह केवल संबोधन नहीं, बल्कि एक संपूर्ण सामाजिक दर्शन है।

साधर्मिक अर्थात वह, जो मेरे धर्म, संस्कार, मूल्यों और जीवन-दृष्टि का सहभागी है। यदि गहराई से देखें, तो "साधर्मिक" शब्द में ही संयुक्त परिवार का पूरा मर्म छिपा हुआ है।

संयुक्त परिवार की सबसे बड़ी शक्ति यह नहीं कि लोग एक ही घर में रहते हैं, बल्कि यह है कि कोई भी व्यक्ति जीवन की लड़ाई अकेले नहीं लड़ता।

साधर्मिकता का अर्थ भी यही है।

यदि किसी परिवार का बच्चा आर्थिक अभाव के कारण पढ़ाई छोड़ने को मजबूर हो जाए, तो पूरा परिवार चिंतित हो जाता है।

यदि कोई सदस्य बीमार पड़ जाए, तो सब उसके साथ खड़े हो जाते हैं।

यदि कोई सफलता प्राप्त करे, तो पूरा परिवार गर्व महसूस करता है।

फिर प्रश्न यह है कि क्या हमारे समाज में भी यही भावना जीवित है?

क्या किसी साधर्मिक विद्यार्थी का अधूरा सपना हमें बेचैन करता है?

क्या किसी साधर्मिक परिवार का संकट हमें अपनी जिम्मेदारी लगता है?

क्या किसी साधर्मिक युवा की सफलता हमें उतनी ही खुशी देती है जितनी अपने पुत्र की सफलता?

यदि नहीं, तो हमें "साधर्मिक" शब्द का अर्थ पुनः समझने की आवश्यकता है।

आज जैन समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती धन की नहीं, बल्कि जुड़ाव की है।

हम संख्या में छोटे हैं, लेकिन इतिहास गवाह है कि किसी समाज की शक्ति उसकी जनसंख्या से नहीं, उसकी एकता, शिक्षा, संगठन और पारस्परिक सहयोग से मापी जाती है।

दुनिया में यहूदी समाज इसका सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। संख्या में सीमित होने के बावजूद उन्होंने शिक्षा, उद्यमिता, सामाजिक सहयोग और सामुदायिक एकजुटता के बल पर विश्वभर में असाधारण प्रभाव स्थापित किया।

उनकी सबसे बड़ी ताकत उनकी संख्या नहीं, बल्कि यह भावना है कि "हम एक-दूसरे के लिए उत्तरदायी हैं।"

जैन समाज के पास भी वही क्षमता है।

हमारे पास अहिंसा का दर्शन है।

हमारे पास शिक्षा की परंपरा है।

हमारे पास उद्यमिता की अद्भुत क्षमता है।

हमारे पास सेवा और दान की गौरवशाली संस्कृति है।

लेकिन इन सबको जोड़ने वाला सूत्र केवल एक है—साधर्मिकता।

दुर्भाग्य से आधुनिक जीवनशैली ने हमें पहले संयुक्त परिवारों से दूर किया और फिर धीरे-धीरे समाज से भी दूर कर दिया।

आज हजारों डिजिटल संपर्क हैं, लेकिन संकट के समय साथ खड़े होने वाले लोग कम होते जा रहे हैं।

शादी-ब्याह और सामाजिक कार्यक्रमों में भीड़ दिखाई देती है, लेकिन आत्मीयता अक्सर दिखाई नहीं देती।

इसलिए आज आवश्यकता केवल समाज चलाने की नहीं, बल्कि समाज को संयुक्त परिवार की भावना से जोड़ने की है।

ऐसा परिवार जहाँ—

किसी विद्यार्थी का सपना पूरे समाज का सपना बने।

किसी युवा का संघर्ष पूरे समाज का संघर्ष बने।

किसी परिवार का दुःख पूरे समाज का दुःख बने।

किसी की सफलता पूरे समाज का उत्सव बने।

हमें अधिक भवनों से पहले अधिक विश्वास खड़े करने होंगे।

अधिक आयोजनों से पहले अधिक आत्मीयता जगानी होगी।

अधिक घोषणाओं से पहले अधिक संबंध बनाने होंगे।

क्योंकि समाज की सबसे बड़ी संपत्ति उसकी इमारतें नहीं, उसके लोगों के बीच का विश्वास होता है।

कल्पना कीजिए—

यदि पूरा जैन समाज वास्तव में साधर्मिक भावना को जीना शुरू कर दे...

