Sushil Shekhar

Sushil Shekhar Social Worker, Environmentalist

चुनाव प्रचार के दौरान कई तीखे राजनीतिक बयान और नारे चर्चा में रहे, जिनमें "हिंदू–मुस्लिम की राजनीति" और "कुत्ता-बिल्ली भ...
08/04/2026

चुनाव प्रचार के दौरान कई तीखे राजनीतिक बयान और नारे चर्चा में रहे, जिनमें "हिंदू–मुस्लिम की राजनीति" और "कुत्ता-बिल्ली भी बांकीपुर से जीत जाएगा" जैसे बयान भी शामिल थे।
चुनाव परिणाम आने के बाद बांकीपुर के मतदाताओं ने अपने वोट से स्पष्ट संदेश दिया कि लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता का होता है।

"राम के नाम लूट है, लूट सको तो लूट..."कबीर की इस पंक्ति को शायद किसी ने बहुत गंभीरता से ले लिया।जिस राम के नाम पर करोड़ो...
06/22/2026

"राम के नाम लूट है, लूट सको तो लूट..."

कबीर की इस पंक्ति को शायद किसी ने बहुत गंभीरता से ले लिया।
जिस राम के नाम पर करोड़ों लोगों की आस्था जुड़ी है, उसी राम के नाम पर चढ़ावे और दान को लेकर सवाल उठ रहे हैं। SIT जांच कर रही है, आरोप गंभीर हैं, और जनता जवाब चाहती है।

अगर आरोप गलत हैं, तो सच्चाई सामने आनी चाहिए। अगर आरोप सही हैं, तो दोषियों को सज़ा मिलनी चाहिए। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब देशभर के लोग श्रद्धा से दान देते हैं, तो उस धन की सुरक्षा और पारदर्शिता की जिम्मेदारी किसकी है?
आस्था जनता की है, लेकिन जवाबदेही भी होनी चाहिए। राम मंदिर किसी दल, संगठन या व्यक्ति की संपत्ति नहीं, करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रतीक है। राम के नाम पर राजनीति बहुत हुई, राम के नाम पर वोट भी बहुत मिले, लेकिन अगर राम के नाम पर भ्रष्टाचार हुआ है, तो यह सिर्फ आर्थिक अपराध नहीं, करोड़ों लोगों के विश्वास के साथ विश्वासघात है।

अब समय है कि जांच निष्पक्ष हो, पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक हो और सच देश के सामने आए। जय श्री राम का नारा लगाने से पहले, राम के आदर्शों—सत्य, मर्यादा और न्याय—को भी याद रखना होगा।

लखनऊ अग्निकांड एक बार फिर कई सवाल खड़े कर गया है।चाहे सरकार किसी भी पार्टी की हो, आम लोगों की जान शायद सिर्फ एक आंकड़ा ब...
06/22/2026

लखनऊ अग्निकांड एक बार फिर कई सवाल खड़े कर गया है।
चाहे सरकार किसी भी पार्टी की हो, आम लोगों की जान शायद सिर्फ एक आंकड़ा बनकर रह गई है। हर बड़ी दुर्घटना के बाद जांच, बयान और आश्वासन तो मिलते हैं, लेकिन क्या वास्तव में कोई सबक लिया जाता है?

हर बार वही लापरवाही, वही व्यवस्थागत खामियां, और फिर कुछ दिनों बाद सब कुछ भुला दिया जाता है। आखिर कब तक निर्दोष लोग अपनी जान गंवाते रहेंगे? कब तक हादसों के बाद सिर्फ संवेदनाएं और मुआवज़े बांटे जाते रहेंगे?

जरूरत सिर्फ दोषियों को ढूंढने की नहीं, बल्कि ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस और जवाबदेह व्यवस्था बनाने की है। पता नहीं यह सिलसिला कब तक चलता रहेगा, लेकिन हर खोई हुई जान हम सबकी सामूहिक विफलता की याद दिलाती है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने न्यूज़क्लिक और उसके संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ दर्ज FIR और ED की कार्रवाई को खारिज करते हुए ...
06/12/2026

दिल्ली हाई कोर्ट ने न्यूज़क्लिक और उसके संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ दर्ज FIR और ED की कार्रवाई को खारिज करते हुए इसे "कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग" बताया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस आपराधिक आरोप नहीं था जिससे मनी लॉन्ड्रिंग या धोखाधड़ी का मामला बनता हो।

