04/06/2026
*जैन समाज की सबसे बड़ी चुनौती: विश्वास का संकट*
जब भी जैन समाज की एकता की बात होती है, तो चर्चा संप्रदायों, संस्थाओं, नेताओं और संसाधनों पर आकर रुक जाती है। लेकिन शायद हम उस मूल कारण को नजरअंदाज कर देते हैं, जो हमें बार-बार बिखेर देता है—आपसी विश्वास की कमी।
आज समाज में धन की कमी नहीं है, प्रतिभाओं की कमी नहीं है, संस्थाओं और साधु-साध्वियों की भी कमी नहीं है। यदि किसी चीज की सबसे ज्यादा कमी है, तो वह है एक-दूसरे पर विश्वास।
दुर्भाग्य से यह विश्वास का संकट केवल व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहा। समाज के विभिन्न संप्रदायों, संस्थाओं, नेताओं और साधु भगवंतों के बीच भी अविश्वास की दीवारें खड़ी होती दिखाई देती हैं। प्रभाव, संसाधनों और नेतृत्व पर पकड़ बनाए रखने की स्वाभाविक इच्छा कई बार सहयोग के स्थान पर संदेह को जन्म देती है।
समय के साथ यह प्रवृत्ति इतनी गहरी हो गई कि हम एक समाज के बजाय अनेक छोटे-छोटे समूहों में बंटते चले गए। श्वेतांबर-दिगंबर, विभिन्न पंथ, गच्छ, ओसवाल-पोरवाल, गुजराती-मारवाड़ी और न जाने कितनी पहचानें हमारे बीच मौजूद हैं। इन पहचानों का अपना महत्व है, लेकिन जब ये पहचानें "जैन" पहचान से बड़ी हो जाती हैं, तब एकता का मार्ग कठिन हो जाता है।
आज स्थिति यह है कि कई बार एक संस्था दूसरी संस्था पर, एक समूह दूसरे समूह पर और यहां तक कि एक गली में रहने वाला व्यक्ति दूसरी गली में रहने वाले व्यक्ति पर भी सहज विश्वास नहीं कर पाता।
ऐसे समय में कुछ प्रयास आशा भी जगाते हैं। जीतो ने पिछले वर्षों में व्यापार, शिक्षा, खेलकूद, नवकार मंत्र दिवस और विभिन्न सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से बिना किसी संप्रदायगत भेदभाव के जैनों को जोड़ने का सराहनीय प्रयास किया है। यह एक महत्वपूर्ण उदाहरण है कि जब साझा उद्देश्य सामने रखा जाता है, तो श्वेतांबर-दिगंबर, गुजराती-मारवाड़ी और विभिन्न पंथों के लोग भी एक मंच पर आ सकते हैं।
हालांकि जीतो की अपनी एक संरचना और कार्यक्षेत्र है, इसलिए वह संपूर्ण जैन समाज का प्रतिनिधि मंच नहीं बन पाया है। लेकिन उसने यह अवश्य सिद्ध किया है कि यदि नीयत समावेशी हो और उद्देश्य साझा हो, तो जैन समाज को जोड़ना असंभव नहीं है।
यहीं से एक गहरा प्रश्न जन्म लेता है—
*जब हम व्यापार के लिए एक हो सकते हैं, खेलकूद के लिए एक हो सकते हैं, नवकार मंत्र के लिए एक हो सकते हैं, तो केवल "जैन" के नाम पर एक क्यों नहीं हो सकते?*
समस्या यह भी है कि इतिहास में समाज अक्सर बड़े संकटों के समय एकजुट हुआ है। लेकिन आज जो चुनौतियां हमारे सामने हैं, वे धीरे-धीरे बढ़ रही हैं। इसलिए अधिकांश लोग सोचते हैं—"इससे मेरा क्या लेना-देना?"
*यही सोच भविष्य का सबसे बड़ा खतरा बन सकती है।*
जब जनसंख्या घटती है, तो वह किसी एक पंथ की नहीं घटती; पूरे जैन समाज की घटती है। जब युवा समाज से दूर होते हैं, तो उसका प्रभाव सभी पर पड़ता है। जब समाज की सामूहिक शक्ति कमजोर होती है, तो उसका नुकसान भी सबको होता है।
*शायद हमें किसी बड़े संकट का इंतजार नहीं करना चाहिए।*
शायद हमें इस बात पर चर्चा कम करनी चाहिए कि हम श्वेतांबर हैं या दिगंबर, किस पंथ से हैं, किस जाति या क्षेत्र से हैं; और इस बात पर अधिक चर्चा करनी चाहिए कि हम केवल जैन होकर एक मंच पर कैसे आ सकते हैं।
मतभेद रहें, विचार अलग हों, परंपराएं भिन्न हों—यह स्वाभाविक है। एकता का अर्थ एकरूपता नहीं होता। लेकिन समाजहित सर्वोपरि रहे, यह भावना अवश्य होनी चाहिए।
क्योंकि समाज को तोड़ने के लिए संसाधनों की कमी नहीं, केवल अविश्वास ही काफी है।
और समाज को जोड़ने के लिए किसी चमत्कार की आवश्यकता नहीं, केवल विश्वास पर्याप्त है।
प्रश्न यह नहीं है कि जैन समाज कब एक होगा।
प्रश्न यह है कि क्या हम अपनी सभी उप-पहचानें बनाए रखते हुए भी स्वयं को सबसे पहले और सबसे ऊपर "जैन" मानने का साहस कर पाएंगे?
शायद जैन समाज की एकता का उत्तर किसी एक संगठन, किसी एक नेता या किसी एक संप्रदाय के पास नहीं है।
शायद उसका उत्तर विश्वास, संवाद और "मैं पहले जैन हूँ" की सामूहिक चेतना में छिपा है।
आपके विचार में जैन समाज की एकता का सबसे बड़ा आधार क्या हो सकता है?