तो कोई प्रतिभाशाली विद्यार्थी आर्थिक अभाव के कारण नहीं रुकेगा।

कोई युवा मार्गदर्शन के अभाव में नहीं भटकेगा।

कोई परिवार संकट में स्वयं को अकेला महसूस नहीं करेगा।

और शायद तब हमें अपनी घटती संख्या को लेकर भी उतनी चिंता नहीं करनी पड़ेगी।

क्योंकि जो समाज अपने लोगों को जोड़ लेता है, वह संख्या से नहीं, संस्कृति से बड़ा बनता है।

अंततः प्रश्न यह नहीं है कि जैन समाज कितना बड़ा है।

प्रश्न यह है कि क्या हम "साधर्मिक" शब्द को केवल बोलते हैं या उसे जीते भी हैं?

जिस दिन प्रत्येक जैन यह महसूस करने लगेगा कि "समाज का हर साधर्मिक मेरा अपना है", उसी दिन पूरा जैन समाज एक विशाल संयुक्त परिवार बन जाएगा।

और उस दिन दुनिया जैन समाज को केवल एक धार्मिक समुदाय के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे संगठित, शिक्षित, संस्कारित और आत्मनिर्भर समाज के रूप में देखेगी, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि—

"छोटी संख्या कोई कमजोरी नहीं होती, यदि दिल और रिश्ते बड़े हों।"

क्योंकि अंत में समाज वही महान बनता है, जहाँ रक्त से नहीं, संस्कारों से रिश्ते बनते हैं; और जहाँ कोई भी साधर्मिक जीवन की लड़ाई अकेले नहीं लड़ता। 🙏
- मानकचंद राठौड़

*गुटखा खाकर अपवित्र वस्त्रों में गांव वालों का भगवान के गर्भ ग्रह में प्रवेश मन को व्यथित करने वाला स्मरण**✍🏻अनिल जैन लो...
02/06/2026

*गुटखा खाकर अपवित्र वस्त्रों में गांव वालों का भगवान के गर्भ ग्रह में प्रवेश मन को व्यथित करने वाला स्मरण*

*✍🏻अनिल जैन लोढ़ा*
*नाकोड़ा की पुकार समाचार पत्र इंदौर*

*सिरोही के पास मीरपुर में जैन समाज का नया जहाज मंदिर बनाया गया।*
वह मंदिर आसपास के गांव वालों के लिए एक पिकनिक स्पॉट बन गया है।
*सैकड़ो की तादाद में गांव वाले आते हैं रील बनाते हैं।*
परमात्मा के मंदिर में गर्भ ग्रह में प्रवेश करके भगवान की प्रतिमा को छू रहे हैं।
*भगवान की ऐसी असातना देख कर मन व्यथित हो जाता है।*
कोई देखने वाला नहीं है एक व्यक्ति बैठा रहता है।
जो गांव वालों को रोकने में अक्षम है।
*जब पास में ही 1300 वर्ष से भी अधिक प्राचीन 108 पार्श्वनाथ में सम्मिलित पार्श्वनाथ दादा का तीर्थ है, तो उसके पूर्व जहाज मंदिर तीर्थ बनाने का औचित्य क्या था।*
अपने नाम के लिए नित्य नए-नए तीर्थ का निर्माण एवं पुराने तीर्थों की असातना नई बात नहीं है।
*धिक्कार है ऐसे साधु संतों को जो अपने नाम के लिए नए-नए मंदिरों का निर्माण करवा रहे हैं।*
10 साल में बने कई नये तीर्थ गांव वालों की जागीर बन रहे हैं।
कर्मचारी गांव के, पुजारी को कुछ नहीं आता, भोजशाला में भोजन जिसे आप खा ही नहीं सकते, तीर्थ की देखरेख मेंटेनेंस नहीं, शायद दो नंबर का पैसा एक नंबर में करने का माध्यम बना लिया है तीर्थों को बाकी कोई मतलब नहीं।
*दानवीरों से विनम्र निवेदन ऐसी जगह पैसे लगाने का कोई मतलब नहीं कोई, पुण्य नहीं बल्कि पाप के भागी बनने का मार्ग प्रशस्त हो रहा है।*

