15/09/2022
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी।
तुम्ह देखी सीता मृगनैनी॥।।🐦
🐦श्री रामजी का विलाप,🌲 सीताजी की खोज🐦
आश्रम देखि जानकी हीना।
भए बिकल जस प्राकृत दीना॥🚩
हा गुन खानि जानकी सीता।
रूप सील ब्रत नेम पुनीता॥🚩
लछिमन समुझाए बहु भाँति।
पूछत चले लता तरु पाँती॥🚩
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी।
तुम्ह देखी सीता मृगनैनी॥🚩
खंजन सुक कपोत मृग मीना।
मधुप निकर कोकिला प्रबीना॥🚩
एहि बिधि खोजत बिलपत स्वामी।
मनहुँ महा बिरही अति कामी॥🚩
पूरकनाम राम सुख रासी।
मनुजचरित कर अज अबिनासी॥🚩
अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ।
गोदावरि तट आश्रम जहवाँ॥
आश्रम देखि जानकी हीना।
भए बिकल जस प्राकृत दीना॥🚩
भावार्थ : लक्ष्मणजी सहित प्रभु श्री रामजी वहाँ गए, जहाँ गोदावरी के तट पर उनका आश्रम था। आश्रम को जानकीजी से रहित देखकर श्री रामजी साधारण मनुष्य की भाँति व्याकुल और दीन (दुःखी) हो गए॥🚩
हा गुन खानि जानकी सीता।
रूप सील ब्रत नेम पुनीता॥
लछिमन समुझाए बहु भाँति।
पूछत चले लता तरु पाँती॥🚩
भावार्थ : (वे विलाप करने लगे-) हा गुणों की खान जानकी! हा रूप, शील, व्रत और नियमों में पवित्र सीते! लक्ष्मणजी ने बहुत प्रकार से समझाया। तब श्री रामजी लताओं और वृक्षों की पंक्तियों से पूछते हुए चले॥🚩
हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी।
तुम्ह देखी सीता मृगनैनी॥
खंजन सुक कपोत मृग मीना।
मधुप निकर कोकिला प्रबीना॥🚩
भावार्थ : हे पक्षियों! हे पशुओं! हे भौंरों की पंक्तियों! तुमने कहीं मृगनयनी सीता को देखा है? खंजन, तोता, कबूतर, हिरन, मछली, भौंरों का समूह, प्रवीण कोयल,॥🚩
कुंद कली दाड़िम दामिनी।
कमल सरद ससि अहिभामिनी॥
बरुन पास मनोज धनु हंसा।
गज केहरि निज सुनत प्रसंसा॥🚩
भावार्थ : कुन्दकली, अनार, बिजली, कमल, शरद् का चंद्रमा और नागिनी, अरुण का पाश, कामदेव का धनुष, हंस, गज और सिंह- ये सब आज अपनी प्रशंसा सुन रहे हैं🚩
श्री फल कनक कदलि हरषाहीं।
नेकु न संक सकुच मन माहीं॥
सुनु जानकी तोहि बिनु आजू।
हरषे सकल पाइ जनु राजू॥🚩
भावार्थ : बेल, सुवर्ण और केला हर्षित हो रहे हैं। इनके मन में जरा भी शंका और संकोच नहीं है। हे जानकी! सुनो, तुम्हारे बिना ये सब आज ऐसे हर्षित हैं, मानो राज पा गए हों। (अर्थात् तुम्हारे अंगों के सामने ये सब तुच्छ, अपमानित और लज्जित थे। आज तुम्हें न देखकर ये अपनी शोभा के अभिमान में फूल रहे हैं)॥🚩
किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं।
प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं॥
एहि बिधि खोजत बिलपत स्वामी।
मनहुँ महा बिरही अति कामी॥🚩
भावार्थ : तुमसे यह अनख (स्पर्धा) कैसे सही जाती है? हे प्रिये! तुम शीघ्र ही प्रकट क्यों नहीं होती? इस प्रकार (अनन्त ब्रह्माण्डों के अथवा महामहिमामयी स्वरूपाशक्ति श्री सीताजी के) स्वामी श्री रामजी सीताजी को खोजते हुए (इस प्रकार) विलाप करते हैं, मानो कोई महाविरही और अत्यंत कामी पुरुष हो॥🚩
🐦🐦जय हो प्रभु राम की➖जय हो राजाराम की🐦