लेकिन सवाल सिर्फ कानूनी जीत का नहीं है।

वर्षों तक चली जांच, छापेमारी, बैंक खातों पर असर, संपत्तियों की जब्ती, पत्रकारों से पूछताछ और लगातार चलाए गए अभियानों ने न्यूज़क्लिक को गंभीर आर्थिक और संस्थागत नुकसान पहुँचाया। कई पत्रकारों, वीडियो संपादकों, तकनीकी कर्मचारियों और फ्रीलांस सहयोगियों की आजीविका प्रभावित हुई। जिन लोगों ने वर्षों तक जनता के मुद्दों को उठाया, उन्हें कानूनी अनिश्चितता और पेशेवर असुरक्षा का सामना करना पड़ा।

आज न्यूज़क्लिक अभी भी काम कर रहा है और अपनी पत्रकारिता जारी रखे हुए है, लेकिन यह स्पष्ट है कि इतने वर्षों की कार्रवाई ने संस्था को भारी नुकसान पहुँचाया है।

यदि अंत में अदालत यह कहती है कि मामला ही नहीं बनता था, तो क्या केवल बरी हो जाना पर्याप्त है? क्या उन पत्रकारों, कर्मचारियों और उनके परिवारों को हुए आर्थिक और मानसिक नुकसान की कोई जवाबदेही नहीं होनी चाहिए?

लोकतंत्र में स्वतंत्र पत्रकारिता का काम सत्ता से सवाल पूछना है, सत्ता की प्रशंसा करना नहीं। यदि जांच एजेंसियों का इस्तेमाल आलोचनात्मक मीडिया संस्थानों पर दबाव बनाने के लिए किया जाता है, तो यह सिर्फ एक मीडिया हाउस पर हमला नहीं, बल्कि नागरिकों के जानने के अधिकार पर हमला है।

न्यूज़क्लिक का मामला हमें याद दिलाता है कि प्रेस की स्वतंत्रता केवल संविधान की किताबों में नहीं, बल्कि संस्थाओं के व्यवहार में भी दिखनी चाहिए।

सवाल पूछना देशद्रोह नहीं है। पत्रकारिता अपराध नहीं है।

दिल्ली के एक होटल में आग लगती है। बिहार के एक अस्पताल में आग लगती है। कई लोग अपनी जान गंवा देते हैं। टीवी चैनलों पर बहस ...
06/04/2026

दिल्ली के एक होटल में आग लगती है। बिहार के एक अस्पताल में आग लगती है। कई लोग अपनी जान गंवा देते हैं। टीवी चैनलों पर बहस होती है, नेताओं के बयान आते हैं, मुआवज़े की घोषणा होती है और जांच के आदेश दे दिए जाते हैं।

फिर क्या होता है?

लगभग वही जो हर बार होता है—कुछ दिनों तक शोर, कुछ दिनों तक संवेदनाएं, और फिर सब कुछ सामान्य।

हर बड़ी दुर्घटना के बाद कहा जाता है कि इससे सबक लिया जाएगा। अग्नि सुरक्षा नियमों की समीक्षा होगी। जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होगी। लेकिन वर्षों से हो रही ऐसी घटनाओं को देखकर सवाल उठता है कि हमने वास्तव में क्या सीखा? शायद कुछ भी नहीं।

होटल, अस्पताल, कोचिंग सेंटर, फैक्ट्री या आवासीय इमारत—दुर्घटना का स्थान बदल जाता है, लेकिन कारण अक्सर वही रहते हैं: लापरवाही, नियमों की अनदेखी और कमजोर जवाबदेही।

सबसे दुखद बात यह है कि मृतकों की संख्या कुछ दिनों तक सुर्खियां बनती है, फिर आंकड़ों में बदल जाती है। जिन परिवारों ने अपने प्रियजनों को खोया, उनके लिए यह जीवन भर का दर्द है। लेकिन व्यवस्था के लिए अक्सर यह सिर्फ एक और घटना बनकर रह जाती है।

यदि हर दुर्घटना के बाद वही गलतियां दोहराई जाएं, तो यह कहना कठिन है कि हमने कोई सबक सीखा है। असली श्रद्धांजलि केवल शोक व्यक्त करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।