*पैसा आपका-फैसला आपका*

Forwarded as received

02/06/2026

*जैन युवा: 20 से 25 की उम्र में ठान ली ये 6 बातें, तो सफलता पीछे नहीं हटेगी*
जैन समाज में संस्कार, अनुशासन और संकल्प की समृद्ध परंपरा रही है। जीवन की 20 से 25 वर्ष की आयु वह समय है, जब व्यक्ति अपने भविष्य की नींव रखता है। इस उम्र में लिए गए सही निर्णय अक्सर 40-50 वर्ष की सफलता का आधार बनते हैं। यदि युवा कुछ मूलभूत बातों को अपना लें, तो सफलता की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।

*1. कार्य-अनुभव अवश्य प्राप्त करें*

यदि संभव हो तो व्यवसाय शुरू करने या पारिवारिक व्यवसाय में पूर्णकालिक जुड़ने से पहले कुछ समय नौकरी या बाहरी कार्य-अनुभव अवश्य लें। यह अनुभव आपको वास्तविक दुनिया, टीम वर्क, समय प्रबंधन, ग्राहकों की अपेक्षाओं और जिम्मेदारी की समझ देता है। अनुभव से सीखा गया ज्ञान पुस्तकों से नहीं मिलता।

*2. किसी भी आइडिया पर गहराई से रिसर्च करें*

उत्साह में शुरू किया गया व्यवसाय या प्रोजेक्ट अक्सर कठिनाइयों का सामना करता है। जिस क्षेत्र में काम करना चाहते हैं, उस पर कम से कम 3 से 6 महीने पर्याप्त अध्ययन करें, बाजार को समझें, सफल और असफल उदाहरणों का विश्लेषण करें। तैयारी जितनी मजबूत होगी, सफलता की संभावना उतनी अधिक होगी।

*3. बेसिक अकाउंटिंग और वित्तीय साक्षरता सीखें*

चाहे नौकरी हो या व्यवसाय, पैसे की समझ अनिवार्य है। प्रॉफिट-लॉस, बैलेंस शीट, कैश फ्लो, टैक्स और निवेश की मूलभूत जानकारी हर युवा को होनी चाहिए। जो व्यक्ति धन का प्रबंधन सीख लेता है, वह भविष्य की कई समस्याओं से बच सकता है।

*4. आर्थिक व्यवहार में पूर्ण ईमानदारी रखें*

जैन दर्शन सत्य और नैतिकता पर आधारित है। टैक्स की चोरी, झूठे बिल, अनैतिक कमीशन और काले धन से दूर रहें। अल्पकाल में बेईमानी लाभदायक दिखाई दे सकती है, लेकिन दीर्घकाल में विश्वास और प्रतिष्ठा ही सबसे बड़ी पूंजी बनती है।

*5. किसी एक कौशल में विशेषज्ञता विकसित करें*

डिग्री अवसर दिला सकती है, लेकिन विशेषज्ञता पहचान दिलाती है। चाहे तकनीक, वित्त, मार्केटिंग, संचार, प्रबंधन या कोई अन्य क्षेत्र हो, किसी एक कौशल में इतना दक्ष बनिए कि लोग आपको उसी कारण याद रखें। सामान्य ज्ञान उपयोगी है, लेकिन विशेषज्ञता असाधारण अवसरों के द्वार खोलती है।

