06/12/2026
दिल्ली हाई कोर्ट ने न्यूज़क्लिक और उसके संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ दर्ज FIR और ED की कार्रवाई को खारिज करते हुए इसे "कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग" बताया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस आपराधिक आरोप नहीं था जिससे मनी लॉन्ड्रिंग या धोखाधड़ी का मामला बनता हो।
लेकिन सवाल सिर्फ कानूनी जीत का नहीं है।
वर्षों तक चली जांच, छापेमारी, बैंक खातों पर असर, संपत्तियों की जब्ती, पत्रकारों से पूछताछ और लगातार चलाए गए अभियानों ने न्यूज़क्लिक को गंभीर आर्थिक और संस्थागत नुकसान पहुँचाया। कई पत्रकारों, वीडियो संपादकों, तकनीकी कर्मचारियों और फ्रीलांस सहयोगियों की आजीविका प्रभावित हुई। जिन लोगों ने वर्षों तक जनता के मुद्दों को उठाया, उन्हें कानूनी अनिश्चितता और पेशेवर असुरक्षा का सामना करना पड़ा।
आज न्यूज़क्लिक अभी भी काम कर रहा है और अपनी पत्रकारिता जारी रखे हुए है, लेकिन यह स्पष्ट है कि इतने वर्षों की कार्रवाई ने संस्था को भारी नुकसान पहुँचाया है।
यदि अंत में अदालत यह कहती है कि मामला ही नहीं बनता था, तो क्या केवल बरी हो जाना पर्याप्त है? क्या उन पत्रकारों, कर्मचारियों और उनके परिवारों को हुए आर्थिक और मानसिक नुकसान की कोई जवाबदेही नहीं होनी चाहिए?
लोकतंत्र में स्वतंत्र पत्रकारिता का काम सत्ता से सवाल पूछना है, सत्ता की प्रशंसा करना नहीं। यदि जांच एजेंसियों का इस्तेमाल आलोचनात्मक मीडिया संस्थानों पर दबाव बनाने के लिए किया जाता है, तो यह सिर्फ एक मीडिया हाउस पर हमला नहीं, बल्कि नागरिकों के जानने के अधिकार पर हमला है।
न्यूज़क्लिक का मामला हमें याद दिलाता है कि प्रेस की स्वतंत्रता केवल संविधान की किताबों में नहीं, बल्कि संस्थाओं के व्यवहार में भी दिखनी चाहिए।
सवाल पूछना देशद्रोह नहीं है। पत्रकारिता अपराध नहीं है।