दुर्भाग्य से, हमारा अनुभव यही बताता है कि कुछ महीनों बाद लोग इन घटनाओं को भूल जाएंगे, मीडिया किसी नए मुद्दे की ओर बढ़ जाएगा और व्यवस्था अगले हादसे का इंतजार करेगी।

जब भारत को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बताया जा रहा था, तब मीडिया चैनलों पर जश्न का माहौल था। घंटों तक बहसें ह...
06/04/2026

जब भारत को दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बताया जा रहा था, तब मीडिया चैनलों पर जश्न का माहौल था। घंटों तक बहसें हुईं, बड़े-बड़े दावे किए गए और इसे ऐतिहासिक उपलब्धि बताया गया। लेकिन आज जब भारत का शेयर बाज़ार पूंजीकरण (Stock Market Capitalization) के आधार पर दुनिया में सातवें स्थान पर खिसक गया है, तब वही मीडिया लगभग खामोश क्यों है?

अगर चौथे स्थान की खबर हेडलाइन बन सकती है, तो सातवें स्थान पर फिसलने की खबर भी उतनी ही प्रमुखता से दिखाई जानी चाहिए। मीडिया का काम केवल सकारात्मक खबरों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना नहीं, बल्कि जनता को पूरी और संतुलित तस्वीर दिखाना है।

हाल के दिनों में Bloomberg Economics की रिपोर्ट में यह दावा किया गया कि रुपये पर दबाव को कम करने और विदेशी मुद्रा भंडार को सहारा देने के लिए RBI ने सोने से जुड़े लेनदेन किए। हालांकि RBI ने इस व्याख्या को खारिज किया और कहा कि उसके भौतिक स्वर्ण भंडार में कोई कमी नहीं आई है।

साथ ही यह भी सच है कि रुपये पर दबाव बढ़ा, विदेशी निवेशकों की बिकवाली देखी गई और बाजार में अस्थिरता बनी रही। लेकिन इन मुद्दों पर उतनी चर्चा नहीं हुई जितनी उपलब्धियों के समय होती है।

सवाल किसी सरकार या पार्टी का नहीं है। सवाल मीडिया की निष्पक्षता का है। यदि उपलब्धियों का श्रेय दिखाया जाता है, तो चुनौतियों और कमजोरियों पर भी उतनी ही ईमानदारी से चर्चा होनी चाहिए।

लोकतंत्र में पत्रकारिता का उद्देश्य प्रचार करना नहीं, बल्कि जनता को तथ्य बताना और सत्ता से जवाबदेही मांगना है।

भारत को “दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था” बनने का ढिंढोरा पीटने वाले आज चुप क्यों हैं, जब खबर आ रही है कि भारत छठे...
04/24/2026

भारत को “दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था” बनने का ढिंढोरा पीटने वाले आज चुप क्यों हैं, जब खबर आ रही है कि भारत छठे स्थान पर फिसल गया है? जब रैंकिंग ऊपर जाती है तो इसे अपनी नीतियों की बड़ी उपलब्धि बताया जाता है, लेकिन जैसे ही गिरावट आती है, वही लोग या तो चुप्पी साध लेते हैं या बहाने बनाने लगते हैं। सच्चाई यह है कि अर्थव्यवस्था केवल रैंकिंग से नहीं, बल्कि रोजगार, महंगाई, आम लोगों की आय और जीवन स्तर से आंकी जाती है। अगर देश में बेरोजगारी बढ़ रही है, महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ रही है और छोटे व्यवसाय संघर्ष कर रहे हैं, तो केवल रैंकिंग का जश्न मनाना या गिरावट पर चुप रहना जनता के साथ ईमानदारी नहीं है। जिम्मेदार नेतृत्व का मतलब है अच्छे समय में श्रेय लेना ही नहीं, बल्कि खराब समय में जवाबदेही भी स्वीकार करना।

हाल ही में Raghav Chadha का Aam Aadmi Party छोड़कर Bharatiya Janata Party में जाना एक बड़ा राजनीतिक संदेश देता है। अपने ...
04/24/2026

हाल ही में Raghav Chadha का Aam Aadmi Party छोड़कर Bharatiya Janata Party में जाना एक बड़ा राजनीतिक संदेश देता है। अपने फैसले के बाद उन्होंने कहा कि AAP “अपने रास्ते से भटक गई है” और वे “गलत कामों का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे।”

लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में कई अहम सवाल खड़े होते हैं।

सबसे पहले—अगर वे वास्तव में इतने असंतुष्ट थे, तो क्या उन्हें अपनी अलग राजनीतिक राह नहीं बनानी चाहिए थी? क्या एक नई पार्टी बनाकर या स्वतंत्र रूप से जनता के बीच जाकर अपने सिद्धांतों को साबित करना ज्यादा ईमानदार कदम नहीं होता?