*6. अच्छी संगति और मार्गदर्शक चुनें*

20-25 वर्ष की आयु में मित्र और मार्गदर्शक आपके भविष्य की दिशा निर्धारित करते हैं। सकारात्मक, मेहनती, ईमानदार और लक्ष्य केंद्रित लोगों के साथ समय बिताइए। संगति का प्रभाव धीरे-धीरे आपके विचारों, आदतों और जीवन के परिणामों में दिखाई देता है।

*संदेश*

ये छह सूत्र केवल जैन युवाओं के लिए नहीं, बल्कि हर महत्वाकांक्षी युवा के लिए उपयोगी हैं। इस उम्र में कमाई से अधिक सीखने, दिखावे से अधिक कौशल और शॉर्टकट से अधिक चरित्र पर ध्यान दीजिए।

*20 से 25 वर्ष की आयु में लिए गए सही निर्णय अक्सर पूरे जीवन की सफलता की नींव बनते हैं।*

— मानकचंद राठौड़

01/06/2026

भावी पीढ़ी के लिए वित्तीय साक्षरता: स्टॉक मार्केट और जीवन की शिक्षा
बच्चों को शेयर बाजार को अपना मुख्य करियर बनाने की सलाह नहीं दी जानी चाहिए। इसे उनके भविष्य के किसी भी व्यवसाय, नौकरी या पेशे के लिए एक "वेल्थ क्रिएशन मॉड्यूल" के रूप में समझना चाहिए।
जब बच्चे छोटी उम्र में ही शेयर बाजार की वास्तविकताओं, जोखिमों और मनोविज्ञान को समझ लेते हैं, तो वे इसे जुए या लॉटरी की तरह नहीं देखते। वे समझते हैं कि शेयर खरीदना किसी स्क्रीन पर दिख रहे नंबर को नहीं, बल्कि एक वास्तविक व्यवसाय में हिस्सेदारी खरीदना है।

बाजार की 8 महत्वपूर्ण सीख

1. बाजार हमेशा लॉजिक से नहीं चलता

कई बार अच्छी कंपनियाँ भी गिरती हैं और कमजोर कंपनियाँ भी तेजी दिखाती हैं। बाजार केवल आंकड़ों से नहीं, बल्कि डर, लालच और उम्मीद जैसी मानवीय भावनाओं से भी चलता है।

2. भीड़ हमेशा सही नहीं होती

बड़े निवेशकों और संस्थागत खिलाड़ियों का प्रभाव बाजार में रहता है। जो लोग बिना सोचे-समझे भीड़ का अनुसरण करते हैं, वे अक्सर नुकसान उठाते हैं। स्वतंत्र सोच विकसित करना जरूरी है।

3. हर खबर निवेश का अवसर नहीं होती

मीडिया का शोर और वास्तविकता अलग-अलग हो सकते हैं। सफल निवेशक सुर्खियों से अधिक तथ्यों और व्यवसाय की गुणवत्ता पर ध्यान देते हैं।

4. लेवरेज का लालच विनाशकारी हो सकता है

कम समय में बड़ा लाभ कमाने की चाहत अक्सर बड़े नुकसान का कारण बनती है। वित्तीय दुनिया में शॉर्टकट बहुत महंगे पड़ते हैं।

5. असली युद्ध अपने मन से होता है

बाजार में सबसे बड़ी लड़ाई किसी चार्ट से नहीं, बल्कि अपने डर, लालच और अधैर्य से होती है। जो स्वयं पर नियंत्रण रखता है, वही लंबे समय में सफल होता है।

6. धन धैर्य से बनता है, जल्दबाजी से नहीं

दुनिया के अधिकांश सफल निवेशकों ने संपत्ति सट्टेबाजी से नहीं, बल्कि अनुशासन, धैर्य और चक्रवृद्धि (Compounding) की शक्ति से बनाई है।

7. वित्तीय शिक्षा केवल शेयर बाजार नहीं है

बचत, बजट, आपातकालीन निधि, बीमा, कर व्यवस्था और विभिन्न एसेट क्लास की समझ भी उतनी ही आवश्यक है। शेयर बाजार वित्तीय साक्षरता का केवल एक हिस्सा है।

