राजेश कुमार पाटीदार तनोडिया

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31/12/2025
18/12/2025

रागनी हमेशा कहती थी “लव मैरिज करने वाले लोग सबसे ज़्यादा खुश रहते हैं..???
उसकी ज़िंदगी में अंश आया, और उसने सोचा अब उसकी ज़िंदगी किसी फिल्म की तरह खूबसूरत होगी।
दोनों ने घर वालों की मर्ज़ी के खिलाफ जाकर शादी की थी। कुछ महीनों तक सब अच्छा चला… पर वक्त बीतते-बीतते उनके बीच की दूरी बढ़ती चली गई।

शादी के एक साल बाद, एक दिन रागनी अपने मायके पहुँची — चेहरे पर मायूसी और मन में एक बड़ा फैसला लेकर।

“माँ, अब मैं अंश के साथ नहीं रहना चाहती। मैं तलाक लेना चाहती हूँ,” उसने धीरे से कहा।

माँ ने उसे गौर से देखा ...???
“बेटा, अगर तू खुश नहीं है तो मैं ज़बरदस्ती किसी रिश्ते को निभाने को नहीं कहूँगी। लेकिन सोच — शादी के बाद तेरे शौक़ बहुत बढ़ गए हैं। तेरे पापा की पेंशन बहुत ज़्यादा नहीं है। तेरे ये सारे खर्च कौन उठाएगा..????

रागनी ने तुरंत जवाब दिया ....
“माँ, आप चिंता मत करो। अंश की सैलरी तीन लाख से ऊपर है। तलाक के बाद मुझे अच्छी-खासी alimony मिलेगी। उससे मेरी और आपकी दोनों की ज़िंदगी आराम से कट जाएगी।

माँ कुछ देर चुप रही, फिर बहुत शांत स्वर में बोली....
“बेटा, जब तू उस इंसान से रिश्ता ही तोड़ रही है, तो उसके पैसों से रिश्ता कैसा...???
अगर तू पढ़ी-लिखी है, तो अपने दम पर कुछ कर।
क्यों किसी और की कमाई पर अपने सपनों की इमारत बनाना चाहती है..???
किसी का जीवन नर्क मत बना, उसे जीने दे — और खुद अपने पैरों पर खड़ी हो।

माँ की बात सुनकर रागनी के चेहरे के रंग उड़ गए।
वो सोच में पड़ गई ...
"अगर अलिमनी न मिली, तो क्या मैं सच में जी पाऊँगी..???

उसकी आँखों में पहली बार पछतावे की झलक थी।
उसे एहसास हुआ कि शायद वो प्यार नहीं, सुविधा ढूँढ रही थी।
वो चुपचाप अपने कमरे में चली गई — और बहुत देर तक आईने में खुद को देखती रही।
वो अब समझ चुकी थी ....
शादी सिर्फ साथ निभाने का नाम नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी और आत्मसम्मान का बंधन है।

सोचिए — आज के आधुनिक समाज में क्या सच में शादियाँ रिश्ता रह गई हैं, या बस एक सौदा बनकर रह गई हैं...???
कितने अंश रोज़ ऐसे फरेब में फँसते हैं, जिनकी ज़िंदगी किसी की “सुविधा” की क़ीमत चुकाती है।

अगर आपको यह कहानी सोचने पर मजबूर करे — तो इसे शेयर ज़रूर कीजिए।
क्योंकि शायद किसी की सोच एक कहानी से बदल जाए।
#कड़वी_सच्चाई #बेटे_हैं_कोई_खिलौना_नही

17/12/2025

एक वो दौर था जब पति भाभी को आवाज़ लगाकर अपने घर आने की खबर पत्नी को देता था,

पत्नी की छनकती पायल और खनकते कंगन बड़े उतावलेपन के साथ पति का स्वागत करते थे।

बाऊजी की बातों का 'हाँ बाऊजी-जी बाऊजी' के अलावा जवाब नही होता था।

आज बेटा बाप से बड़ा हो गया, रिश्तों का केवल नाम रह गया।

ये समय-समय की नही समझ-समझ की बात है।

बीवी को तो दूर बड़ो के सामने हम अपने बच्चों तक को नही बतलाते थे।

आज बड़े बैठे रहते है पर सिर्फ बीवी से ही बतियाते है।

दादू के कंधे मानो पोतों-पोतियों के लिए आरक्षित होते थे, काका जी ही भतीजों के दोस्त हुआ करते थे।

आज वही दादू 'OLD-HOUSE' की पहचान है, काकाजी बस रिश्तेदारों की सूची का एक नाम है।

बड़े पापा सभी का ख्याल रखते थे, अपने बेटे के लिए जो खिलौना खरीदा वैसा ही खिलौना परिवार के सभी बच्चों के लिए लाते थे।

'ताऊजी' आज सिर्फ पहचान रह गए और छोटे के बच्चे पता नही कब जवान हो गया?

दादी जब बिलोना करती थी

बेटों को भले ही छाछ दे पर मक्खन तो वो केवल पोतों में ही बाँटती थी।

दादी के बिलोने ने पोतों की आस छोड़ दी क्योंकि पोतों ने अपनी राह अलग मोड़ दी।

राखी पर बुआजी आते थे, घर मे नही मोहल्ले में फूफाजी को चाय-नाश्ते पर बुलाते थे।

अब बुआजी बस दादा-दादी के बीमार होने पर आते है, किसी और को उनसे मतलब नही चुपचाप नयननीर बरसाकर वो भी चले जाते है।

शायद मेरे शब्दों का कोई महत्व ना हो पर कोशिश करना इस भीड़ में खुद को पहचान ने की कि हम ज़िंदा है या बस "जी रहे" हैं।

ये समय-समय की नही समझ-समझ की बात है।

अंग्रेजी ने अपना स्वांग रचा दिया, शिक्षा के चक्कर में हमने संस्कारों को ही भुला दिया।

बालक की प्रथम पाठशाला परिवार व पहला शिक्षक उसकी माँ होती थी, आज परिवार ही नही रहे तो पहली शिक्षक का क्या काम?

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