दूसरा बड़ा सवाल यह है कि जब वे AAP में इतने वर्षों तक महत्वपूर्ण भूमिका में रहे, तब उन्होंने पार्टी के कितने फैसलों या कामों की खुलकर आलोचना की? अगर पार्टी पहले से ही “भटक” रही थी, तो क्या उस समय उन्होंने सार्वजनिक रूप से इसका विरोध किया, या फिर सत्ता और पद में रहते हुए चुप्पी बनाए रखी?

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण विरोधाभास—जिन आरोपों या संकेतों के आधार पर उन्होंने AAP छोड़ी, क्या वही सवाल Bharatiya Janata Party पर भी समय-समय पर नहीं उठते रहे? विपक्ष लगातार BJP पर भी संस्थाओं के दुरुपयोग, राजनीतिक दबाव और पारदर्शिता की कमी जैसे आरोप लगाता रहा है। ऐसे में यह समझना मुश्किल है कि जो बातें AAP में अस्वीकार्य थीं, वे BJP में स्वीकार्य कैसे हो गईं।

यह कदम केवल एक दल बदल नहीं, बल्कि राजनीतिक विचारधारा की लचीलेपन—या कहें अवसरवाद—पर भी रोशनी डालता है। जनता के लिए यह तय करना कठिन हो जाता है कि नेता सिद्धांतों के आधार पर फैसले लेते हैं या परिस्थितियों के अनुसार अपने रुख बदलते हैं।

76 साल की उम्र में भी वही जुनून और समर्पण—यह पहचान है प्रणय रॉय की। भारतीय पत्रकारिता में उनका नाम विश्वसनीयता और गहराई ...
04/16/2026

76 साल की उम्र में भी वही जुनून और समर्पण—यह पहचान है प्रणय रॉय की। भारतीय पत्रकारिता में उनका नाम विश्वसनीयता और गहराई के साथ जुड़ा हुआ है।

NDTV की स्थापना से लेकर उसे एक भरोसेमंद समाचार मंच बनाने तक उनका सफर प्रेरणादायक रहा है। NDTV के मालिक से यहां तक पहुंचने की यात्रा में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन पत्रकारिता के प्रति उनका जुनून कभी कम नहीं हुआ।

इस उम्र में भी एक हाथ में मोबाइल से विजुअल लेते और दूसरे हाथ में माइक थामे, दिखाता है कि उनके अंदर आज भी वही पत्रकारिता का जुनून जिंदा है।

बिहार की राजनीति में आज सचमुच एक युग का अंत महसूस होता है। जंगल राज से  सुशासन तक का सफर सिर्फ बदलाव नहीं, एक नई पहचान क...
04/15/2026

बिहार की राजनीति में आज सचमुच एक युग का अंत महसूस होता है। जंगल राज से सुशासन तक का सफर सिर्फ बदलाव नहीं, एक नई पहचान की कहानी है। गड्ढों भरी सड़कों से चमचमाती राहों तक,
अंधेरे घरों से हर घर रोशनी तक, डर और अपराध के माहौल से कानून और व्यवस्था तक—यह परिवर्तन अपने आप नहीं आया, यह दूरदर्शी नेतृत्व और लगातार प्रयासों का परिणाम है।

आपने सिर्फ शासन नहीं किया, बल्कि बिहार को एक नई दिशा दी, एक नई सोच दी। विकास, विश्वास और व्यवस्था—इन तीन स्तंभों पर खड़ा आपका कार्यकाल हमेशा याद किया जाएगा।

आपके इस सफर को आने वाली पीढ़ियाँ प्रेरणा के रूप में देखेंगी।
आपका योगदान इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा।

Nitish Kumar

Adresse

National Institute Of Scientific Research
Quebec, QC
G1K9A9

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