8. धन के साथ नैतिकता भी जरूरी है

धन कमाना महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे अधिक महत्वपूर्ण है उसे सही और जिम्मेदार तरीके से कमाना और उपयोग करना। आर्थिक सफलता तभी सार्थक है जब वह व्यक्ति, परिवार और समाज तीनों के लिए उपयोगी बने।

इस प्रशिक्षण का वास्तविक उद्देश्य

इसका उद्देश्य बच्चों को ट्रेडर बनाना नहीं, बल्कि उन्हें यह सिखाना है कि:

✔ पूंजी का सही प्रबंधन कैसे किया जाता है।

✔ जोखिम और प्रतिफल का संतुलन कैसे बनाया जाता है।

✔ मेहनत से कमाए गए धन को लंबे समय में कैसे बढ़ाया जाता है।

✔ सोशल मीडिया पर दिखाई जाने वाली "रातों-रात अमीर बनने" की कहानियों और सट्टाखोरी से कैसे बचा जाता है।

✔ भविष्य में अपने व्यवसाय, नौकरी या प्रोफेशन से अर्जित पूंजी को एक वेल्थ क्रिएशन मॉड्यूल के माध्यम से कैसे विकसित किया जाता है।

बच्चों को क्या सिखाएं?

• व्यवसाय और ब्रांड्स को समझना।

• चक्रवृद्धि की शक्ति को जानना।

• पहले पेपर ट्रेडिंग और अध्ययन करना।

• धन के प्रति जिम्मेदार और नैतिक दृष्टिकोण विकसित करना।

निष्कर्ष

हम बच्चों को गणित, विज्ञान और तकनीक सिखाते हैं, लेकिन धन, जोखिम और आर्थिक निर्णयों की शिक्षा अक्सर नहीं देते। परिणामस्वरूप वे पेशेवर रूप से सफल होने के बावजूद वित्तीय रूप से कमजोर रह जाते हैं।

यदि अगली पीढ़ी को वित्तीय साक्षरता, जोखिम प्रबंधन, निवेश का विज्ञान और धन के प्रति जिम्मेदार सोच सिखाई जाए, तो वे केवल अच्छे निवेशक ही नहीं, बल्कि बेहतर नागरिक, बेहतर उद्यमी और बेहतर निर्णयकर्ता भी बन सकते हैं।

वित्तीय शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को शेयर बाजार का खिलाड़ी बनाना नहीं, बल्कि जीवन का समझदार खिलाड़ी बनाना है।

— मानकचंद राठौड़

अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख केवल शैक्षिक एवं जागरूकता उद्देश्यों के लिए लिखा गया है। इसका उद्देश्य बच्चों और अभिभावकों में वित्तीय साक्षरता, जोखिम प्रबंधन और दीर्घकालिक निवेश की समझ विकसित करना है, न कि किसी प्रकार की निवेश सलाह देना। शेयर बाजार में निवेश जोखिमों के अधीन है; इसलिए किसी भी निवेश निर्णय से पहले स्वयं अध्ययन करें और आवश्यक होने पर सेबी (SEBI) पंजीकृत वित्तीय सलाहकार से परामर्श लें।

*तुम पहाड़ नहीं बना सकते – अरावली की चीख*पहले अरावली की पहाड़ियाँ थीं – हरी, भरी, घनी।फिर महल चाहिए थे राजाओं को। लकड़ी ...
30/05/2026

*तुम पहाड़ नहीं बना सकते – अरावली की चीख*
पहले अरावली की पहाड़ियाँ थीं – हरी, भरी, घनी।

फिर महल चाहिए थे राजाओं को। लकड़ी चाहिए थी। पहाड़ियाँ नंगी कर दी गईं। वृक्ष गिरे, जड़ें उखड़ीं।

परिणाम? राजस्थान का बड़ा हिस्सा बूंद-बूंद पानी को तरसने लगा। आसमान से बरसात आँखें फाड़े देखती रही, धरती फटी रही।

यह था एक सबक – लेकिन इंसान को सबक याद नहीं रहता।

*आज वही अरावली, वही नंगी पहाड़ियाँ, अब मार्बल और ग्रेनाइट की भूख से कुचली जा रही हैं।*

खनन की अनुमति दे दी गई। पहाड़ियों के टुकड़े-टुकड़े हो रहे हैं। खदानों में चट्टानों का कत्ल हो रहा है। जहाँ कभी जंगल था, वहाँ अब डंपर दौड़ते हैं। जहाँ कभी झरने फूटते थे, वहाँ अब सूखी चीखें हैं।

तुम कहते हो – "पेड़ तो नए लगा दूँगा।"

पर सवाल वही है – पहाड़ बना सकते हो क्या?

*नहीं।*

तुम मिट्टी का ढेर रख दोगे, उसे पर्वत कहोगे। पर वह न तो बादल को बुलाएगा, न नदी को जन्म देगा।

और सबसे भयानक बात – यह नतीजा तुम्हें नहीं, तुम्हारी आने वाली पीढ़ी भुगतेगी।

प्रकृति चुप है अभी। पर उसकी लीला अंधाधुंध नहीं होती। वह समय आने पर अपना परचम लहराती है – सूखे के रूप में, बाढ़ के रूप में, उजड़ते गाँवों के रूप में। जब बूँद के लिए तरसते लोग पूछेंगे – "हमारे बापों ने क्या सोचा था?" तब कोई जवाब नहीं होगा।

जो पहाड़ तोड़ता है, वह अपने पोते की प्यास तोड़ता है।
जो नंगी पहाड़ी से ग्रेनाइट निकालता है, वह अपने बच्चे की हवा में ज़हर घोलता है।

एक बार पूछ लो – क्या नया पहाड़ बना सकते हो?

जवाब नहीं। सिर्फ खामोशी। और उस खामोशी में अरावली के हर टूटे हुए पत्थर से चीख निकलेगी।

*पेड़ लगाओ – जरूर लगाओ। लेकिन पहाड़ मत मारो। क्योंकि मरा हुआ पहाड़ फिर नहीं आता। और उसकी मौत का खामियाजा तुम्हारा ही खून भुगतेगा।*
- मानकचंद राठौड़

27/05/2026

देश चमक रहा है लेकिन...
500 रुपये की पेंशन के लिए
एक बहू ने अपनी 90 साल की सास को पीठ पर उठाकर
9 किलोमीटर पैदल सफर किया…
जैन समाज भी चमक रहा है लेकिन...
इस गलतफहमी में मत रहिए
कि यहां गरीबी का दर्द नहीं है...

25/05/2026

मेरा सदा यह प्रयास रहता है कि मेरे शब्द आपके हृदय को छुए।
- मानकचंद राठौड़

25/05/2026

*रुपए की गिरती कीमत — आपकी जमा पूंजी की वैल्यू घटा रही है?*
1947 में 1 डॉलर = ₹3.30 था। आज वही डॉलर ₹95 से ऊपर है।
यह सिर्फ एक संख्या नहीं — यह आपकी बचत, आपके सपनों और आपके भविष्य पर सीधा असर डालने वाला सच है।

1. रुपए की ऐतिहासिक यात्रा — संख्याओं की कहानी
स्वतंत्रता के बाद दशकों की आर्थिक नीतियों, युद्धों, वैश्विक संकटों, घरेलू चुनौतियों और राजनीतिक फेल्योर के कारण रुपया लगातार कमज़ोर होता गया।

डॉलर बनाम रुपया — ऐतिहासिक दर:
1947 → ₹3.30
1966 → ₹7.50
1985 → ₹12.38
1991 → ₹17.90
2000 → ₹44.31
2013 → ₹63.75
2026 → ₹95+

📉 व्यापार घाटा: भारत जितना निर्यात करता है उससे कहीं ज्यादा आयात करता है। इस असंतुलन से डॉलर की माँग हमेशा बनी रहती है जो रुपए पर दबाव डालती है।

चीन भी हमारी तरह आयातित तेल पर निर्भर था लेकिन चीन की करेंसी की कीमत सिर्फ 3 गुना घटी और भारत की करेंसी उसी समय के दौरान 30 गुना घट गई। अगर हम महाशक्ति बनने का सपना देख रहे हैं तो हमारी आर्थिक स्थिति चीन के मुकाबले होनी चाहिए ना कि पाकिस्तान।

हमें श्री नरेंद्र मोदी से उम्मीद थी जब वो विपक्ष में थे कि अब रुपए की कीमत को नहीं घटने दिया जाएगा। आम आदमी की यह उम्मीद भी अब खत्म हो गई है।

आम आदमी की जेब पर सीधी मार
रुपए की गिरावट सिर्फ अखबारों की सुर्खी नहीं — यह सीधे आपके घर की थाली, आपके बच्चों की पढ़ाई और आपकी EMI तक पहुँचती है।

🛒 रोज़मर्रा का सामान महंगा: पेट्रोल, खाद्य तेल, दाल, इलेक्ट्रॉनिक्स — इन सब में आयातित कच्चे माल का हिस्सा है। रुपया कमज़ोर होते ही इनकी कीमतें बढ़ने लगती हैं।
🏠 लोन और EMI महंगे: महंगाई बढ़ने पर RBI ब्याज दरें ऊँची रखता है। इससे होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की EMI सीधे बढ़ जाती है।
🎓 विदेश शिक्षा दुर्लभ: जिनके बच्चे विदेश में पढ़ाई करते हैं, उनके लिए फीस और रहने का खर्च रातोंरात बढ़ जाता है।
💊 दवाइयाँ और स्वास्थ्य: कई दवाओं में आयातित रासायनिक तत्व होते हैं। रुपए की गिरावट से दवाओं की कीमतें भी बढ़ सकती हैं जो गरीब परिवारों पर भारी पड़ती है।
✈️ विदेश यात्रा महंगी: विमान का ईंधन, होटल बुकिंग, विदेशी खर्च — सब डॉलर में होते हैं। कमज़ोर रुपए से विदेश घूमना आम परिवारों की पहुँच से बाहर हो जाता है।

बैंक में पैसा सुरक्षित ज़रूर है, लेकिन अगर FD की ब्याज दर महंगाई से कम है तो आपकी क्रय शक्ति घट रही है। केवल नाम के लिए पैसा बढ़ता दिखता है। क्रयशक्ति के हिसाब से वास्तव में वो घट रहा हैं।

भ्रम: "यह केवल बड़े लोगों का मामला है, मुझे क्या फर्क।"
गरीब और मध्यमवर्ग को सबसे पहले असर पड़ता है — क्योंकि उनकी आय निश्चित है लेकिन पेट्रोल, सब्ज़ी, दवाएँ सब महंगी हो जाती हैं।

रुपए की गिरावट एक जटिल आर्थिक समस्या है, लेकिन इसका असर हर उस घर में होता है जहाँ मेहनत की कमाई बचाई जाती है। जब हम समझेंगे कि हमारी बचत पर कौन से आर्थिक बल दबाव डाल रहे हैं — तभी हम बेहतर निर्णय ले सकेंगे, सरकार से जवाब माँग सकेंगे, और अपने भविष्य की सुरक्षा कर सकेंगे।

हम सरकार से साफ़ माँग करते हैं:

· निर्यात बढ़ाने की वास्तविक नीतियाँ बनाई जाएँ, सिर्फ घोषणाएँ नहीं — ताकि डॉलर की कमी न हो।
· अनावश्यक आयात पर नियंत्रण किया जाए, खासकर उन वस्तुओं पर जिनका घरेलू विकल्प बनाया जा सकता है।
· विदेशी निवेश के लिए भरोसेमंद माहौल बनाया जाए — पॉलिसी में आज-कल का बदलाव बंद हो।
· कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएँ (रिन्यूएबल एनर्जी, ईवी, रिफाइनरी विस्तार)।
· RBI को निर्देश दिया जाए कि वह विदेशी मुद्रा भंडार का बेहतर उपयोग कर रुपए की अस्थिरता रोके — न कि केवल महंगाई पर फोकस करे।

तब तक हर आम नागरिक की जमा पूंजी चुपचाप पिघलती रहेगी, और सरकार के आँकड़ों की चमक-दमक के पीछे एक पूरा देश गरीब होता रहेगा।

अब सिर्फ चिंता नहीं, माँग करने का समय है।
- मानकचंद राठौड़

24/05/2026

*जैन समाज: अस्तित्व का संकट या मौन आत्मसमर्पण?*
जैन समाज आज एक खतरनाक जनसांख्यिकीय संकट (Demographic Crisis) की ओर बढ़ रहा है।
*आँकड़े चीख रहे हैं:*
जैन समुदाय की प्रजनन दर (TFR) मात्र *1.6* (पीयू रिसर्च के अनुसार कुछ समय पहले यह 1.2 तक गिर चुकी थी) है, जबकि समाज को बचाए रखने के लिए न्यूनतम *2.1* अनिवार्य है। यह दुनिया के किसी भी धार्मिक समुदाय में सबसे कम है।

⚠️ *इस मौन विनाश के 4 बड़े खतरे:*

1. *अस्तित्व का लोप:* हर दशक में हमारी आबादी का हिस्सा घट रहा है (0.45% से 0.36%)। अगर यही रफ्तार रही, तो आने वाली पीढ़ियों को 'जैन' शब्द सिर्फ किताबों में मिलेगा।

2. *विरासत का क्षरण:* हमारे भव्य मंदिर, तीर्थक्षेत्र और तीर्थंकरों की वाणी को सँभालने वाले और पौषध-सामायिक करने वाले हाथ ही नहीं बचेंगे।

3. *अकेला बुढ़ापा:* कम बच्चों का मतलब है—भविष्य में सूने घर, बढ़ते वृद्धाश्रम और संकट के समय अपनों का अभाव।

4. *राजनैतिक-सामाजिक उपेक्षा:* घटती संख्या का सीधा असर नीतियों में हमारी अनदेखी और घटते प्रतिनिधित्व के रूप में दिखेगा।

💔 *'संयम' का अर्थ आत्म-विलोपन नहीं है!*

हम शिक्षित हैं, पर्यावरण और संसाधनों की चिंता करते हैं—यह सराहनीय है। लेकिन परिवार नियोजन के नाम पर संख्या को शून्य की ओर ले जाना समझदारी नहीं है। असली अहिंसा अपने समाज के भविष्य को सुरक्षित रखना भी है।

🛑 *जागो! जनसंतुलन ही समाधान है*

* *संतुलन ही संयम है:* आज युवा दंपतियों को समझने की जरूरत है कि समाज के अस्तित्व के लिए *2 से 3 संतान* कोई पाप नहीं, बल्कि धर्म और संस्कृति को जीवित रखने का उत्तरदायित्व है।

* *गुणवत्ता के साथ संख्या:* जैन समाज की ताकत हमेशा संस्कारों (गुणवत्ता) में रही है, लेकिन अस्तित्व बचाए रखने के लिए न्यूनतम संख्या बल (Quantity) भी अनिवार्य है।

"यह आग्रह केवल संख्या बढ़ाने का नहीं, बल्कि संस्कारित और जिम्मेदार अगली पीढ़ी तैयार करने का है। अस्तित्व बनाए रखने के लिए न्यूनतम जनसंतुलन आवश्यक है।"
- *मानकचंद राठौड़*

*समय कम है: अगर आज नहीं चेते, तो कभी नहीं!* अपनी अगली पीढ़ी को एक सुरक्षित भविष्य और अस्तित्व दीजिए।

Address

Mumbai

Telephone

9820054078

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Bhartiya Jain Samaj posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Organization

Send a message to Bhartiya Jain Samaj:

  • Want your organization to be the top-listed Government Service?

Share